अवसाद, उन्माद, आक्रामकता की औषधी है विजया

पूज्य अवधेशानंद गिरि


जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज ”पूज्य आचार्यश्री जी” 30 सितंबर 2023 को श्री सत्य सांईं सभागार, लोधी रोड़, नई दिल्ली में भारतीय ज्ञान-मनीषा के सम्मान हेतु आयोजित ”भारतीय धरोहर के वार्षिक सम्मान समारोह 2023” में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे।

अपने संबोधन में ”पूज्य आचार्यश्री जी” ने कहा कि भारतीय धरोहर के स्वरूप और संकल्पना को वृहद अर्थों में लेने की आवश्यकता है। जब आप अतीत को पढ़ेंगे तो अपनी विराटता का अनुभव होगा। जीवित वही है जिसने अक्षर ब्रह्म की उपासना की है। मैं बड़े विश्वास से कह रहा हूँ कि भारतीय धरोहर हमारी संस्कृति, दिव्य जीवनमूल्य और वैदिक मनीषा के रक्षण संवर्धन का कार्य कर रही है।

हमारी संस्कृति पर इतने प्रहार और कुठाराघात हुए फिर भी हम जीवन्त हैं। बड़े षड्यंत्र के साथ हमारी औषधियों से हमें विलग किया गया। हम प्रकृति से विकृति की ओर जाए ये मैकाले चाहता था, हम शिक्षा से गुरुकुल से दूर हो जाए ये मैकाले चाहता था। आज अमेरिका समेत पूरी दुनिया विजया, शतावर, जावित्री, नागरमोथा आदि औषधियों का उपयोग कर रही है। अमेरिका में लोग अवसाद, उन्माद, चिंता, आक्रमकता, आत्म हत्या की प्रवृत्ति के शिकार हैं ये वहां के वैज्ञानिकों का मानना है और इसलिए अमेरिका ने हाथ पसारकर सिर झुका कर विजया अर्थात भांग को स्वीकार किया है कि हमे भोले बाबा पर चढऩे वाली भांग बचा सकती है जिस विजया को षडयंत्र के तहत कलंकित किया गया है। आज पुरे अमेरिका में हल्दी का दूध, हल्दी की चाय पी जा रही है और सबसे अधिक प्रचलित तो तुलसी की चाय है। भारतीय धरोहर बड़ा कार्य कर रही है। भारतीय धरोहर के द्वारा ज्ञान-विज्ञान भारतीय मनीषा की रक्षा हो रही है। विश्व की सभी संस्कृतियाँ काल-कवलित हो गई, अतीत के गर्भ में खो गई। जो संस्कृति आज भी सम्पूर्ण विश्व पर शासन कर रही है, उसका नाम है – वैदिक हिन्दू संस्कृति। विश्वभर में जिस संस्कृति को स्वीकार किया गया है, वह है – सनातन वैदिक संस्कृति। हम थे, हम हैं और हम रहेंगे इसी का नाम सनातन है।

आइए ! अपने धर्म और जीवन मूल्यों का अनुपालन करें। अपनी संस्कृति विचार और स्वभाव में रहकर ही हम अजेय रह सकेंगे। हमारी संस्कृति ही हमें जीवन्त रखेगी।