सिन्धु-सरस्वती सभ्यता की लिपि

राजीव रंजन प्रसाद
एनएचपीसी में इंजीनियर तथा प्रसिद्ध लेखक


इतिहास का मजाक बनाने वालों में एक नाम राजेन्द्र प्रसाद सिंह का भी आता है। इनकी पुस्तक ‘इतिहास का मुआयना’ पढ़ते हुए सिन्धु घाटी सभ्यता पर लिखे उनके चुटकुले पढऩे को मिले। बुद्ध से पहले के बुद्ध सारा जहाँ बना रहे थे और आर्य घोड़े तथा तलवारें लिए टकाटक चले आ रहे थे, स्तूपों को तोड़ते हुए, क्योंकि वही तो थे जो हर जगह दिखाई देते थे। इनके हिसाब से सृष्टि से पहले स्तूप था, सृष्टि के बाद भी स्तूप होगा, चाँद पर स्तूप था और सूरज तो स्तूप का वही हिस्सा है, जो चमचमाता है और जिससे धरती पर रोशनी आती है। हास-परिहास अपनी जगह है। सनौली की खुदाई से प्राप्त निष्कर्षों ने जिस तरह परिहासकारों के एजेंडे उजागर किए हैं, उसी तरह आवश्यकता इस बात की भी है कि उस लिपि को पढ़ा जाए, जिसे अब तक अनपढ़ा बताकर तरह-तरह की सामाजिक दरारें पैदा की जाती रही हैं। बात हो रही है सिन्धु-सरस्वती घाटी सभ्यता की, जिसके अधिकतम रहस्यों से पर्दा तब उठ सकता है, जब इसकी लिपि को पढ़ लिया जाए।

सिन्धु-सरस्वती सभ्यता और इतिहास लेखन
भारतीय इतिहास का सिन्धु-सरस्वती सभ्यता से संबंधित पन्ना उतना भी अनजाना, अनपढ़ा और अबूझा नहीं है, जितना कि वामपंथी इतिहासकारों ने इसे बनाए रखने का प्रयास किया है। अनेक इतिहासकारों ने इतिहास लेखन में विद्यमान वामपंथी एकाधिकार को तोड़कर सच लिखने का साहस किया। इनमें डॉ. बी. बी. लाल की चर्चित पुस्तक ‘सरस्वती बह रही है’, भगवान सिंह की कृति ‘हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य’ तथा कृपाशंकर सिंह की ‘आर्य, ऋग्वेद और भारतीय सभ्यता ने बड़ी भूमिका निभाई है। इन पुस्तकों के माध्यम से हम सिन्धु-सरस्वती सभ्यता की वर्तमान तक की निरंतरता को स्थापित करने में समर्थ हो सकते हैं। इस निरंतरता को अब तक यह कहकर झुठलाया जाता रहा है कि सभ्यता की लिपि पढ़ी नहीं गई।

सिन्धु लिपि के उपलब्ध प्रमाण
सिन्धु-सरस्वती सभ्यता का जहाँ-जहाँ तक विस्तार ज्ञात है, वहाँ उत्खनन के दौरान मुहरें, धातु की वस्तुएँ, बर्तन आदि प्राप्त हुए हैं। चार हजार से भी अधिक ऐसी वस्तुएँ मिली हैं, जिन पर उस लिपि का अंकन है, जिसे सिन्धु-सरस्वती लिपि के रूप में पहचाना जाता है। इनमें से अनेक प्राप्तियों में ऊपर की ओर विशिष्ट लिपि अथवा लेखन के चिन्ह दिखाई पड़ते हैं और नीचे की ओर पशु का चित्र अंकित है। सिन्धु-सरस्वती लिपि का प्रथम साक्ष्य वर्ष 1853 में प्राप्त हुआ था। यहाँ से आरंभ कर वर्तमान तक इस लिपि के 400 से लेकर 700 तक चिन्हों की पहचान की गई है। विद्वानों के अनुसार इनमें मूल वर्ण लगभग 60 प्रतीत होते हैं। शेष चिन्ह अन्य वर्णों तथा मात्राओं के मेल से बने हुए माने जाते हैं। प्रथम दृष्टया विवेचना इसे चित्रात्मक लिपि निरूपित करती है। अर्थात प्रत्येक चिन्ह किसी ध्वनि, भाव अथवा वस्तु का सूचक रहा होगा। लिपि को बाएँ से दाएँ अथवा दाएँ से बाएँ पढ़ा जाता था, इसे लेकर विद्वानों में मतभिन्नता रही है। यहाँ यह ध्यान रखना होगा कि मुहरों में वर्णों के मिरर इमेज उत्कीर्णित किए गए होंगे, जिससे मूल छपाई में वे सीधे पढ़े जा सकें। इस आधार पर भी लेखन दिशा का सही भान नहीं किया जा सका है। सबसे बड़ी बात यह है कि अभी तक लिपि को समझने में मदद करने वाला कोई ज्ञात द्विभाषी शिलालेख उपलब्ध नहीं है।

लिपि को पढऩे के आरंभिक प्रयास
इन कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए यह देखना आवश्यक है कि क्या सिन्धु-सरस्वती सभ्यता की लिपि को पढऩे के वैज्ञानिक प्रयास हुए हैं? वस्तुत: इस लिपि को पढऩे के आरंभिक प्रयासों में वेडेन तथा तत्पश्चात नटवर झा आदि के प्रयासों का उल्लेख मिलता है। हालाँकि इन प्रयासों को व्यापक स्वीकृति नहीं मिली। आधुनिक तकनीक, ज्ञान और विज्ञान का प्रयोग इस लिपि को समझने के लिए किया जा सकता है। इस दिशा में हुए अनेक अन्य प्रयासों पर भी दृष्टि डाली जानी चाहिए। एक वैज्ञानिक प्रयास अंशुमाली मुखोपाध्याय ने किया, जो सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। उन्होंने सुप्रसिद्ध एपिग्राफिस्ट इरावाथम महादेवन द्वारा संकलित सिन्धु शिलालेखों के डिजिटल कॉर्पस का उपयोग किया। कम्प्यूटेशनल विश्लेषण के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि सिन्धु घाटी की लिपि ध्वन्यात्मक रूप से नहीं लिखी गई थी। उनके अनुसार सिन्धु लिपि के प्रतीक वस्तुओं और अवधारणाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे इस लिपि का संबंध प्राचीन द्रविड़ भाषा से होने की संभावना भी व्यक्त करती हैं। इस शोध में मुखोपाध्याय यह मानकर चलती हैं कि सिन्धु-सरस्वती लिपि के प्रतीक किसी वर्णमाला की तरह नहीं हैं। ऐसे में केवल प्रतीकों के आधार पर उसे किसी भाषा से जोड़ देना और निष्कर्ष पर पहुँच जाना जल्दबाजी कही जा सकती है।

सिन्धु लिपि और प्रोटो-ब्राह्मी का प्रश्न
इस कड़ी में रजत राकेश ने सिन्धु घाटी सभ्यता की मुद्राओं पर गहन कार्य किया और अपने निष्कर्षों के आधार पर इसे प्रोटो-ब्राह्मी के रूप में पहचानने का प्रयास किया। रजत राकेश के शोध के अनुसार उत्तर भारतीय लिपियों के अक्षरों को सिन्धु लिपि के क्रमिक विकास की परिणति के तौर पर देखा जा सकता है। उन्होंने ज्ञात ब्राह्मी लिपि और उसके अक्षरों के विकास पर काम किया तथा उनकी तुलना सिन्धु-सरस्वती सभ्यता की उपलब्ध मुहरों और पॉटरी के टुकड़ों पर मिले चिन्हों से की। अपने इस प्रयास में उन्होंने पाया कि सिन्धु घाटी के कई व्यंजन या तो ब्राह्मी के व्यंजनों से बिल्कुल मिलते हैं अथवा मामूली रूप से परिवर्तित हैं।
लिपि की पहचान तक तो यह शोध हमें पहुँचाता है, लेकिन भाषा को लेकर अस्पष्टता बनी रहती है। आज जब हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में हैं, अनेक एल्गोरिदम, मॉडल और समीकरण हमारे सामने हैं, जिनके माध्यम से अज्ञात को समझने का अब बेहतर प्रयास किया जा सकता है।

यज्ञदेवम का क्रिप्टोग्राम आधारित प्रयास
सिन्धु-सरस्वती सभ्यता की लिपि को समझने का एक बहुत ही विलक्षण प्रयास यज्ञदेवम द्वारा किया गया है। अकेडेमिया की वेबसाइट पर उनका विस्तृत कार्य शोधपत्र के रूप में उपलब्ध है। सिन्धु-सरस्वती सभ्यता की लिपि को यज्ञदेवम ने क्लाउड शैनन द्वारा वर्णित प्रक्रियाओं के अनुरूप एक बड़े क्रिप्टोग्राम के रूप में समझने का प्रयास किया है। उन्होंने प्रत्येक चिन्ह की गुत्थी को क्रमिक रूप से नियमित अभिव्यक्तियों और सेट-इंटरसेक्शन का उपयोग करके सुलझाने का प्रयास किया है।
क्रिप्टोग्राफी या क्रिप्टोलॉजी को सामान्य बोलचाल में कूट-लेखन भी कहा जा सकता है। इसका प्रयोग छिपी हुई सूचना के अध्ययन और सुरक्षित संप्रेषण में होता है। आधुनिक समय में एटीएम कार्ड, कंप्यूटर पासवर्ड और इलेक्ट्रॉनिक वाणिज्य आदि में कूट-लेखन की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस दृष्टि से यज्ञदेवम ने जिस पद्धति को अपनाया है, वह कूट-विश्लेषण की वैज्ञानिक परंपरा से जुड़ी हुई दिखाई देती है।

क्रिप्टोग्राफी और क्रिप्टोएनालिसिस
क्रिप्टोलॉजी को मुख्यत: दो भागों में बाँटा जाता है—क्रिप्टोग्राफी और क्रिप्टोएनालिसिस। इन प्रक्रियाओं के माध्यम से संदेशों एवं सूचनाओं को सुरक्षित तरीके से भेजा और प्राप्त किया जा सकता है। इसे सरलता से समझने के लिए हम युद्धकाल अथवा जासूसी के दौरान इसके प्रयोग का उदाहरण ले सकते हैं। भेजने वाला अपने संदेशों को कूटित अथवा एन्क्रिप्ट कर देता है, जिससे केवल वही व्यक्ति उसे समझ सके जिसके लिए संदेश भेजा गया है। यही प्रक्रिया क्रिप्टोग्राफी कहलाती है। इन गोपनीय संदेशों अथवा अबूझी कूट-लिपि को पढऩे का जो प्रयास किया जाता है, वह क्रिप्टोएनालिसिस कहलाता है। यज्ञदेवम का प्रपत्र पढ़ते हुए मुझे यह स्पष्ट हुआ कि किसी रोसेटा स्टोन के अभाव में भी सिन्धु-सरस्वती लिपि को पढऩे का प्रयास किया जा सकता है, ठीक उसी तरह जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सैन्य जासूस कूट लिपियों को पढऩे का प्रयास करते थे।

रोसेटा स्टोन से क्या सीख मिलती है?
रोसेटा स्टोन प्राचीन मिस्र की भाषा को समझने में मदद करने वाला एक गहरे रंग के पत्थर का टुकड़ा है, जो लगभग 2200 वर्ष पुराना है। जुलाई 1799 में नेपोलियन के आक्रमण के दौरान फ्रांसीसी सैनिकों ने इस पत्थर को मिस्र के अल-राशिद शहर के निकट खोजा था। रोसेटा स्टोन