प्रमुख पुरातात्विक स्थल

डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
पुरातत्व के जानकार


पूर्व सूचनाधिकारी, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख नगरों, जैसे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो, की खुदाई से सुनियोजित नगर-योजना, उत्कृष्ट जल-निकास व्यवस्था तथा पक्की ईंटों से निर्मित भवनों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। ये अवशेष उस समय की विकसित नागरिक व्यवस्था और उच्चकोटि की वास्तुकला का परिचय देते हैं। पाकिस्तान स्थित मोहनजोदड़ो भी इसी सभ्यता का एक महत्वपूर्ण नगर था। देश के विभाजन के बाद हड़प्पा और मोहनजोदड़ो पाकिस्तान में रह गए। यहाँ विभाजन के पश्चात भारत में प्राप्त प्रमुख उत्खनित स्थलों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत है।

लोथल, गुजरात
लोथल गुजरात के भाल क्षेत्र में भोगवा नदी के तट पर स्थित सिंधु घाटी सभ्यता का एक प्रमुख नगर तथा प्राचीन बंदरगाह था। यहाँ से प्राप्त विश्व का प्राचीनतम गोदीबाड़ा डॉकयार्ड इस बात का प्रमाण है कि यह नगर समुद्री व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र था। उत्खनन में मेसोपोटामिया और फारस से व्यापारिक संबंधों की पुष्टि करने वाली मुहरें, बाट, माप के उपकरण तथा अन्य व्यापारिक अवशेष प्राप्त हुए हैं।
इसके अतिरिक्त हड़प्पाकालीन मृदभांड, पाषाण एवं ताम्र उपकरण, मुहरें तथा विभिन्न प्रकार के माप-तौल के साधन भी मिले हैं। एक आवासीय भवन से सोने के दाने, सेलखड़ी की चार मुहरें, शंख एवं ताँबे की चूडिय़ाँ तथा मिट्टी से लेपित पात्र प्राप्त हुए हैं। यहाँ शंख-शिल्प और ताम्रकर्म से जुड़े कारीगरों के कार्यस्थलों के अवशेष भी मिले हैं। लोथल से युग्मित समाधियों तथा स्त्री-पुरुष शवाधानों के प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं।

धोलावीरा, गुजरात
गुजरात के कच्छ जिले में स्थित धोलावीरा सिंधु घाटी सभ्यता का एक अत्यंत विकसित और सुव्यवस्थित नगर था। अपनी विशिष्ट स्थापत्य एवं जल-प्रबंधन प्रणाली के कारण इसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है।
धोलावीरा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी उन्नत जल संरक्षण व्यवस्था है। वर्षा जल के संचयन के लिए यहाँ विशाल जलाशय, नालियाँ तथा अन्य संरचनाएँ निर्मित की गई थीं। अन्य हड़प्पा नगरों की अपेक्षा यह नगर तीन भागों—दुर्ग, मध्य नगर और निचले नगर—में विभाजित था। आयताकार योजना पर बसाया गया यह नगर उत्कृष्ट नगर-नियोजन और जल प्रबंधन का अनुपम उदाहरण है।

कालीबंगा, राजस्थान
राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्गर सरस्वती नदी के तट पर स्थित कालीबंगा एक प्रमुख प्राक्-हड़प्पा एवं हड़प्पाकालीन पुरास्थल है। इसकी खोज वर्ष 1952 में अमलानंद घोष ने की थी। यह विश्व के सबसे प्राचीन जुते हुए खेत तथा भूकंप के साक्ष्यों के लिए प्रसिद्ध है।
यह नगर ग्रिड-पद्धति पर बसाया गया था, जहाँ सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। अधिकांश मकान कÓची ईंटों से निर्मित थे। जल-निकास के लिए यहाँ पक्की ईंटों के स्थान पर लकड़ी की नालियों का प्रयोग किया जाता था, जो इसे अन्य हड़प्पा स्थलों से विशिष्ट बनाता है। उत्खनन में जुते हुए खेत, अग्निकुंड, चूडिय़ों के अवशेष तथा चबूतरों पर निर्मित सात अग्निवेदियों हवनकुंडों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं, जो तत्कालीन धार्मिक अनुष्ठानों और यज्ञ परंपरा की ओर संकेत करते हैं।

सिनौली, उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित सिनौली लगभग चार हजार वर्ष पुराना लगभग 2000-1800 ईसा पूर्व ताम्रपाषाणकालीन पुरातात्विक स्थल है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किए गए उत्खनन में यहाँ कांस्य युगीन शाही कब्रगाह, ताँबे की ढालें, तलवारें, मुकुट तथा तीलियों स्पोक्स रहित प्राचीन रथ प्राप्त हुए हैं। इन खोजों ने भारत की प्राचीन योद्धा संस्कृति के अध्ययन को नई दिशा प्रदान की है।

सिनौली से प्राप्त ताबूत, रथ, अस्त्र-शस्त्र तथा अन्य अवशेष इस क्षेत्र की विकसित सभ्यता के प्रमाण हैं। यह संस्कृति हड़प्पा सभ्यता के पतन तथा क्षेत्रीय संस्कृतियों, विशेषकर ओचर कलर्ड पॉटरी ओसीपी संस्कृति, के उदय के संक्रमणकाल का प्रतिनिधित्व करती है। यहाँ की दफन परंपराएँ, रथों के अवशेष तथा योद्धाओं से संबंधित सामग्री वैदिक साहित्य में वर्णित परंपराओं से उल्लेखनीय समानता प्रदर्शित करती हैं। इस दृष्टि से सिनौली सिंधु सभ्यता और प्रारंभिक वैदिक संस्कृति के मध्य एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है।

राखीगढ़ी, हरियाणा
राखीगढ़ी हरियाणा में स्थित विश्व का सबसे बड़ा हड़प्पाकालीन पुरास्थल है। यह सिंधु सभ्यता के सबसे बड़े और प्राचीन नगरों में से एक माना जाता है। उत्खनन से यहाँ सुनियोजित नगर-योजना, पक्के मकान, उन्नत जल-निकास व्यवस्था तथा व्यापारिक गतिविधियों के पर्याप्त प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
यहाँ मिले मानव कंकालों का डीएनए विश्लेषण भारतीय प्राचीन इतिहास के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाल के उत्खननों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एएसआई ने आठ नई कब्रों तथा तीन पूर्ण मानव कंकालों की खोज की है। इन अवशेषों को डीएनए परीक्षण हेतु भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण, कोलकाता भेजा गया है। कब्रों से प्राप्त मिट्टी के बर्तन, शंख की चूडिय़ाँ तथा आभूषण उस समय के लोगों की धार्मिक मान्यताओं और मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास का संकेत देते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ मनके निर्माण के केंद्र, ताँबे एवं सोने के आभूषण, मुहरें तथा विकसित नगर-योजना के अनेक प्रमाण भी मिले हैं।

आलमगीरपुर, उत्तर प्रदेश
मेरठ जिले में हिंडन नदी के तट पर स्थित आलमगीरपुर सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे पूर्वी पुरास्थल माना जाता है। यह हड़प्पा सभ्यता के अंतिम चरण का प्रतिनिधित्व करता है। स्थानीय रूप से इसे ‘परशुराम का खेड़ा’ अथवा ‘परशुराम का टीला’ भी कहा जाता है।
यहाँ से ताँबे के ब्लेड, मिट्टी की मुहरें, मनके, चूडिय़ाँ, कूबड़ वाले बैल एवं साँप की मृण्मूर्तियाँ तथा वस्त्रों की छाप वाले मृदभांड प्राप्त हुए हैं। ये अवशेष उस समय की शिल्पकला, वस्त्र-निर्माण तथा सांस्कृतिक जीवन की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।

हस्तिनापुर, उत्तर प्रदेश
मेरठ जिले में गंगा नदी के तट पर स्थित हस्तिनापुर भारत का अत्यंत प्राचीन एवं ऐतिहासिक नगर है। महाभारत के अनुसार यह कौरवों और पांडवों की राजधानी था। साथ ही यह जैन धर्म का भी एक प्रमुख तीर्थस्थल है।
प्रसिद्ध पुरातत्वविद् प्रो. बी. बी. लाल के नेतृत्व में किए गए उत्खनन में यहाँ से चित्रित धूसर मृदभांड Painted Grey Ware संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए, जिन्हें महाभारतकालीन संस्कृति से संबंधित माना जाता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस स्थल को संरक्षित घोषित किया है तथा यहाँ आज भी अनुसंधान एवं उत्खनन कार्य जारी हैं।

बैराट, राजस्थान
राजस्थान का बैराट प्राचीन काल का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक नगर है। परंपरा के अनुसार इसका संबंध राजा विराट से माना जाता है। यहाँ मौर्यकालीन बौद्ध स्तूप, विहार तथा अनेक पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं। सम्राट अशोक के शिलालेखों के कारण भी यह स्थल विशेष महत्व रखता है।
दक्षिण भारत के आदिचनल्लूर, चंद्रवल्ली और ब्रह्मगिरि जैसे स्थलों पर हुए उत्खननों ने भी भारतीय प्रागैतिहासिक संस्कृति के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसी प्रकार अजंता और एलोरा की शैलकृत गुफाएँ अपनी उत्कृष्ट मूर्तिकला एवं भित्तिचित्रों के माध्यम से प्राचीन भारतीय कला की समृद्ध परंपरा का परिचय देती हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद धोलावीरा, लोथल, कालीबंगा, राखीगढ़ी, बनवाली, कुणाल, सुरकोटडा, भगवानपुरा, नागेश्वर, कुंतसी तथा पादरी सहित भारत में सिंधु सभ्यता के लगभग 400 पुरातात्विक स्थलों की पहचान की जा चुकी है।

ऐतिहासिक एवं मौर्य-गुप्तकालीन स्थल
ऐतिहासिक काल लगभग 600 ईसा पूर्व से आगे मौर्य, शुंग, कुषाण, गुप्त तथा अन्य राजवंशों के उत्कर्ष का काल माना जाता है। तक्षशिला, सारनाथ, पाटलिपुत्र, नालंदा तथा अन्य स्थलों के उत्खनन से भवनों, स्तूपों, सिक्कों, अभिलेखों और मूर्तियों के रूप में बहुमूल्य पुरातात्विक सामग्री प्राप्त हुई है।

नालंदा, बिहार
नालंदा के प्राचीन महाविहार एवं अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के अवशेष उत्खनन के माध्यम से प्रकाश में आए। इसकी स्थापना पाँचवीं शताब्दी ईस्वी में गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम द्वारा की गई थी। यह तेरहवीं शताब्दी तक विश्व के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में से एक रहा।
नालंदा में देश-विदेश से विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते थे। यहाँ बौद्ध दर्शन के साथ-साथ व्याकरण, चिकित्सा, गणित, ज्योतिष, तर्कशास्त्र तथा अनेक विषयों का अध्ययन कराया जाता था। वर्तमान में यह स्थल यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है।

कुम्हरार, बिहार
पटना के समीप स्थित कुम्हरार प्राचीन पाटलिपुत्र का महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। यहाँ सर्वप्रथम एल. ए. वाडेल ने उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उत्खनन कार्य प्रारंभ किया। बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के डी. बी. स्पूनर ने विस्तृत उत्खनन कराया।
यहाँ प्रसिद्ध ‘अस्सी-स्तंभों वाला सभागार’ Eighty-pillared Hall प्राप्त हुआ, जिसे मौर्यकालीन स्थापत्य का अद्वितीय उदाहरण माना जाता है। पॉलिशयुक्त बलुआ पत्थर के स्तंभ तथा अन्य अवशेष मौर्यकाल की स्थापत्य-कला की उत्कृष्टता को प्रमाणित करते हैं।

सारनाथ, उत्तर प्रदेश
वाराणसी से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित सारनाथ बौद्ध धर्म का अत्यंत पवित्र तीर्थस्थल है। प्राचीन काल में इसे ऋषिपत्तन तथा मृगदाव के नाम से जाना जाता था। यहीं भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना प्रथम उपदेश दिया था, जिसे ‘धर्मचक्र-प्रवर्तन’ कहा जाता है।

उत्खनन में यहाँ धमेख स्तूप, अशोक स्तंभ, मूलगंध कुटी विहार तथा अनेक विहारों और स्तूपों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। सम्राट अशोक द्वारा स्थापित सिंहशीर्ष स्तंभ आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है।

बलिराजगढ, बिहार
बिहार के मधुबनी जिले में स्थित बलिराजगढ़ एक विशाल प्राचीन किलेबंद नगर है। उत्खनन से यहाँ मौर्य, शुंग, कुषाण, गुप्त तथा पाल काल के अवशेष प्राप्त हुए हैं। प्राचीन ईंटों की दीवारें, रिंग-वेल, आँगन, जल-निकास व्यवस्था, सिक्के, मुहरें, मिट्टी की मूर्तियाँ तथा अन्य पुरावशेष इस नगर की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के प्रमाण हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार बलिराजगढ़ प्राचीन विदेह राज्य का एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक एवं शहरी केंद्र रहा होगा। यहाँ प्राप्त पुरातात्विक सामग्री उत्तर भारत की प्राचीन नगरीय संस्कृति के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।