भारतीय संस्कृति के साधक : डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी

फिल्मकार, निर्देशक और लेखक डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी किसी परिचय से परे हैं। उन्होंने भारतीय संस्कृति, परंपरा और कथाओं को जन—जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसलिए उन्हें सांस्कृतिक संवर्धन के संवाहक के रूप में जाना जाता है। डॉ.चंद्रप्रकाश द्विवेदी का जन्म २६ फरवरी, १९६० को डोडूआ, सिरोही राजस्थान में हुआ था। उनकी शिक्षा और पारिवारिक पृष्ठभूमि ने उनके मन में भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक साहित्य के प्रति गहरी रुचि उत्पन्न की। चूँकि पिता स्वयं संस्कृत साहित्य, व्याकरण और वेदांत के प्राध्यापक थे तो घर में हमेशा से पौराणिक और सांस्कृतिक साहित्य का प्रवास बना रहा, जिस कारण उनमें पढऩे की एक आदत बनी, और वेदों, उपनिषदों को पढऩे का अवसर स्वत: ही बन पाया।

अश्वनी सिंह


भारतीय सिनेमा, टेलीविजन और साहित्य के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी। इन्होंने अपने जीवन को भारतीय संस्कृति, साहित्य और इतिहास के संवर्धन और संरक्षण के लिए समर्पित कर अपने ज्ञान और स्वाध्याय से भारतीय सांस्कृतिक और सामाजिक संवर्धन में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। उनका कार्यक्षेत्र विभिन्न माध्यमों में फैला हुआ है, जिसमें थिएटर, फिल्में, टेलीविजन, डॉक्युमेंटरी, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक संग्रहालय, लाइट एंड साउंड शो, आदि शामिल हैं, जो उनकी बहुमुखी प्रतिभा और भारतीय संस्कृति, इतिहास और साहित्य के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

डॉ. द्विवेदी के कार्य भारतीय संस्कृति और समाज पर गहरा प्रभाव डालते हैं। उनकी रचनाएं भारतीय इतिहास, संस्कृति और समाज की जटिलताओं को समझने और उनसे जुड़े मुद्दों पर विचार करने के लिए हमें प्रेरित करती हैं। उन्होंने अपनी कृतियों में भारतीय मूल्यों, परंपराओं और दर्शन को प्रमुखता से स्थान दिया है, जिससे भारतीय समाज और संस्कृति का संवर्धन हुआ।

उनकी शिक्षा और पारिवारिक पृष्ठभूमि ने उनके मन में भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक साहित्य के प्रति गहरी रुचि उत्पन्न की। चूँकि पिता स्वयं संस्कृत साहित्य, व्याकरण और वेदांत के प्राध्यापक थे तो घर में हमेशा से पौराणिक और सांस्कृतिक साहित्य का प्रवास बना रहा, जिस कारण उनमें पढऩे की एक आदत बनी, और वेदों, उपनिषदों को पढऩे का अवसर स्वत: ही बन पाया। इन सांस्कृतिक साहित्यों को पढऩे के दौरान उत्पन्न हुए प्रश्न और उत्तर के सिलसिले ने उन्हें इन रचनाओं और हमारे ऐतिहासिक नायकों और उनके जीवन पर शोध के लिए प्रेरित किया। इस कारण से उनका इन साहित्य और ऐतिहासिक नायकों के साथ एक प्रबल संबंध बना, जो आज भी उनके साथ है। और, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उन्हीं ऐतिहासिक नायकों ने उन्हें आज हमारे बीच स्थापित कर रखा है।

डॉ. द्विवेदी ने पढ़ाई के दिनों में ही स्वयं को थिएटर से जोड़ लिया था और एक लेखक, निर्देशक और अभिनेता के रूप में मंचन करने लगे। विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय स्तर पर उनके लिखे लघु नाटक ‘वेताल उवाच’, ‘एकलव्य’ और ‘खग्रास’ हैं, जो भारतीय पौराणिक कथाओं और महाभारत के पात्रों पर आधारित हैं।

थिएटर में कुछ वर्ष तक संलग्न रहने के बाद डॉ. द्विवेदी ने जनमानस के बीच लुप्त हो चुके राष्ट्रनायक अर्थशास्त्र के रचयिता ‘आचार्य चाणक्य (कौटिल्य)’ पर शोध करना शुरू किया। जो आने वाले भविष्य में भारतीय जनमानस और टेलीविजन के इतिहास को हमेशा के लिए बदलने वाला था।

वर्ष 1986 में डॉ. द्विवेदी ने टीवी धारावाहिक ‘चाणक्य’ का लेखन, आरम्भ किया और अनेक संघर्षों के बाद वर्ष 1991 में उसका प्रसारण हुआ। उन्होंने लेखन के अतिरिक्त धारावाहिक का निर्देशन भी किया और स्वयं अभिनय भी किया। जिसके गढ़े हुए संवाद, राष्ट्रीय सामाजिक चेतना, अखंड भारत के स्वप्न, राजनीति और दर्शन पर आचार्य विष्णुगुप्त के पाठ ने भारत के जनमानस में तहलका मचा दिया। ‘चाणक्य’ को आम जनमानस में एक विचारक, एक शिक्षक की तरह स्थापित करने का श्रेय भी डॉ. द्विवेदी को ही जाता है। जिन्होंने इस राष्ट्रीय नायक को आम जनमानस के बीच सजीव कर भारत की अखंडता और उसके नागरिकों में राष्ट्रीयता की अलख जगाने वाले एक साधारण से शिक्षक की उपयोगिता को रेखांकित किया। चाणक्य महज़ एक ऐतिहासिक पात्र नहीं, बल्कि हम सबके लिए एक प्रेरणा से ओतप्रोत आइना है जिसके सम्मुख खड़े होकर हम स्वयं को और अपनी शक्ति को जान पहचान सकते हैं।

कालजयी धारावाहिक ‘चाणक्य’ के निर्माण के बाद डॉ. द्विवेदी ने 1996 में ‘शिवाजी सावंत’ द्वारा लिखित उपन्यास ‘मृत्युंजय’ पर धारावाहिक बनाया, जो कि महाभारत के पात्र ‘कर्ण’ पर आधारित है। यह धारावाहिक ‘कर्ण’ के असामान्य व्यक्तित्व को चित्रित करता है, जिसे हम सब महाभारत के प्रतिनायक के रूप में जानते हैं।

धारावाहिक ‘मृत्युंजय’ के बाद डॉ. द्विवेदी ने वर्ष 1997 में टेलीविजन पर एक और प्रयोग किया, जिसका नाम था ‘एक और महाभारत’। यह प्रयोग महाभारत को एक नयी दृष्टि से देखने और समझने का प्रयास था। जिसे दर्शक और टीवी चैनल दोनों ने ही पूर्णत: अस्वीकार कर दिया। इस असफलता ने डॉक्टर द्विवेदी को फिर से महाभारत के अध्ययन और शोध के लिए विवश किया और उन्होंने प्रयोग और परंपरा के बीच परम्परा पर ध्यान देने की महत्ता को समझा और स्वीकार किया। एक अंतराल के बाद धारावाहिक से निकल फि़ल्मों में प्रवेश किया।

वर्ष 2003 में डॉ. द्विवेदी ने अपनी साहित्यिक रुचि अनुसार अपनी पहली फि़ल्म के लिए ‘अमृता प्रीतम’ के उपन्यास ‘पिंजर’ को चुना। इस फि़ल्म ने 1947 में भारत विभाजन की त्रासदी के दौरान होने वाले संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं को बहुत गहराई से छुआ। इस फि़ल्म के लिए डॉ. द्विवेदी को भारत सरकार द्वारा 51वाँ राष्ट्रीय पुरस्कार ‘राष्ट्रीय एकता सम्बन्धी सर्वोत्तम कथाचित्र के लिए नरगिस दत्त पुरस्कार’ भी मिला।

फि़ल्म ‘पिंजर’ की प्रसिद्धि और अनेक पुरस्कारों के बाद डॉ. द्विवेदी ने एक बार फिर से टेलीविजन की ओर रुख़ किया। इस बार वे टेलीविजन पर एक नए प्रयोग धारावाहिक ‘उपनिषद गंगा’ के साथ थे, जिसका मूल आधार हमारे उपनिषद थे। इस धारावाहिक का मूल उद्देश्य ही यही था कि उपनिषदों को आम जन की भाषा में इस तरह से कहना कि देखने वाले दर्शक उपनिषद, उसके मर्म और उसके दर्शन को आसानी से समझ सकें। ‘उपनिषद गंगा’ का प्रथम प्रसारण वर्ष 2012 में हुआ था। ‘उपनिषद गंगा’ ने भारतीय दर्शन और उपनिषदों के ज्ञान को सरल और समझने योग्य तरीके से प्रस्तुत किया।
धारावाहिक ‘उपनिषद गंगा’ के माध्यम से डॉ. द्विवेदी ने टेलीविजन पर अपने थिएटर के अनुभव का इस्तेमाल कर, थिएटर और टेलीविजन दोनों का मिश्रण कर एक नवीन और अद्भुत द्रश्य प्रस्तुत किया। जो आज भी दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय है। डॉ. द्विवेदी को ‘उपनिषद गंगा’ में थिएटर के इस प्रयोग के लिए वर्ष 2020 में ‘बी.एम. शाह-संगीत नाटक अकादमी’ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

धारावाहिक ‘उपनिषद गंगा’ के निर्माण के बाद, वर्ष 2012 में डॉ. द्विवेदी ने ‘डॉ. काशीनाथ सिंह’ के उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ पर ‘मोहल्ला अस्सी’ का निर्माण किया। इसके बाद वर्ष 2014 में, डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने फि़ल्म ‘जेड प्लस’ को लिखा और निर्देशित किया, जो ‘राम कुमार सिंह’ के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। फिर वर्ष 2019 में डॉ. द्विवेदी ने ‘सुराज्य संहिता’ को लिखा और निर्देशित किया। ‘सुराज्य संहिता’ वैदिक काल से लेकर हर्षवर्धन काल तक की शासन व्यवस्था और लोकसेवाओं के इतिहास को प्रामाणिकता और विस्तार से प्रस्तुत करती है।

इसके बाद वर्ष 2022 में डॉ. द्विवेदी ने एक और ऐतिहासिक राष्ट्र नायक ‘सम्राट पृथ्वीराज’ को बड़े पर्दे पर उकेरा। यह फि़ल्म अपने कालखंड, वास्तुकला और वेशभूषा को सजीवता से चित्रित करने के लिए सराही गयी। यह फि़ल्म बॉक्स ऑफि़स पर असफल रही पर सम्राट पृथ्वीराज को एक बार फिर से हम सब के बीच सजीव कर गयी।

डॉ.द्विवेदी को उनके सांस्कृतिक और सामाजिक संवर्धन और योगदान के लिए भारत सरकार, राज्य सरकारों एवं विभिन्न सांस्कृतिक संगठनों एवं संस्थानों से भी सम्मान और पुरस्कार मिले हैं।

हिन्दी भाषा को वैश्विक स्तर पर ले जाने और उसके उत्थान एवं विशिष्ट हिन्दी सेवा के लिए, डॉ. द्विवेदी को वर्ष 1992 में ‘उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ’ द्वारा ‘हिन्दी गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

वर्ष 2018 में डॉ. द्विवेदी को ‘केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा’ द्वारा ‘दीन दयाल उपाध्याय हिंदी सेवी सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

डॉ. द्विवेदी ने अपने कार्य के दौरान विभिन्न सरकारी और शैक्षिक संस्थानों में भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। वे वर्ष 2023 से, ‘पुणे विश्वविद्यालय’ की ‘डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी’ के नाट्य और चलचित्र पाठ्यक्रम के लिए मानद मार्गदर्शक हैं। वर्ष 2021 से ‘ऋषिहुड विश्वविद्यालय’, सोनीपत, हरियाणा के संस्थापक सदस्य हैं। इसके अलावा, वे बेंगलुरु, कर्नाटक के चाणक्य विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय सलाहकार बोर्ड में भी हैं।

उन्होंने भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा गठित केंद्रीय सांस्कृतिक सलाहकार बोर्ड और महात्मा गांधी की 150वीं जयंती और पंडित दीन दयाल उपाध्याय की 100वीं जयंती की स्मृति समिति के भी वे सदस्य रहे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा गठित केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड और कई अन्य सांस्कृतिक और शैक्षिक समितियों में भी सेवा दी है। 2023 में, डॉ. द्विवेदी को हरियाणा सरकार द्वारा ज्योतिसर, कुरुक्षेत्र में महाभारत पर संग्रहालय के लिए ऑडियो-विजुअल सामग्री के लेखक के रूप में नियुक्त किया गया। इसके अतिरिक्त उन्होंने साँची, उज्जैन, अयोध्या के दीप पर्व के इतिहास और महाकाल के पौराणिक आख्यान पर लाइट एंड साउंड शो के लिए लघु कथा लेखन भी किया है। भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश और सरस्वती नदी पर वृत्त चित्र के वे रचनात्मक निर्देशक रहे हैं। ह्व