श्री राजेंद्र सिंह जी ने भारत और भारतीयता के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया था। उन्होंने प्राचीन ज्ञान, परंपरा, संस्कृति, संस्कार, सभ्यता पर गहन शोध किया। उनका अध्ययन नौकरी या अपने व्यवसाय के लिए नहीं था। वे अध्ययन करते थे अपनी ज्ञानपिपासा को शान्त करने हेतु। यही कारण था कि एक सामान्य डिप्लोमा प्राप्त तकनीशियन होने के बाद भी उनके पास पुस्तकों का एक अनुपम भंडार था। पुस्तकें जिनका वे गहन अध्ययन करते थे, उन पर चिंतन-मनन करते थे और उसके निचोड़ को संप्रेषित करने के लिए तत्पर रहते थे।
रवि शंकर, निदेशक, सभ्यता अध्ययन केंद्र, दिल्ली
देश में जब से यूरोपीय शिक्षा व्यवस्था प्रारंभ हुई, तभी से शिक्षा तथा विद्वता का प्रमाणपत्र बाँटने का काम राज्य ने अपने हाथ में ले लिया। तब से यानी लगभग 1830-35 से लेकर आज तक के काल को मैं बौद्धिक दृष्टि से अंधकार का काल मानता हूँ। हालाँकि औपनिवेशिक मानस के प्रभावक्षेत्र से आच्छादित बहुत से लोग इसे भारत के पुनर्जागरण का काल मानते हैं, परंतु वस्तुत: यह काल भारत के बौद्धिक अंधकार का ही है। इस बौद्धिक अंधकार में भी भारतीय धरा ऐसे कुछ रत्न उत्पन्न करती रहती है, जो अपनी प्रभा से न केवल मार्ग प्रशस्त करते हैं, बल्कि यह विश्वास भी दिलाते हैं कि अंधकार का नाश संभव है। यह अलग बात है कि ऐसे विद्वानों को वर्तमान राज्यकेंद्रित तंत्र में वह स्थान प्राप्त नहीं हो पाता, जिसके वे वास्तविक अधिकारी होते हैं। स्वर्गीय राजेंद्र सिंह एक ऐसे ही विद्वान थे।
आधुनिक शिक्षा प्रणाली की दृष्टि से तो राजेंद्र सिंह को अधिक शिक्षित नहीं कहा जा सकता। यदि हम आधुनिक उपाधियों और शोधपत्रों के आलोक में उनकी विद्वता को जाँचें तो उसमें भी हम उन्हें कहीं नहीं पाएँगे। परंतु यदि हम ज्ञान और अध्ययन की बात करें तो राजेंद्र सिंह की गहराई और ऊँचाई दोनों को ही मापना कठिन होगा। उनका अध्ययन नौकरी या अपने व्यवसाय के लिए नहीं था। वे अध्ययन करते थे अपनी ज्ञानपिपासा को शान्त करने हेतु। यही कारण था कि एक सामान्य डिप्लोमा प्राप्त तकनीशियन होने के बाद भी उनके पास पुस्तकों का एक अनुपम भंडार था। पुस्तकें जिनका वे गहन अध्ययन करते थे, उन पर चिंतन-मनन करते थे और उसके निचोड़ को संप्रेषित करने के लिए तत्पर रहते थे।
सौभाग्य का विषय था कि राजेंद्र सिंह का संपर्क युवावस्था में ही वैद्य गुरुदत्त तथा पंडित भगवद्दत्त जैसे विद्वानों से हो गया था। उल्लेखनीय है कि उस समय कनॉट प्लेस में स्थित वैद्य गुरुदत्त का कार्यालय राजधानी दिल्ली का एक प्रमुख तथा जीवंत बौद्धिक केंद्र हुआ करता था। उनके कार्यालय में होने वाली बौद्धिक गोष्ठियों में श्री रामस्वरूप, श्री सीताराम गोयल, श्री बलराज मधोक, अशोक कौशिक जैसे लोग आया करते थे। राजेंद्र सिंह भी उनकी इस मंडली के सदस्य हो गए और वैद्य गुरुदत्त की बौद्धिक गतिविधियों में सहयोगी हो गए।
गुरुदत्त जी ने शीघ्र ही उनकी अध्येता—वृत्ति और शोध सामथ्र्य को पहचान कर इतिहास के विषयों पर लिखने के लिए प्रेरित किया। गुरुदत्त जी ‘शाश्वत वाणी’ नामक एक मासिक पत्रिका प्रकाशित करते थे। राजेंद्र सिंह ने उसमें अनेक विषयों पर गहन शोधपरक आलेख लिखे। इस प्रकार अध्ययन को अभिव्यक्ति का एक माध्यम मिला और फिर राजेंद्र सिंह जी ने पाञ्चजन्य तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में लिखना प्रारंभ किया।
राजेंद्र सिंह जी कई भाषाओं तथा लिपियों के जानकार थे। हिन्दी, संस्कृत के साथ पंजाबी पर उनकी अच्छी पकड़ थी। साथ ही वे देवनागरी, गुरुमुखी और फारसी लिपि पढ़ लेते थे। उन्होंने सिख साहित्य का गहन अध्ययन किया था। देश में सिख अलगाववाद का आंदोलन चरम पर चल रहा था। राजेंद्र सिंह जी ने सिख गुरुओं की राष्ट्रीय दृष्टि को सामने लाने के लिए भरपूर बौद्धिक उद्यम किया। इसी क्रम में काहन सिंह नाभा ने 19वीं शताब्दी में एक पुस्तक लिखी थी- ‘हम हिंदू नहीं।’ इसका उत्तर देते हुए वर्ष 1999 में राजेंद्र सिंह निराला ने पुस्तक लिखी—’हम हिंदू हैं।’ पंजाबी में लिखी इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद राजेंद्र सिंह जी ने किया।
नब्बे के दशक में ही श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर पहुँच रहा था। मामला सर्वोच्च न्यायालय में था और अयोध्या में बाबर के आक्रमण से पूर्व श्रीराम का मंदिर होने के साक्ष्य ढूंढे जा रहे थे। पुरातत्त्व विभाग अपना काम कर रहा था, इतिहासकार अपना काम कर रहे थे। राजेंद्र सिंह जी भी सर्वोच्च न्यायालय में गवाही देने के लिए प्रस्तुत हुए। समस्या यह थी कि वे किसी भी पक्ष की ओर से नहीं थे। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी परीक्षा ली कि उनमें गवाही देने की योग्यता है भी या नहीं और उनके पास कुछ साक्ष्य हैं या नहीं। न्यायालय ने उन्हें गवाही के योग्य पाया और इस प्रकार राजेंद्र सिंह जी ने न्यायालय को बताया कि बाबर के आने से पूर्व ही प्रथम गुरु नानकदेव जी महाराज ने श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर होने का वर्णन किया है। इस गवाही के दौरान उन्होंने जो साक्ष्य एकत्र किए, उन्हें बाद में एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित भी किया गया जिसका शीर्षक था—’सिख साहित्य में श्रीराम जन्मभूमि का इतिहास।’
राजेंद्र सिंह जी की कई विषयों में कार्य करने की इच्छा थी। उनका भारतीय इतिहास की कालगणना पर काफी अध्ययन था। विशेषकर वे महाभारत के काल तथा सृष्टि संवत् पर कार्य करने के लिए काफी प्रयत्नशील थे। इस संबंध में वे साहित्य भी एकत्र करते थे और इन पर कार्य करने वाले विद्वानों से संवाद भी करते रहा करते थे। उन्होंने कालगणना पर छिटपुट कुछ आलेख भी लिखे, जो प्रकाशित भी हुए। परंतु इस पर एक पुस्तक तैयार करने की भी उनकी इच्छा थी।
इस्लाम के सैद्धांतिक पक्ष पर भी उनकी गंभीर रुचि थी। उन्होंने कुरान को ठीक से पढ़ा था। उन्हें बड़ी संख्या में आयतें कंठस्थ भी थीं और उन्हें किसी भी चर्चा में उद्धरण देने के लिए पुस्तक खोलने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। वे कई बार दुख भी व्यक्त किया करते थे कि टेलीविजन चैनलों पर जो लोग इस्लाम पर चर्चा करने जाते हैं, उन्हें विषय की ठीक जानकारी नहीं होती।
पुराणों का भी राजेंद्र सिंह जी ने गहरा अध्ययन किया था। उन्हें रामायण, महाभारत और पुराणों के उद्धरण कंठस्थ थे। ऋषि दयानंद के भक्त राजेंद्र सिंह जी पर वैद्य गुरुदत्त और पंडित भगवद्दत्त जैसे आर्यसमाजियों का प्रभाव था और इस कारण वे सामान्य आर्यसमाजियों की भांति पुराणों का खंडन नहीं करते थे, बल्कि उनमें से भारत के इतिहास को जानने का प्रयास करते थे। राजेंद्र सिंह जी भारतीय विज्ञान परंपरा से भी काफी परिचित थे। भारतीय रसायन विज्ञान पर उनके पास कई पुरानी पुस्तकें थीं। उन्होंने स्वयं भी कई प्रयोग करके देखे थे। आयुर्वेद के दो सौ से अधिक ग्रंथ उनके पास थे और उन्होंने सारे पढ़े हुए थे।
सबसे बड़ी बात यह थी कि लगभग 67 वर्ष की आयु में भी उनमें युवाओं जैसा उत्साह था। फरीदाबाद से वे अकेले ही चल कर नियमित रूप से भारतीय धरोहर के कार्यालय आया करते थे। अपनी रूचि के विषयों पर कार्य करने और संदर्भ सामग्री एकत्र करने के लिए वे काफी भागदौड़ किया करते थे। उनकी एक समस्या थी कि उन्हें कम्प्यूटर पर हिंदी टाइप करना नहीं आता था। वे कई-कई बार कहा करते थे कि उन्हें एक टाइपिस्ट की आवश्यकता है जिससे वे अपने आलेख और पुस्तकें टाइप करवा सकें।
इस समस्या का समाधान उन्होंने मोबाइल टाइपिंग से निकाला। उन्होंने अपने मोबाइल से टाइप करके अपने आलेख सुरक्षित करना प्रारंभ किया। अपने फेसबुक पेज पर वे लंबे-लंबे आलेख लिखने लगे। इसके अलावा उन्होंने अपने जीमेल पर ढेर सारे आलेख ड्राफ्ट में लिख कर सुरक्षित कर दिए। उनकी इस लगन को देखकर उनके एक मित्र ने उन्हें एक टैबलेट भेंट में दे दिया। इसके बाद उनके कार्य की गति और बढ़ गई।
उनकी इच्छा थी कि देश में युवा विचारकों, लेखकों का समूह तैयार हो जो इन विषयों पर गंभीरता से कार्य करे। ऐसे युवाओं के साथ संवाद करने के लिए वे सदैव तत्पर रहा करते थे। उनमें ज्ञान और विद्वता का कोई अहंकार नहीं था, बल्कि वे कभी भी स्वयं को विद्वान नहीं मानते थे, स्वयं को एक अध्येता के रूप में ही प्रस्तुत करते थे। नई बात जानने के लिए वे सदैव तत्पर रहते थे, कभी भी यह नहीं कहते थे कि यह तो मैंने पढ़ रखा है, जबकि उन्होंने वह सब वास्तव में पढ़ा हुआ था। ऐसी सहजता और सरलता के साथ वे अपनी बात रखते थे कि लोग निरुत्तर हो जाते थे।
राजेंद्र सिंह जी आज हमारे बीच में नहीं हैं। अल्पायु में ही उनका देहावसान हो गया। ऐसे सहज और स्वाभाविक विद्वानों की देश को काफी आवश्यकता है। आज आवश्यकता है डिग्री से बाहर निकल कर विद्वता का सम्मान करने की। ऐसे विद्वानों को शिक्षा तथा शोध तंत्र में स्थान देने की।





