भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की झलक

पुस्तक का नाम – सार्थवाह
लेखक – डॉ. मोतीचंद्र, मूल्य – 280 रूपये मात्र, पृष्ठ – 333
प्रकाशन – बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, उपलब्धता: यह पुस्तक https://archive.org से डाउनलोड की जा सकती है।


प्राचीन काल में यात्रा करने के लिए आधुनिक युग जैसे आवागमन के साधन तो थे नहीं अत: लोग पैदल या घोड़ों, खच्चरों, ऊँटों इत्यादि पर यात्रा किया करते थे। यात्रा अगर लम्बी होती थी तो इसमें महीनों लग जाया करते थे। यात्रियों को इन लम्बे मार्गों पर विभिन्न प्रकार के अवरोधों और खतरों का सामना करना पड़ता था। यात्राएं करने वालों में विद्यार्थी एवं विद्वानगण, तीर्थयात्री, सैन्य समूह (सेनायें) इत्यादि हुआ करते थे। इनके अतिरिक्त यात्राएं करने वाला एक और वर्ग भी होता था जो कि यात्रा के मामले में उपरोक्त सभी वर्गों से सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण था—व्यापारियों का समूह, क्योंकि व्यापारीगण ही सबसे ज्यादा यात्राएं किया करते थे और मार्गों का निर्धारण और निर्माण वस्तुत: व्यापारिक यात्राओं के आधार पर होता था न कि अन्य वर्गों द्वारा की जाने वाली यात्राओं के। अन्य वर्गों के यात्री भी वस्तुत: व्यापारियों द्वारा निर्धारित/निर्मित मार्ग का ही अनुसरण करते थे।

ऐसे व्यापारिक यात्रियों के समूहों का एक मुखिया या नायक हुआ करता था जिसके नेतृत्व में व्यापारिक काफिला चलता था। काफिलों का यह मुखिया मार्गों, उसपर पडऩे वाले अवरोधों और खतरों और उनके निवारण के उपायों इत्यादि को भली भांति जानने-समझने वाला होता था। प्रस्तुत पुस्तक का नाम ‘सार्थवाह’, ‘सार्थ’ और ‘वाहक’ को मिला कर बना है जिसमे ‘सार्थ’ का अर्थ है ‘व्यापारिक काफिला/दल/समूह’ और ‘वाहक’ का अर्थ है दिग्दर्शक, मुखिया या नायक। इस प्रकार ‘सार्थवाह’ शब्द का अर्थ हुआ ‘व्यापारिक काफिले का दिग्दर्शक, मुखिया या नायक’। प्रस्तुत पुस्तक का नाम भले ही ‘सार्थवाह’ है परंतु पुस्तक की विषय-वस्तु किसी ‘सार्थवाह’ की जीवनी या कर्तव्यों के बारे में ही नहीं है बल्कि प्राचीन काल से मध्य काल तक मुख्य व्यापारिक मार्गों के इर्द-गिर्द घूमता भारतवर्ष का आर्थिक, सामाजिक लोकाचार और राजनैतिक, सैन्य इतिहास के विषय में है।

इस पुस्तक के माध्यम से प्राचीनकाल में व्यापारिक समूहों को मार्गों में किन प्रकार कि कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था और उन कठिनाइयों का कैसे सामना किया जाता था, इन बातों की जानकारी हमें मिलती है। राज्यों द्वारा व्यापारिक मार्गों पर कौन कौन सी सुविधाएँ प्रदान कि जाती थी, पथों पर राज्यों द्वारा व्यापारियों और यात्रियों की सुरक्षा के क्या उपाय किये जाते थे इत्यादि बातों की जानकारी इस पुस्तक में दी गयी है।

इसके अतिरिक्त यह पुस्तक प्राचीन काल से मध्यकाल तक की भारतवर्ष की सामाजिक-आर्थिक संस्कृति को बहुत ही उत्तम ढंग से प्रस्तुत करती है। राज्य द्वारा व्यापारियों से लिए जाने वाले कर का निर्धारण कैसे होता था,किस किस काल में भारतवर्ष का व्यापार किन किन राज्यों और संस्कृतियों के साथ होता रहा है; इस विषय पर तो यह सर्वोत्कृष्ट ग्रन्थ है। प्राचीन काल में भारतवर्ष आर्थिक और व्यापारिक रूप से कितना विकसित और व्यापक था वह इस पुस्तक को पढने से सहज ही ज्ञात हो जायेगा। मौर्य काल और गुप्त काल में भारतवर्ष की आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य को बहुत ही उत्तम ढंग से प्रस्तुत किया गया है। संस्कृत, बौद्ध और जैन साहित्यों की लोक-कथाओं के उद्धरण से प्राचीन भारतवर्ष की आर्थिक व्यापारिक गतिविधियों और व्यापारिक संस्कृति का एक अत्यंत ही उत्कृष्ट खाका खीचा गया है। किन किन देशों के और किन किन संस्कृतियों को मानने वाले भारतवर्ष में व्यापार के लिए आते थे और भारत के व्यापारी किन किन देशों में व्यापार के लिए जाते थे हमें सहज में ही पता चलता है। भारतवर्ष से किन किन वस्तुओं का निर्यात होता था तथा कहाँ कहाँ से किस किस वस्तु का आयात होता था इन सभी की जानकारी हमें मिलती है।

व्यापारिक गतिविधियों के अलावा इस पुस्तक में विभिन्न युगों के देशी विदेशी यात्रियों और उनके द्वारा वर्णित विभिन्न स्थानों और लोकाचार का भी बहुत ही अच्छा विवरण इस पुस्तक में मिलता है। प्राचीन काल में भारतवर्ष से समुद्र-मार्ग से किये जाने वाले व्यापार का भी व्यापक विवरण है। किन किन देशो से सामुद्रिक व्यापार होता था, समुद्र मार्ग से किन किन वस्तुओं का व्यापार होता था, समुद्र मार्ग से व्यापार में किन प्रकार की समस्याओं का सामना करना होता था, इस बारे में में अच्छी जानकारी है।

जिस सन्दर्भ में यह पुस्तक थोड़ा निराश करती है वह है भारतीय इतिहास का कालक्रम। लेखक ने भारतीय इतिहास के कालक्रम को ठीक ठीक उसी तरह मान लिया है जैसा कि अंग्रेजों ने प्रतिपादित किया। इसके अतिरिक्त लेखक ने भारतवर्ष पर काल्पनिक ‘आर्य आक्रमण’ को भी सत्य मानते हुए भी कुछ लिखा है। चूँकि यह पुस्तक 1952 में लिखी गई है जिस समय इन मान्यताओं की तूती बोलती थी, अत: इस बात को ध्यान में रखते हुए लेखक की इस त्रुटि को अनदेखा किया जा सकता है। कुल मिलााकर अगर इस पुस्तक के तथ्यों को सही कालक्रम में विश्लेषित किया जाय तो यह प्राचीन भारतीय आर्थिक गतिविधियों, लोकाचार और संस्कृति पर एक बहुत ही ज्ञानवर्धक पुस्तक साबित होगी।

प्रशांत सिंह