सत्य को नारायण समझे मीडिया

आदित्य अवस्थी
शोधार्थी, जम्मू—कश्मीर अध्ययन केंद्र, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय


समाज का इतिहास तकनीकी प्रगति का इतिहास रहा है। प्रौद्योगिकी निर्धारणवाद का सिद्धांत प्रौद्योगिकी और समाज की प्रकृति के बीच एक कारणात्मक संबंध स्थापित करते हुए यह प्रतिपादित करता है कि समाज की तकनीक ही उसके सामाजिक ढांचे और सांस्कृतिक मूल्यों के विकास को प्रेरित करती है। समकालीन राजनीतिक और मीडिया परिदृश्य में तकनीकी निर्धारणवाद की अपनी सीमाएँ हैं। मैकलुहान का ‘माध्यम ही संदेश है’ जहां प्रौद्योगिकी की भूमिका को रेखांकित करता है, वहीं यह संचार के एक महत्वपूर्ण घटक—संदेश की सामग्री और संदेश देने वाले व्यक्ति के चरित्र की उपेक्षा करता है। ‘माध्यम ही संदेश है’ का सिद्धांत मनुष्य को एक ऐसा असंवेदनशील प्राणी मानता है, जो संदेश की प्रामाणिकता को समझने में असमर्थ है।

वर्तमान के इस प्रकार के संचारीय परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में डॉ. जयप्रकाश सिंह की पुस्तक ‘नारदीय संचार नीति’ नेतृत्व की भूमिका, व्यक्तिगत ईमानदारी और विश्वसनीयता का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत करती है। सार्वजनिक कूटनीति के क्षेत्र में, अंतत: संचार का प्रभाव व्यक्ति के चरित्र की शक्ति पर निर्भर करता है, न कि केवल माध्यम पर।

भारतीय संस्कृति सदैव से एक ”संवादी संस्कृति” रही है। संवाद की प्रक्रिया भारतीय संचार परंपरा का एक महत्वपूर्ण घटक रही है; यह विभिन्न दृष्टिकोणों के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करती है। भारतीय परंपरा में संवाद न केवल सांस्कृतिक धारा के अंतर्गत हुआ है, बल्कि बाहरी प्रवाहों से भी संवाद स्थापित किया है। यम-नचिकेता, याज्ञवल्क्य-गार्गी, श्रीकृष्ण-अर्जुन के संवाद इसके प्रमुख उदाहरण हैं। लेखक ने अपनी पुस्तक में देवर्षि नारद के संवादों का विस्तार से वर्णन किया है, जिनमें श्रीकृष्ण, महर्षि गालव, युधिष्ठिर, असितदेवल और स्रंजय से संवाद प्रमुख हैं। नारद जी की प्रह्लाद को दी गई शिक्षा, साम्ब को सूर्यनारायण की पूजा करने की सलाह और शुकदेव को दिए गए उपदेश भी पुस्तक में विशेष स्थान रखते हैं। डॉ. सिंह ने उन घटनाओं का भी उल्लेख किया है, जिनमें देवर्षि नारद एक प्रेरक शक्ति और उत्प्रेरक के रूप में कार्य करते हैं।

भारतीय संचार मूल्यों का आकलन पश्चिमी मानदंडों के आधार पर नहीं किया जा सकता है और न ही इन्हें पश्चिमी स्वीकृति की आवश्यकता है। डॉ. जयप्रकाश सिंह, जो कि एक हाइब्रिड वारफेयर विशेषज्ञ हैं तथा भारतीय संचार परंपरा के विद्वान हैं, ने बेहद रुचिकर तरह से डिजिटल युग में प्रासंगिक संचारीय दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया है। उन्होंने अपनी पूर्ववर्ती पुस्तक संपूर्ण संचारविद आचार्य अभिनवगुप्त में ‘स्वत्व’ और ‘शील तथा संचार की अविच्छेद्यता’ की अवधारणा प्रस्तुत की थी, जिसे उन्होंने अपनी नवीन कृति ‘नारदीय संचार नीति’ में एक कदम आगे बढ़ाते हुए ”शील ही संदेश है” का सिद्धांत प्रतिपादित किया है। अधिकांश सभ्यताओं में ‘सत्य’ और ‘शक्ति’ के बीच अस्पष्टता रही है, जो अंतत: संघर्ष को जन्म देती है। परंतु भारतीय सभ्यता में सत्य को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। देवर्षि नारद, सत्यनारायण कथा के माध्यम से, ‘सत्य’ को ‘नारायण’ के रूप में प्रतिष्ठित कर सत्य को एक परम मूल्य के रूप में स्थापित करते हैं। डॉ. जयप्रकाश अपनी पुस्तक में एक महत्वपूर्ण विचार रखते हैं कि यदि मीडिया ‘सत्य’ को ‘नारायण’ माने, तो वह 21वीं सदी में ‘विश्वसनीयता संकट’ से उबर सकता है।

‘नारदीय संचार नीति’ संचार, वैश्वीकरण की चुनौतियों, संचार माध्यमों पर तकनीकी विकास के प्रभाव, नैरेटिव युद्ध, मीडिया में ‘सत्य’ की स्थिति और देवर्षि नारद की असाधारण संवाद शैली को गहराई से जोड़ती है। यह पुस्तक भारतीय संचार मूल्यों पर प्रकाश डालती है, जो फेक न्यूज़, डीप फेक, ट्रोलिंग और संचार प्रक्रिया के तकनीकी पक्ष पर बढ़ते जोर के युग में विशेष रूप से प्रासंगिक हैं। हालांकि, डॉ. जयप्रकाश सिंह यदि अध्यायों का अधिक सुव्यवस्थित निर्माण करते, तो यह नए पाठकों के लिए और अधिक स्पष्ट और बोधगम्य होती।