द्रविड़ और दलित विमर्श या षड्यंत्र

पुस्तक का नाम – ब्रेकिंग इंडिया
लेखक – राजीव मल्होत्रा, अरवदिन नीलकंदन, मूल्य – 695 रूपये मात्र, पृष्ठ – 640,
उपलब्धता: यह पुस्तक //breakingindia.com/ से मंगवा सकते हैं।


सनातन धर्म पर गम्भीर अध्ययन के लिए कुछ लोगों ने हिन्दू समाज से धन एकत्रित किया क्योंकि वे चाहते थे कि धर्म पर गम्भीर अध्ययन हो। उन्होंने वह पैसा दुनिया की विभिन्न महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों को सौंपा क्योंकि वे अपने यहां धर्म पर अध्ययन प्रारम्भ करें। पैसा उपलब्ध कराने वालों ने लगातार भूल की। वे भूल गए कि विदेशी विश्वविद्यालयों को जो पैसा वे उपलब्ध करा रहे हैं, उस पैसे पर और वहां होने वाले अध्ययन पर विश्वविद्यालय का ही नियंत्रण होगा। हावर्ड विश्वविद्यालय, कोलम्बिया विश्वविद्यालय, प्रिस्टन विश्वविद्यालय, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय को इसी उद्देश्य से सनातनियों ने पैसा उपलब्ध कराया कि वे सनातन धर्म पर कुछ गम्भीर अध्ययन करेंगे लेकिन इससे समस्या का समाधान होने की जगह और गम्भीर हुई। भारतीयों का पैसा ही सनातन धर्म के खिलाफ इस्तेमाल होने लगा। राइट विंग नैरेटिव को लेकर इस देश में इक्कीसवी सदी शुरू होने से पहले किसी विमर्श को इतनी गम्भीरता से स्वीकार्यता पाते नहीं देखा। जिन लोगों ने इस राइट विंग नैरेटिव को स्थापित करने की दिशा महत्वपूर्ण काम किया और उन षडयंत्रों के ऊपर से पर्दा हटाया जो दशकों से इस देश में चल रहा था तो उसमें एक महत्वपूर्ण नाम राजीव मल्होत्रा का है। इन्हीं राजीव मल्होत्रा ने अरविन्दन नीलकन्दन के साथ मिलकर ‘ब्रेकिंग इंडिया’ के नाम से एक किताब लिखी। यह किताब भारत में द्रविड़ और दलित फाल्टलाइन पर पश्चिमी देशों के निवेश के पीछे के षडयंत्र पर बड़े—बड़े खुलासे करती है और पढऩे वाले की आंखे ऐसे खोलती हैं कि वह खुली की खुली रह जाती है।
भारतीयों के बीच भारतीय नैरेटिव को स्वीकार्यता दिलाना भी इतना आसान काम नहीं है। इस देश में सैकड़ों सालों से अपनी परम्परा—संस्कृति और पहचान से नफरत करने का ऐसा प्रशिक्षण दिया गया है कि वापस देश के एक—एक नागरिक को अपनी देश—माटी पर अभिमान हो, इसके लिए भी बहुत प्रयास की आवश्यकता है।

नैरेटिव को लेकर जब दुनिया भर के विश्वविद्यालयों ने निराश किया तो राजीव मल्होत्रा ने इसका विकल्प निकाला और विद्वानों की अपनी टीम बनाई। अपने अध्ययन के दम पर रिसर्च पेपर प्रकाशित किया। किताबें लिखी। वीडियो बनाएं। वह लोकप्रिय हुईं। इस तरह राजीव मल्होत्रा ने एक माडल खड़ा किया। अब इस दिशा में दूसरे विद्वान भी अपने अपनी—अपनी क्षमता के अनुसार काम कर सकते हैं। अब ना प्रकाशन कोई बड़ी चुनौती है और ना लोगों तक पहुंचना। बस कटेन्ट अच्छा होना चाहिए।
दुनिया भर में ऐसे सनातनी और दूसरे पंथों के मानने वाले लोग करोड़ों की संख्या में मौजूद हैं, जो दुनिया की सबसे पुरानी संस्कृति को जानना और समझना चाहते हैं। जब भारतीय संस्कृति—परम्परा और धर्म को समझने वाले समूह से लोग अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों और कांफ्रेन्स में जाकर हमारी बात रखेंंगे तब जाकर हमारी बात सही तरीके से दुनिया के सामने पहुंचेगी।

राजीव मल्होत्रा ने अपने प्रयास से ‘राजीव मल्होत्रा आफिसिअल’ के नाम से एक यू ट्यूब चैनल भी शुरू किया। जिसे जाकर हमें सुनना चाहिए। हम विरोधी मत के लोगों को पैसा देकर सोचें कि वे भारतीय परम्परा के लिए कुछ सकारात्मक करेंगे। यह हमारी भूल है। हमें दुख इस बात का करना चाहिए कि हम आज तक नालंदा और तक्षशीला का गौरव दुहरा रहे हैं लेकिन हमारे पास पूरी दुनिया के लिए उदाहरण बने, ऐसा एक विश्वविद्यालय नहीं है। हमारे पाठ्यक्रम में दशकों से कई ऐसी बातें पढ़ाई जा रहीं हैं, जिससे भारतीय होने का गौरव कम होता है। हम पाठ्यक्रम सुधार की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा पाएं हैं। श्री मल्होत्रा के अनुसार विरोधी मत के विश्वविद्यालयों को सनातन धर्म पर अध्ययन के लिए पैसा उपलब्ध कराना, मगरमच्छ को खाना खिलाने जैसा है। आप उसे चाहे कितना भी खाना खिलाएं, जिस दिन उसे अवसर मिलेगा वह आपको निगलने से परहेज नहीं करेगा। मगरमच्छ का डीएनए, मगरमच्छ का डीएनए है। वह आपका प्यारा छोटा कुत्ता नहीं हो सकता। जिसे आप खाना खिलाकर वफादारी की उम्मीद रखें। आप दूसरी सभ्यता के लोगों के भरोसे अपना विमर्श नहीं खड़ा कर सकते। आपको अपना विमर्श तैयार करने के लिए अपनों के अंदर आत्मसम्मान पैदा करना होगा और विद्वानों की एक आर्मी तैयार करनी होगी। जो पूरी दुनिया में भारत का प्रतिनिधित्व कर सके। सनातनियों की तरफ से अपनी बात रख सकें।

जब आप 650 पृष्ठों की किताब ब्रेकिंग इंडिया से गुजरेंगे, इस किताब को पढऩे के साथ—साथ आपको ऐसा महसूस होगा कि आंखों पर चढ़ाए गए झूठ की कई परतों में से एक परत उतर गई। यह किताब लक्षणों की बात नहीं कर रही है। राजीव मल्होत्रा ने अपनी किताब में बीमारी को पकडऩे की कोशिश की है। इस किताब से पहले हम हर बार सिर्फ लक्षणों का ईलाज कर रहे थे और बीमारी बढ़ती जा रही थी।

श्री मल्होत्रा किताब में लिखते हैं— 1517 से 1840 के बीच लगभग दो करोड़ अफ्रि कन मूल के लोगों को बंधुआ मजदूर बनाकर अमेरिका ले जाया गया। 18वीं सदी में गुलामी को यूरोप में सांस्थानिक स्वीकार्यता हालिस थी। मुक्ति की इच्छा रखने वाले अफ्रि कन गुलामों के लिए गुलामी का एक ही विकल्प था, मृत्यु। यूरोप की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में एक समय गुलामों की बड़ी भूमिका थी। 1843 में जोसिआ प्रिस्ट की किताब ‘बाइबिल डिफेन्स आफ स्लेवरी’ आई। इस किताब में चर्च और बाईबिल के हवाले से समझाने की कोशिश की गई है कि गुलामों को रखना रिलिजियस कर्मकांड है। वही अमेरिकी आकर जब हम भारतीयों को मानवाधिकार का पाठ पढ़ाते हैं तो अजीब ही लगता है।

इसी किताब में जिक्र है कि तमिलनाडु पुलिस के खुफिया तंत्र की रिपोर्ट में पलानी बाबा का जिक्र आता है। पलानी बाबा वास्तव में जिहाद के उद्देश्य से तमिलनाडु में सक्रिय अहमद अली का नाम था। बात 1983 की है, जब इस्लामिक कट्टरपंथी समूह आल इंडिया जिहाद समिति तमिलनाडु में सक्रिय हुई। जिहाद समिति के नेता अहमद अली ने अपनी पहचान कट्टरपंथी और जिहादी तकरीरों की वजह से तमिलनाडु के मुसलमानों के बीच में जल्दी बना ली। अहमद अली की सारी गतिविधियां आल इंडिया मिलि काउंसिल द्वारा नियंत्रित की जा रही थी और मिली काउंसिल सीधा—सीधा सउदी के वहाबी समूहों के साथ जुड़ा हुआ था। वहाबी समूहों के जिहादी एजेन्डा के अन्तर्गत 1980 के दौरान ऐसे कई हिन्दू कार्यकर्ताओं पर मुसलमानों के अपमान का आरोप लगा, जो जाति—पंथ की दरारों को मिटाकर हिन्दूओं को एक करने की दिशा में काम कर रहे थे। ऐसे आरोप सबसे अधिक कोयम्बटूर में लगे, जो तमिलनाडु की आर्थिक राजधानी मानी जाती है। हिन्दू कार्यकर्ताओं को 1980 में तमिलनाडु बदनाम करने की कोशिश की घटना और उनके मनोबल को तोडऩे के प्रयासों को याद रखिएगा।

बहरहाल इस तरह एक तीर से जिहादी समूह ने दो शिकार किए, एक तरफ हिन्दू कार्यकर्ताओं की समाज के बीच स्वीकार्यता कम करने का प्रयास किया। दूसरी तरफ उनके नाम पर मुसलमानों की गोलबंदी की। फिर एक घटना हुई। इजरायल के खुफिया विभाग ने दक्षिण भारत में 90 के दशक के शुरूआती सालों में फिलिस्तीन के एक छात्र को गिरफ्तार किया और उन्होंने खुलासा किया था कि वह छात्र भारत में आतंकियों की भर्ती के लिए काम कर रहा था। इजराइल खुफिया विभाग की पूछताछ में यह बात सामने आई थी कि अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक कट्टरपंथी समूहों के तार तमिलनाडु तक जुड़े हैं। यह सोचने वाली बात है कि एक फिलिस्तीनी छात्र बिना स्थानीय सहयोग के अपने काम को इस तरह बिना रोक—टोक के अंजाम तक पहुंचाने के लिए नए देश में कैसे इतनी सक्रियता से काम कर सकता है। जरूर कोई इस्लामिक कट्टरपंथी समूह उसे दक्षिण भारत में सपोर्ट कर रहा था।

अब सोचने वाली बात यह है कि दिसम्बर 2020 में कोयम्बटूर से यदि 3000 हिन्दूओं के मुसलमान होने की खबर सामने आती है तो यह सब एक दिन में नहीं हुआ। जिहादी समूहों के 40 साल की मेहनत है यह। इसकी जमीन वे तमिलनाडु में दशकों से बना रहे हैं। 3000 हिन्दूओं की खबर मीडिया में आ गई, जमीन पर हालात इससे भी गम्भीर हैं।

आशीष कुमार ‘अंशु’