सोनाली मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार
भारत को सोने की चिडिय़ा कहा जाता था। यह सोने की चिडिय़ा मात्र भौतिक समृद्धि के कारण ही नहीं था, अपितु वह उन संस्कारों के कारण था, जो पीढ़ी गत पीढ़ी, संतानों के माध्यम से चेतना में अंतर्निहित होते थे। शिशु बचपन से ही जिन संस्कारों को जीवन में आत्मसात करता था, उन्हीं को वह अन्य स्थानों में लेकर जाता था। भौगोलिक रूप से भारत की सीमाएं निर्धारित हो सकती हैं, परंतु सांस्कृतिक रूप से नहीं। सांस्कृतिक भारत तो संस्कारों में बसता है।
परंतु अब स्थिति भिन्न है। भारत सोने की चिडिय़ा या फिर कहें विश्व गुरु बनने की बात तो कर रहा है, परंतु वह संस्कारों पर बात नहीं कर रहा है। वह उन मूलभूत नींव पर मौन है, जिन पर विश्व गुरु का भवन बनना है। बिना संस्कारों के विश्व गुरु का भवन नहीं बन सकता है। और ये संस्कार कौन प्रदान करता है, ये संस्कार कहाँ से आते हैं, इन पर तो चर्चा शून्य के लगभग ही होती है।
यह भी बहुधा देखा गया है कि भारत या भारत की हिन्दू पहचान के प्रति आज के युवा अत्यधिक घृणा से भर गए हैं। वे भारत विरोधी शक्तियों के हाथों का भी खिलौना बन जाते हैं, जैसा कि हमने किसान आंदोलन, या फिर नागरिकता संशोधन अधिनियम के मध्य हुए आंदोलनों में देखा था। यह देश के युवा वर्ग का एक भाग ही था, जिसने माता काली को हिजाब आदि में दिखाने पर कोई आपत्ति नहीं दिखाई थी। यह वह वर्ग है, जो भारत को वैश्विक परिदृश्य में हिन्दू पहचान को लेकर नकारात्मक रूप से दिखाए जाने पर स्वयं में लज्जित हो जाता है, परंतु उस मानसिकता का विरोध नहीं करता, जो उसे इस सीमा तक आत्महीनता के सागर मे डुबो देती है।
ऐसा क्यों हो रहा है? इस पर बात करनी चाहिए? क्या भारत की शिक्षा इसके पीछे कारण है? या फिर और कुछ या फिर हम यह कह सकते हैं कि शिक्षा का निर्धारण करने वाले लोग ही आत्महीनता की मानसिकता से पीडि़त हैं और वे भारत की शिक्षा को पश्चिमी चश्मे से देखकर उसे पश्चिमी रूप में ढालकर भारत के बच्चों में आत्महीनता के संस्कार भर रहे हैं?
इन सभी प्रश्नों पर बात ‘बच्चे आपके-संस्कार किसकेÓ पुस्तक करती है। लेखक द्वय राजीव मल्होत्रा एवं विजया विश्वनाथन की यह पुस्तक उन सभी मूलभूत प्रश्नों पर बात करती है, जो बहुधा एक सामान्य अभिभावक के मस्तिष्क में उठते हैं, जब उनकी संतान उस पथ पर चली जाती है, जो उनकी अपेक्षाओं के एकदम विपरीत होता है।
इस पुस्तक की प्रस्तावना में ही अघासुर की कथा का वर्णन है कि कैसे वह भेष बदलकर वृंदावन के बालकों को नष्ट करने के लिए आया था और कैसे प्रभु श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया था। श्रीकृष्ण ने तो असुर को पहचान लिया था, परंतु क्या हम उस असुर को पहचान पाए हैं, जो हमारे निर्दोष बालकों को अपने कब्जे में करने के लिए उत्सुक हो उठा है और जो लगातार उन्हें अपने नियंत्रण में करता हुआ आ रहा है।
यद्यपि वह अभी तक पूर्णतया सफल नहीं हो पाया है, परंतु यह भी तथ्य है कि वह कुछ तो सफल हुआ ही है। उसने काफी बच्चों को अपने शिकंजे में कस लिया है और इस बार उसके रूप भिन्न हैं। उसके ऐसे रूप हैं, जिन पर सहज ध्यान ही नहीं है। जो आवश्यक प्रतीत होते हैं, जिनके विषय में ऐसा लगता है कि ये बच्चों के विकास के लिए आवश्यक हैं।
विकास होता है या नहीं, यह तो नहीं पता, हाँ, वे संस्कार अवश्य उनमें आ जाते हैं, जो कम से कम इस भूमि के तो नहीं होते हैं। यह पुस्तक प्रस्तावना से ही वह बात करती है, जो आज के समय में होनी आवश्यक है। जैसे कि सूचकांकों के माध्यम से उपनिवेशीकरण, जो बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि हमारे बच्चे इन सूचकांकों से बहुत प्रभावित हो जाते हैं, और यह नहीं समझ पाते कि आखिर भारत से अधिक गरीब देश, और भारत द्वारा भेजे गए अन्नादि पर जीवन—यापन करने वाले देश प्रसन्नता सूचकांक में भारत से ऊपर क्यों हैं?
यह पुस्तक तमाम विषयों पर खुलकर बात करती है, जिनमें असहज करने वाले विषय भी शामिल हैं। इनमें मुख्य रूप से माता—पिता के अधिकारों पर भी बात की गई है। बच्चों के पालन—पोषण में माता—पिता के अधिकार कितने सीमित हो गए हैं। साथ ही यौन शिक्षा पर बात की गई है। यह अमेरिकी शिक्षा प्रणाली की सड़ांध पर बात करती है। यह उस रूपहले सपने के अंधेरे को सामने लाती है, जिसके पीछे हमारे देश का युवा पागल है। इसमें लेखकों ने लिखा भी है कि कैसे भारत का नीति आयोग, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा शिक्षा मंत्रालय संयुक्त राष्ट्र का अंधानुकरण करने से पूर्व अनुसंधान रिपोट्र्स को पढ़ते नहीं हैं। इस पुस्तक में अमेरिकी शिक्षा प्रणाली की समस्याओं पर बात की गई है। कैसे गणित के मूलभूत सिद्धांत को ही चुनौती दी जा रही है कि गणित में केवल एक ही उत्तर सही होता है।
अमेरिकी युवाओं के मानसिक संकट पर बात की गई है और कहा भी गया है कि अ_ारह से चौबीस वर्ष के युवाओं के बीच लगभग छत्तीस प्रतिशत को किसी न किसी प्रकार का मानसिक रोग है।
इसमें महात्मा गांधी के नाम को कैसे माक्र्सवादी विचारों के लिए प्रयोग किया जा रहा है, इस पर भी खुलकर तथ्यात्मक रूप से बात की गई है।
इसके बाद यह भी लिखा है कि कैसे एजेंडा के चलते नाबालिगों के यौन अधिकार, मानवाधिकार बन गए। और यह तर्क इन्टरनेशनल प्लैन्ड पेरेंटहुड फेडरेशन के कारण हो रहा है। और कैसे यह अवांछित जनसंख्या को कम करने के लिए काम कर रहा है, यह भी बताया है।
इसमें अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा भारतीय नीतियों में घुसपैठ पर बात की गई है। इसमें परत दर परत उन षड्यंत्रों का खुलासा किया गया है, जो वोक एजेंसियां भारत की शिक्षा नीति के साथ कर रही हैं। इसमें उन वैश्विकवादियों पर भी चर्चा की गई है, जिनका उद्देश्य भारत को तोडऩा है, क्योंकि जैसे-जैसे राष्ट्र निर्बल होते जाएंगे, उनकी शक्ति बढ़ती जाएगी और उनके पास अथाह धन है। साथ ही उनके पास कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी नई तकनीकें भी हैं। लेखकों ने लिखा है कि चीन के समान भारत ने वैश्विक मानक आयात करते समय अपनी राष्ट्रीय नीतियों को विकसित नहीं किया, जो इनकी नींव के रूप में काम करते हुए सुरक्षा प्रदान कर सकती हैं।
यौन शिक्षा वाली नीतियों को केवल हिन्दू विद्यार्थियों के लिए ही लागू किया जा रहा है, क्योंकि अल्पसंख्यक संस्थानों को उनके मजहबी और रिलीजियस अधिकारों के कारण तमाम छूटें प्राप्त हैं और वे अपने विद्यार्थियों पर ये लागू भी नहीं करते हैं।
शिक्षा में तमाम विसंगतियों के कारण कैसे हमारे बच्चों को वे संस्कार मिलते हैं, जो हमारे हैं ही नहीं, यह पुस्तक उस पर बात करती है। यह कई ऐसे तथ्य हमारे सामने प्रस्तुत करती है, जिन्हें आम तौर पर हम न ही पढऩा चाहते हैं और न ही पढऩे को मिलते हैं।
यह पुस्तक हल भी प्रदान करती है। यह शिक्षा के वैदिक सिद्धांत पर बात करती है, अत्यंत मूलभूत प्रश्न उठाती है कि किसे शिक्षा दी जा रही है? जिस व्यक्ति को शिक्षा दी जा रही है, उनके वास्तविक स्वरूप ”आत्मा” को समझना, साथ ही वह व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करने के बाद समाज में क्या योगदान करेगा, इस पर बात होनी चाहिए। दुर्भाग्य यही है कि हिन्दू बच्चों को कथित सेक्युलर शिक्षा में जो पढ़ाई कराई जा रही है, वह शिक्षा है ही नहीं, जो हिन्दू बच्चों को उनके संस्कारों के अनुसार प्रदान करनी चाहिए। कैसी शिक्षा होनी चाहिए, कैसे संस्कार हों कि भारत पुन: विश्व गुरु बने, उसके लिए यह पुस्तक पढऩा हर हिन्दू के लिए अनिवार्य है। च



