डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’
प्राचीन संस्कृत साहित्य के विद्वान
कला वह है, जो जड़ में चेतन की प्रतिष्ठा कर दे और पत्थर तक को मूल्यवान बना दे। शिल्पियों ने धातु ही नहीं, पत्थरों में भी बहुत से प्रयोग किए हैं और यंत्र से लेकर वाहन, देवादि को लक्षणात्मक पहचान देकर साकार किया है। भारतीय उपमहाद्वीप में देवस्थानों में अनेक शास्त्रों की प्रतिष्ठा भी मूर्तियों के रूप में की गई है। जिस देवता (विष्णु, शिव, देवी, गणेश, कार्तिकेय या लोकदेव) का मंदिर हो, उससे संबंधित पौराणिक और प्रचलित लीला प्रसंगों का अंकन तो आम बात है, लेकिन 10 वीं सदी अर्थात् मध्यकाल से देवालय नीति आदि शास्त्रों के शिल्प रूप में प्रतिष्ठा के केंद्र भी बने।
गुफाओं के निर्माण काल से प्रवृत्ति
लंबे समय से शिल्पकारों में शास्त्र के उत्कीर्णन की प्रवृत्ति रही ही और धीरे-धीरे उसको मंदिरों में भी अपनाया गया। यह भी कहा जा सकता है कि शिल्प के साथ—साथ शास्त्र भी निर्देशात्मक रूप में सामने आए अथवा नवीकृत होते रहे। देखा जाए तो महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना आदि के मंदिरों में पंचतंत्र (विष्णु शर्मा कृत) की कहानियों के मुख्य दृश्यों को उत्कीर्ण किया गया है। मित्रपरीक्षा के अंतर्गत, विशेषकर कछुए को हंसों द्वारा बचाना, जामुन के पेड़ पर रहने वाले बंदर को मगर द्वारा अपने घर ले जाने की बातों से बचने वाली कहानियों के पैनल बहुत सुंदर और आकर्षक हैं।
मंदिरों की भित्तियों और स्तंभों की सज्जा के लिए शिल्पकारों के लिए जो शास्त्र प्राय: आदर्श बने, उनमें से कुछ मुख्य हैं –
=यंत्र, युक्ति शास्त्र ( यज्ञोपयोगी शुल्ब आदि, वास्तु सम्मत रेखांकन, कलापूरक, त्रिकोणमिति, गणित आदि)
=देवशास्त्र, आगम ( पांचरात्र, शैवागम, देवयागम, काश्यप, महाकाव्य और कला निर्देशक पुराण आदि)
=कामशास्त्र (गोनियापुत्र, वात्स्यायन, जयदेव, कोक्क, कुम्भा आदि के निर्देशानुसार प्रणय निवेदन, प्रेमालाप, आपान गोष्ठी, चंद्रकला, अनेक आसन, विपरीत रति, पशु संगचार आदि)
=नाट्य शास्त्र (भरताचार्य निर्देशित नृत्त के 108 करण, अभिनय, वेश बनाव आदि)
=संगीत शास्त्र ( चार प्रकार के वाद्यों का वादन, गायन और नर्तन, संगीत गोष्ठी, प्रेक्षक आदि)
=शिक्षा शास्त्र ( गुरुगृह, शिष्यों को प्रशिक्षण, वेद या श्रुति पाठ, उच्चारण आदि)
=नीतिशास्त्र (कामंदक, औसनस, बृहस्पति के नीति शास्त्र के प्रसंगों सहित पंचतंत्र, वेताल पच्चीसी, पुरुष परीक्षा, तोता मैना आदि)
यही नहीं, जीव विकास के स्तर, युद्ध के लिए व्यूह रचना, आखेट शास्त्र, गज शास्त्र, अश्व शास्त्र, चित्र शास्त्र, अलंकरण और लिपि शास्त्र के विविध विषयों को भी शिल्पकारों ने आत्मसात किया और उन्हें कुछ इस तरह शिल्पमय किया कि वे शोध योग्य लगते हैं।
शिल्प ग्रंथों में विषय वैविध्य
शिल्प ग्रंथों में विषयों की विविधता क्यों मिलती है? उत्तर मध्यकाल में यह प्रवृत्ति लुप्त सी हो गई तो शिल्प शास्त्रों में भी उनसे संबंधित अध्यायों को महत्व नहीं मिला। शिल्प शास्त्र की जो भी पांडुलिपियां मिलीं, वे संगीत, नृत्य आदि पर आकर खंडित हो गईं। इसी कारण मैंने ‘समरांगण सूत्रधार’, ‘अपराजित पृच्छा’ आदि विशालकाय लेकिन खंडित और अधूरे ग्रंथों को पूर्ववर्ती उचित संदर्भों का प्रयोग करके पूरा किया। यह कार्य पहली बार और संतोषजनक हुआ था।
दक्षिण में उल्लेखनीय नाट्य शास्त्र
दक्षिण भारत के देवालयों का अपना वैशिष्ट्य है। वे नागर की अपेक्षा गोपुर वाले द्राविड़ शैली में होते हैं और सर्वाधिक प्रयोग सम्मत मिलते हैं। देवालय को देखकर ही लगता है कि शिल्पकला देवलोक को भूमि पर उतार लाती है। मंदिरों की भित्तियां, विशेषकर जगती, जंघा भाग, मंडप, द्वार और स्तंभ वे अवयव होते हैं, जहां सूत्रधार अपने शिल्पियों का अपनी कला और कल्पना शक्ति को साकार करने का आह्वान करता है। शिल्पकार बीड़ा उठाता है और मंदिर के प्रमुख देवता की ग्रंथोक्त या स्तोत्र वर्णित लीलाओं और चरित के विभिन्न अंशों को मूर्तिमान करता जाता है।
देवालय हमारे शास्त्रों के शिल्पमय स्वरूप भी हैं। वे हमारी ज्ञान परंपरा से अलग नहीं हैं। वे शिक्षण, प्रशिक्षण और ध्यान के केंद्र इसलिए हैं कि वहां शिल्प सम्मत रूप में व्यापार, व्यवहार, सामुद्रिक, धातु, रत्न और व्यापारिक गतिविधियों को बेहतर रूप में देखा और समझा जा सकता है।
चिदंबरम का नटराज मंदिर नाट्य शास्त्र का प्रामाणिक उदाहरण है। हालांकि ऐसा अन्य मंदिरों में भी देखने में आता है। ये अंकन नृत्य प्रशिक्षण के लिए प्रामाणिक उदाहरण हैं जो शास्त्रीय नृत्यों में स्वीकृत हुए हैं। मुझे याद आता है कि शैलालिक सूत्र, जिनका उल्लेख भगवान् पाणिनि ने किया है और लोक से समृद्ध होकर शास्त्र में स्थापित प्रस्तुतिमूलक नृत्य की दैहिक भाव भंगिमाएं (करण) यहां शिल्प रूप में जीवंत हैं। यह अंकन शिल्प और शास्त्र सम्मत है, क्योंकि शिल्प ग्रंथ मयमतम्, काश्यपशिल्प में शिव के तांडव और करणों का संदर्भ है। अपराजित पृच्छा में शिव तांडव के 9 रूप अपूर्ण थे, जिनको हमने मंदिरों के इन्हीं प्रमाणों के आधार पर पूरा किया। यही नहीं, समरांगण सूत्रधार का करण विषयक अंतिम अधूरा अध्याय भी देवालय प्रमाणों के बल पर ही पूरा हुआ।
नृत्य के करण मुहूर्त के करण से अलग हैं। ज्योतिष में तिथि का आधा करण कहा जाता है जो दिन और रात्रि के होते हैं। जैसे बालव, कौलव, बव करण आदि। नृत्य के करण वस्तुत: थिरकने के दौरान की गतियां और मुद्राएं हैं जो 108 रूप और नाम वाली हैं। तंडू मुनि और अन्यत्र नंदीकेश्वर को उनके नामकरण का श्रेय है। इन करणों का इतना महत्व है कि विष्णु धर्मोत्तर सहित सोमेश्वर, शारंगदेव, महाराणा कुम्भा, अशोकमल्ल, शुभंकर, जाय सेनापति, पुंडरीक आदि कई ग्रन्थकारों ने उनको उद्धृत किया। (शिव का नर्तन: कुमारस्वामी के अनुवाद में हमारी भूमिका) शिल्पकार भी कहां पीछे रहते। पाषाण में नाट्य शास्त्र में अक्षुण्ण कर दिया, इसलिए कि यदि कभी किसी ग्रंथ का कोई भाग खंडित हो जाए तो मुझ जैसे को वह प्रमाण यथा रूप मिल सके। मैं इसीलिए कहता हूं कि ”कहा जाता है”, ”सुना जाता है” जैसी अटकलों से दूर शिला शिल्प और शिलालेख बहुत प्रामाणिक और उचित होते हैं। वहीं पता चलता है कि देवता मूर्ति प्रकरणम् में अभिनय दर्पण के जिस मत को महत्व दिया गया, उसको शिल्पकारों ने कैसे सार्थक किया: हस्तपाद समायोगा: नृत्तस्य करणम् भवेत्।”
उत्तर भारत में भी शिव को नृत्य का नायक मानकर अनेक मानक मूर्तियां बनी हैं, जिनमें हर्ष पर्वत, बाडोली, चित्तौडग़ढ़ आदि के शिल्पियों के प्रयोग बड़े सुन्दर हैं। शिल्पकार का आत्मबोध है कि शिव का नर्तन इस ब्रह्मांड के चक्रण में है। वे एक पांव उठाते हैं तो कोण बनाते हैं, कई कोण और कई दृष्टिकोण! कंधे और सिर तक पगतली उठती है तो तुक, कौतुक, अहोतुक होता है! जटाएं बिखरती हैं तो घूर्ण रचती हैं! इसमें एक से लेकर उनचास मरूत तक के फेर! उनकी भुजाएं कई हो जाती हैं! दो से चार, चार से छह और छह से आठ, आठ से दस और दस से बारह भी! यह आनुपातिक विस्तार कर्म के धर्म का उत्थान करता लगता है। उन भुजाओं के अपने-अपने आयुध शिव के गुण स्वरूप को साकार करते हैं… किसी आश्चर्य से कम नहीं शिव का नर्तन! पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और भृंगी, शृंगी, नंदी सब के सब कौतुक करते हैं!




