हिंदू कालगणना

श्रीराम तिवारी
संस्कृति सलाहकार, मुख्यमंत्री, मध्य प्रदेश


हिंदू समय चक्र सूर्य सिद्धांत के पहले अध्याय के श्लोक 11 से 23 में आते हैं। वह जो कि श्वास प्राण से आरंभ होता है, यथार्थ कहलाता है; और वह जो त्रुटि से आरंभ होता है, अवास्तविक कहलाता है। छह श्वास से एक विनाड़ी बनती है। साठ विनाडिय़ों से एक नाड़ी बनती है। साठ नाडिय़ों से एक दिवस दिन और रात्रि बनते हैं। तीस दिवस से एक मास महीना बनता है। एक नागरिक सावन मास सूर्योदयों की संख्याओं के बराबर होता है। एक चंद्र मास, उतनी चंद्र तिथियों से बनता है। एक सौर मास सूर्य के राशि में प्रवेश से निश्चित होता है। बारह मास एक वर्ष बनाते हैं। एक वर्ष को देवताओं का एक दिवस कहते हैं। देवताओं और दैत्यों के दिन और रात्रि पारस्परिक उलटे होते हैं। उनके छह गुणा साठ देवताओं के दिव्य वर्ष होते हैं।
15 लघु की एक नाड़ी, जिसे दण्ड भी कहते हैं। इसका मान उस समय के बराबर होता है, जिसमें कि छह पल भार के चौदह आउन्स के ताम्र पात्र से जल पूर्ण रूप से निकल जाए, जबकि उस पात्र में चार मासे की चार अंगुल लम्बी सूई से छिद्र किया गया हो। ऐसा पात्र समय आकलन हेतु बनाया जाता है। यह दो दण्ड एक मुहूर्त के बराबर होते हैं। 6 या 7 मुहूर्त एक चौथाई दिन या रत्रि जिसे याम या प्रहर भी कहते हैं, के बराबर होता है। 4 याम या प्रहर एक दिन या रात्रि। चन्द्र मापन में एक तिथि वह समय होता है, जिसमें सूर्य और चंद्र के बीच का देशांतरीय कोण बारह अंश बढ़ जाता है। तिथि सिद्धान्त का खण्डतिथि और अखण्डतिथि के हिसाब से दो भेद हैं। वेदांग ज्योतिष के अनुसार अखण्डतिथि माना जाता है। जिस दिन चान्द्रकला क्षीण हो जाता है उस दिन को अमावस्या माना जाता है। दूसरे दिन सूर्योदय होते ही शुक्ल प्रतिपदा, तीसरे दिन सूर्योदय होते ही द्वितीया। इसी क्रम से 15 दिन में पूर्णिमा होती है। फिर दूसरे दिन सूर्योदय होते ही कृष्ण प्रतिपदा। और फिर तीसरे दिन सूर्योदय होते ही द्वितीया, और इसी क्रम से तृतीया, चतुर्थी आदि होते हैं।
14 वें दिन में ही चन्द्रकला क्षीण हो तो उसी दिन कृष्ण चतुर्दशी टूटा हुआ मानकर दर्शश्राद्धादि कृत्य किया जाता है। ऐसा न होकर 15 वें दिन में ही चन्द्रकला क्षीण हो तो तिथियाँ टूटे बिना ही पक्ष समाप्त होता है। इस कारण कभी 29 दिन का और कभी 30 दिन का चान्द्र मास माना जाता है। वेदांग ज्योतिष भिन्न सूर्यसिद्धान्तादि लौकिक ज्योतिष का आधार में खण्डतिथि माना जाता है। उनके मत में तिथियाँ दिन में किसी भी समय आरम्भ हो सकती हैं और इनकी अवधि उन्नीस दिन से अधिक छब्बीस घंटे तक हो सकती है।
● एक पक्ष या पखवाड़ा = पंद्रह तिथियाँ
● चान्द्र मास दो प्रकार का होता है -एक अमान्त और पूर्णिमान्त।
● पहला शुक्ल प्रतिपदा से अमावस्या तक अर्थात् शुक्लादिकृष्णान्त मास वेदांग ज्योतिष मानता है। सूर्यसिद्धान्तादि लौकिक ज्योतिष के पक्षधर दूसरा पक्ष मानते हैं पूर्णिमान्त। अर्थात् कृष्ण प्रतिपदा से आरम्भ कर पूर्णिमा तक एक मास।
एक मास = 2 पक्ष पूर्णिमा से अमावस्या तक कृष्ण पक्ष; और अमावस्या से पूर्णिमा तक शुक्ल पक्ष
एक ऋतु = 2 मास 12 मास में से प्रत्येक ऋतु दो मास की होगी
एक अयन = 3 ऋतुएं छ: ऋतुओं में से तीन
एक वर्ष = 2 अयन उत्तरायन एवं दक्षिणायन का होता है।
वेदांग ज्योतिष के आधार पर पंचवर्षात्मक युग माना जाता है। प्रत्येक 60 वर्ष में 12 युग व्यतीत हो जाते हैं। 12 युगों के नाम आगे बताया जा चुके हैं। शुक्लयजुर्वेदसंहिता के मंत्रों में पंचसंवत्सरात्मक युग का वर्णन है। ब्रह्माण्डपुराण, लिंगपुराण, वायुपुराण, महाभारत के आश्वमेधिक पर्व, कौटलीय अर्थशास्त्र, सुश्रुतसंहिता सूत्रस्थान ग्रंथ में वेदांग ज्योतिष की जानकारी मिलती है।

पितरों के संदर्भ में कालगणना
पितरों की समय गणना में 15 मानव दिवस का एक पितृ दिवस होता है। 30 पितृ दिवस का 1 पितृ मास एवं 12 पितृ मास का 1 पितृ वर्ष तथा पितृ जीवन काल 100 पितृ वर्ष होता है। 1200 पितृ मास का 36000 पितृ दिवस एवं 18000 मानव मास का 1500 मानव वर्ष होता है।

देवताओं के संदर्भ में कालगणना
देवताओं की कालगणना में 1 मानव वर्ष = एक दिव्य दिवस होता है। 30 दिव्य दिवस का 1 दिव्य मास तथा 12 दिव्य मास का 1 दिव्य वर्ष एवं दिव्य जीवन काल 100 दिव्य वर्ष होता है जो 36,000 मानव वर्ष के बराबर माना जाता है। विष्णु पुराण के अनुसार कालगणना में चार युग की गणना निम्नानुसार से की जा सकती है- एक वर्ष अर्थात् 2 अयन प्रत्येक की छह मास अवधि मिलकर एक वर्ष बनाते हैं। 360 मानव वर्ष मिलकर एक दिव्य वर्ष होता है
1,200 दिव्य वर्ष का 1 कलि युग 1 चरण 432,000 सौर वर्ष, 2,400 दिव्य वर्ष का 1 द्वापर युग 2 चरण 864,000 सौर वर्ष, 3,600 दिव्य वर्ष का 1 त्रेता युग 3 चरण 1,296,000 सौर वर्ष तथा 4,800 दिव्य वर्ष का 1 सत युग 4 चरण 1,728,000 सौर वर्ष बनता है।
इस प्रकार से 12,000 दिव्य वर्ष के 4 युग बनते है जो 1 महायुग अर्थात् दिव्य युग कहलाता हैं। 1 महा युग 1,728,000 सौर वर्ष के होते है।

ब्रह्मा की कालगणना
1000 महायुग= 1 कल्प होता है, जिसमें चार अरब बत्तीस करोड़ मानव वर्ष सम्मिलित है और यही सूर्य की खगोलीय वैज्ञानिक आयु भी है। ब्रह्मा का एक दिवस दिन—रात दो कल्प के बराबर होता है। ब्रह्मा का एक दिवस, एक दिन का 1कल्प और एक रात का 1 कल्प मिलकर बनाते हैं। ब्रह्मा का एक दिवस दिन—रात अर्थात दो कल्प 8 अरब 64 करोड़ मानव वर्ष का होता है।
30 ब्रह्मा के दिन 1 ब्रह्मा का मास के बराबर होता है, इसमें दो खरब 59 अरब 20 करोड़ मानव वर्ष होते हैं।
● 12 ब्रह्मा के मास ब्रह्मा के 1 वर्ष के बराबर होता है, इसमें 31 खरब 10 अरब 4 करोड़ मानव वर्ष सम्मिलित होते हैं।
50 ब्रह्मा के वर्ष = 1 परार्ध तथा 2 परार्ध= 100 ब्रह्मा के वर्ष जो 1 महाकल्प अर्थात् ब्रह्मा का जीवन काल होता है। यह 31 शंख 10 खरब 40 अरब मानव वर्ष के बराबर माने जाते हैं। ब्रह्मा का एक दिन अथवा एक रात जितनी अवधि को कल्प कहते हैं जो 4,32,00,00,000 मानव वर्ष की होती है, जो 10,000 भागों में बंटा होता है, जिसे चरण कहते हैं। एक चरण 4,32,000 साल का होता है। चारो युगों का यह चक्र ऐसे दोहराता रहता है, कि ब्रह्मा के एक दिन में 1000 महायुग हो जाते हैं और ब्रह्मा की रात्रि में 1000 महायुग हो जाते हैं। इस प्रकार, ब्रह्मा के एक दिवस दिन—रात में 2000 महायुग/ चतुर्युगी हो जाते हैं।

एक उपरोक्त युगों का चक्र एक महायुग 43 लाख 20 हजार सौर वर्ष के बराबर होता है। श्रीमद्भग्वदगीता के अनुसार सहस्र-युग अहर-यद ब्रह्मणो विदु: अर्थात् ब्रह्मा का एक दिन 1000 महायुग के बराबर होते हैं। इसके अनुसार ब्रह्मा का एक दिन 4 अरब 32 करोड़ सौर वर्ष होते हैं। इसी प्रकार इतनी ही अवधि ब्रह्मा की रात्रि की भी है। एक मन्वन्तर में 71 महायुग 306,720,000 सौर वर्ष होते हैं। प्रत्येक मन्वन्तर के शासक एक मनु होते हैं। प्रत्येक मन्वन्तर के बाद, एक संधि-काल होता है, जो कि कृतयुग के बराबर का होता है 1,728,000 = 4 चरण। इस संधि-काल में प्रलय होने से पूर्ण पृथ्वी जलमग्न हो जाती है। एक कल्प में 432,000,0000 अर्थात 4 अरब 32 करोड़ सौर वर्ष होते हैं, जिसे आदि संधि कहते हैं, जिसके बाद 14 मन्वन्तर और संधि काल आते हैं। दो कल्प के बराबर ब्रह्मा का एक दिवस दिन-रात होता है। जहाँ, एक कल्प में, एक हज़ार चतुर्युगी का दिन होता है और फिऱ इस कल्प के बाद उतनी ही अवधि अर्थात् एक कल्प की रात्रि आती है।

इस प्रकार, ब्रह्मा के एक दिवस दिन-रात में 14 मनुवंतरों का एक कल्प और एक पूरा कल्प जितनी रात्रि का लंबा प्रलयकाल बीत जाता है। अस्तु, ब्रह्मा का एक दिवस दो कल्प अर्थात 8 अरब 64 करोड़ साल जितनी लंबी अवधि का होता है। 1 कल्प=1000 चतुर्युगी 1 कल्प=14 मनवंतर 1 मनवंतर=71 चतुर्युगी होता है। 71म 43,20,000=30,67,20,000 मानव वर्ष यहाँ गौर करने लायक तथ्य यह है कि सूर्य द्वारा अपने गैलेक्सी के केंद्र अर्थात ब्लैक होल का एक चक्कर लगाने में लगभग इतना ही समय लगता है।

1 चतुर्युगी 1 महायुग के बराबर है। 1 महायुग में चारों युग सतयुग 4 चरण कलयुग +त्रेतायुग 3 चरण कलयुग +द्वापरयुग 2 चरण कलयुग+ कलयुग के 10 चरण अर्थात 1 चरण जो 1 कलयुग में 4,32,000 मानव वर्ष सम्मिलित है। ब्रह्मा की आयु 100 साल मानी गई है तो ब्रह्मा की कुल आयु 31,10,40,00,00,00,000 मानव वर्ष के बराबर होती है। ब्रह्मा का एक दिवस, दो कल्प अर्थात् 8 अरब 64 करोड़ साल का होता है और वैज्ञानिकों द्वारा लगभग यही आयु, हमारे सूर्य की आयु मानी जाती है। इस प्रकार 36,000 वर्ष सूर्य की कुल आयु के बराबर ब्रह्मा की आयु है।
हम वर्तमान में वर्तमान ब्रह्मा के इक्यावनवें वर्ष में सातवें मनु, वैवस्वत मनु के शासन में श्वेतवाराह कल्प के द्वितीय परार्ध में, अठ्ठाईसवें कलियुग के प्रथम वर्ष के प्रथम दिवस में विक्रम संवत् 2080 में हैं। इस प्रकार अब तक 15 नील, 55 खरब, 21 अरब, 97 करोड़, 19 लाख, 61 हज़ार, 625 वर्ष इस ब्रह्मा को सृजित हुए हो गए हैं। ग्रेगोरियन कैलेण्डर के अनुसार वर्तमान कलियुग 3,102 ई. पू. में हुआ था। वेदांग ज्योतिष के व्याख्याकार का कहना है कि यह समय महाभारत के युद्ध का है। इसके 36 साल बाद यदुवंश का विनाश हुआ और उसी दिन से वास्तविक कलियुग प्रारंभ हुआ। इस गणित से आज वि॰ सं॰ 2081 एवं कलि संवत् 5126 चल रहा है।

ब्रह्मा जी के एक दिन में 14 इन्द्र क्रमिक आते हैं और प्रत्येक की जगह नए देवता इन्द्र का स्थान लेते हैं। इतनी ही बड़ी ब्रह्मा की रात्रि होती है। दिन की इस गणना के आधार पर ब्रह्मा की आयु 100 वर्ष होती है फिर एक ब्रह्मा की जगह दूसरे ब्रह्मा स्थान ग्रहण करते हैं। ब्रह्मा की आयु के बराबर विष्णु का एक दिन होता है। इस आधार पर विष्णुजी की आयु 100 वर्ष है। विष्णुजी की आयु के 100 वर्ष का शंकर जी का एक दिन होता है। इस दिन और रात के अनुसार शंकर जी की आयु 100 वर्ष होती है।