इंडोनेशिया के प्रमुख हिन्दू एवं बौद्ध मंदिर

—डॉ. मोहनलाल गुप्ता


इंडोनेशिया एक मुस्लिम बहुल देश है। कभी यह भारतीय संस्कृति का केंद्र हुआ करता था। इस्लाम के प्रवेश के बाद वहां के अधिकतर लोग मुसलमान हो गए, लेकिन अभी वहां सैकड़ों मंदिर हैं, जो बताते हैं कि यहां भारतीय संस्कृति किस स्तर पर रही थी।

जावा द्वीप के मंदिर
जावा में हिन्दू धर्म के प्रभाव को आसानी से समझा जा सकता है। जावा द्वीप पर 15 बड़े हिन्दू मंदिर खोजे गए हैं, जिनमें परमबनन शिव मंदिर और बोरोबुदुर बौद्ध विहार मुख्य हैं। दूसरे प्रमुख मंदिरों में ई. 750 में बना देंग मंदिर, 9वीं शताब्दी का प्लाओसान मंदिर, 15वीं सदी में बना साथो मंदिर, सिंघसरी साम्राज्य के काल में ई. 1248 में बना किदाल मंदिर, जन्म से पहले जीवन को दर्शाता 15वीं सदी में बना सुख मंदिर और मजापहित साम्राज्य के समय में 12वीं तथा 15वीं सदी के दौरान बना ‘पनतरन मंदिर’ सम्मिलित हैं। इन मंदिरों को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर की सांस्कृतिक श्रेणी में सम्मिलित किया गया है।

परमबनन शिव मंदिर समूह
मध्य जावा में स्थित परमबनन शिव मंदिर समूह, इंडोनेशिया का सबसे बड़ा और विशाल हिन्दू मंदिर समूह है। यह मंदिर समूह मुख्यत: भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा को समर्पित है। मंदिर परिसर में काले रंग के चौकोर, आयताकार एवं विभिन्न आकृतियों में तराशे हुए, सुगढ़ एवं विशालकाय पत्थरों के सैकड़ों विशाल ढेर स्थित हैं जो नौवीं शताब्दी के विशाल मंदिर समूह की उपस्थिति को दर्शाते हैं। पत्थरों के इन ढेरों के नीचे मूल मंदिरों के आधार दबे पड़े हैं। इस मंदिर समूह का विनाश किसी शक्तिशाली भूकंप के दौरान हुआ।

बौद्ध धर्म एवं शैव धर्म की प्रतिस्पद्र्धा

भारत से आए कई हिन्दू राजकुमारों ने जावा द्वीप के अलग-अलग क्षेत्रों पर छोटे-छोटे राज्य स्थापित किए। सातवीं-आठवीं शताब्दी में मध्य जावा क्षेत्र में संजय राजवंश के वंशज राज्य करते थे। यह राजवंश मूलत: हिन्दू धर्म को मानने वाला था किन्तु बाद में किसी काल में बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया था। आठवीं शताब्दी में शैलेन्द्र वंश के राजाओं ने संजय वंश के शासकों को परास्त करके मध्य जावा से परे धकेल दिया और मेदांग राज्य की स्थापना की। संजय वंश पूर्वी जावा पर शासन करने लगा। शैलेन्द्र वंश के राजा भी महायान बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने बोरोबुदुर एवं सेवू के विशाल एवं गगनचुम्बी महायान बौद्ध मंदिरों का निर्माण किया।

हिन्दू धर्म की जय तथा मंदिर का निर्माण
नौवीं शताब्दी में एक बार पुन: शैलेन्द्र वंश का पतन हो गया एवं उनके स्थान पर पुन: संजय वंश का उत्थान हुआ और उन्होंने माताराम राज्य की स्थापना की। इस समय तक इस वंश के राजाओं ने पुन: शैव-हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया था। इसलिए 850 ई. के आसपास माताराम राज्य के संजय वंशीय राजा राकाई पिकातान ने हिन्दू धर्म की विजय के रूप में इस मंदिर समूह का निर्माण कराना आरम्भ किया, ताकि शैलेन्द्र वंश के शासकों को उनकी ही भाषा में विशाल मंदिरों के निर्माण के माध्यम से जवाब दिया जा सके।

राकाई पिकातान के उत्तराधिकारी राजाओं- लोकपाल तथा बालीतुंग महाशंभु ने मंदिरों का निर्माण निरंतर जारी रखा। 856 ई. के शिवगढ़ शिलालेख के अनुसार इस मंदिर को मूलत: भगवान शिव को समर्पित किया गया था तथा इस मंदिर का मूल नाम शिवगढ़ था। जिस स्थान पर आज यह मंदिर समूह स्थित है, उसके ठीक निकट से नौवीं शताब्दी में ओपाक नामक नदी बहती थी। मंदिर को सुरक्षित करने के लिए इस नदी का रुख मोड़ा गया। अब यह नदी मंदिर के पश्चिम में है तथा उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है।

मंदिर की जीर्णोद्धार यात्रा
जब डच लोग इस द्वीप पर आए तो 1811 ई. में उनकी दृष्टि इस मंदिर समूह के खण्डहरों पर पड़ी। उन्होंने खजाने की लालसा में इस मंदिर को और भी खोद डाला। बाद में डच लोगों द्वारा इस पूरे क्षेत्र का सर्वे किया गया। तब पाया गया कि आस-पास के लोग इन मंदिरों के पत्थरों को उठाकर अपने घरों की नीवों में डालते थे तथा घरों की चिनाई करते थे। 1918 ई. में डच लोगों ने इन मंदिरों का पुनर्निर्माण आरम्भ किया।

रामकथा के मंचन हेतु स्टेडियमों का निर्माण
मंदिर परिसर में ही ओपाक नदी के तट पर ओपन एयर तथा इंडोर स्टेडियमों का निर्माण किया गया ताकि वहाँ रामकथा का मंचन किया जा सके। जावा द्वीप पर रामकथा नृत्य नाटिकाएँ हजारों साल से मंचित की जाती रही हैं। उन विभिन्न नृत्य नाटिकाओं को ढूंढकर फिर से इन स्टेडियमों तक लाया गया।

सुन्नी मुसलमान द्वारा शिव मंदिर का उद्घाटन
1953 ई. में मुख्य शिव मंदिर के जीर्णोद्धार का काम पूरा हो गया। इंडोनेशिया के प्रथम राष्ट्रपति सुकार्णो ने इस मंदिर का उद्घाटन किया जो इस्लाम की सुन्नी शाखा का मुसलमान था। इस समय तक जावा की 80 प्रतिशत जनसंख्या सुन्नी मुसलमान थी किन्तु उन्हें इस हिन्दू मंदिर को फिर से खड़ा करने, उसका उद्घाटन करने और उसके दरवाजे पूरे संसार के पर्यटकों के लिए खोलने में कोई परहेज नहीं था, अपितु वे गर्व की अनुभूति करते थे कि उन्होंने अपनी सैकड़ों साल पहले खोई हुई सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित कर लिया था।

परमबनन परिसर के मुख्य मंदिरों की प्रतिमाएँ
परमबनन परिसर का मुख्य मंदिर अर्थात् शिव मंदिर 47 मीटर ऊँचा है तथा आधार पर 34 मीटर लम्बा एवं 34 मीटर चौड़ा है। मंदिर के पूर्व में बनी सीढिय़ों से होकर ऊपर जाया जाता है जहाँ एक के बाद एक करके चारों ओर कुल चार कक्ष बने हुए हैं जिनमें से पूर्व दिशा की ओर के मुख्य कक्ष में भगवान शिव की प्रतिमा खड़ी है। उत्तर की तरफ वाले कक्ष में महिषासुर मर्दिनी दुर्गा की प्रतिमा है। एक कक्ष में भगवान गणेश एवं एक कक्ष में अगस्त्य ऋषि की प्रतिमा है। ब्रह्मा मंदिर में केवल एक ही कक्ष है जिसमें केवल ब्रह्मा की प्रतिमा है। इसी प्रकार विष्णु मंदिर में भी केवल एक कक्ष है जिसमें केवल भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित है।

श्रीराम कथा प्रसंगों की अद्भुत प्रतिमाएँं
मुख्य मंदिरों के पूजा कक्षों की बाहरी दीवारों पर प्रदक्षिणा अथवा परिक्रमा करने के पथ बने हुए हैं। इन प्रदक्षिणा पथों के दोनों ओर की दीवारों पर रामकथा एवं श्रीकृष्ण लीला के प्रसंगों की प्रतिमाएँ उत्कीर्ण की गई हैं। रामकथा प्रसंग के मूर्ति फलक शिव मंदिर से आरम्भ होते हैं तथा ब्रह्मा मंदिर में जाकर पूर्ण होते हैं। इन दीवारों पर लोकपालों एवं विविध देवताओं की प्रतिमाएँ भी उत्कीर्ण हैं। राक्षसों द्वारा ऋषियों का उत्पीडऩ, रावण द्वारा सीता का हरण, जटायु द्वारा सीता को बचाने की चेष्टा, भगवान द्वारा मारीच का वध, रावण द्वारा कैलाश पर्वत को उठाने के दृश्य बहुत सुंदर बन पड़े हैं।

भागवत पुराण के प्रसंगों का अंकन
हिंदू धर्मावलंबियों के लिए परमबनन मंदिर आस्था का केन्द्र है। परमबनन मंदिर इतना सुंदर है कि इसकी बनावट किसी को भी अपने मोहपाश में बांध ले। मंदिर की दीवारों पर रामकथा के प्रसंग मूर्तियों के रूप में अंकित हैं। विष्णु मंदिर के परिक्रमा पथ में भागवत पुराण के आधार पर श्रीकृष्ण लीला के प्रसंग शिलापट्टों पर उत्कीर्ण हैं। बाल कृष्ण की लीलाओं के अंकन को देखकर दर्शक सम्मोहित सा खड़ा रह जाता है।

पशु-पक्षियों एवं कल्पतरु का अंकन
इन मंदिरों की बाहरी दीवारों की ताकों में सिंह, हिरण, खरगोश, बिल्ली आदि का अंकन है। साथ ही तोते, मोर, हंस, लोकपाल, अप्सराएँ एवं अन्य मूर्तियांँ उत्कीर्ण हैं। एक ताक में हंस अपनी चोच लम्बी करके पानी पीने का प्रयास कर रहा है। एक ताक में दो मादा तोते बैठे हैं जिनके मुंह के स्थान पर स्त्रियों के सुंदर चेहरे बने हुए हैं जिन्होंने विविध प्रकार के आभूषण एवं मुकुट धारण कर रखे हैं।

परग्रही प्राणी जैसे गरुड़
शिव मंदिर के बाहर के प्रदक्षिणा पथ में एक प्रतिमा में भगवान विष्णु की सेवा में गरुड़ विराजमान हैं। गरुड़ का सिर अपेक्षाकृत लम्बा बनाया गया है जिसे देखकर मिस्र देश के उन लम्बी खोपडिय़ों वाले देवताओं का स्मरण होता है जिनके लिए माना जाता है कि ये परग्रही मानव थे और दूसरे लोक से धरती पर आए थे। गरुड़ के सिर पर जटाओं एवं उनसे बंधे हुए जूड़े का भी अंकन किया गया है। गरुड़ के नीचे जल में तैरती हुई मछलियाँं दिखाई गई हैं। जिनसे ज्ञात होता है कि भगवान विष्णु इस समय क्षीर सागर में विश्राम कर रहे हैं, गरुड़ उनकी सेवा में हैं तथा हाथों में कमल पुष्प सुशोभित है।

प्लाओसान बौद्ध मंदिर
प्लाओसान बौद्ध मंदिर भी एक मंदिर समूह है जिसमें मंदिरों के खंडहर स्थित हैं। प्लाओसान बौद्ध मंदिर परिसर 2000 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ है तथा समुद्र की सतह से मात्र 148 मीटर ऊपर स्थित है। इसका निर्माण काल भी नौवीं शताब्दी का है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजकुमारी काहुलुन्नान अथवा प्रमोदवद्र्धिनी ने करवाया जो कि शैलेन्द्र वंश के सम्राट-उन्गा अथवा समरातुंगा की पुत्री थी। प्लाओसान मंदिर परिसर में 174 छोटे भवन हैं। इनमें से 116 स्तूप हैं तथा 58 चैत्य हैं। बहुत से भवनों पर शिलालेख उत्कीर्ण हैं। इनमें से दो लेख यह सूचित करते हैं कि यह मंदिर राकाई पिकातान द्वारा उपहार स्वरूप बनाए गए हैं।

बोरोबुदुर बौद्ध चैत्य एवं विहार
बोरोबुदुर महायान बौद्ध विहार मध्य जावा प्रांत के मगेलांग नगर में स्थित है। यह भी परमबनन शिव मंदिर तथा प्लाओसान बौद्ध विहार की भांति मूलत: 9वीं सदी में निर्मित है। जिस समय यह बना था उस समय यह संसार का सबसे बड़ा बौद्ध विहार था। इसका यह स्थान आज भी सुरक्षित है। यह छह वर्गाकार चबूतरों पर बना हुआ है जिसमें से तीन चबूतरों का ऊपरी भाग वृत्ताकार है। इस विहार में उत्कीर्णित प्रतिमाओं वाली 2,672 प्रस्तर शिलाएँ और 504 बौद्ध प्रतिमाएँ पाई गई हैं। इसके केन्द्र में स्थित प्रमुख गुम्बद के चारों ओर स्तूप वाली 72 बुद्ध प्रतिमाएँ हैं।

बोरोबुदुर, पावोन और मेंदुत का रहस्य
झील में तैरता पुष्प कमल था बोरोबुदुर स्मारक
बोरोबुदुर मंदिर का निर्माण समुद्र तल से 265 मीटर की ऊँचाई पर स्थित एक झील में खड़ी 49 फुट ऊँची चट्टान पर किया गया था। इस प्राचीन झील का अस्तित्व 20वीं सदी के आरम्भ में पुरातत्वविदों के बीच गहन चर्चा का विषय था। 1931 ई. में हिंदू और बौद्ध वास्तुकला के डच विद्वान डब्ल्यू.ओ.जे. नियूवेनकैम्प द्वारा विकसित सिद्धांत के अनुसार, ‘केदू मैदान’ प्राचीन काल में एक झील हुआ करता था और बोरोबुदुर अपने निर्माण के समय इसी झील में कमल पुष्प के समान तैरता था। इसके निर्माण का समय मंदिर में उत्कीर्णित उच्चवचों और 8वीं तथा 9वीं सदी के दौरान सामान्य रूप से प्रयुक्त शाही पात्रें के अभिलेखों की तुलना से अनुमानित किया जाता है।

जकार्ता के मंदिर
जकार्ता शहर का वास्तविक नाम जयकार्ता है। यह पश्चिमी जावा में स्थित है तथा इंडोनेशिया की राजधानी है। जकार्ता में 17 प्रमुख हिन्दू मंदिर पाए गए हैं जिनमें नौवीं शताब्दी में निर्मित विशाल शिव मंदिर, 926 ई. में बना तीर्थ एम्पुल मंदिर, 11वीं सदी में बना गोवा गजह (शिव मंदिर), 14वीं शताब्दी में निर्मित बेसैख का माता मंदिर और 1633 ई. में निर्मित पुरा उलुंदनु ब्रतन (शिव मंदिर) प्रमुख हैं।
योग्यकार्ता के मंदिर
योग्यकार्ता शहर मध्य जावा में स्थित है। फरवरी 2010 में योग्यकर्ता में स्थित एक निजी मुस्लिम विश्वविद्यालय के परिसर में दो मंदिरों के अवशेष मिले जब विश्वविद्यालय ने वहाँ बनी एक मस्जिद के पास पुस्तकालय बनाने के लिए खुदाई आरंभ की। ये मंदिर लगभग 1100 साल पुराने हैं तथा विशाल और अद्वितीय हैं।
सिंघसरी शिव मंदिर
13वीं शताब्दी में बना सिंघसरी शिव मंदिर पूर्वी जावा के सिंघसरी नामक स्थान पर बना हुआ है। यह विशाल शिव मंदिर अपनी भव्यता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। मंदिर में भगवान शिव की एक विशाल प्रतिमा है जिसके पूजन के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में भक्त आते हैं। भगवान शिव से संबंधित समस्त पर्व बड़ी धूम-धाम से मनाए जाते हैं।
बाली भाषा में ‘पुरा’ का अर्थ मंदिर होता है। अक्टूबर, 2012 में इंडोनेशिया के पुरातत्व विभाग ने बाली द्वीप का सर्वेक्षण किया तथा चौदहवीं शताब्दी ईस्वी के एक विशाल हिन्दू मंदिर को खोज निकालने का दावा किया। पुरातत्वविदों ने देश को सूचित किया कि पूर्वी देन्पासार में नदी बेसिन में हो रही खुदाई में धरती से तीन फुट नीचे उन्हें एक विशालकाय पत्थर मिला तथा आगे हुई खुदाई में पाया गया कि यह वास्तव में एक विशाल मंदिर की आधारशिला है। ऐसे पत्थर बड़ी संख्या में मिले जो यह प्रमाणित करते हैं कि चौदहवीं सदी में इस नदी क्षेत्र में बड़ी संख्या में मंदिरों का निर्माण हुआ।

पुरा तमन अयुन (सरस्वती मंदिर)
देवी सरस्वती को समर्पित यह मंदिर बाली के उबुद नगर में है। यहाँ पर एक सुंदर कुंड भी बना है, जो इस मंदिर का मुख्य आकर्षण है। यहाँ प्रतिदिन संगीत के कार्यक्रम होते हैं। संस्कृत में अयन का अर्थ होता है- घर। बाली द्वीप का अयुन शब्द संस्कृत के अयन शब्द से ही बना है।

पुरा बेसकिह मंदिर

बाली द्वीप के माउंट अगुंग में स्थित यह मंदिर प्रकृति की गोद में बसा इंडोनेशिया का सबसे सुंदर मंदिर है। यह बाली का सबसे बड़ा और पवित्र मंदिर भी है, जो बाली के महत्वपूर्ण मंदिरों की शृंखला में सम्मिलित किया गया है। 1995 ई. में इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया। मंदिर में विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियांँ स्थापित हैं।

गिन्यार क्षेत्र के मंदिर
बाली द्वीप के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में स्थित गिन्यार में 1986 ई. में हुई खुदाई में वासा मंदिर सामने आया जो 11 मीटर चौड़ा है। 2010 ई. तक इंडोनेशिया के पुरातत्वविद, गिन्यार में धरती के नीचे दबे हुए 16 और मंदिरों को ढूंढने में सफल हो गए।

तनाहलोट मंदिर (विष्णु मंदिर)
बाली द्वीप पर स्थित विशाल समुद्री चट्टान पर भगवान विष्णु को समर्पित तनाहलोट मंदिर 15वीं शताब्दी में निर्मित हुआ। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है तथा इंडोनेशिया के मुख्य आकर्षणों में से एक है।
(यह आलेख लेखक की पुस्तक ‘हिंदुत्व की छाया में इंडोनेशिया’ के कुछ अंशों को मिलाकर तैयार किया गया है)