सात मोक्षपुरियाँ

भूषणलाल पाराशर
संरक्षक, श्री सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा, दिल्ली


पुराणों में मुक्ति के पाँच मुख्य कारण बतलाये गये हैं। इनमें ब्रह्मज्ञान प्रथम हेतु है। द्वितीय है भक्ति द्वारा भगवत्कृपा की प्राप्ति। तृतीय है अपने पुत्र-पौत्रदिकों, गोत्रजों, कुटुम्बियों तथा अन्य व्यक्तियों द्वारा गया आदि तीर्थों में सम्पादित श्राद्ध-कर्म। चौथा है धर्म युद्ध तथा गोरक्षा आदि में हुई मृत्यु। पाँचवाँ है कुरुक्षेत्र आदि प्रधान तीर्थों और सात प्रधान मोक्षदायिनी पुरियों में निवास पूर्वक शरीर-त्यागना। इसीलिये गरुड़पुराण (2/40/114) में कहा है—
अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवन्तिका।।
पुरी द्वारावती ज्ञेया: सप्तैता मोक्षदायिका:।।

यहां इन सात पुरियों का संक्षिप्त महात्म्य दिया जा रहा है—

1- अयोध्या

यह सात मोक्षदायिनी पुरियों में प्रथम है। ‘स्कन्दपुराण’ के वैष्णव खण्ड के अयोध्या महात्म्य के अनुसार यह विष्णु के सुदर्शन चक्र पर बसी है। ‘भूतिशुद्ध-तत्व- के अनुसार यह भगवान् श्री रामचन्द्र के धनुषाग्रह पर स्थित है। इसका आकार मछली के समान लम्बा है और इसका मान सहस्त्रधारा-तीर्थ से एक योजन पूर्व तकद्ब्रब्रह्मकुण्ड से एक योजन पश्चिम तक, दक्षिण में तमसा नदी तक एवं उत्तर में सरयू नदी तक निर्दिष्ट है (स्कन्द वै-खं-अ-मा- 1/64/65) पहले ब्रह्माजी ने अयोध्या में ब्रह्मकुण्ड की स्थापना की थी। इसी प्रकार यहां भगवती सीता द्वारा निर्मित एक सीताकुण्ड भी है, जिसे भगवान् श्री राम ने वर देकर समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला बना दिया। इसमें स्नान करने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। इससे पूर्व सरयू में ट्टणमोचन तीर्थ है, जहां लोमशजी ने विधिपूर्वक स्नान किया था। अयोध्या में सहस्त्रधारा से पूर्व ‘स्वर्गद्वार’ है। यहां किया हुआ यज्ञ, हवन, दान, पुण्यादि अक्षय हो जाता है। पुराणों के अनुसार सरसू नदी के तट पर अवस्थित यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा है। भगवान श्री राम की जन्मभूमि होने के कारण भी इसका महत्व लोकविश्रुत है।

2- मथुरा
पुराणों में मथुरा के मधुपुर आदि कई नाम आये हैं। वराहपुराण के तीस अध्यायों में इसका महात्म्य है। नारदपुराण के उत्तरभाग के 75 से 80 तक के अध्यायों में इसका विस्तृत वर्णन है। यह यमुना नदी के दोनों ओर बसा है। विशेष कर इसका विस्तृत भाग यमुना के दक्षिण तट पर है। पुराणों के अनुसार यह मुख्यतया भगवान् श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के रूप में विख्यात है।

3- माया (हरिद्वार)
यह पवित्र सात पुरियों में तीसरें स्थान पर आती है। वराहपुराण के 145-146 अध्यायों में इसकी विशेष महिमा वर्णित है। ब्रह्माण्ड पुराण के अन्तिम खण्ड के चालीसवें अध्याय में भी इसकी महिमा है। सतीदेवी की मूर्ति एवं शक्तिपीठ होने के कारण यह प्रसिद्ध है। कनखल से ट्टषिकेश तक का प्रान्त मायापुरी कहा जाता है। गंगा जी पर्वत से उतरकर सर्वप्रथम यहीं समतल भूमितल पर प्रवेश करती हैं, इसलिये इसका दूसरा नाम गंगाद्वार भी है। इसके दोनों ओर पवित्र तीर्थों की स्थिति है।

4- काशी (वाराणसी)
काशी भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी हुई है। यह प्रलयकाल में भी नष्ट नहीं होतीद्ब्रऐसा कहा गया है। वरुणा और असी के बीच में स्थित होने के कारण इसे वाराणसी भी कहा गया है। यहां राजघाट से लेकर दुर्गाघाट, सिन्ध्यिाघाट, ललिताघाट, केदारघाट, मर्णिकर्णिका आदि सैकड़ों घाट हैं। विश्वेश्वर लिंगस्वरूप विश्वनाथद्ब्रमन्दिर, अन्नपूर्णाद्ब्रमन्दिर, ज्ञानवापी, दुण्ढिराज गणेश, दण्डपाणि, लांगुलीश्वर, दुर्गा-मन्दिर, हनुमान-मन्दिर, संकटमोचन, पिशाचमोचन तथा सहस्त्रें अन्य मन्दिर एवं पवित्र तीर्थ-स्थान हैं, जो अविमुक्त क्षेत्र काशी की शोभा बढ़ाते हैं। काशी की महिमा पर ‘काशीरहस्य’ और ‘काशीखण्ड’ दो विशाल ग्रन्थ हैं।

5- कांची
पेलार नदी के तट पर स्थित शिवकाची एवं विष्णुकांचीद्ब्रइन दो नामों से दो भागों में विभक्त यह हरिहरात्मिका पुरी है। शिवकांची विष्णुकांची से बड़ी है। यह चेन्नई से 75 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम की ओर स्थित है। यहां का मुख्य मन्दिर एकाग्रेश्वर-मन्दिर है। इसमें वामन-मन्दिर, कामाख्या-मन्दिर, सुब्रह्मण्यम्-मन्दिर आदि तीर्थ हैं एवं सर्वतीर्थ-सरोवर भी है। कांची में वरदराज स्वामी तथा देवराज स्वामी के मन्दिर हैं, इनके अतिरिक्त और अन्य कई मन्दिर हैं। ब्रह्माण्ड पुराण में कांचीपुरी की महिमा विशेष रूप से वर्णित है।

6- अवन्तिका (उज्जैन)
उज्जैन को पृथ्वी की नाभि कहा गया है। यहां महाकाल का ज्योतिर्लिंग और हरसिद्धि देवी का शक्तिपीठ प्रसिद्ध है। पुराणों के अनुसार यह हैहयवंशी राजा कार्तवीर्य की राजधानी रही है। विक्रमादित्य आदि के समय में यह कभी सम्पूर्ण भारत की और कभी मालवा की राजधानी रही है। स्कन्दपुराण के दो खण्ड अवन्तिक्षेत्र-माहात्म्य और अवन्तीखण्ड इसी पुरी की महिमा में पर्यवसित हुए हैं। उज्जैन नगर मध्य-प्रदेश की राजधानी भोपाल से प्राय: 125 किमी पश्चिम में है। शिप्रा नदी उज्जैन के ठीक बीचोबीच से बहती है। यहां बड़े गणेश, सिद्ध-वट, कालभैरव-मन्दिर, यन्त्र-महल, माधव-क्षेत्र, अंकपाद आदि विशेष प्रसिद्ध हैं। अंकपाद में ही भगवान् श्रीकृष्ण ने सान्दीपनि ट्टषि से 32 विद्याओं एवं 64 कलाओं का अध्ययन किया था। इसमें बिल्वकेश्वर महादेव, रुद्र-सरोवर, नीलगंगासंगम, दशाश्वमेध, व्यास-तीर्थ आदि भी प्रसिद्ध हैं।

7- द्वारका

यह चार धामों में भी परिगणित है। स्कन्द-पुराण का प्रभास-खण्ड इसकी महिमा-रूप में निबद्ध है। इसके भी पहले द्वारावती, कुशस्थली आदि कई नाम रहे हैं। यह वर्तमान गुजरात प्रदेश के काठियावाड़ जिले में पश्चिम समुद्र-तट पर स्थित है। पुराणों के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण के शरीर-त्याग के बाद द्वारका समुद्र में डूब गयी थी, फिर उसके अवशेष अब भी स्थित हैं। भगवान् श्री कृष्ण ने अपने जीवन का अधिकांश भाग यहीं व्यतीत किया था। इनके पहले यहां ककुद्मी का राज्य था, जिसकी कन्या रेवती से बलदेवजी ने विवाह किया था। प्रभास खण्ड के अनुसार द्वारका के प्रभाव से कीट-पतंग, पशु-पक्षी आदि भी मुक्त हो जाते हैं। यहां निष्पाप-सरोवर, रणछोडज़ी का मन्दिर, श्री कृष्ण महल-वल्लभाचार्य की बैठक, वासुदेव-मन्दिर, शंखोद्वार तीर्थ, नागनाथ, पिण्डारक-तीर्थ, कामनाथ, माधवपुर, नारायण-सरोवर आदि कई महत्वपूर्ण तीर्थ हैं।