— धरोहर प्रतिनिधि
अखिल ब्रह्माण्ड नायक परमेश्वर की इस अद्भुत रचना संसार चक्र का प्रवाह अनवरत अपनी गति में चलता चला जा रहा है। इस प्रवाह की गति को कालचक्र के नाम से अभिहित किया जाता है। कालगणना स्वल्पकालिक से दीर्घकालिक मर्यादाओं (सीमाओं) में आबद्ध है- कल्प, मन्वन्तर, युग, संवत्सर, मास, दिन आदि में सुव्यवस्थित रूप में विभाजित है। पृथिवी, ग्रह, नक्षत्रों की गतियाँ इस समय सीमा को विभिन्न रूपों में नियंत्रित करती रहती हैं। वर्ष की सीमा को 12 भागों में वितरित किया गया है, जिन्हें मास या महीना कहा जाता है। ये 12 महीने छह ऋतुओं में विभाजित होते हैं। प्रत्येक ऋतु का अपना विशेष प्राकृतिक महत्व है। प्रकृति की विशेषताओं के अनुसार विभिन्न प्रकार के उत्सव आदि भी होते हैं। भारतीय नव वर्ष का प्रारम्भ वसंत ऋतु में होता है। वसंत ऋतु को ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसमें प्रकृति की हरियाली, वासंती फूलों की सुषमा जहाँ प्राकृतिक सौन्दर्य को बिखेर देती है। वहीं पर नव वर्ष के प्रारम्भ होते ही 15 दिन पश्चात् वैशाख मास का शुभारम्भ होता है।
भारतीय समय चक्र की परम्परा में वैशाख मास की अपार महिमा है। इसे माधव मास भी कहा जाता है। भगवान् विष्णु को अत्यंत प्रिय है वैशाख का महीना। इस मास में भगवान् नारायण के प्रमुख अवतारों (दशावतारों) में भगवान् परशुराम, प्रह्लाद के रक्षक श्री नरसिंह भगवान्, कूर्म भगवान् और बुद्ध रूप में 4 अवतार लेकर प्रकट हुए। विभिन्न दर्शन परम्पराओं के प्रतिष्ठापक आचार्यों महाप्रभु वल्लभाचार्य, आद्य शंकराचार्य, स्वामी रामानुजाचार्य ने इसी मास में इस धराधाम को पावन किया और दर्शनों की स्थापना की। आदिशक्ति भगवती के दिव्य स्वरूपों में दस महाविद्याओं में से मातंगी, बगलामुखी, छिन्नमस्ता ने धर्म की रक्षा के लिए अपने स्वरूप प्रकट किया। सिख सम्प्रदाय के दस गुरुओं में से गुरु तेगबहादुर, गुरु अर्जुनदेव, गुरु अंगददेव जी और गुरु अमरदास जी ने अपने प्राकट्य प्रकाश से जगत् को प्रकाशित किया। माँ गंगा भागीरथी इस मास में दिव्य भारत भूमि में प्रवाहित हुईं तथा माँ जगदम्बा जानकी जी हलाग्र भाग से प्रकट हुईं और राजा जनक को अपना दिव्य रूप पुत्री के रूप में सौंप दिया। अनेक महापुरुषों में हिन्दू सम्राट छत्रपति शिवाजी, महाकवि सूरदास जी ने वैशाख मास को अपने जन्म से सुशोभित किया।
साधना की दृष्टि से वैशाख का महीना परम पवित्र माना जाता है। राशि में संक्रमण की दृष्टि से भगवान् सूर्य नारायण इसी मास में प्रथम राशि मेष राशि में संक्रमण करते हैं और यह काल वैशाखी के रूप में हरि के द्वार गंगा तट पर परम उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस पुण्य पर्व पर आस्तिक जनसमुदाय गंगा में स्नान करने की भावना से पूर्ण रहता है। प्रत्येक 12 वर्ष में इसी पावन पर्व पर हरिद्वार में कुंभ होता है तथा छह वर्ष में अद्र्ध-कुम्भ अपनी पूर्ण गरिमा के साथ मनाया जाता है। सम्पूर्ण वैशाख मास भर प्रात:काल गंगा में स्नान करना और भगवान् विष्णु की पूजा तथा उपवास करने से जीवन में सात्विक भावना का प्रवेश होता है और भगवान् विष्णु के चरणों में अपार प्रीति होती है। अक्षय तृतीया का पावन पर्व इसी मास में आता है, जो उस दिन किए हुए प्रत्येक सत्कर्म को अक्षयता प्रदान करता है।
पवित्र वैशाख महीने में व्रत अनुष्ठान भगवत् आदि ग्रंथों का पाठ करने से भगवान् नारायण के चरणों में अपार प्रीति प्राप्त होती है। और पुण्य फल को भगवत् अर्पण कर देने से दुर्लभ मोक्ष की प्राप्ति होती है।





