चाणक्य क्यों प्रासंगिक हैं आज भी

जवाहरलाल कौल
वरिष्ठ पत्रकार


कई बरस पहले जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे तो मुझे चाणक्य के बारे में ऐसी टिप्पणी सुनने को मिली कि महसूस हुआ कि युग बदल जाते हैं, परिस्थितियां बदल जाती हैं, कालांतर इतना बड़ा होता है कि पुराने युग को समझ पाना केवल कल्पना के ही सहारे संभव रहता है, परंतु कुछेक लोग और उनकी नीतियां हमेशा प्रासंगिक बनी रहती हैं। ईद का दिन था। मैं अपने एक राजनीतिक मित्र को बधाई देने गया। वे उस समय केंद्र सरकार में मंत्री थे, इसलिए स्वाभाविक था कि मिलने वालों की बहुत भीड़ होगी। सोचा, कुछ देर से ही चला जाए, तब तक भीड़ छंट गई होगी। शायद कुछ अधिक ही देर से पहुंचा। मिले तो सही, लेकिन बैठक के बदले उन्होंने मुझे अपने शयन कक्ष में बुलाया। कोई पुस्तक पढ़ रहे थे। बोले, ‘इस ब्राह्मण में विलक्षण बुद्धि रही होगी।’
मैंने पूछा कौन से ब्राह्मण की बात कर रहे हैं?
उन्होंने कहा, वही, चाणक्य, और कौन?
‘मैंने पूछा कि इतने समय पश्चात चाणक्य को पढऩे की आवश्यकता क्यों पड़ी! इन्होंने राजीव गांधी पर बहुत ही बढिय़ा टिप्पणी लिखी है।’ उन्होंने बताया कि चाणक्य ने शासक के लिए जो कुछ न करने को कहा था वही सब प्रधानमंत्री जी करते जा रहे हैं। उदाहरण के लिए शासक को अपने बचपन के दोस्तों और सगे—सम्बंधियों को राजकाज में सलाहकार नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि कमजोरियों को सबसे अधिक वही लोग जानते हैं और उनका बेजा इस्तेमाल करते हैं।
दरअसल, मेरे मित्र को प्रधानमंत्री ने किसी राजकीय मामले पर बातचीत के लिए अपने कक्ष में बुलाया था और वे ठीक उसी समय कमरे में आए जब प्रधानमंत्री के कुछ निकट के मित्र भी वहां उपस्थित थे। वे ऐसे मित्र थे जिनके लिए शायद पहले से ही समय की आवश्यकता नहीं रही हो। मंत्री जी दरवाजे के पास ही ठिठक गए और प्रतीक्षा करने लगे कि प्रधानमंत्री की नजर पड़ेगी तो बैठने को कहेंगे और मित्र लोगों से विदा लेंगे, लेकिन वे बहस में इतने व्यस्त थे कि मंत्री जी द्वार पर ही खड़े—खड़े उनकी बहस देख कर मन ही मन कुढ़ते रहे। माहौल कुछ ऐसा था जैसा कालेज की कैंटीन में चार सहपाठी में बहस के बीच होता है। वे भी कैंटीन के भीतर नहीं बाहर, खड़े खड़े। मंत्री को बहुत बुरा लग रहा था। प्रधानमंत्री के साथ ऐसा व्यवहार और उन्हीं के राजकीय कार्यालय में पचाना मुश्किल हो रहा था। शासन बिना अनुशासन के संभव नहीं होता। मंत्री जी का मन हुआ कि वह आगे जाकर टोक दें, लेकिन इसमें खतरा था कि कहीं पद भी न जाए और उसके साथ मान भी।

चाणक्य की दूसरी सीख की दुर्गति के नाटकीय प्रदर्शन का प्रत्यक्षदर्शी पत्रकार के रूप में मैं स्वयं रहा था। पाकिस्तान के बारे में तब के विदेश सचिव ने कोई बयान दिया था जो पाकिस्तान सरकार को पसंद नहीं आया। कुछ दिन बाद नई दिल्ली के विज्ञान भवन में प्रधानमंत्री की देशी और विदेशी पत्रकारों से वार्ता में एक पाकिस्तानी दैनिक के संवाददाता की शिकायत थी कि आप तो संबंध अच्छे बनाने की बात करते हैं लेकिन आप के विदेश सचिव तो हमारे विरुद्ध बयान दे रहे हैं। इस पर प्रधानमंत्री का उत्तर था कि आप जल्द ही नए विदेश सचिव से बात करेंगे। यानी प्रेस सम्मेलन में ही प्रधानमंत्री ने अपने विदेश सचिव को बर्खास्त करने की घोषणा कर दी जबकि विदेश सचिव प्रधानमंत्री के साथ बगल में ही बैठे थे। अपने ही दल के एक प्रमुख नेता को सार्वजनिक तौर पर अपमानित करने की एक घटना से आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के विरुद्ध बगावत का माहौल पैदा हुआ और उसी ने एक फिल्मी नायक नंदमूरि तारक रामाराव को राजनैतिक नायक बना दिया।

लगभग ढाई हजार वर्ष पश्चात् भी चाणक्य हमारे लिए क्यों प्रासंगिक हैं? चाणक्य का कर्म इस बात का प्रमाण है कि भारत वर्ष को प्राचीन काल से ही एक ही सांस्कृतिक राष्ट्र माना जाता था। समय—समय पर राजनैतिक रूप से वह छोटे—छोटे रजवाड़ों में बंट जाता रहा हो, लेकिन किसी बाहरी संकट के सामने उसका वही विराट आकार आंखों के सामने आता रहा है जिसकी सीमाएं आसेतु हिमालय बताई गई हैं। उत्तरापथ पर उत्तर-पश्चिम भारत में उत्पन्न हुआ बालक चाणक्य, जिसकी शिक्षा-दीक्षा उस सीमा प्रांत में ही हई हो, सुदूर पूर्व में साम्राज्य स्थापना की कल्पना कैसे कर सकता था? एक स्थापित साम्राज्य को उखाडऩे के लिए केवल साहस ही नहीं जन समर्थन भी चाहिए, जनता के बीच प्रतिष्ठा चाहिए, जो शायद उसे उत्तर-पश्चिम में मिल सकता था, पूर्व भारत में नहीं मिल सकता था जहां की भाषा भी भिन्न रही होगी। यह हुआ तो इसलिए कि नालंदा और तक्षशिला में भारत की जो छवि दिखाई देती थी, वह एक समान थी। जिस जैन परंपरा में चाणक्य को दमिल या तमिल कहा गया है, वे भी इस तथ्य को ही पुष्ट करती हैं कि सुदूर दक्षिण में पैदा हुआ चाणक्य उत्तर पश्चिम में शिक्षा पाकर पूर्वी भारत में राजनैतिक क्रांति कर सकता है। वह भी अपने लिए नहीं, एक प्रतिभावान गरीब बालक के पीछे पूरे समाज को खड़ा करके। उस बालक का वंश शायद कई पीढिय़ों से अपनी शक्ति और सम्पन्नता खो चुका था और कोई उसे क्षत्रिय तक मानने को भी तैयार नहीं था। यह स्वाभाविक है कि जब चंद्रगुप्त मौर्य सम्राट बन गए तो सभी सम्प्रदायों के लोगों ने उन्हें अपना बताने का प्रयास किया। कोई उन्हें शाक्य घोषित करके बुद्ध से जोडऩे का प्रयास करने लगा, तो कोई उन्हें दक्षिणात्य बताने लगा जहां जैन परंपरा का पर्याप्त प्रभाव था। लेकिन चाणक्य ने जब चुद्रगुप्त को चुना तो वह एक साधारण सा बालक था जिसके पास न तो कुल की प्रतिष्ठा थी न धनबल और न ही सैन्य बल। चाणक्य ने उसमें बचपन में ही एक नायक के गुण देखे थे, जिन्हें बस मांजने की आवश्यकता थी।

आसेतु हिमालय की कल्पना कोई अर्वाचीन धारणा नहीं है। भारत सांस्कृतिक रूप एक राष्ट्र तब भी था जब यह सोलह जनपदों में बंटा था। इसलिए जब मौर्य साम्राज्य स्थापना हुई तो भले ही पूरा भारत वर्ष मौर्य राजाओं के शासन में शामिल न रहा हो, लेकिन जो दक्षिण के राज्य उनके शासन से बाहर थे, उनको भी विराट देश का सीमांत ही माना जाता था, विदेश नहीं। अशोक के शिलालेखों में जिन चोल, पण्डया, केरल ताम्रपर्णी आदि दक्षिणी राज्यों का उल्लेख है उनको प्रत्यांत या केवल अंत्य ही कहा गया है। शेष राज्य जिनका उल्लेख शिलालेखों में है, इस वर्ग में नहीं रखे गए हैं।

नंदों के विरुद्ध अपने अभियान में चाणक्य को उत्तर-पश्चिम में सेना की आवश्यकता थी और धनाभाव के कारण ही नहीं उच्च वर्गों में राजा के विरुद्ध विद्रोह में शामिल होने के प्रति अरुचि तथा साहस का अभाव उनके मार्ग में बाधा बने होंगे। उन्हें इस मामले में पहाड़ी जनजातियों और आंचलिक जातियों का ही सहारा मिला। शायद उसी प्रकार जैसे राम को शक्तिशाली रावण के विरुद्ध बड़े क्षत्रिय राजाओं का नहीं, वनवासी वानर जातियों का ही साथ मिला। उन्हें ही कुशल सैनिक बना कर उन्होंने रावण की विशाल सेना को पराजित किया था। चाणक्य को आरम्भिक सफलताएं इन्हीं वनवासी और निर्धन जनजातियों के ही कारण मिलीं। शायद उन्हें चंद्रगुप्त में अपने ही वर्ग का प्रतिनिधि दिखाई दिया हो। आज भी वही शासक सफल होगा जो देश के वंचित, आंचलिक लोगों का विश्वास जीत सके जिनको सभ्यों की पंगत में बैठने का अधिकार नहीं रहता।

चाणक्य का एक नाम विष्णुगुप्त भी बताया जाता है। अर्थशास्त्र में केवल एक बार चाणक्य को इस नाम से पहचाना गया है। लेकिन अन्य साक्ष्य इस बात का संकेत देते हैं कि विष्णुगुप्त ही उनका असली नाम रहा होगा। चाणक्य शब्द की जितनी भी व्याख्याएं की गई हैं उनसे साफ है कि यह शब्द स्वतंत्र शब्द नहीं है। इसका विकास उसी तरह से हुआ है जैसे रघु से राघव या पंडु से पांडव। चाणक्य के पिता का नाम अगर चणक था तो स्वाभाविक है कि आरम्भ में उनके बेटे को पिता के नाम से ही चाणक्य कहा जाता रहा होगा, जबकि नामकरण कुछ और हुआ होगा। लोकप्रिय साहित्य में इस बात पर अधिक बल दिया गया है कि चाणक्य का राजा नंद ने अपमान किया था और उसका ही बदला लेने के लिए चाणक्य ने नंद साम्राज्य को उखाडऩे का संकल्प लिया था। लेकिन जिस तरह का अभियान चाणक्य ने चलाया था, उसमें नंद को उखाडऩा तो गौण था, यवन आक्रांताओं को देश से बाहर रखना प्रधान लक्ष्य बन गया था। नंद के मारे जाने पर चाणक्य ने संन्यास नहीं लिया और न वे अपने महाविद्यालय लौटे। वे शासन के सिद्धांतों को रचने और सफल शासन के नियम—कायदे बनाने में लग गए। उन्होंने बरसों पहले एक बालक को एक अभियान के नेतृत्व के लिए चुना था। उसे इस योग्य बनाने के लिए बालक को शस्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा दी। समय—समय पर उसे सही समर नीति सिखाई। लेकिन आचार्य और दूरद्रष्टा होने के नाते वे जानते थे कि शासक के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं कि वे राजनीति के दांवपेंच सीख अपने विरोधियों को पछाड़े, अपितु यह भी आवश्यक है कि शासक सत्ता पाने के पश्चात अपने कर्तव्य से उदासीन न हो जाए, सत्ता के दंभ में निरंकुश न हो और सामान्य शिष्टाचार को अनावश्यक मान कर उदंड न बने। इस बात की ओर लोगों का ध्यान कम ही गया है कि चाणक्य के लिए राजधानी और साम्राज्य का केंद्रीय भाग ही महत्त्वपूर्ण नहीं था, वे सीमांत को सबसे अधिक महत्व देते थे। मौर्य साम्राज्य को स्थापित करने में उन्हें जितना समय उत्तर-पूर्व के क्षत्रपों को सम्भालने और यवन आक्रांताओं को सीमा से बाहर रखने में लगा, उतना ही हिमालय की तराइयों में स्थानीय राजाओं को संधियों में बांधने में लगा था। चाणक्य मानते थे कि जिस राजा की नजरें सीमा पर नहीं रहतीं, उसका देश अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता है।

राष्ट्र केवल एक विशाल जन समूह ही नहीं होता और न किसी विशेष भूभाग पर अधिकार होना ही, उसे राष्ट्र बनाता है। जब यह जनसमूह किसी भूभाग में बहुत काल तक रहता है तो वह कई प्रकार के सहकारी नियम या बंधन स्वीकार कर लेता है जो उस समूह को शांति और साहचर्य में रहने के योग्य बनाए। उसकी परंपराएं बनती हैं, उसके संस्कार विकसित होते हैं। ऐसे संस्कारित जनसमूह के आदर्श उसका मार्गदर्शन करते हैं। इन आदशों में तों महान पुरुष, विद्वान ऋषि-मुनि, वीर व लोकप्रिय राजा या शासक उस जनसमूह के नायकों के रूप में उभरते हैं। ऐसा जनसमूह अगर अपने देश से विलग भी हो जाए तो भी उसकी परंपराएं, उसके आदर्श और उसके नायकों की सीख उसे पुन: अपने देश में स्थापित होने या नए देश बनाने की क्षमता देते हैं।

कुछ समय पहले जब मैं कनाडा में था तो वहां मुझे कई बार ऐसा लगता था कि कनाडा आज भी राष्ट्र बनने की आरम्भिक छटपटाहट से ही गुजर रहा है। एक बार विचार विमर्श के दौरान वहां के एक पत्रकार ने बताया कि ऐसा इसलिए है कि हमारे पास अमरीकियों की तरह बाकायदा नित नए-नए नायकों का उत्पादन करने की व्यवस्था नहीं है। अमेरिका की राजनैतिक आयु कुछ सौ साल ही है इसलिए उसे एक राष्ट्र का रूप पाने की बहुत जल्दी थी। यही कारण है कि वहां बहुत कम समय में सब बातें जल्दी जल्दी होती नजर आती हैं।

भारत जैसे प्राचीन राष्ट्र की समस्या नायक बनाने की नहीं, नायकों की स्मृति को संजो कर रखने की है। चाणक्य हमारे उन नायकों में से हैं जिनको न केवल स्मृतियों में सजो कर रखना चाहिए, बल्कि उनकी बातों को भी व्यवहार में उतारना आवश्यक है।