ऐसे बनते हैं संत और सन्यासी

मुरारी शरण शुक्ल
सह सम्पादक, हिन्दू विश्व


प्राचीन काल में ऋषि, देवर्षि, महर्षि, ब्रह्मर्षि इत्यादि पदवियाँ प्रचलित थीं। इनके दिव्यतम स्तर को प्राप्त करना इस कलिकाल में कठिन दिखाई देने लगा, तो समाज ने युगानुकूल अनेक नवीन पदवियों का विकास किया। आज शंकराचार्य, पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, मंडलेश्वर, श्री महंत, महंत, आचार्य, परमाचार्य, यति, योगी, साधु, संत, परमहंस जैसी पदवियाँ प्रचलित हैं। हर सनातनी इनके बारे में जानना चाहता है।

साधु
महाकोष वाचस्पत्यम् में साधु को क्रोधजीत, निर्वैरी, दयावान, शांत, दंभ और अहंकार से मुक्त, निरपेक्ष और वीतरागी कहा गया है। लोभ, मोह, मद, कामादि से रहित, भगवद चरणों का शरणार्थी, सहिष्णु, समदर्शी, सर्वभूत का सुख चाहने वाला, परदुख से विरत बताया गया है। महानिर्वाण तंत्र में साधु को दृढ़व्रती, सत्यधर्म और सत्यवादी कहा है। कल्कि पुराण में साधु को स्वयं हरि कहा गया है और बताया गया है कि जिनका हृदय धर्म है और जिनके स्पर्श और पूजन से यमदर्शन से मुक्ति मिलती हो, उन्हें साधु कहा गया है। बौद्ध धम्मपद के भिक्खु वग्ग में इन्द्रिय संयमी को साधु कहा है। जैन मत में साधु के स्थान पर साहू शब्द का प्रयोग हुआ है। तुलसीदास ने कहा है- एक घड़ी आधो घड़ी आधो में पुनि आध। तुलसी संगत साधु की हरै कोटि अपराध।।

संत
मत्स्य पुराण में कहा गया है कि ब्राह्मण ग्रंथ और वेद देवताओं की प्रत्यक्ष अभिव्यक्तियाँ हैं, जिनके अंत:करण में ब्रह्म और उक्त ग्रन्थों का संयोग हो, वे संत कहलाते हैं। ‘मालविकाग्निमित्रम’ में कालिदास ने संत का अर्थ किया है विवेकवान। ‘रघुवंशम’ में उन्होंने कहा है कि सद्-असद् का निर्णय कर सकने वाले नीर-क्षीर विवेकी पुरुष ही संत हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण ने कहा है कि जो तीर्थों को अपनी उपस्थिति से पवित्र कर देते हैं, वे संत हैं। बृहन्नारदीय पुराण में विष्णु भक्त और परमार्थ में रत व्यक्ति को संत कहा गया है। भर्तृहरि ने नीतिशतक में कहा है कि विनम्रता से अभ्युन्नति करने वाले, पर गुणों के कथन से ही अपने गुणों को प्रकाशित करने वाले, दूसरों के बड़े कार्यों की सिद्धि के लिए उद्योग करते हुए ही निजरथ की सिद्धि करने वाले, कटुभाषी दुष्टों का क्षमा द्वारा ही तिरस्कार करने वाले, आश्चर्यजनक आचरण शैली वाले लोकमान्य लोग ही संत कहलाते हैं। छान्दोग्योपनिषद में सत् की उपासना करने वाले को संत कहा गया है। तैत्तिरीय उपनिषद में ब्रह्माण्ड के रहस्यों को समझने वाले को सन्त कहा गया है। तुलसीदास ने कहा है- पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया।। संत सहहिं दुख परहित लागी। पर दुख हेतु असंतोष अभागी।।

संन्यासी
आपस्तम्ब धर्मसूत्र में उल्लेख है कि चार आश्रम हैं- गार्हस्थ्य, आचार्यकुल ब्रह्मचर्य, मौन संन्यास और वानप्रस्थ। आगे बताया गया है कि ब्रह्मचर्य का नियम पूर्वक पालन करने वाला ही संन्यास का अधिकारी है- अत एव ब्रह्मचर्यवान् प्रव्रजति। संन्यासी के बारे में आगे कहा है कि निरग्नि हो जाए, गृह, सुख व शरण का त्याग करें, मौन रहें, केवल दैनिक अध्यवसाय के समय बोले, ग्राम में केवल इतने ही अन्न की भिक्षा माँगें जितने से जीविका चल सके। इस संसार की अथवा परलोक की चिंता किए बिना सर्वत्र भ्रमण करें। दूसरों द्वारा त्यागे हुए वस्त्र धारण करें या सभी वस्त्रों का परित्याग करें। सब कुछ त्याग कर केवल आत्मा का चिंतन करें।

संन्यासी छ: प्रकार के कहे गए हैं-
कुटीचक्र
वैधानिक धर्मसूत्र में कहा है कि कुटी चक्र संन्यासी गौतम, भारद्वाज, याज्ञवल्क्य व हारित प्रभृति ऋषियों के आश्रम में प्रवास करते, प्रतिदिन केवल आठ ग्रास भोजन करते थे, योग मार्ग के ज्ञाता थे और मोक्ष साधन में लगे रहते थे। अर्णिका उपनिषद में कहा है कि कुटिचरों को स्वजनों को त्याग देना चाहिए।
बहूदक
भिक्षुक उपनिषद में कहा है कि बहुदक संन्यासी त्रिदण्ड, कमंडल, शिखा, यज्ञोपवीत, कषाय वस्त्र धारण करें, मधु-मांस का त्याग कर केवल ब्राह्मण के घर से भिक्षा ग्रहण कर आठ ग्रास ही भोजन करें।
हंस
हंस संन्यासी को ग्राम में एक दिन और नगर में पाँच दिन रुकना चाहिए। तीर्थ में सात दिन से अधिक रूकने की अनुमति नहीं है। एक माह तक उपवास करने, चंद्रायन व्रत करने और पंचगव्य के सेवन की बात वैखानस धर्मसूत्र और भिक्षुक उपनिषद में कहा गया है। संन्यास उपनिषद में कहा है कि हंस संन्यासी को जटाधारी, त्रिपुण्ड एवं उध्र्वपुंड धारण करने वाला, अनजान स्थान पर मांग कर भोजन करने वाला, कौपीन (लंगोटी) मात्र धारण करने वाला होना चाहिए। अर्णिका उपनिषद व स्मृति मुक्ताफल में एकदण्डी धारण करने की भी चर्चा है।
परमहंस
परमहंस सन्यासी वृक्ष मूल या शून्यागार (परित्यक्त गृह) में वास करें। शिखा, यज्ञोपवीत से विहीन पाँच घरों से हाथ रूपी पात्र में भिक्षा प्राप्त करने वाला (करपात्री), एक लंगोटी, एक चादर तथा एक बांस का दण्ड अपने पास रखने वाला, शरीर पर भस्म धारण करने वाला, सब कुछ परित्याग कर देने वाला परमहंस होता है। जाबालोपनिषद में कहा गया है कि परमहंस सन्यासी अव्यक्त लिंग अर्थात् संन्यास के चिन्हों से रहित, आचरण भी अव्यक्त, अंदर से उन्मत्त न होते हुए भी बाहर से उन्मत्त लगने वाले होते हैं।
वैराग्य संन्यासी
वैराग्य संन्यासी वे होते हैं, जो दृष्ट एवं अनुश्राविक विषयों के प्रति तृष्णा रहित होकर तथा पूर्व जन्म के पुण्यों के फलस्वरूप वैराग्य उत्पन्न होने पर संन्यास ग्रहण किया हो।
ज्ञान संन्यासी
जो शास्त्रों के ज्ञान से पाप-पुण्य और सांसारिक अनुभवों को सुनकर, प्रपञ्च से उपराम हो, शरीर वासना (पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा), शास्त्र वासना (शास्त्रों पर अत्यधिक निर्भर करना), लोक वासना (लौकिक व्यवहारों की प्रमुखता) का परित्याग कर समस्त प्रकार की सांसारिकता को त्याग कर, साधन चतुष्टय (विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षत्व) से सम्पन्न होकर सन्यास ग्रहण किया हो।
तुरीयातीत
तुरीयातीत संन्यासी सब कुछ त्याग देने वाला, गोमुख वृति वाला अर्थात बिना हाथों के प्रयोग के तीन गृहों से फल अथवा अन्न की भिक्षा लेने वाला, अपना शरीर नग्न रखने वाला, शरीर को मृत की भांति जानकर किसी तरह जीवन निर्वाह करने वाला होता है।
अवधूत
अवधूत सन्यासी नियमातीत, पतित और निन्दित के अतिरिक्त अजगर वृत्ति से आहार प्राप्त करने वाले, अपने स्वरूप की खोज में सतत लगे रहते हैं। विश्व से अपने को अलग मानते हैं, संसार को जड़ मानते हैं, स्वयं को विराट मानते हैं।
परिव्राजक
बौधायन धर्मसूत्र में परिव्राजक को परिवार जनों का परित्याग कर वन में रहने, शिखा मुण्डन और कौपीन धारण, वर्षा में एक स्थान वास, कषाय वस्त्र धारण और वाणी-मन-कर्म का निग्रह करने का विवरण है। विष्णु धर्मसूत्र में चतुर्थाश्रम में प्रवेश के समय सम्पत्ति त्यागकर, सात घरों से भिक्षा ले, शून्यागार अथवा वृक्ष के नीचे वास करना चाहिए, गाँव में द्विरात्री वास नहीं करना चाहिए और किसी को प्रणाम भी नहीं करना चाहिए। गौतम धर्मसूत्र में संन्यासी को द्रव्य संग्रह नहीं करना चाहिए, उध्र्वरेता अर्थात ब्रह्मचारी हो, केवल भिक्षा लेने ही गाँव में जाएँ, भिक्षा मिलने में विलम्ब हो तो बिना भिक्षा लिए ही लौट आयें।
मंडलीश्वर या मंडलेश्वर
साधुओं की मंडली का जो प्रमुख हो, उसे आरम्भ में मंडलीश्वर कहते थे, कालान्तर में वही मंडलेश्वर कहे जाने लगे। साधुओं की मंडली का आकार छोटा भी हो सकता है और बड़ा भी।
महामंडलेश्वर
साधु-संतों-संन्यासियों की अनेक मंडलियों के जो स्वामी हों, उन्हें महामण्डलेश्वर कहा जाता है। उनके लिए कुछ योग्यता निर्धारित हैं।
1.वेद-पुराण का ज्ञान : व्यक्ति को वेदांत, धर्मशास्त्र और पुराणों का गहरा ज्ञान होना चाहिए।
2.आचार्य या शास्त्री की उपाधि : अगर किसी के पास ये उपाधि है, तो उसे प्राथमिकता मिलती है।
3.मठ से जुड़ाव : व्यक्ति जिस मठ या अखाड़े से जुड़ा है, वहाँ समाज सेवा और धर्म का प्रचार होना चाहिए।
4.कथावाचक का अनुभव : अगर कोई 10-12 साल से कथा सुनाने या मठ से जुड़ा हुआ है, तो यह भी उसकी योग्यता में गिना जाता है।

महामंडलेश्वर बनने की प्रक्रिया
महामंडलेश्वर बनने के लिए कई नियमों का पालन करना पड़ता है। चयन के बाद व्यक्ति को संन्यास दिलाया जाता है और उन्हें स्वयं ही अपना पिंडदान करना होता है। इसके बाद महामंडलेश्वर का पट्टाभिषेक (राज्याभिषेक जैसा सम्मान समारोह) किया जाता है। पट्टाभिषेक के समय 13 अखाड़ों के संत और महंत विद्यमान रहते हैं। इस अवसर पर व्यक्ति को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गुड़ का मिश्रण) दिया जाता है और चादर भेंट की जाती है।

महामण्डलेश्वर शंकराचार्य के बाद सबसे बड़ी उपाधि होती है। अब महामण्डलेश्वर और शंकराचार्य के दायित्व के मध्य आचार्य महामण्डलेश्वर की उपाधि होती है, जिन्हें अखाड़े का पीठाधीश्वर भी कहा जाता है। वैष्णव अखाड़े के पीठाधीश्वर को श्रीमहंत कहा जाता है।

शंकराचार्य

आद्य शंकर ने साधु-संतों-संन्यासियों की बिखरी हुई मंडलियों को एकत्रित किया, संगठित किया और परम्पराओं में शिथिल हो चुके चार धामों के चार मठों को पुनर्जागृत किया। चारों मठों में स्वयं के ही नाम से शंकराचार्य के चार पद निश्चित किए। तब से शंकराचार्य की यह परम्परा निरंतरता में चली आ रही है। शंकराचार्यों के नेतृत्व में ही संन्यासियों ने कोष अनुशासित कर के दशनामी अखाड़े आरम्भ किए। अखाड़ों में साधु शास्त्र एवं शस्त्र दोनों ही विधाओं में पूर्ण रूप से पारंगत होते थे। दोनों के सहयोग से राष्ट्र एवं धर्म की रक्षा ही मूल उद्देश्य था। दशनामी अखाड़े में मुख्य प्रशासनिक पद निम्नवत हैं-

शम्भू पंच

वस्त्रधारी संन्यासी व दावों, मढिय़ों व अखाड़ा के सभी नागा संन्यासी होते हैं। वस्त्रधारी संन्यासियों को मत देने का अधिकार नहीं है। सामान्यतया इनका अधिवेशन कुम्भ मेलों में ही होता है। शम्भू पंच कुम्भ मेला के अधिवेशन में तीन अथवा छह वर्ष के लिए अखाड़ा के पदाधिकारियों का निर्वाचन करता है। उक्त चयनित पंचों के पास ही अखाड़ों की सम्पूर्ण सम्पत्ति का अधिकार होता है। इन पंचों में किसी की भी मृत्यु हो जाने पर आगामी कुम्भ तक यह पद खाली ही रहता है।

श्रीमहंत

अखाड़ा की व्यवस्था देखने के लिए आठ मुख्य नागा संन्यासी होते हैं, जिन्हें श्रीमहंत कहते हैं। इनका चयन तीन साल के लिए निर्वाचन द्वारा होता है। कुछ अखाड़ों में यह संख्या चार की भी होती है। ये श्रीमहंत मढिय़ों का प्रतिनिधित्व करते हैं और अखाड़ा कार्यकारिणी के भी सदस्य होते हैं।

कारबारी

श्रीमहंत अखाड़ों के आठ कारबारी या सहायक महंतों का चुनाव करते हैं। ये कारबारी अपने दावों से चुने जाते हैं। इनका चुनाव अखाड़ा के सभी सदस्य निर्वाचन प्रक्रिया से करते हैं। ये सभी नागा संन्यासी होते हैं।

श्रीपंच

श्रीमहंत और कुछ अन्य अधिकारी धूनिवाला से ख्यात होते हैं, वे ही श्रीपंच बनाये जाते हैं। ये अखाड़ा के प्रशासनिक तंत्र का संचालन करते हैं। अखाड़ा का प्रबंधन और अनुशासन का काम भी इनके पास ही होता है।

सचिव

श्रीपंच मिलकर सचिव नियुक्त करते हैं। ये श्रीपंच के प्रति उत्तरदायी होते हैं। सामान्यतया न्यायालय में अथवा शासन तंत्र में सचिव ही अखाड़ा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

कोठारी

ये अखाड़ा की मुद्रा व अन्नकोष की देखभाल करते हैं। इन्हें रोकडिय़ा या खजांची भी कहते हैं। इनकी नियुक्ति श्रीपंच द्वारा सचिव व थानापति की सलाह से की जाती है।

थानापति

इनका चयन श्रीपंच दावों से करते हैं। एक दावा से एक थानापति का चयन होता है। अखाड़े में जितने दावे होते हैं, उतने ही थानापति होते हैं। यह पद वरिष्ठ नागा संन्यासी को दिया जाता है, जो श्रीपंच के कार्यालय से मुक्त हो। किसी भी निर्णय में इनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है।

जमतिया महंत

अखाड़ों के नागा कई जमातों में वर्गीकृत होते हैं। इन जमातों के प्रमुख को जमतिया महंत कहा जाता है। इनकी नियुक्ति श्रीपंच करते हैं। ये वरिष्ठ नागा संन्यासी होते हैं।

कोतवाल

कोतवाल का काम अनुशासन सम्बन्धी काम देखने का होता है। सैन्य अभियानों के भी ये प्रमुख होते हैं। टकसाल के भी प्रमुख होते हैं ये। ये आचार्य महामण्डलेश्वर के रक्षक भी होते हैं।

इसके अतिरिक्त अखाड़ों में पुजारी, भंडारी, सेवक प्रभृति पद भी होते हैं। ये नवागत और नवदीक्षित होते हैं। नवागतों की दीक्षा के पाँच चरण होते हैं- छोरा, बंदगीदार, हुडदंगा, नागा और अतीथ। इसकी पूरी प्रक्रिया से सबको गुजरना पड़ता है। अखाड़ा में एक आचार्य महामण्डलेश्वर और सैकड़ों महामण्डलेश्वर होते हैं।