वसंत ऋतुचर्या (चैत्र-वैशाख माह)

वैद्य मनीषा शर्मा
BAMS , Prakriti consultant एवं मर्म चिकित्सा विशेषज्ञ


वसंत ऋतु आदान काल की ऋतु है। यह शीत और ग्रीष्म का संधिकाल है। संधि का समय होने से वसंत ऋतु में थोड़ा-थोड़ा असर दोनों ऋतुओं का होता है। प्रकृति ने यह व्यवस्था इसलिए की है, ताकि प्राणीजगत शीतकाल को छोडऩे और ग्रीष्म काल में प्रवेश करने का अभ्यस्त हो जाए। अत: वसंत ऋतु संतुलन बनाने की ऋतु है, क्योंकि अब ऋतु परिवर्तन के कारण आहार—विहार में परिवर्तन करना आवश्यक हो जाता है।

इस ऋतु में गर्मी पडऩी शुरू होती है। इसमें सूर्य की किरणें और हवा अधिक तीक्ष्ण और रूखी होती है। इस कारण व्यक्ति का बल कम हो जाता है। हेमन्त काल में संचित हुआ कफ वसन्त काल के आने पर सूर्य की किरणों से पिघल कर (स्रोतों द्वारा शरीर में फैलकर) जठराग्नि को मन्द कर देता है और अनेक प्रकार के रोग पैदा होते हैं।

आचार्यों ने शरीर में समदोष अवस्था को बनाये रखने की दृष्टि से प्रत्येक ऋतु के लिए पथ्य- अपथ्य का स्पष्ट वर्णन किया है, जिसके माध्यम से रोगों की रोकथाम में मदद मिलती है।

क्योंकि बढ़े हुए कफ के कारण जठराग्नि मंद होती है। इसलिए लघु (आसानी से पचने वाला), उष्ण तथा रुक्ष गुणों वाले कटु, तिक्त, कषाय आहार की सलाह दी जाती है।

स्निग्ध (चिकनाई युक्त), गुरु (पचने में भारी), मधुर रस प्रधान खाद्य पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए क्योंकि ऐसा आहार कफ को बढ़ाता है।

वसंत ऋतु में आने वाला होली का त्योहार इस ओर संकेत करता है कि शरीर को थोड़ा सूखा सेंक देना चाहिए जिससे कफ पिघलकर बाहर निकल जाय। सुबह जल्दी उठकर व्यायाम करना, दौडऩा लाभदायक होता है।

सम्भावित रोग
श्वास, खांसी, बदनदर्द, ज्वर, वमन, अरुचि, भारीपन, भूख कम लगना, कब्ज, पेट दर्द, कृमिजन्य विकार आदि होते हैं।

प्रयोग करें
∙ शरीर संशुधि हेतु वमन, विरेचन नस्य, कुंजल आदि क्रियाओं को अपनाएं।
∙ रूखा, कड़वा तीखा, कसैले रस वाले पदार्थों का सेवन।
∙ इस समय सूखे द्रव्य आँवले, त्रिफला अथवा चने के आटे आदि से मालिश करके गर्म पानी से स्नान करना हितकर है।
∙ 1 गिलास गुनगुने पानी में 1 चम्मच शुद्ध शहद डालकर सुबह खाली पेट पीना लाभकर है। शहद को कफ नाशक द्रयों में श्रेष्ठ कहा गया है।
∙ एक वर्ष पुराना जौ, गेहुं व चावल का उपयोग करना उचित है।
∙ इस ऋतु में जौ-ज्वार, बाजरा, मक्का, कोदो आदि रूखे धानों का आहार श्रेष्ठ है।
∙ मूंग, मसूर, अरहर, चना,कुलथी, की दाल उपयोगी है।
∙ इस ऋतु में लाई, भूने हुए चने, ताजी हल्दी, मूली, घीया, गाजर, बथुआ, चौलाई, परवल, सरसों, मैथी,पालक, धनिया, अदरक, आदि का सेवन करना हितकर है।
∙ नागरमोथा अथवा सोंठ डालकर उबाला हुआ पानी पीने से कफ का नाश होता है, साथ ही अग्नि भी बढती है ।

प्रयोग न करें
∙ मधुर (मीठा), अम्ल( खट्टा), लवण( नमकीन ) पदार्थो का सेवन कम से कम करें।
∙ नए अन्न, शीतल, चिकनाई युक्त, भारी, खट्टे एवं मीठे द्रव्य, उड़द, आलू, नए गुड़, भैंस का दूध का सेवन मना है।
∙ ठंडे पेय, आइसक्रीम, बर्फ के गोले चॉकलेट, मैदे की चीजें, खमीरवाली चीजें, दही आदि पदार्थ बिल्कुल त्याग देने चाहिए।
∙ पचने में भारी पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
∙ दिन में सोना, एक स्थान पर लम्बे समय तक बैठे रहना उचित नहीं है।
∙ चावल खाना ही हो तो दिन में खाना चाहिए, रात में नहीं।