भारत का स्त्री विमर्श

पुस्तक का नाम – स्त्रीत्व, धारणाएं एवं यथार्थ
लेखक – कुसुमलता केडिया, रामेश्वर प्रसाद मिश्र,
मूल्य – 120 रूपये मात्र, पृष्ठ – 192, प्रकाशन – विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 0542-2413741, //vvpbooks.com/


आज किसी भी प्रकार के विकास के मापदंडों में एक प्रमुख मापदंड है स्त्री सशक्तिकरण। स्त्री सशक्तिकरण का नारा, इसकी परिभाषा, इतिहास तथा मनोरचना और इसका आधार सभी कुछ पूरी तरह विदेशी हैं। इसलिए सुनने में अतिप्रिय लगने वाले इस नारे और अभियान से देश की स्त्रियों का नुकसान होता ही दिखता है। शिक्षा और रोजगार में भागेदारी बढऩे के बाद भी स्त्रियां न तो समर्थ बन पाई हैं और न ही समाज में उनके प्रति सम्मान में वृद्धि हुई है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि क्या पश्चिम के स्त्री विमर्श से भारत की स्त्रियों की समस्याओं को समझा और उसका समाधान किया जा सकता है? यदि पश्चिम का स्त्री विमर्श भारत की स्त्रियों की समस्याओं को नहीं समझ पा रहा है तो इसका कारण क्या है? भारत का स्त्री विमर्श क्या और कैसा हो? क्या स्त्री विमर्श का कोई भारतीय चेहरा भी हो सकता है?

स्त्रीत्व नामक पुस्तक में इन सभी प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास विदुषी प्रो. कुसुमलता केडिया और प्रो. रामेश्वर प्रसाद मिश्र ने देने का प्रयास किया है। आमतौर पर हिंदी में स्त्री विमर्श पर पुस्तकें बहुत ही कम संख्या में मिलती हैं। जो प्रमुख पुस्तकें मिलती हैं, वे विदेशी लेखिकाओं की पुस्तकों का अनुवाद ही हैं। ऐसे में यह पुस्तक एक बड़ी कमी को पूरा करती है। साथ ही अन्य पुस्तकें जहाँ पश्चिम की स्त्री के संघर्षों के केवल एक पक्ष को ही प्रस्तुत करती है, स्त्रीत्व उसके सभी आयामों को हमारे सामने खोल कर रख देती है। पुस्तक का शीर्षक ‘स्त्रीत्व : धारणाएं एवं यथार्थ’ ही इसका सबसे अच्छा परिचय है। इस पुस्तक का उपशीर्षक है स्त्री-प्रश्न पर हिंदू दृष्टि से सभ्यतामूलक विमर्श। यह पंक्ति दो विषयों को स्पष्ट करती है। पहला विषय तो यह है कि स्त्री-प्रश्न सभ्यतामूलक विमर्श का हिस्सा है। यह एक सामान्य विषय नहीं है। इसलिए इस पर चर्चा करने वालों को सभ्यतामूलक प्रश्नों और इतिहास का ठीक ज्ञान होना आवश्यक है। दूसरा विषय है कि इस पुस्तक में हिंदू दृष्टि को प्रस्तुत किया गया।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि सभ्यताओं के संघर्ष के विचार को जन्म देने वाले हट्टिंगटन ने हिंदुओं को किसी सभ्यता के रूप में स्वीकार ही नहीं किया। परंतु यह एक सच्चाई है कि इस संघर्ष में सबसे अधिक आक्रमण भी हिंदुओं पर ही किए गए हैं और आज भी किए जा रहे हैं। इसलिए स्त्री-प्रश्न पर हिंदू दृष्टि से विचार करने वाली पुस्तक समय की आवश्यकता है।
सामान्यत: समाज में प्रचलित स्त्री-विमर्श में ईसाइयों द्वारा किए गए एकतरफा प्रोपेगैंडा को प्रस्तुत किया जाता है और भारत में स्त्रियों की स्थिति के बारे में केवल और केवल ईसाई मिशनरियों द्वारा प्रचारित झूठ को इतिहास की तरह मान लिया जाता है। इस पुस्तक में इन दोनों ही पक्षों को समुचित उदाहरणों, संदर्भों तथा तथ्यों के साथ उजागर किया गया है। पुस्तक की भूमिका में लेखकद्वय लिखते हैं, ‘प्रस्तुत अध्ययन में हमने ऐसी ही श्रेष्ठ विदुषी यूरोपीय स्त्रियों एवं विद्वान यूरोपीय पुरुषों के गहन अध्यवसाय से अर्जित ज्ञान के अंशों की प्रस्तुति कर विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में स्त्री की स्थिति के बारे में तथ्य दिए हैं। साथ ही, हिंदू धर्म एवं हिंदू इतिहास में स्त्रियों की स्थिति पर शास्त्रीय आधारों सहित प्रामाणिक जानकारी दी है। भारतीय स्त्री के यथार्थ से भारतीय शिक्षित वर्ग में व्याप्त स्त्री-संबंधी मान्यताएं इतनी विपरीत, दूर एवं अजनबी क्यों हैं, यह विवेचित करने के लिए ख्रीस्त पंथ द्वारा रचित, प्रचारित, स्थापित तथा बलपूर्वक अनुशासित स्त्री-जीवन के इतिहास को देना आवश्यक था, अत: वह भी किया गया है।’

इसप्रकार यह पुस्तक हमें स्त्रियों के स्थिति को लेकर एक सच से परिचय करवाती है। उदाहरण के लिए अधिकांश स्त्री-विमर्श करने वाले लोग इस तथ्य से अनभिज्ञ होते हैं कि मात्र कुछ सौ वर्ष पहले यूरोप में लाखों की संख्या में स्त्रियों को चुड़ैल कह कर जिंदा जला दिया गया था। स्त्रियों को चुड़ैल या डायन कह कर जलाने की घटनाएं 20वीं शताब्दी तक यूरोप में घटती रही हैं। भारत में भी ये घटनाएं केवल उन्हीं इलाकों में हैं, जहाँ ईसाई मिशनरियों का प्रभाव है। इस पुस्तक में कुल नौ अध्याय हैं। एक अध्याय में प्राचीन भारत में स्त्रीयों की स्थिति पर प्रकाश डाला गया है। इस अध्याय में दिए गए तथ्यों तथा प्रमाणों से इस मिथ्या अवधारणा का खंडन हो जाता है कि भारत में स्त्रीयों पर पहले काफी अत्याचार होते थे या उन्हें बंधनों में रखा जाता था।

पुस्तक में स्त्रियों के नवोन्मेष के सूत्रों पर भी चर्चा की गई है। पुस्तक की भाषा थोड़ी क्लिष्ट है, और अनेक शब्दों का प्रयोग थोड़ा अपरिचित सा प्रतीत होता है, परंतु स्त्री-विमर्श पर यह इकलौती पुस्तक है, जो भारत की स्त्री के मन को उसके सही अर्थ में प्रस्तुत करती है। इसलिए इस पुस्तक को स्त्री विमर्श करने वाले सभी अध्येताओं को अनिवार्य रूप से पढऩा चाहिए।

रवि शंकर