भाषाविज्ञान की अनुपम पुस्तक

पुस्तक का नाम – भाषा का इतिहास
लेखक – पंडित भगवद्दत्त, मूल्य – 150 रूपये मात्र, पृष्ठ – 282
प्रकाशन – विजय कुमार गोविंदराम हासानंद, 4408, नई सड़क,
दिल्ली, 011-23977216, 65360255


भाषा मनुष्य को समस्त जीवों से अलग करती है। मनुष्य बोल कर अपने भावों को व्यक्त कर सकता है, यह उसकी एक अद्भुत सामथ्र्य है। इसके कारण मनुष्य शेष सभी जीवों से बलशाली हो जाते हैं। प्रश्न उठता है कि मनुष्य भाषा का प्रयोग कैसे करने लगे? अन्यान्य जीव भाषा का प्रयोग क्यों नहीं कर सकते? हालांकि बहुधा कथा-कहानियों में जीवों की भाषा का भी उल्लेख करते हैं जैसे कि सर्प भाषा, मत्स्यभाषा आदि, परंतु वह हमारी कल्पना अथवा अनुमान मात्र होता है। पशु-पक्षियों द्वारा भावाभिव्यक्तियों तथा विभिन्न प्रकार की अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न आवाजें निकालने की प्रक्रिया हम देखते हैं, परंतु उसे भाषा नहीं कहा जा सकता।

सामान्यत: भाषा की उत्पत्ति को लेकर दो प्रकार के मत ही प्रचलित रहे हैं। पहला मत भाषा को ईश्वर द्वारा प्रदत्त मानता है। इस मत के पोषक समस्त भारतीय आचार्यों के अतिरिक्त मैक्समूलर जैसे यूरोपीय अध्येता भी हैं। दूसरी ओर विकासवादी हैं जो भाषा को मनुष्यों द्वारा विकास की गई मानते हैं। विकासवादी परंतु इस बात को स्पष्ट करने में अक्षम साबित हुए हैं कि आखिर संकेतों की भाषा से इतनी व्यवस्थित व्याकरणों वाली भाषा का विकास कैसे हो गया। इसलिए आधुनिक यूरोपीय भाषाशास्त्रियों ने यह मान लिया है कि भाषा की उत्पत्ति का प्रश्न निरर्थक है। उन्होंने अपने दिमाग के घोड़े खूब दौड़ा लिए, परंतु वे यह नहीं समझ पाए कि मनुष्य ने भाषा का विकास कैसे कर लिया। अंतत: उन्होंने इस प्रश्न पर विचार करना बंद कर दिया।

भारत में वर्तमान में चूँकि यूरोपीय निष्कर्षों को वैज्ञानिक माना जाता है, स्वाभाविक है कि यहाँ के सभी भाषाशास्त्री भी केवल विकासवादी परिकल्पना के ही पोषक हैं। इस परिकल्पना के कुछ साम्राज्यवादी तथा रंगभेदी आयाम भी हैं। इसे स्वीकार करने से विभिन्न प्रकार के भाषा-परिवारों के विकास और उनकी श्रेष्ठता आदि के सिद्धांतों को भी मान्यता मिलती है। इससे भारोपीय भाषा जैसी परिकल्पनाएं भी स्थापित होती हैं और इससे भारत के इतिहास को मनमाने ढंग से तोड़-मरोड़ कर लिखा जा सकता है, जोकि यूरोपीय प्राच्यविदों को वास्तविक अभिप्राय रहा है। ऐसे में आवश्यकता थी कुछ ऐसे भाषाशास्त्रियों और उनके द्वारा कुछ ऐसी पुस्तकों के लेखन की जो इन मिथ्या वादों को समुचित उत्तर दे सके। पंडित भगवद्दत्त एक ऐसे ही विद्वान हैं।

पंडित भगवद्दत्त ने 50 के दशक में भाषा का इतिहास नामक पुस्तक लिखी। उन्होंने उस काल में यह स्थापित किया कि भाषा के विकास का सिद्धांत मिथ्या है। उन्होंने भारोपीय भाषा की परिकल्पना पर जबरदस्त चोट की। इस पुस्तक का पहला ही अध्याय भाषा की उत्पत्ति का है और उसमें उन्होंने तत्कालीन यूरोपीय विद्वानों को उद्धृत करते हुए उनकी स्थापनाओं की निरर्थकता को भलीभांति स्थापित किया है। भारतीय विज्ञान के अनन्य विद्वान भगवद्दत्त ने यह स्थापित किया है कि भाषा ईश्वरप्रदत्त ही हो सकती है। इसके लिए उन्होंने जहाँ भारतीय शास्त्रों को उद्धृत किया है, वहीं उसे तार्किकता की कसौटी पर भी कसा है।

कुल 21 अध्यायों में विभक्त इस पुस्तक में भगवद्दत ने भाषा के विकास या ह्रास, आदि भाषा कौन सी थी, भाषा का विज्ञान क्या है, विश्व के विभिन्न भागो की भाषाओं में क्या सादृश्य अथवा विषमता है, भारोपीय भाषा की परिकल्पना जैसे समकालीन प्रश्नों पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया है। भगवद्दत्त का स्पष्ट मानना है कि भाषा का विकास नहीं, बल्कि ह्रास होता है। मूल भाषा जो प्रारंभ में मनुष्यों को मिली, वह संस्कृत थी और आज की सभी भाषाओं से अधिक सक्षम, श्रेष्ठ और विकसित थी। उससे निकली भाषाएं उससे कहीं कमतर ही हैं। इसे वे विविध उदाहरणों द्वारा साबित करते हैं।

भाषा के विज्ञान पर भारतीय शास्त्रों के मत पर आधारित यह एक अप्रतिम पुस्तक है। दुर्भाग्य यह है कि भारत के विश्वविद्यालयों में भाषाविज्ञान पढऩे-पढ़ाने वाले अधिकांश विद्वान तथा अध्येता इस पुस्तक से परिचित ही नहीं है। भारत की अकादमिया ने जानबूझ कर ऐसी पुस्तकों को पठन-पाठन से दूर रखा है। जबकि आवश्यकता तो यह थी कि देश के भाषाशास्त्री इसका गंभीर अध्ययन करते ताकि वे भाषाविज्ञान विषयक भारतीय मत को ठीक से जान पाते।

पुस्तक 50 के दशक में लिखी गई होने के कारण इसका भाषा कहीं-कहीं आज के पाठकों को कठिन और क्लिष्ट प्रतीत हो सकती है, परंतु संभवत: भगवद्दत्त भी इस बात को समझते रहे होंगे, इसलिए उन्होंने अनेक शब्दों के साथ कोष्ठक में उसका अंग्रेजी शब्द भी दे दिया है, जिससे पुस्तक को समझना आसान हो गया है।