अभिनव गुप्त
पत्रकार
भगवान श्रीकृष्ण ने जीवन-चक्र व कर्म के संदर्भ में मानव को जो ज्ञान प्रदान किया, वह गीता ज्ञान कहलाता है। कुरुक्षेत्र की रणभूमि में जब अर्जुन अपने शत्रुओं के रूप में परिजनों को देख मोह-ग्रस्त हो गए, तब प्रभु ने उनको गीता—रूपी अमृत का पान कराया। यही गीता उपदेश आज भी पथ—प्रदर्शक बनकर मानव जाति को प्रेरित कर रहा है। गीता ज्ञान के सम्बन्ध में कहा गया है कि इस अमृत सागर के पास जो भी जाएगा, वह अपनी तृप्ति और शांति के लायक अपना पात्र भर कर ले आएगा। इस ज्ञान-सागर से कोई भी प्यासा नहीं लौट सकता। श्रीकृष्ण के मुख से गीता—रूपी यह अमृत-धारा माघ शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन प्रकट हुई थी। इस पवित्र दिन को श्री गीता जयंती के रूप में याद किया जाता है।
गीता जी के संदर्भ में यह जानना बहुत आवश्यक है कि यह पवित्र ग्रंथ किसी विशिष्ठ-पंथ, संप्रदाय, जाति विशेष के लिए नहीं है। यह एक ऐसा ग्रंथ है, जिसका जन्म संपूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिए हुआ है। गीता जी में निहित संदेश सभी प्रकार के लोगों को जीवन व्यवहार की प्रेरणा देते हैं। आवश्यक है कि सभी इसे समझ कर जीवन में व्यावहारिक रूप से अपनाने का प्रयास करें। कुरुक्षेत्र की धरा को श्री गीता जी की जन्मभूमि होने का श्रेय प्राप्त है। श्रीगीता जयंती को यहाँ एक भव्य उत्सव के रूप मनाया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में यह आयोजन अंतरराष्ट्रीय मेले का रूप ले चुका है। सरकारी स्तर पर इस मेले के लिए बड़े पैमाने पर तैयारियां की जाती हैं। लगभग 15 दिन तक यहां के प्रमुख तीर्थों पर गीता जी एवं महाभारत से सम्बंधित विभिन्न कार्यक्रम आयोजित होते हैं। ज्योतिसर, सन्निहित सरोवर इत्यादि सभी स्थानों की छटा इन दिनों निराली होती है। सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र ब्रह्मसरोवर होता है।
कुरुक्षेत्र के सबसे प्रमुख तीर्थों में ब्रह्मसरोवर का नाम अग्रणी है। पुराणों के अनुसार इस सरोवर में स्नान के उपरांत मनुष्य कई अश्वमेघ यज्ञों का फल प्राप्त करता है। युगों से सूर्यग्रहण के अवसर पर लाखों लोग इसमें स्नान के लिए जुटते हैं। आज यह पौराणिक सरोवर विश्व के गिने-चुने सबसे बड़े पक्के सरोवरों में सम्मिलित है। लगभग 3,300 फुट लम्बे व 1,500 फुट चौड़े इस सरोवर के आसपास कई प्रमुख तीर्थ विद्यमान हैं। श्रीगीता जयंती के प्रमुख कार्यक्रम ब्रह्मसरोवर के आसपास एवं मध्य में स्थित पुरुषोत्तमपुरा बाग में आयोजित होते हैं। किसी न किसी देश को इस अवसर पर भागीदार बनाया जाता है और कोई न कोई भारतीय राज्य भी प्रत्येक साल इस कार्यक्रम में पार्टनर होता है।
इन 15 दिनों में पूरे कुरुक्षेत्र का माहौल भक्तिमय हो जाता है। रंग—बिरंगी लडिय़ों से जगमगाते मन्दिर, घाट, आश्रम, सड़कें, बाजार उत्सव के आनन्द को दोगुना कर देते हैं। भारत की बहुआयामी संस्कृति को यहाँ ब्रह्मसरोवर के तट पर कलाकारों द्वारा मंचित किया जाता है। अलग-अलग राज्यों के दल अपने प्रदेश की कला को जनता के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। इस दौरान महारास लीला, भजन संध्या, शास्त्रीय नृत्य एवं संगीत सहित आरती एवं दीपदान के कार्यक्रम आयोजित होते हैं। भारतवर्ष के लगभग सभी प्रमुख सन्त एवं कथावाचक इस अवसर पर ब्रह्मसरोवर के निकट पिछले वर्षों में कथा के माध्यम से अपना आशीर्वाद जनता को देते आए हैं। इन दिनों में श्री गीता जी के श्लोकों से पूरा वातावरण गुंजायमान रहता है।
ब्रह्मसरोवर के चारों ओर बने पक्के गलियारे में देश-भर से आए शिल्पकार अपने सामान के स्टॉल लगाते हैं। बंगाल, कर्नाटक, सम, गुजरात सहित लगभग हर राज्य का हस्तशिल्प यहां देखने को मिलता है। अपने देश की लोककला को निकट से जानने एवं समझने का स्वर्णिम अवसर यह उत्सव प्रदान करता है। राजस्थान का दाल-बाटी, बिहार का लिट्टी-चोखा, कश्मीर के कहवा का स्वाद भी इस मौके पर लोग प्राप्त करते देखे जा सकते हैं। हरियाणा की सांस्कृतिक धरोहर को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के माध्यम से देश एवं विदेश से आए अतिथि समझने का प्रयास करते हैं। पगड़ी बांधने से लेकर पींग झूलने और हरियाणवी चूरमे, जलेबी सहित विभिन्न व्यंजनों का स्वाद इस दौरान जन-सामान्य को चखने को मिलता है। वर्ष-दर-वर्ष उत्सव के रंगों की चमक बढ़ती जा रही है। दूर-दूर से लोग परिवार सहित श्रीगीता जयंती उत्सव को देखने आते हैं। एक आध्यात्मिक कार्यक्रम से आगे बढ़ कर यह मेला भारतीय सांस्कृतिक पहचान को प्रस्तुत करने का माध्यम बनता जा रहा है।
आज के भौतिक युग में हमारे युवा जब सामाजिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक रूप से क्षीण हो रहे हैं। भोग-विलास व लोभ की पराकाष्ठा जैसी आसुरी वृत्तियां हम पर हावी हो रही हैं। ऐसे में इस प्रकार के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन आधुनिक पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोडऩे में पूर्ण रूप से लाभकारी हैं। श्रीगीताजी जयंती का यह आयोजन इस ग्रन्थ के कर्म के सन्देश को भी पूरे विश्व में फैलाने में भी सहयोगी बन रहा है। देश-विदेश की जनता को भारत की आध्यात्मिक पहचान से जोडऩे के लिए श्रीगीता जयंती उत्सव जैसे कार्यक्रम एक पुल का कार्य कर रहे हैं।





