राजीव रंजन प्रसाद
एनएचपीसी में इंजीनियर तथा प्रसिद्ध लेखक
प्राचीन भारतीय युद्धनीति में शांतिदूत अथवा संधिदूत महत्वपूर्ण भूमिका निभाया करते थे। युद्ध में उतरने से पहले बातचीत, धमकी या शक्ति प्रदर्शन के माध्यम से संघर्षों को सुलझाने के प्रयासों ने कई ऐतिहासिक युद्धों को आकार दिया है। अतीत के दो कालखण्ड जिन्हें रामायण और महाभारत जैसे महान महाकाव्यों में दस्तावेजीकृत किया गया है शांति की इस युद्धनीति को बहुत अच्छी तरह से प्रस्तुत करते हैं। राम और रावण के मध्य हुआ महायुद्ध हो अथवा कौरवों और पांडवों के मध्य हुआ महाभारत हमें शांतिदूतों की भूमिका दिखाई पड़ती है। लंका में युद्ध से ठीक पहले किष्किन्धा के युवराज अंगद शांतिदूत की भूमिका निभाते हैं, जबकि शांतिदूत श्रीकृष्ण की महाभारत युद्ध को रुकवाने के अंतिम प्रयास के रूप में भूमिका भी सर्वविदित है।
दोनों ही शांतिदूतों में समानता है, वे सुझाव और ठोस प्रस्ताव के साथ भेजे गये हैं, दोनों का ही सभा में अनादर करने की चेष्टा होती है और दोनों ही अपने अतुलनीय विवेक से परिस्थितियों का सामना करते हुए शत्रु पक्ष को गहरी मनोवैज्ञानिक चोट देते हैं। एक और तथ्य ध्यानाकर्षित करता है कि दोनों ही परिस्थितियों में शांतिदूत भेजने वाला पक्ष सामरिक दृष्टि से कमजोर प्रतीत होता था और अपेक्षाकृत बड़ी और शक्तिशाली सेना को चुनौती दे रहा था। दोनों ही परिस्थतियों में विजेता वही पक्ष रहा है जिसने बातचीत के लिए पहल इस उद्घोषणा के साथ की है कि उनके साथ धर्म है।
रावण से युद्ध छेडऩे से पहले अंगद का ही चयन क्यों किया गया यह प्रश्न महत्व का है। वाल्मीकि रामायण में यह प्रसंग बहुत अधिक विस्तृत नहीं है लेकिन तुलसीदास ने रामचारित मानस में बहुत रस लेकर लिखा है—
इहाँ प्रात जागे रघुराई।
पूछा मत सब सचिव बोलाई॥
कहहु बेगि का करिअ उपाई।
जामवंत कह पद सिरु नाई॥1॥
सुनु सर्बग्य सकल उर बासी।
बुधि बल तेज धर्म गुन रासी॥
मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा।
दूत पठाइअ बालि कुमारा॥
इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि सुग्रीव के मंत्रियों की सभा में इस बात पर मनोमंथन हुआ कि शांतिदूत बनाकर किसे भेजा जाना चाहिये। सभासदों से सबसे वरिष्ठ जामवंत की सलाह पर यह निश्चित हुआ कि अंगद इस कार्य के लिए सर्वथा उपयुक्त सिद्ध होंगे। यद्यपि श्रीराम की सेना में दूत बनने की क्षमता रखने वाले योग्य अनेक थे लेकिन अंगद का चयन जामवंत की सलाह पर किए जाने के कई कारण प्रतीत होते हैं। सर्वप्रथम यह कि लंकादहन के कारण हनुमान का भय अभी वहाँ की प्रजा और सभासदों के मध्य विद्यमान था। अत: पुन: उन्हें ही दूत बना कर भेजना उचित नहीं था। यदि हनुमान फिर से दूत बना कर भेजे जाते तो संदेश जा सकता था कि सेना में अधिक क्षमतावान केवल एक ही वीर है। पराक्रमी तथा बुद्धिमान अंगद का वहाँ जाना यह संदेश देने में समर्थ था कि श्रीराम की सेना में अनेक ऐसे वीर हैं जो लंका विजय करने में बड़ी भूमिका निभाने वाले हैं। अंगद राजपुत्र हैं अत: वे राजनीति और कूटनीति को भलीभांति समझते हैं, यह भी एक बड़ा कारण जामवंत द्वारा उनका नाम प्रस्तावित करने के पीछे जान पड़ता है। श्रीराम की इस प्रस्ताव सहमति को तुलसीदास ने शब्द दिए है –
नीक मंत्र सब के मन माना।
अंगद सन कह कृपानिधाना॥
बालितनय बुधि बल गुन धामा।
लंका जाहु तात मम कामा॥
बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ।
परम चतुर मैं जानत अहऊँ॥
काजु हमार तासु हित होई।
रिपु सन करेहु बतकही सोई॥
श्रीराम जब अंगद को संबोधित करते हैं तो वे अपने शांतिदूत के नैसर्गिक गुणों को भी रेखांकित करते हैं। वे बुद्धि और बल सहित अन्य गुणों की सराहना करते हुए कहते हैं कि अंगद को कार्य कितने महत्व का है अथवा इसमें कितने खतरे हैं, यह स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं है। वे जानते हैं कि युवराज अंगद चतुर हैं और ऐसी परिस्थिति में क्या और कैसे करना है इसकी जानकारी रखते हैं। श्रीराम कोई विशेष समझाईश नहीं देते, कोई रणनीति नहीं थमाते न ही कोई संदेश प्रदान करते हैं, बल्कि अपने शांतिदूत से कहते हैं कि ”शत्रु से वही बातचीत करना, जिससे हमारा काम हो और उसका कल्याण हो।” यह विश्वास तभी उपज सकता है जब यह भरोसा हो कि जिसे भेजा जा रहा है वह कूटनीति में और युद्धनीति में सामान्य रूप से पारंगत हो।
महाभारत महायुद्ध में शांतिदूत की भूमिका के लिए श्रीकृष्ण स्वाभाविक चयन थे, पाण्डवों के पक्ष में वे स्वयं रणनीतिकार तथा प्रमुख सलाहकार की भूमिका में थे। महाभारत में शांति प्रस्ताव धृतराष्ट्र की सभा में रखे जाने का प्रसंग युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण के परस्पर संवाद से आरंभ होता है। युधिष्ठिर पूरी तरह से भ्रमित हैं, वे अपना अधिकार भी चाहते हैं और किसी तरह का संघर्ष भी नहीं चाहते। युधिष्ठिर ने केवल पाँच गाँव अर्थात ‘अविस्थल, वृकस्थल, माकंदी, वारणावत और एक कोई भी अन्य गाँव’ मिल जाने पर भी युद्ध न करने की अपनी इच्छा श्रीकृष्ण के समक्ष व्यक्त की। युधिष्ठिर यह जानते थे कि सुलह की कोई संभावना है तो वह श्रीकृष्ण के माध्यम से ही संभव है। शांतिदूत के हस्तिनापुर दरबार में जाने से अपमानित होने का भय था। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं कि शांति बहुमूल्य है और उनकी अपनी क्षमता इतनी है कि दुर्योधन कोई दुस्साहस नहीं कर सकेगा। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि शांतिवार्ता इसलिए आवश्यक है जिससे संसार में कोई यह न कह सके कि भूल पांडव पक्ष से हुई है। श्रीकृष्ण की केवल युधिष्ठिर ही नहीं सभी पांडवों से पृथक—पृथक मंत्रणा भी होती है और लगभग सभी के मध्य शांति को एक अवसर देने के लिए सहमति थी। क्या ये सारे प्रयास केवल कूटनीति भर थे, क्योंकि द्रौपदी जब खुले केश लिए सम्मुख आती हैं और अपने साथ हुए अन्याय पर शांतिवार्ता के औचित्य का प्रश्न खड़ा करती हैं तब श्रीकृष्ण नि:संकोच स्पष्टता कर देते हैं, वे कहते हैं – ‘कृष्णे! तुम शीघ्र ही कौरवों की स्त्रियों को रुदन करते देखोगी। काल के वशमें पड़े हुए धृतराष्ट्र पुत्र मेरी बात नहीं सुनेंगे तो युद्ध में मारे जाकर कुत्ते और गीदड़ों के भोजन बनेंगे।
रामायण में उल्लेख है कि शांतिदूत अंगद जब राजभवन पहुंचते हैं, रावण के किसी पुत्र से झड़प हो जाती है। इस संघर्ष का परिणाम यह होता है कि लंका दहन की स्मृतियाँ ताजा हो उठती हैं और सैनिक भयभीत होकर अंगद को स्वयं ही रास्ता दे देते हैं। तुलसीदास लिखते हैं ”बिनु पूछें मगुदेहिं दिखाई। जेहि बिलोक सोइजाइ सुखाई” अर्थात् वे बिना पूछे ही अंगद को रावण के दरबार की राह बता देते हैं। जिसे ही अंगद देखते हैं, वही डर के मारे सूख जाता है। अंगद सभा के भीतर पहुंचते हैं तब पुन: सभासदों में मनोवैज्ञानिक दबाव देखने को मिलता है ”उठे सभासद कपि कहुँ देखी। रावन उर भा क्रोध बिसेषी” अर्थात् अंगद को देखते ही सब सभासद उठ खड़े हुए। यह देखकर रावण के हृदय में बड़ा क्रोध हुआ। इसके पश्चात् जो अंगद-रावण संवाद है वह दो ओर के सेनानायकों के मध्य का शक्तिपरीक्षण है। अंगद रावण की सभा को दबाव में ला चुके हैं और उससे उबरने के लिए राक्षसराज अपनी वीरता और सामथ्र्य का बखान करता है। अंगद वे प्रसंग जानबूझ कर सामने रखते हैं जब जब रावण को पराजय का सामना करना पड़ा अथवा वह विपरीत परिस्थितियों में रहा। रावण को बाली से पराजय और सहस्रबाहु से पराजय का स्मरण कराया जाता है। श्रीराम की वीरता के उदाहरण सहित हनुमान द्वारा अकेले ही लंका दहन करने का स्मरण कराया जाता है। रावण को सीधे—सीधे यह अवसर दिया जाता है कि वह सीता को लौटा कर श्रीराम से संधि करने के लिए स्वतंत्र है जिससे युद्ध को टाला जा सकता है।
महाभारत के शांतिदूत श्रीकृष्ण यह जानते हैं कि युद्ध होकर रहेगा। वे मनोवैज्ञानिक युद्ध को पहले ही जीत लेना चाहते थे। उन्हें भान था कि सात अक्षौहिणी पाण्डव सेना का सामना ग्यारह अक्षौहिणी कौरव सेना से है। संख्या की दृष्टि से भी कौरवों के पास महारथी अधिक हैं और सामथ्र्य भी। ऐसे में वे भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य आदि के मन में यह भाव बिठा देना चाहते थे कि धर्म का पक्ष पांडवों का है और जहाँ धर्म है वहीं विजय है। महाभारत के उद्योग पर्व में इसकी स्पष्टता आती है; श्रीकृष्ण वार्तालाप में अर्जुन से कहते हैं -”युधिष्ठिर का पक्ष इतना प्रबल है कि जब उसे मैं वहाँ रखूँगा और दुर्योधन मेरे कथनानुसार कार्य नहीं करेगा, तब वह सबों की दृष्टि में वध के योग्य समझा जायगा। जो मेरी दृष्टि में वध के योग्य है, वह जब संसार की दृष्टि में भी वध्य साबित हो गया, तब तो काम पूरा हो ही गया। संसार के सामने यह सिद्ध करना भी मेरा कर्तव्य है कि दुर्योधन दुरात्मा और पापी है। और यही काम मैं वहाँ जाकर करूँगा।” श्रीकृष्ण ने निरपेक्षता रखी, वे हस्तिनापुर पहुँच कर राज्य के अतिथि होने के स्थान पर विदुर के निवास पर ठहरे। राज्यसभा में उन्होंने दुर्योधन को न केवल समझाया, बल्कि पांडवों को केवल पाँच ग्राम देकर संधि कर लेने वाला प्रस्ताव भी सामने रखा लेकिन दुर्योधन का निर्णय स्पष्ट था, वह सूई की नोक बराबर भूमि भी पांडवों को देने के लिए प्रस्तुत नहीं था।
रामायण के शांतिदूत और महाभारत के शांतिदूत, दोनों ही यह जानते थे कि उन पर आघात हो सकता है, उन्हें बंदी बनाने का प्रयास हो सकता है। इसके अतिरिक्त दोनों को यह भी भान था कि सभा से वापस लौटने से पूर्व उन्हें ऐसा प्रभाव छोड़ देना है जिसकी अनुगूँज महायुद्ध तथा उसके पश्चात् भी बनी रहे। अंगद एक स्थान पर उत्तेजना का प्रदर्शन करते हैं –
कटकटानकपिकुंजर भारी।
दुहुभुजदंडतमकिमहि मारी।
गिरतसँभारि उठा दसकंधर।
भूतल परे मुकुट अति सुंदर।
अर्थात् अंगद बहुत जोर से कटकटाए और उन्होंने तमककर अपने दोनों भुजदण्डों को पृथ्वी पर दे मारा। रावण गिरते-गिरते सँभलकर उठा। उसके अत्यंत सुंदर मुकुट पृथ्वी पर गिर पड़े। रावण को निश्चय ही अंगद से ऐसी उत्तेजना की अपेक्षा नहीं रही होगी। उसने अपने सभासदों से कहा कि घेर कर अंगद को पकड़ लिया जाए और बंदी बना लिया जाए। अब सोचिए कि उन सभासदों और सैनिकों की क्या मनोदशा होगी जबकि एक बार ऐसा ही प्रयास किया जा चुका है और रामदूत हनुमान पूरी लंका नगरी ही तहस—नहस कर जा चुके हैं। अंगद बुद्धिमान हैं वे मनोविज्ञान के ज्ञाता हैं और ऐसी परिस्थिति में धैर्य दिखाते हुए और अपने एक पैर को भूमि पर जमाते हुए रावण को चुनौती देते हैं ‘जौंममचरनसकसिसठटारी। फिरहिंरामु सीता मैं हारी’ अर्थात् हे रावण यदि तू मेरा चरण हटा सके तो सीताजी के लिए किया जा रहा यह युद्ध छोड़ कर श्रीराम लौट जाएंगे। एक बार के लिए यह अत्युक्ति लगती है लेकिन सूक्ष्मता से समझने पर हमें भान होता है कि अंगद द्वारा यह चुनौती पूरी सभा का एक बार में ही मनोबल तोडऩे के लिए थी। भयभीत सैनिक अंगद का पैर हिला पाने में समर्थ नहीं थे। अब अंगद के ललकारने पर रावण स्वयं उठा। जब वह अंगद का चरण पकडऩे लगा, तब बालि कुमार ने कहा कि मेरा चरण पकडऩे से तेरा बचाव नहीं होगा, जा कर श्रीराम के चरण पकड़, उनसे क्षमा याचना कर। इसी स्थान पर अंगद का हेतु पूरा हो जाता है। तुलसीदास लिखते हैं ‘सिंघासनबैठेउ सिर नाई। मानहुँसंपति सकल गँवाई’ अर्थात् रावण सिर नीचा करके सिंहासन पर जा बैठा। मानो सारी सम्पत्ति गंवाकर बैठा हो। अंगद का यह कार्य किसी भी तरह श्रीकृष्ण के विराटरूप प्रदर्शन से कम नहीं था।
कौरव सभा में श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का आदेश देने वाला दुर्योधन यह नहीं जानता था कि इसी पल उसका दंभ टूट जाएगा, वह मनोवैज्ञानिक रूप से पराजित महसूस करेगा साथ ही साथ उसके साथी-सेनानी भी भयाक्रांत हो जाएंगे। सभा में उत्तेजना और ऐसे में श्रीकृष्ण का आत्मविश्वास और देवत्व की हुंकार ने ही यह स्पष्ट कर दिया था कि महाभारत का युद्ध होगा और भीषण होगा। श्रीकृष्ण के विराट रूप को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत किया है –
हरि ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
भगवान् कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।
यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।
‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल,
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।
‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
शत कोटि सरित, सर, सिन्धुमन्द्र।
‘शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,
शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश,शत कोटि रुद्र,
शत कोटि काल,शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।
कविता की ये पंक्तियाँ एक वृहद घटना का संक्षेपीकरण हैं। दुर्योधन का श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का प्रयास ही विफल नहीं हुआ, बल्कि यह भी स्पष्ट हो गया था कि उसकी पराजय निश्चित है और धर्म की विजय होगी। यह भी सिद्ध कर दिया गया कि जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहीं धर्म है।





