जानिए गीता के किस अध्याय में कितने श्लोक

प्रथम अध्याय
गीता के प्रथम अध्याय में 47 श्लोक हैं। इस अध्याय का आरंभ ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ से होता है। इस अध्याय से शिक्षा मिलती है कि मनुष्य को दोहरा भाव नहीं रखना चाहिए। दोहरे भाव से आपस में प्रेम, स्नेह नहीं पनपता, बल्कि कलह-कष्ट जन्म लेते हैं।

द्वितीय अध्याय
गीता के दूसरे अध्याय में 72 श्लोक हैं। अर्जुन अत्यंत विचलित होकर युद्ध से अलग होने की इच्छा करते हैं तब भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें समझाते हैं कि आसन्न स्थिति से पलायन करना न तो कल्याणकारी होता है और न ही स्वर्गदायी। इससे मुनष्य का पतन होता है।

तृतीय अध्याय
गीता के तीसरे अध्याय में 43 श्लोक हैं। युद्ध भूमि में अर्जुन कर्तव्य और अकर्तव्य की स्थिति में अभी भी झूल रहे हैं। अर्जुन ऐसे कर्म से बचना चाहते हैं, जिसमें दिनभर उन्हें अपने लोगों की हत्या करनी पड़े। वे श्रीकृष्ण से पूछते हैं, ‘मेरा कल्याण कर्म करने से होगा या ज्ञान से होगा।’

चतुर्थ अध्याय
चौथे अध्याय में 42 श्लोक हैं। इसमें कर्मयोग का महत्व बताया गया है और उसका गहन विश्लेषण किया गया है। भगवान् कहते हैं कि जो व्यक्ति गृहस्थाश्रम में रहकर अपने सभी कर्म निर्लिप्त भाव से करता है, वह सबसे श्रेष्ठ कर्मयोगी है।

पाँचवाँ अध्याय
पाँचवें अध्याय में 29 श्लोक हैं, जिनमें कर्मयोग की श्रेष्ठता को बताया गया है। अर्जुन युद्ध से बचने के लिए सगे-संबंधियों की हत्या को पापजन्य बताने लगे तब भगवान् श्रीकृष्ण ने कर्म से भागने वाले को बंधन में जकड़ा हुआ और कर्मयोगी को बंधन से मुक्त बताया।

छठा अध्याय
गीता के छठे अध्याय में 47 श्लोक हैं। इनमें बताया गया है कि मनुष्य स्वयं परमात्मा का अंश है। अर्थात् शरीर को चलाने वाली आत्मा स्वयं परमात्मा का जीता-जागता सूक्ष्म रूप है, जिसका नाश नहीं हो सकता। वह नित्य-निरंतर रहने वाला है, केवल शरीर रूपी वस्त्र बदल जाते हैं।

सातवाँ अध्याय
सातवें अध्याय में 30 श्लोक हैं। इसमें भगवान् की अपरा (संसार) तथा परा (जीव या आत्मा) प्रकृतियों के बारे में बताया गया है। भगवान् की अपरा प्रकृति जड़ तथा निरंतर परिवर्तन वाली है और परा पकृति चेतन तथा नित्य न बदलने वाली है।

आठवाँ अध्याय
इस अध्याय के 28 श्लोकों में परमात्मा के ‘अक्षरÓ और ‘ब्रह्मÓ स्वरूप का वर्णन किया गया है। अक्षर यानी जिसका कभी क्षरण नहीं होता, समाप्ति नहीं होती और जो ब्रह्म के रूप में ब्रह्मांडव्यापी है।

नौवाँ अध्याय
नौवें अध्याय में 34 श्लोक हैं। इनमें भगवान् श्रीकृष्ण ने ज्ञान-विज्ञान, प्राणियों और सृष्टि के विषय में व्यापक रूप से बताया है। यह बताया गया है कि ज्ञान से संसार से मुक्ति मिलती है और विज्ञान से भगवान् में प्रेम।

दसवाँ अध्याय
गीता के 10वें अध्याय में 42 श्लोक हैं। इनमें परमात्मा को सभी का मूल कहा गया है। भगवान् कहते हैं कि जो व्यक्ति मुझे अजन्मा, अनादि और संपूर्ण लोकों का महान् ईश्वर मानता है अर्थात् दृढ़ता से स्वीकार कर लेता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान और सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

ग्याहरवाँ अध्याय
इस अध्याय में 55 श्लोक हैं। इनमें भगवान् के विश्व रूप के दर्शन हैं। अर्जुन को अपने विश्व रूप के दर्शन कराने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण ने उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान की। अर्जुन को भगवान् के अनगिनत हाथ और मुख दिखाई पड़ रहे हैं। अर्जुन हैरान हैं।

बारहवाँ अध्याय
गीता के 12वें अध्याय में 20 श्लोक हैं। इसमें भक्ति और ज्ञान के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। दरअसल, ज्ञान का उदय होने पर ही मनुष्य भक्ति की ओर उन्मुख होता है, यह ज्ञान जरूरी नहीं कि किताबी ज्ञान हो।

तेरहवाँ अध्याय
इस अध्याय में 34 श्लोक हैं। इसमें शरीर और जीव के कार्य, क्रियाओं और व्यवहार के बारे में विस्तार से बताया गया है। शरीर को यहाँ ‘क्षेत्र’ कहा गया है और जीव यानी आत्मा को ‘क्षेत्रज्ञÓ। बताया गया है कि शरीर और आत्मा दोनों अलग हैं।

चौदहवाँ अध्याय

27 श्लोकों से गुँथे इस अध्याय में सत्व, रज और तम-इन तीन गुणों का व्याख्यात्मक वर्णन किया गया है। ये तीनों गुण प्रत्येक व्यक्ति में कम या अधिक मात्रा में अवश्य पाए जाते हैं। ये तीनों गुण ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को दर्शाते हैं।

पन्द्रहवाँ अध्याय
इस अध्याय में 20 श्लोक हैं। इसमें अपरा, परा और ईश्वर का विस्तार से वर्णन किया गया है। परा और अपरा को ईश्वर का स्वभाव या प्रकृति कहा गया है। कहा गया है संसार के आदि-अंत का किसी को ज्ञान नहीं है।

सोलहवाँ अध्याय
इस अध्याय में 24 श्लोक हैं। भय क्यों होता है, अहिंसा क्यों आवश्यक है! सत्य भाषण का प्रभाव, क्रोध का त्याग, संसार की कामना का त्याग, मन की शुद्धि आदि विषयों का इसमें वर्णन किया गया है।

सत्रहवाँ अध्याय
इस अध्याय में 28 श्लोक हैं। इसमें श्रद्धा, समर्पण और अर्पण का महत्व बताया गया है। जिस प्रकार श्रद्धा का अधिक होती है, व्यक्ति वैसा ही आचरण करता है। जो व्यक्ति राजसी और तामसी श्रद्धा का त्याग करके केवल सात्विक श्रद्धा का आश्रय लेता है, उसका मन ईश्वर से जुड़ जाता है।

अठारहवाँ अध्याय
इस अध्याय में 78 श्लोक हैं और यह गीता का सबसे बड़ा अध्याय है। इसमें कर्तव्य-कर्म के बारें में विस्तार से बताया गया है। कर्तव्य करना मनुष्य का धर्म है। बिना कर्तव्य के मनुष्य न तो सांसारिक व्यवहार कर सकता है और न ही आध्यात्मिक लाभ पा सकता है। च