गीता का संदेश सार्वकालिक है। गीता कहती है कि हम अपने अधिकार की बात तो करें, लेकिन उसमें मर्यादा होनी चाहिए। अपने और पराए के बीच भेदभाव न करके सबके साथ समान व्यवहार करना चाहिए। धृतराष्ट्र इसी मर्यादा और सम व्यवहार का पालन नहीं कर सके। उन्होंने पुत्र मोह में हर उस कार्य को किया, जिसने महाभारत के युद्ध की भूमिका रखी। वे कुछ समय के लिए भी पुत्र मोह छोड़कर कार्य करते तो शायद महाभारत का युद्ध होता ही नहीं।
गीता सम्पूर्ण जीवन की व्याख्या है।
- गीता जीवन के कुरुक्षेत्र में विषमताओं, वेदनाओं, वासनाओं तथा चिन्ताओं से संघर्ष करने का अद्भुत गाण्डीव है।
- गीता आत्मविश्वास भरने वाला गौरवमय सूत्र है।
- गीता कायर में बल और निर्जीव में चेतना फूंकती है।
- गीता मुर्दे को पुनर्जीवित करने वाली संजीवनी है।
- गीता उपनिषदों का सार है, गागर में सागर है।
- गीता स्वधर्म में बाधक मोह का निरसन है।
- गीता आत्मा की अमरता तथा शरीर की नश्वरता प्रतिपादित करती है।
- गीता जीवन का संगीत है।
- गीता कहती है जगत् के मालिक नहीं, माली बनो।
- गीता समझाती है चिन्ता नहीं, चिंतन करो, मार्ग अवश्य मिलेगा।
- गीता निराश लोगों की मुस्कान है।
- गीता भारतीय संस्कृति की पहचान है।
- गीता कुरुक्षेत्र युद्धस्थल पर कही गई। इसकी स्पष्ट सीख है कि स्वर्ग-प्राप्ति के लिए वनों, पर्वतों की कन्दराओं, सागर के एकान्त किनारों अथवा नदियों के तटों पर तपस्या के लिए जाने की आवश्यकता नहीं। संसार में रहकर अपने कर्तव्य कर्मों को भली प्रकार करते हुए, जीवित रहते हुए ही स्वर्गीय सुख प्राप्त करो।
- गीता स्पष्ट कहती है, जीवन और जगत् से भागो नहीं, प्रत्युत इनके प्रति जागो।
- गीता ऐसा अकेला ग्रंथ है जिसे हमारी न्याय-व्यवस्था में पावन स्थान प्राप्त है।
- जब न्यायालय में इस पर हाथ रखकर व्यक्ति शपथ लेता है, ”मैं जो कुछ कहूंगा, सच कहूंगा और सच के अलावा कुछ और नहीं कहूंगा तो इस ग्रंथ की महत्ता स्वयं बोलती है।”
- गीता न केवल शाश्वत शांति का अमोघ साधन है, अपितु उसका अग्रदूत भी है।
- गीता में भगवान् श्रीकृष्ण वक्ता हैं और अर्जुन, संजय व धृतराष्ट्र श्रोता हैं। अर्जुन ने गीता का उपदेश श्रवण कर यह स्वीकार किया कि इससे उनकी निरर्थक सांसारिक आसक्ति जो उन्हें उनके कर्तव्य पथ से विमुख कर रही थी, वह नष्ट हो गई है। साथ ही उन्हें अपने कर्तव्य की स्मृति मिल गई है और उनके सारे संदेह दूर हो गए हैं। संजय को भी गीता उपदेश श्रवण करने से आह्लाद, आनन्द व दिव्य दृष्टि मिली। केवल धृतराष्ट्र ही एकमात्र ऐसा श्रोता है जिन्होंने गीता सुनी तो अवश्य परन्तु वह अपनी अनुभूति का एक भी शब्द व्यक्त नहीं कर सका। इसका मुख्य कारण यह था कि वह अपने हठ, अहम् और आसक्ति से ग्रस्त रहे। हम धृतराष्ट्र न बनें, अपितु अर्जुन बनें। गीता श्रवण की यही सार्थकता है।
- गीता में अधिकार की बात नहीं कही गई है, केवल कर्तव्य की बात कही गई है।
- गीता में युवा वर्ग के लिए मुख्य संदेश है कि वह अपने कर्तव्य के प्रति सदैव जागरूक रहे और कर्तव्य पथ से विचलित न हो। साथ ही उसमें अपने कर्तव्य के प्रति निष्क्रियता, प्रमाद, आलस्य और निठल्लापन की भावना न पनपे। युवा वर्ग जिस क्षेत्र में है उस क्षेत्र में अपने कर्तव्य को पूरा करने में रत रहे। जिसने भी इस सूत्र को इस जीवन में उतारा वह मानकर चलें कि अर्जुन बना।





