डॉ. बी. रविशंकर : आयुर्वेद अनुसंधान के युग निर्माता

प्रो.महेश व्यास
डीन, अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान, नई दिल्ली


भारत की धरोहर आयुर्वेद केवल चिकित्सा पद्धति भर नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का विज्ञान है। इसकी गहराई और वैज्ञानिकता को आधुनिक शोध पद्धतियों से प्रमाणित करना सदैव एक चुनौती रहा है। इस चुनौती को अवसर में बदलने वाले जिन हस्तियों का नाम विशेष आदर से लिया जाता है, उनमें डॉ. बी. रविशंकर अग्रणी हैं। चार दशक से अधिक के लंबे करियर में उन्होंने अपने अथक प्रयासों से आयुर्वेद को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की कसौटियों पर परखा और विश्व स्तर पर स्थापित किया।

सन् 1953 में जन्मे डॉ. रविशंकर ने प्रारंभिक शिक्षा के बाद मैसूर विश्वविद्यालय से बी.एससी. और मैसूर मेडिकल कॉलेज से फार्माकोलॉजी में एम.एससी. की पढ़ाई की। आगे चलकर उन्होंने गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय, जामनगर से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान का यह संगम उनके जीवन के हर कार्य में झलकता है। वे प्रारंभ से ही औषध विज्ञान और चिकित्सा अनुसंधान के प्रति गहरे समर्पित थे और यही कारण था कि अपने करियर की शुरुआत उन्होंने 1979 में केरल के भारतीय पंचकर्म संस्थान से की। यहीं से उनके शोध और प्रयोगात्मक कार्यों की यात्रा शुरू हुई जिसने आगे चलकर उन्हें आयुर्वेद अनुसंधान का पर्याय बना दिया।

1987 में वे गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय, जामनगर के प्रतिष्ठित संस्थान आईपीजीटी एंड आरए में प्राध्यापक के रूप में कार्य प्रारम्भ किया। यहाँ उन्होंने न केवल फार्माकोलॉजी प्रयोगशाला की स्थापना की, बल्कि एक एनिमल एक्सपेरिमेंट ललैब का विकास कर शोध को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। उनके नेतृत्व में यहाँ अनेक महत्वपूर्ण प्रयोग हुए जिन्होंने पहली बार यह प्रमाणित किया कि आयुर्वेद की अवधारणाएँ केवल परंपरा की देन नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। जब वे सीसीआरएएस की परियोजनाओं के प्रभारी बने, तो देशभर में आयुर्वेदिक औषधियों और उनके विषाक्तता मूल्यांकन पर योजनाबद्ध अनुसंधान प्रारंभ हुआ।

उनका कार्यक्षेत्र केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहा। वे शिक्षा और संस्थागत विकास में भी उतने ही सक्रिय रहे। 1987 से 2010 तक उन्होंने कई उच्च स्तरीय पाठ्यक्रमों का संचालन किया और असंख्य एमडी एवं पीएचडी के छात्रों का मार्गदर्शन किया। उनके निर्देशन में सैकड़ों शोधार्थियों ने अपनी चिकित्सा अनुसंधान की पढ़ाई पूरी की और आज वे देश-विदेश में आयुर्वेद के राजदूत की तरह कार्य कर रहे हैं।

2010 में जब उन्होंने उडुपी में एसडीएम सेंटर फॉर रिसर्च इन आयुर्वेद एंड अलाइड साइंसेज़ में कार्य करना प्रारम्भ किया,तब से यह केंद्र आयुर्वेदिक शोध का नया गढ़ बन गया। यहाँ न केवल प्रयोगात्मक चिकित्सा पर काम हुआ, बल्कि आधुनिक उपकरणों और तकनीकों का उपयोग करते हुए आयुर्वेदिक सिद्धांतों को परखा और प्रमाणित किया गया। उनके प्रयासों से इस केंद्र ने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। 2019 से वे श्रीश्री कॉलेज ऑफ आयुर्वेदिक टीचिंग एंड रिसर्च, बेंगलुरु में शोध सलाहकार के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं और नई पीढ़ी को दिशा प्रदान कर रहे हैं।

उनके शोध की व्यापकता और गहराई देखते ही बनती है। उन्होंने भैषज्य कल्पना की वैज्ञानिक व्याख्या की और यह सिद्ध किया कि औषधियों की निर्माण प्रक्रियाएँ जैसे पुट, शोधन और अनुपान महज पारंपरिक क्रियाएँ नहीं, बल्कि औषधि की प्रभावकारिता और सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले वैज्ञानिक उपाय हैं। उन्होंने 30 से अधिक औषधियों और योगों पर विषाक्तता अध्ययन कर यह प्रमाणित किया कि आयुर्वेदिक औषधियाँ सुरक्षित और परिणामकारी हैं। दीपनीय-पाचन, विरुद्धाहार, बस्ती चिकित्सा, रस और गुणों के प्रभाव जैसे सिद्धांतों को उन्होंने प्रयोगात्मक रूप से सिद्ध किया। साथ ही औषधीय पौधों पर किए गए उनके शोधों ने यह दिखाया कि प्राकृतिक और कृषित पौधों के गुणों में अंतर हो सकता है, ऋतु परिवर्तन से औषधीय प्रभाव प्रभावित हो सकते हैं और संयोजन में थोड़े से परिवर्तन से भी औषधि का असर बदल सकता है।

उन्होंने केवल सैद्धांतिक शोध ही नहीं किए, बल्कि अनेक व्यावहारिक प्रोटोकॉल भी विकसित किए। चाहे बात यकृत सुरक्षा की हो, हृदय सुरक्षा की या न्यूरोप्रोटेक्टिव प्रभावों की—उन्होंने ऐसे मानकीकृत परीक्षण पद्धतियाँ विकसित कीं जिन्हें आज भी अनुसंधान में अपनाया जाता है। उनके शोधपत्रों की संख्या 200 से अधिक है और उन्होंने कई पुस्तकों का लेखन व संपादन किया है।

प्रोफेसर बी. रविशंकर अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान में संस्थागत आचार अनुसन्धान समिति के सदस्य हैं और उनके मार्गदर्शन में ही एमडी व पीएचडी के समस्त अनुसन्धान कार्य होते हैं।अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान देश का प्रतिष्ठित आयुर्वेद संस्थान है जिसमें प्रोफेसर बी. रविशंकर की विशिष्ट भूमिका है। इसी का परिणाम है कि अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के शोध विषय, राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं।

उनकी सेवाओं और योगदान को देश ने सम्मानित भी किया। उन्हें 2017 में ए.वाई.यू.एस.एच. का लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला। 2001 में हरी ओम आश्रम का स्वर्ण पदक और 1993 व 2010 में इंडियन ड्रग्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन पुरस्कार उनके नाम जुड़ गए। ये सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि आयुर्वेदिक जगत की सामूहिक प्रतिष्ठा के प्रतीक हैं।

विद्यार्थियों और सहकर्मियों के बीच वे एक मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत के रूप में याद किए जाते हैं। उनकी सहजता, ज्ञान और शोध के प्रति समर्पण ने अनेक युवा वैज्ञानिकों को प्रेरित किया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि यदि परंपरा और विज्ञान को साथ लेकर चला जाए तो आयुर्वेद जैसी प्राचीन चिकित्सा पद्धति आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की कसौटी पर खरा उतर सकती है और विश्व को नई दिशा दे सकती है।

डॉ. रविशंकर का जीवन बताता है कि सच्चा शोध केवल प्रयोगशालाओं और आलेखों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह समाज को दिशा देता है, नई पीढ़ी को प्रेरणा देता है और राष्ट्र की धरोहर को वैश्विक मंच तक पहुँचाता है। आज जब दुनिया प्राकृतिक चिकित्सा और समग्र स्वास्थ्य की ओर लौट रही है, तब उनके योगदान की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। उन्होंने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि आयुर्वेद भारत की आत्मा है और इसका वैज्ञानिक उत्थान ही वह मार्ग है जो समाज को स्वास्थ्य और कल्याण की ओर ले जाएगा।

डॉ. बी. रविशंकर वास्तव में आयुर्वेद अनुसंधान के युगनिर्माता हैं। उनकी विरासत प्रयोगशालाओं, पुस्तकों और शोधपत्रों से आगे बढ़कर उन अनगिनत विद्यार्थियों और संस्थानों में जीवित है जिन्हें उन्होंने दिशा दी। वे आने वाली पीढिय़ों के लिए यह प्रेरणा बनकर रहेंगे कि समर्पण और विज्ञान मिलकर किस तरह से किसी परंपरा को विश्व की धरोहर बना सकते हैं।