इस संस्था के द्वारा भारतीय संस्कृति के सभी विषयों के महत्वपूर्ण ग्रंथों का प्रकाशन शनै:—शनै: किया गया है एवं इसमें उत्तरोत्तर वृद्धि भी समय-समय पर होती रही है। इस प्रकाशन से राष्ट्रभाषा में अनुदित चारों वेद, वेदांग, अठ्ठारह पुराण-उपपुराण, षड्दर्शन, उपनिषद्, स्मृतिग्रन्थ, व्याकरण-साहित्य आदि ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं।
बृजेश कुमार मिश्र, सह संपादक
भारतीय संस्कृति और धरोहर को आगे बढ़ाने में चौखम्बा प्रकाशन का अतुलनीय योगदान है। आज चौखम्बा प्रकाशन को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। हर उस व्यक्ति को चौखम्बा प्रकाशन के महत्व की जानकारी है, जो थोड़ा—बहुत भी पुस्तकों से संबंध रखता हो। इसके संस्थापक हैं श्री हरिदास जी गुप्त। हरिदास जी ने 1892 में वाराणसी के चौखम्बा मोहल्ले में ”चौखम्बा समूह” की स्थापना की। उन्होंने संस्कृत में पुस्तकें प्रकाशित कर उन्हें जन सामान्य तक पहुंचाया। उस काल में यह बहुत बड़ी बात थी। हरिदास जी द्वारा रोपा गया ”चौखम्बा समूह” नामक वह बिरवा आज विशाल वट वृक्ष का रूप धारण कर चुका है। इसकी अनेक शाखाएं हैं। ये शाखाएं भारतीय वाङ्मय को पुष्पित और पल्लवित कर रही हैं। जिस तरह चौखम्बा समूह का विस्तार हुआ, उसी तरह हरिदास जी का परिवार भी बढ़ता गया। आज उनके वंशज इस समूह के अनेक प्रकाशनों को बहुत ही कुशलता के साथ चला रहे हैं।
हरिदास जी के वंशज लगभग पांच शताब्दी पूर्व गुजरात के सिद्धपुर—पाटन से बाबा विश्वनाथ की नगरी वाराणसी आकर बस गए थे। आज यह परिवार वाराणसी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के अनेक नगरों में फैला है। इस परिवार के पास अनेक प्रकाशन संस्थान हैं और सबके नाम के साथ ”चौखम्बा” शब्द अवश्य लगा है।
हरिदास जी के पांच पुत्र थे। चौथे पुत्र थे वृजजीवन दास जी गुप्त। इनके चार पुत्र हैं— वल्लभ दास जी गुप्त, वृजदास जी गुप्त, नवनीत दास जी गुप्त एवं जमुना दास जी गुप्त। इन सभी ने अपने पिता जी के साथ मिलकर इस समूह को आगे बढ़ाया। इसी क्रम में वृजजीवन दास जी गुप्त एवं उनके चारों पुत्रों ने 1974-75 में वाराणसी में ”चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन” की स्थापना की। इस प्रकाशन की पुस्तकों की मांग आज देश—विदेश में है।
बाद में 2006 में श्री नवनीत दास जी गुप्त ने नई दिल्ली में ”चौखम्बा पब्लिशिंग हाउस” की स्थापना कर संस्था को सर्वोच्च शिखर पर प्रतिस्थापित करने का श्लाघनीय कार्य किया। इस संस्था के द्वारा भारतीय संस्कृति के सभी विषयों के महत्वपूर्ण ग्रंथों का प्रकाशन शनै:—शनै: किया गया है एवं इसमें उत्तरोत्तर वृद्धि भी समय-समय पर होती रही है।
इस प्रकाशन से राष्ट्रभाषा में अनुदित चारों वेद, वेदांग, अ_ारह पुराण-उपपुराण, षड्दर्शन, उपनिषद्, स्मृतिग्रन्थ, व्याकरण-साहित्य आदि चतुर्दश विद्याओं से सम्बद्ध ग्रन्थ, आयुर्वेदीय संहिता ग्रन्थ, जैन एवं बौद्ध धर्म से सम्बद्ध ग्रन्थ, अनेकानेक तान्त्रिक ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं। इनके अतिरिक्त ज्योतिष, योगविज्ञान, वास्तुविद्या आदि के साथ-साथ आयुर्वेद से सम्बद्ध अनेकानेक अर्वाचीन ग्रन्थों को प्रकाशित करते हुए पाठकों का ज्ञान-संवद्र्धन करते हुए इस पुनीत कार्य को ही अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य निर्धारित कर श्री नवनीत दास जी गुप्त सांसारिक कार्यों से विरक्त के समान हो गए।
संस्था द्वारा प्रकाशित कुछ महत्वपूर्ण ग्रन्थ निम्न हैं-
श्रीमद्भागवत महापुराण का अन्वय एवं ”श्रीधरी” संस्कृत टीका का हिन्दी अनुवाद के साथ नौ खंडों में प्रथम बार प्रकाशन, श्री पद्म महापुराण (सात खंडों में) एवं श्री विष्णुधर्मोत्तर महापुराण (तीन खंडों में) का हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशन, 108 वैदिक उपनिषदों का अंग्रेजी में अनुवाद (18 खण्डों में), श्रीरामचरितमानस का रोमन लिप्यांतरण एवं अंग्रेजी अनुवाद।
आयुर्वेद के आधार ग्रन्थ ”चरक संहिता” का विस्तृत विमर्श के साथ डॉ. ब्रह्मानन्द त्रिपाठी कृत हिन्दी अनुवाद का प्रकाशन (इसका विमोचन पूर्व राष्ट्रपति माननीय श्री शंकर दयाल शर्मा जी द्वारा किया गया था)। तन्त्र साहित्य के प्रमुख ग्रन्थ यथा-श्री विद्यार्णव तन्त्र का पांच खण्डों में हिन्दी टीका के साथ प्रकाशन, महाकाल संहिता का हिन्दी टीका के साथ छह खण्डों में प्रकाशन, मेरु तन्त्र का हिन्दी टीका के साथ पांच खण्डों में प्रकाशन इत्यादि प्रमुख हैं।
इस प्रकार देवभाषा की साधना में रत नवनीत दास जी गुप्त के 2014 में 72 वर्ष की आयु में दैवयोग से गोलोक—गमन करने के पश्चात् उनके पुत्र-द्वय सर्वश्री नवीन कुमार गुप्त एवं नीरज कुमार गुप्त ने अपने पिता जी के कार्यों को गति प्रदान करना आरम्भ किया और वर्तमान में वे दोनों ही अपने पूज्य पिता जी के इस प्रशंसनीय कार्य को पुष्पित-पल्लवित करने में रत रहकर अपने विद्वान् लेखकों एवं संस्था के सहयोगियों के साथ संस्था की गौरव-वृद्धि में लगे हुए हैं। इसके फलस्वरूप दोनों ही संस्थाएं दिनानुदिन प्रगति के पथ पर अग्रसर होकर भारतीय संस्कृति एवं साहित्य की सेवा में समर्पित हैं एवं देश की सांस्कृतिक धरोहर को ग्रन्थ-रूप में संरक्षित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। वास्तव में यह प्रकाशन भारतीयता और भारतीय साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने में लगा है। इस प्रकाशन की सफलता के पीछे जिन लोगों की मेहनत लगी है, वे सच में उस दीपक के समान हैं, जिसके आलोक में असंख्य जीव जगमग करते हैं।
भारतीय ज्ञान—परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए चौखम्बा प्रकाशन को ”भारतीय धरोहर” के इस प्रतिष्ठित सम्मान से सम्मानित किया जा रहा है।





