एफ.सी. भाटिया
वरिष्ठ लेखक
भारतीय नव-वर्ष का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल को उस समय होता है जब सूर्य और चन्द्रमा मीन राशि में एक ही अंश और काल पर होते हैं। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार प्रजापति ने अपने शरीर से समय की जो प्रतिमा उत्पन्न की उसको संवत्सर कहा गया है। इस प्रकार सृष्टि के निर्माण का शुभारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हुआ। इसीलिए भारतीय कालगणना में इस दिन से नववर्ष (नवसंवत्सर) के प्रारम्भ की मान्यता है। सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी की सविधि पूजा करने के उपरान्त उनसे नववर्ष के शुभ होने की प्रार्थना की जाती है, ”हे भगवन! आपके प्रसाद से मेरे वर्ष भर के विघ्न नष्ट हो जाएँ और यह नववर्ष मेरे लिए कल्याणकारी तथा शुभ हो।” भारतीय संस्कृति अपने स्वभावनुसार अनेकता को एकता में पिरोने वाली महान संस्कृति है। इसीलिए हमारे देश में कालगणना के अनुसार अनेक संवत् हैं जिनमें विक्रम संवत् प्रमुख है।
इस संवत् की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि हमारे देश में सभी व्रत, पर्व, उत्सव, तीज-त्योहार का निर्णय इसी संवत् के अनुसार किया जाता है और इस संवत् के अनुसार वर्ष भर भूमंडल पर घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान किया जाता है। सम्राट विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रांताओं को परास्त कर इस संवत् का प्रारम्भ किया था।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से वासन्तीय नवरात्र का प्रारम्भ होना आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्ष के आरम्भ में शक्ति की आराधना से ऊर्जा का संचय होता है जिसका सदुपयोग वर्षपर्यन्त सफलता देता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का आरोग्य से विशिष्ट संबंध है। मानव शरीर को नीरोगता प्रदान करने वाली इस परम ऊर्जामयी तिथि को इसी कारण आरोग्य प्रतिपदा भी कहा जाता है।
वैदिक काल में महीनों के नाम ऋतुओं के आधार पर होते थे। बाद में उनका आधार नक्षत्रें को बनाया गया। विक्रम संवत् में भी इसी परम्परा को अपनाते हुए नक्षत्रें के आधार पर महीनों का नामकरण किया। सर्वप्रिय चारु वसन्त में नव वर्ष का आरम्भ जन-मन के उल्लास, उमंग एवं आनन्द को दोगुना कर देता है।
वसन्त सम्पूर्ण धरती को पुष्पों से सुशोभित कर हृदय में कोमल प्रवृत्तियों को उजागर कर चित्त में नवजीवन मस्ती-मादकता एवं आनन्द प्रदान कर समस्त सृष्टि को नवयौवन की अनुभूति कराता है। विक्रमी नववर्ष में समग्र राष्ट्रीय पर्व के दर्शन होते हैं। सिंधी समाज में यह दिन भगवान झूलेलाल के जन्म दिवस तथा चेटी चंड के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार श्रीराम जी का अभिषेक भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही हुआ। वरामिहिर की वृहत्संहिता तथा भास्कराचार्य के सूर्य सिद्धांत का वार्षिक आधार भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होता है।
इस नववर्ष प्रतिपदा पर कुछ ऐसे कार्य कर सकते हैं जिनसे समाज में सुख-शांति, पारस्परिक प्रेम तथा एकता के भाव उत्पन्न हों। जैसे हम गरीबों और रोगग्रस्त व्यक्तियों की सहायता करने, वातावरण को प्रदूषण से मुक्त करने, समाज में प्यार और विश्वास बढ़ाने, शिक्षा का प्रसार करने तथा सामाजिक कुरीतियों को दूर करने जैसे कार्यों के लिए संकल्प ले सकते हैं। नववर्ष का मनाना तभी सार्थक होगा।





