पुष्पा शर्मा, इतिहासकार
अजमेर संभाग का केकड़ी जिला नगर समन्वित संस्कृति के साथ-साथ पुरावैभव के दृष्टिकोण से भी इतिहास में अपना प्रमुख स्थान रखता है। केकड़ी के आसपास बहने वाली बनास की सहायक नदियाँ डाई एवं खारी की जल—धाराओं ने जैसे इसे हरीतिमा का वरदान दिया है। इन नदियों की जल—धाराओं ने अपने गर्भ में अनेकानेक रहस्यों को संजो रखा है जो समय-काल के साथ उजागर हो रहे हैं।
बघेरा (व्याघ्रपादपुर) ग्राम केकड़ी जिला मुख्यालय से 19 कि.मी.एवं अजमेर संभाग मुख्यालय से लगभग 100 कि.मी. दूरी पर स्थित है। स्कंदपुराणान्तर्गत व्याघ्रपादपुर माहात्म्य में इसकी स्थिति पुष्कर से 13 गव्यूति दूर बताई गयी है। बघेरा बनास नदी में बीसलपुर के समीप मिलने वाली छोटी नदी डाई के किनारे अवस्थित है। पुरातत्ववेत्ता कार्लाइल ने बघेरा के चारों ओर घास के व्यापक जंगल से घिरे इस ग्राम की तुलना हरी-भरी पहाडिय़ों के विशाल लहराते सागर के मध्य हरे-भरे द्वीप मुस्कुराते दिखाई दे रहे हैं। बघेरा का अभी तक पुरातात्विक दृष्टिकोण से उत्खनन आदि करवा कर सर्वेक्षण नहीं किया गया है।
प्राचीन वराह मन्दिर (बघेरा ) चिकने श्याम पाषाण से निर्मित यह प्रतिमा लगभग 10-11 शताब्दी की है। इस मूर्ति का अनुमानित माप 6&2&4 फीट है। सम्पूर्ण प्रतिमा कच्छप पृष्ठ पर स्थित है जिस पर जलपट्टिका अंकित है। वराह मूर्ति के नीचे कूर्म एवं जलपट्टिका का टंकन पाताल का द्योतक माना जा सकता है। शूकर वराह के अग्र चरणों के समीप एक वैष्णव आयुध शंख,गदा एवं पिछले चरणों के समीप विष्णु के दो अन्य आयुध पद्म, चक्र का अंकन है। वराह मूर्ति के अग्रपद का दायां चरण आगे की ओर उन्मुख है। प्रतीत होता है वह चरण नागराज की नागवली पर है। बघेरा की शूकर प्रतिमा के नसाग्र के शीर्ष पर गोलाकार पृथ्वी का अंकन इसे अन्य यज्ञ वराह प्रतिमाओं से अद्भुत एवं विलक्षण बनाती है।महावराह की उक्त प्रतिमा के सम्पूर्ण शरीर पर सात लोक, सात समुद्रों, ब्रहृमांड में विचरण करने वाले चराचर जीव-जन्तु, मानव चेष्टाओं,नृत्य, गायन, वादन का टंकन है। पृष्ठ पर सात पट्ट अंकित हैं, जिनमें लघु रूप में देवी-देवता, ऋषि मुनियों एवं गोल घेरे में राम-नाम को उत्कीर्ण किया गया है। वराह की विशाल सम्पूर्ण प्रतिमा पर 525 लघु आकृतियाों को उकेरा गया है। वराह के ग्रीवादेश में मुक्तमाल,रूण्डमाल एवं वैजयंतीमाला प्रदर्शित है, शीश भाग पर रासलीला चक्र, नीचे शेषनाग एवं आगे ब्रह्या शेषनाग पर दो सुंदर नागकन्याओं का अंकन (ईंगला-पिंगला )है। दोनों नागकन्याएं पूर्ण श्रृंगारित हैं हार, कुण्डल,कंकण मेखला एवं नुपुर का सुंदर अंकन दृष्टव्य है। वराह मूर्ति मुक्तामय आभूषणों से विभूषित है। नागराज के आगे दांये-बांये वीणाधारण नारद मुनि एवं पक्षीराज गरुड़ की लघु मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। उक्त मूर्ति में न केवल शूकर का विशाल आकार अपितु उसकी देह पर 525 देव-गन्धर्व एवं 24 अवतारों का अंकन मूर्ति को नेत्ररंजक बनाता है, बघेरा की पशु वराह मूर्ति की विशेषता यह है कि इसमें वराह का सम्पूर्ण शरीर पशु का परन्तु अलंकरण भगवान विष्णु के हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार ज्योतिष्टोम,पौनर्भवस्तोम,अत्रिरात्र तथा वैराग जैसे पवित्र यज्ञ पशुवराह की देह से प्रादुर्भुत हुए। इतिहासकारों एवं पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार ऐसी दुर्लभ मूर्तियों की संख्या अत्यल्प है।
तोरणद्वार(बघेरा ) –बघेरा में स्थित भव्य तोरणद्वार (स्तम्भ) भूरे बलुआ पाषाण से निर्मित दो स्तम्भों पर आधारित है। विवेच्य द्वार के दोनों स्तम्भ तीन खण्डों में विभक्त हैं, दो स्थान पर घटपल्लव लगाए गए हैं। तोरणद्वार से स्तम्भ पर बेल-बूटों तथा अनेकानेक सुन्दर और सजीव देवी-देवताओं की मूर्तियों से अलंकृत है। स्तम्भ के प्रथम खण्ड में कीर्तिमुकुट,गजधर एवं नरथर की पट्टिकाएं दृष्टव्य हैं। द्वितीय खण्ड की चारों दिशाओं में त्रिभंग मुद्रा में सेवक-सेविकाओं का सुन्दर शिल्पांकन है। ऊपरी खण्ड में अष्टकोणीय युग्म प्रतिमाओं क साथ रावणानुग्रह,गतिशील मुद्रा में नर वराह एवं अनेक धर्म कथाओं का नेत्ररंजक शिल्पांकन उत्कीर्ण है। स्तम्भ के ललाट पर विभिन्न मुद्राओं में नृत्य मंडलियों को शिल्पित किया गया है। सम्पूर्ण तोरणद्वार सनातन परम्परा एवं मान्यता के अनुरूप टंकित है। प्रेम का प्रतीक वैभवशाली, आकर्षक एवं विशाल तोरणद्वार मध्यकालीन स्थापत्यकला की भव्य कृति है जिससे तत्कालीन सांस्कृतिक वैभवता एवं शिल्पकला की उत्कृष्टता का साक्ष्य है। पुरातत्व विभाग द्वारा उक्त वैभवशाली शिल्प लगभग 8वीं से 12वीं शताब्दी ईसवी में निर्मित स्थापत्यकला की सुंदरतम कृति का अनुपम उदाहरण है। विवेच्य शिल्प से लोक-प्रवाद के अनुसार ढोला और मारवणी के विवाह संस्कार से सम्बन्ध रखते हैं। “ढोला मारवणी री वार्ता” के कई संस्करण से भी लोक-प्रवाद की पुष्टि होती है -वळै बघेरे देवगांव,सागर घणा निवाण। धन भटियाणी मारवण,पिउ ढोलो चहुवाण।।
वार्ता साहित्यानुसार नरवर के राजा द्वारा बघेरा सहित कई ग्राम भेंट का उल्लेख मिलता है।शास्त्रों में सप्तपदी के विधान में चंवरी, थाम का पूजन एवं रोपण की परम्परा वर्तमान में भी दृष्टव्य है, तोरणद्वार के समीप ही चंवरी एवं थामकलश स्थापित है।
जैन मन्दिर (बघेरा )-ग्राम बघेरा(केकड़ी) को जैन मूर्तियों का अद्वितीय खजाना माना जाता है। वर्तमान में यह स्थान “श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र बघेरा” नाम से प्रसिद्ध है। मन्दिर में स्थापित मूर्तियाँ प्राय:सभी 11वीं से13वीं शताब्दी की हैं। मूर्तियाँ पद्मासन एवं खडगासन मुद्रा में हैं। यहाँ भू-गर्भ से सर्वाधिक जैन मूर्तियाँ जुलाई 1972 ई.को प्राप्त हुईं। भूगर्भ से शान्तिनाथ भगवान की श्वेत पाषाण से निर्मित लगभग 7-8 फीट ऊँची प्रतिमा प्राप्य है। उक्त सौम्य,शान्त नयनाभिराम मूर्ति भव्य जैन मन्दिर में स्थापित है।
पदमावती देवी मूर्ति-तीर्थंकर पाश्र्वनाथ स्वामी की यक्षिणी के रूप में देवी पदमावती का उल्लेख जैन शास्त्रों में मिलता है। यह देवी मूर्ति रूप में कुक्कुट वाहन तथा पाश्र्वनाथ स्वामी के सर्प द्वारा प्रदर्शित रहती है। बघेरा मन्दिर परिसर में पदमावती देवी की सुन्दर मूर्तियाँ संरक्षित हैं। वह ललितासन में विराजमान और पांच सर्प फणों के छत्र से युक्त है। चतुर्बाहू मूर्ति फलक अपने उध्र्व करों आयुध एवं अन्य कर में जलपात्र एवं वरद मुद्रा में शिल्पित है। यक्षी मूर्ति फलक वाहन कुक्कुट के साथ शिल्पित है।
एक अन्य मूर्ति फलक में देवी ललितासन में आसीन सर्पफणों के छत्र से आच्छादित है अपने आयुध एवं कुक्कुट वाहन एवं वाहन के समीप पदम् कलिकाओं के साथ उत्कीर्ण है। यक्षी मूर्ति में उध्र्व करों में आयुध एवं अन्य कर में अक्षसूत्र देवी कमलासन ध्यान मुद्रा में शिल्पित है। मूर्ति फलक के दांयें-बायें मध्य में तीर्थंकर ध्यान मुद्रा में कमल पर आसीन हैं। छत्र के शीर्ष भाग पर सर्प फणों से युक्त तीर्थंकर की लघु मूर्ति शिल्पित है। मूर्ति फलक के अधोभाग में देवी के दोनों तरफ आयुधधारित सेवकों का शिल्पांकन है। मूर्ति फलक में देवी शीश से लेकर पादांगुली तक अलंकृत है। उनके शीश पर मुकुट, कुण्डल,ग्रीवाहार जिसकी लटकन वक्ष के मध्य से नाभि तक अंकित है। मूर्ति फलक नेत्ररंजक है।
अम्बिका देवी मूर्ति- जैन मूर्ति कला में देवी अम्बिका सर्वाधिक लोकप्रिय रूप में विख्यात है। यह तीर्थंकर नेमिनाथ की यक्षी के रूप में अधिकृत है। बघेरा जैन मन्दिर परिसर में चिकने श्वेत पाषाण पर उत्कीर्ण यक्षी की चतुर्भुज मूर्ति सिंहवाहना है। यह ललितासन में सिंह पर आरूढ़ है। देवी के करों में पदम्,आम्रफल एवं बालक से युक्त है। शीर्ष भाग पर लघु जिन आकृति (नेमिनाथ) उत्कीर्ण है। देवी मुकुट, हार, कर्ण कुण्डल, भुजबंध, करधनी आदि आभूषण से आभूषित हैं। पृष्ठ भाग में सुन्दर प्रभा मण्डल का शिल्पांकन है।
मन्दिर परिसर में चिकने श्याम पाषाण पर उत्कीर्ण यक्षी की चतुर्भुज मूर्ति सिंहवाहना है। यह ललितासन में सिंह पर आरूढ़ है। देवी के करों में पदम्,आम्रफल एवं बालक से युक्त है। शीर्ष भाग पर लघु जिन आकृति (नेमिनाथ) उत्कीर्ण है। देवी मुकुट,हार.कर्ण कुण्डल,भुजबंध,करधनी आदि आभूषण से आभूषित है। पृष्ठ भाग में सुन्दर प्रभा मण्डल का शिल्पांकन है।
प्रतिष्ठासारसंग्रह में सिंहवाहना यक्षी को द्विभुजी एवं चतुर्भुजा बताया गया है। अपराजितपृच्छा में द्विभुजी अम्बिका के करों में फल एवं वरद मुद्रा का वर्णन है। चिकने श्वेत पाषाण से निर्मित एक अन्य मूर्ति फलक में जैन यक्षी द्विभुजी सिंहवाहना है। यक्षी ललितासन में सिंह पर आरूढ़ है। सिंहवाहना अम्बिका फल, आम्रलुम्बि से युक्त है। शीर्ष भाग पर लघु जिन मूर्ति का शिल्पांकन है, उक्त मूर्त आभूषणों से अलंकृत है। यक्षी के शीश पर मुकुट, कर्ण कुण्डल, केयूर, भुजबंध,करधनी का अंकन मूर्ति कला की पराकाष्ठा का उदाहरण है।
देवी सरस्वती मूर्ति-प्रारम्भिक जैन ग्रन्थों में सरस्वती का उल्लेख बुद्धि के देव या श्रुत देव के रूप में प्राप्त होता है। जिनों की शिक्षाएं जिनवाणी आगम या श्रुत के रूप में जानी जाती थी और सम्भवत इसी कारण जैन आगमिक ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की भुजा में शास्त्र (पुस्तक) के अंकन की परम्परा प्रारम्भ हुई। विवेच्य क्षेत्र से अवाप्त देवी सरस्वती की चिकने श्वेत पाषाण से निर्मित देवी की चतुर्भुजी मूर्ति के उध्र्व करों में शास्त्र (पुस्तक) एवं पदम् तथा अधो कर में अक्षमाला एक अन्य कर भग्नावस्था है। सम्भावना है कि खण्डितावस्था के कर में कमण्डलु का अंकन की सम्भावना बलवती होती है। देवी सरस्वती के चतुर्बाहू क्रमश अन्तर्दृष्टि,वैराग्य,ज्ञान और संयम के प्रतीक कहे जा सकते हैं। देवी पूर्ण रूप से आभूषण से आभूषित- केयूर, कुण्डल, कांची, मुकुट से आभूषित, मूर्ति फलक के अधि भाग पर हंस वाहन एवं करबद्ध सेवक का अंकन है। निर्मल शुभ्र मुख ज्ञान के प्रकाश से शोभायमान है। मूर्ति फलक के शीर्ष पर लघु जिन मूर्ति का शिल्पांकन है।
इतिहास की गंगा और यमुना तो हम सभी के समक्ष दृश्यमान होती है परन्तु पुरातात्विक संस्कृति की अंत: सलिला के दर्शन हम नही कर पाते। राजस्थान के प्राचीन इतिहास की दृष्टिकोण से इस आंचल में बिखरे पुरातात्विक अवशेष के दृष्टिकोण से बघेरा का बहुत बड़ा महत्व है। केकड़ी के क्षेत्रस्थ कई भूभाग यत्र-तत्र बिखरे पुरावैभव अपनी प्राचीनता एवं वैभव की कहानी स्वयं बयां कर रहे हैं।




