ब्रज की मुकुटध्वजा गोवर्धन

प्रदीप कुमार चौबे


आनन्दकन्द भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि को क्रीड़ा एवं लीलास्थली होने का गौरव प्राप्त होने से ब्रजभूमि भारतवर्ष में अति पावन है। इस ब्रजभूमि में गोपालकृष्ण की गोचारण-स्थली एवं गोचर भूमि गोवर्धन का अपना विशिष्ट महत्व है, जहां सात कोस (इक्कीस किमी) की परिक्रमा वाला गिरिराज गोवर्धन स्वयं श्यामसुन्दर के स्वरूप में विराजमान हैं। मथुरा से पश्चिम दिशा में लगभग अ_ारह किमी की दूरी पर अवस्थित यह गिरिराज गोवर्धन पर्वत के नाम से प्रसिद्ध है। श्री गिरिराज महाराज कलियुग के प्रथम देव हैं और ब्रजवासियों के परम आराध्य हैं। यह मान्यता है कि गिरिराज जी की शरण में मन से मांगी मनौती अवश्य पूर्ण होती है और शरणागत की इच्छापूर्ति में गिरिराज जी क्षणिक भी देर नहीं करते। अस्तु यह भी असंख्य जनता की श्रद्धा के पात्र हैं। देश के विभिन्न भागों से नर-नारी गिरिराज जी की परिक्रमा, इनकी पावन रज को सिर पर धारण करके अपने जीवन को धन्य मानते हैं। यहां दिन-रात ‘गिरिराज जी की जय’ के उद्घोषों से परिक्रमा मार्ग गुंजित रहता है।

पूर्वकाल में यह पर्वत बहुत ऊंचा था, किन्तु अब भूमि में शनै: शनै: अदृश्य होता जा रहा है। शास्त्रों में इनका तीन योजन ऊंचा होने का प्रमाण प्राप्त होता है। इसकी ऊंचाई एवं विस्तार में भौगोलिक क्षरण तथा अपक्षरण की प्रक्रिया के कारण निरन्तर कमी होना स्वाभाविक है। श्रीकृष्ण-काल में श्यामल गिरिकन्दराओं से आच्छादित, मनमोहक हरित लताओं, सघन कुंज-निकुंजों, वन-उपवनों, श्रोत ताल-तलैयों तथा स्वच्छ झरनों से परिवेष्टित आनन्दकन्द योगिराज श्रीकृष्ण की रास क्रीड़ा स्थली गिरिराज को भगवान श्रीकृष्ण ने सात वर्ष की आयु में इन्द्र के प्रकोप से ब्रजवासियों की रक्षा हेतु अपनी उंगली पर उठाया और सप्ताहपर्यन्त धारण करके इन्द्रदेव का मानमर्दन किया।

धार्मिक दृष्टि से गिरिराज जी का प्राचीन काल से ही ब्रज में सर्वाधिक गौरवपूर्ण स्थान और महत्व रहा है। ब्रज में मान्यता है कि इनकी पूजन-परिक्रमा के मंत्र ‘गोवर्ध नगिरे तुभ्यं गोपाना सर्वरक्षकम्। नमस्ते देवरूपाय देवानां सुखदायिने।।Ó का दो सहस्त्र बार जाप करके चार बार प्रदक्षिणा करने पर सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है। श्री गिरिराज जी की तलहटी एवं कन्दराओं में भगवान श्रीकृष्ण तथा श्रीराधाजी के विहार-स्थल रहे हैं। अतएव इस भूमि का विशेष महत्व है। ब्रज की मुकुटध्वजा श्रीगोवर्धन कोई सामान्य पर्वत नहीं, अपितु गिरिराज है, भगवान का साक्षात् स्वरूप है तथा कलिकाल में प्रत्यक्ष देवता है।

ऐसे पावन धाम गोवर्धन नगरी के दर्शनार्थ और परिक्रमा के लिए प्रत्येक माह पूर्णिमा से पूर्व ही नर-नारियों के झुण्ड के झुण्ड उमड़ते चले आते हैं तथा दूध-भोग चढ़ाते हुए कह उठते हैं- ‘तन मन धन सब कुछ अर्पन, चले रे चले सब गोवर्धन।’ गुरु-पूर्णिमा के पर्व पर प्रतिवर्ष लाखों भक्तजन भारी भीड़ में भी देश के कोने-कोने से नंगे पैर परिक्रमा करने आतेे हैं जिससे जन-सैलाब उमड़ पडऩे से यहां लक्खी मेला एवं कुम्भ मेले का सा रूप दृष्टिगोचर होता है। लोंद के महीने (अधिकमास) में प्रतिदिन अहर्निश चौबीसों घंटे परिक्रमा लगती है। अपने जीवन को सफल बनाने और पाप विनाश के कुछेक पेट के बल लेटकर परिक्रमा लगाते हैं तो अनेक भक्तजन दूध की धार धूप के साथ परिक्रमा नंगे पैर पूर्ण करते हैं। समस्त तीर्थों का मुख्य धाम और सभी देवों का महान टीका है यह गिरिराज जहां की कन्दराओं में श्यामाश्याम विराजते हैं और सखियों सहित श्रीकृष्ण बलराम खेलते हैं। इस गिरिवर पर श्रीकृष्ण लीलाओं का एक प्रमुख स्थल दानघाटी है, जहां गोपाल कृष्ण ने ग्वालों के संग गोपियों से मक्खन, दूध, दही का दान लिया। मानसी गंगा के भीतर श्रीमुकुट गिरिराज जी के मुखारविन्द का मंदिर है, जिसके तीन ओर मानसी गंगा जल है, जो सायंकाल ऐसा प्रतीत होता है मानो श्रीगिरिराज जी स्वयं स्वरूप धारण कर किसी सुन्दर नौका में बैठकर जल-विहार कर रहे हों। हरगोकुल से आगे श्रीगिरिराज की ह्व