समय और संस्कार की सिद्धि है गोधूलि

डॉ. श्रीकृष्ण ”जुगनू”, प्राचीन संस्कृत साहित्य के विद्वान


कई बार तो लगता है कि मानवीय समझ और उसको साझा करने के लिए गाय से जुड़ी गतिविधियां बहुत सहायक सिद्ध हुई हैं।

गायों की पदचाप से उठने वाली धूल
आश्विन के बाद कार्तिक की संध्या में गांव की गलियां गोधूलि उठाती और गोधूलि से ही नहाती तो दादी, नानी, पोते—पोतियों, नातियों को बाहर लेकर बैठ जातीं, ताकि व्याधि की आशंका भी हो तो गोधूलि उसका शमन कर दे! गोधूलि बेला! बहुत आदरणीय शब्द जिसको समय के साथ जोड़ा गया है! इसको लग्न का सम्मान दिया गया है। लग्न साधन की झंझट से अलग, तिथि, मुहूर्त, वार, होरा, करण आदि देखने की बजाय शुद्ध बेला का पर्याय हुआ गोधूलि बंला। लोक में ”गोधलकिया लगन” का बड़ा मान रहा, क्योंकि इसी बेला में सबको अपने ठिकानों का स्मरण रहता है। क्या परिंदे और क्या चौपाए! यह बेला संयोग की हेतु है। विवाह जैसे सर्वोच्च संस्कार में गोधूलि बेला को सर्वोच्च प्राथमिकता है। जानते हैं क्यों!

गोधूलि के मुहूर्त में सप्तपदी को भी शुभ माना गया है। वराहमिहिर का विवाह पटल हो या केशव का विवाह वृंदावन ग्रंथ, इस मुहूर्त की बड़ी प्रशंसा करते हैं। सबको यह समय लुभाता है। कभी जब गाँव से लौटते देर हुई, तब आलय को लौटती धेनुओं की ग्रीवा में लटकी घंटियों, किंकणियों का स्वर और खुर से टकरा उठती धूल, हमें अनेक प्रेरणाओं से भर देती है। ऐसी बेला अद्भुत दृश्य संयोजित करती है।

बुजुर्ग कहते कि गोधूलि बेला में प्रभु का स्मरण करें। न तो भोजन बनाएं और न ही सेवन करें। सोना और अध्ययन करना भी सही नहीं माना जाता। इसी को सुषुमना भी कहते हैं।

यह भी कहते हैं कि इसमें घर का ध्यान हो। घर स्वयं का और घर साहिब का! मां तो घर लौटी गाय को छूकर उसकी धूलि सिर पर लगाती! यह श्रद्धा से ज्यादा उपचार था।

गोपाष्टमी के दिन मां आटे में गुड़ मिलाकर, उसे पहले कम पानी से गूंथतीं, फिर आठ पिंड बनातीं। उन पर रोली से टीकी लगाकर गोधूलि बेला में गायों को खिलातीं। बोला जाता:
पंखी माले आविया, खूंटे गावडियाह।
सहियर इसड़ो साहिबो खोज न बावडियाह।।

आज मशीनीकरण और भौतिकता का दुराग्रह इन सबको लील गया है। गोधूलि के विषय में सोचकर ही बचपन की यथार्थ गोधूलि बेला याद हो आती है। सचमुच वह आनंद बच्चों के लिए बड़ा आकर्षक था। जब गायों का समूह जंगल से घर को लौटता था तो आस-पास का सारा परिवेश धूलिस्नात् हो जाता था। स्वयं गायों का दिखना भी कम हो जाता था। आगे-आगे गायें और पीछे ग्वाला! क्या मनोहारी दृश्य हुआ करता था। आज इन सबको याद करते ही आंखें भर आती हैं। ऐसे बदलाव की तो हमने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। फिर भी हम सौभाग्यशाली हैं कि ईश्वर ने हमें कितना कुछ दिखाया है।

गोधन : व्याकरण का स्रोत
गोधूलि की तरह गोजाग शब्द सुबह के अर्थ में आता है। गोधन हमारी अर्थ व्यवस्था की स्थाई निधि है : निधि नाम गवा:। उसको रखना यानी धारण करना धर्म। जिसके पास गोधन हो, वह गोस्वामी और जो पालन करे, वह गोप और गोपाल।
गायों के लिए बनाया या निकाला गया आहार गोग्रास। गोधूम किसे कहते हैं? गोजी जैसा क्वाथ, गोकर्ण जैसा तीर्थ, गोघाट जैसे सोपान के क्या कहने!

जहां गोधन रहता है, वह गोशाला, गोवास, गोलोक या गोठा या गोष्ठा। जहां एकाधिक कुलों का गोधन हो, वह गोकुल। जहां व्यांत गो बछड़ों के साथ रखी जाती हैं, वो गो खिड़क। गायों से गांव। गांव गांव गोचर।

जहां गायें साथ खड़ी की जा कर पूजन – नैवज हो, वह गोली या गवली। गोशाला और देवायतन का द्वार गोपुर, प्रतोली के पाश्र्व अवलोकन गोख, गोखड़ा और गवाक्ष।

जहां प्राकृतिक जल धारा फूटे, वह गोमुख। वह धारा होकर बहे तो गोमती नदी। छोटा स्थान गोपद, बड़ी बैठकी गोचर्म सम। सज्जा गोमूत्रिका और गाय वालों का महीना गोपमास मार्गशीर्ष ।

गायों से ही हमारे गुवाड़, गोत्र और गायों से ही गली, गृह, उसमें भी गोमुखी, गावी जैसी रचनात्मक कक्ष्याएं। सब कुछ गोमय! जहां गाय है, वहां शुभ संभाव्य है।

हमारे पर्व, मास, त्योहार यही सब याद दिलाने आते हैं। अलौकिक कहानियों से ज्यादा महत्व इन लौकिक शब्दों को समझने का है। गोपमास, गोपाष्टमी, गोवत्स द्वादशी, पोला आदि के मूल में यही भाव है। गोपाष्टमी के लिए कहा गया है कि उस अवसर पर गोग्रास और गौ परिक्रमा होनी चाहिए। गायों के अनुगमन से अपेक्षित काम और कामनाएं पूरी होती हैं
गोपाष्टमीति संप्रोक्ता कार्तिके धवले दले ।।
तत्रकुर्याद्गवां पूजां गोग्रासं गोप्रदक्षिणाम् ।।
गवानुगमनं दानं वांछन्सर्वाश्च संपद: ।।

गोधूलि और सांझी चित्रांकन
क्वार की गोधूलि बेला की महिमा पूरा मध्य भारत जानता है। मेरे लिए यह आलेख्य का आसोज है, कला का क्वार। पितृ पक्ष एक अर्थ में चित्र पक्ष भी है, क्योंकि इस महीने में भित्तिचित्र बनाने की परिपाटी बहुत पुरानी है। उस काल की जबकि मानव ने बारिश में धूली पहाड़ी पत्थर वाली भित्तियों को उघाडी देखा और चींटी, कर्मला-कामला आदि रेंगने वाले जंतुओं से बचाव के लिए गोबर का प्रयोग करना सीखा। बाद में, गोबर के उभरांकन सुगम रूप से करने के लिए आधार पर हिरमिच से रेखांकन किया।

गृहिणियां, महिलाएं, खासकर लड़कियां इस काम में आगे आईं। गुहाओं में गोबर से सज्जा का यह काम काम संजा या संझ्या भी कहा जाने लगा। संझ्या को सांझ से जुड़ा कन्या पर्व कहा जाता है, यह क्वार का पक्ष पर्व भी है। सांझी, संझ्या, संध्या, झिंजा, क्वार चितराम, मामुलिया, भितां, रनु, रली जैसे कई नाम मगर एक ही पर्व। यह गोधूलि की महिमा का सुंदर रूपक है।

यह विश्वास भी पनप गया कि यह श्राद्धपक्ष में लोकदेवी संझ्या के स्मरण का सुअवसर है। लेकिन, इसमें पूर्ववर्ती पीढिय़ों के पात्रों, जो कि पूर्वज-पितर हैं, को उपकरणों, गतिविधियों समेत चित्रित करने का काम तो किया ही जाता है। गुहा चित्रों की पृष्ठभूमि इस प्रसंग में तुलनीय है। पानी पर रंग, आंगन में पत्तों से अंकन बहुत बाद में आया।

हमें पता है कि कन्याएं तिथि के अनुसार गाय के गोबर से नित नई आकृतियां बनाकर पत्तों, फूल-केसर, पंखुडियों से उसे सजाती हैं और फिर आरती करती हैं। ‘आरतीÓ यानी अपनी ही बनाई गई कला को कोई बुरी नजर न लग जाए, इसलिए निराकरण का उपाय। आरात्रिक या आरार्तिक… आरती का मूल विचार इस पर्व के साथ जुड़ा है। गो गोबर, गोलमण्डल, गुलपोशी, गोधूलि बेला, गीतों से गुणगान और पूरे पन्द्रह दिन बाद विसर्जन। गुहा से गमन।

वेद में उषादेवी और रात्रि देवी के पूजन का संदर्भ है मगर संध्‍यादेवी के पूजन का यह अनूठा पर्व है, जो प्रत्येक तिथि के साथ जुड़ी है और तिथि के वृद्धिसूचक अंकों के अनुसार अपना आकार तय करती जाती है… नारदपुराण में इन्हीं गुणों के कारण संध्‍यावली को श्रेष्ठ नायिका कहा गया है जो पति, पुत्र सहित महालय में लीन होती है लेकिन इसका खास सन्दर्भ सांब पुराण और ब्रह्माण्ड पुराण धारण किए हुए हैं :
आला फूलां भरियो वाटको जी कांई,
संझ्या की बाई ओ, संझ्या ने भेजो करां संझ्या री आरती…।