कुलदेवी लोक और शास्त्रीय दृष्टि

श्रीकृष्ण ‘जुगनू’
प्राचीन संस्कृत साहित्य के विद्वान


देवियां और देवता अनेक कोटि, रूप, भेद और भाव वाले होते हैं। सामुदायिक स्तर पर देव मान्यता और विश्वास कुछ ऐसे पक्ष हैं जो शास्त्रीय पक्ष से अधिक लोकायन से अधिक पुष्ट होते हैं। विष्णुधर्मोत्तर रौच्य नाम से ऐसी देव धारणा को विस्तार देता है लेकिन देवीपुराण देवियों की मान्यताओं की अनेक व्याप्तियों की पुष्टि करता है—
वृक्षमूव्र्यां तथा वायौ व्योमे स्वर्गे च सर्वश:।
एवं विधा त्वियं देवी सदा पूज्या विजानता।
अप्येकं वेत्ति तो नाम धात्वर्थ निगमैर्नर:।
स दु:खैर्वज्र्जित: सर्वै: सदा पापाद्विमुच्यते।।
(देवी पुराण 38, 100-102)

भारतीय परिवारों में कुल देवी की मान्यता लगभग वैसे ही रही है जैसे मिस्र में थी। ग्रीक परिवार भी कुल की रक्षा करने वाली शक्तियों में विश्वास करते थे। कुल देवियां हमारे घर- गुवाड़ के मूल द्वार की सूचक होती हैं। अधिकांश कुल देवियों के नाम ऐसे होते हैं, जो शास्त्रों में नहीं मिलते हैं, क्यों?

द्वार द्वार ड्याढ़ी माता
हर द्वार पर देवी विराजमान रहती है। कुलदेवी की मान्यता उस काल की देन है, जबकि गायों के गुवाड़ की तरह पालकों ने एक साथ रहकर गोत्र की मान्यता का विकास किया। तब गोखे चोखे होकर गोखडे गवाक्ष हुए और द्वार पर सुरक्षा के भाव के रूप में आयुध चिह्नित किए जाने लगे। मित्र प्रद्योत कहते हैं गोत्र शब्द बड़ा ही रोचक इतिहास समेटे हुए है। गोत्र का अर्थ है— गोशाला (cowshed)। त्र प्रत्यय (अन्त्यलग्न/suffix) का प्रधान अर्थ है— रक्षक। अत: गोत्र का अर्थ गोरक्षक भी हुआ।

गो के तीन अभिप्राय हैं—
1. गाय की कोई विशेष प्रजाति (नस्ल/breed)।
2. गेहूँ (गोधूम) की कोई विशेष प्रजाति।
(गोमेध = गोवत्स-बधियाकरण व गेहूँ की खेती)
3. वेद की कोई विशेष शाखा।

भारत में पिता-पुत्र-क्रम (male lineage) को गोत्र संज्ञा प्रदान की गई थी और प्रत्येक पिता-पुत्र-क्रम गो के उपर्युक्त तीनों रूपों की रक्षा कर रहा था। ब्रह्मवैवर्त पुराण में द्वार द्वार देवी की बात आई तो मत्स्येंद्रनाथ ने कुलदेवी की बात कौल मत निर्णय में कही। आज जो गुवाड़ वाले द्वार बचे हैं, उनको देखता हूं तो ये बातें सामने आती हैं।

उन देवियों के आहार, पानक, स्थान, स्थिति केवल लोक स्मृतियों के आधार पर होते हैं, क्यों? कहीं न कहीं इन देवियों के मूल जनजातीय होते हैं, कुछ प्रसंगों में शासकों के साथ विशेष रूप से देखने की जरूरत होती है, क्यों यह मान लिया गया है कि जो कुल देवी राजा की होगी, वही उनकी प्रजा की होगी।

आजकल अनेकजनों की जिज्ञासा रहती है कि उनकी कुलदेवी कौन है? उनका मूल स्थान कौन सा है? उसकी पूजा विधि क्या है? इस प्रसंग में हमें याद रखना चाहिए कि इसकी जानकारी हमें परदादी, दादी, मां… की ओर से मिलती है। वे ही जानती हैं कि उनके कुल की देवी कौन सी है? उनकी पूजा की विधि क्या है? किस तिथि को पूजी जाती हैं? परिवार में संवादहीनता से ऐसी समस्याएं खड़ी होती हैं। कोई कहीं भी रहें, लेकिन हमें इस बारे में पूछना और बताना चाहिए। इस बारे में किसी चतुर से पूछने से बचना चाहिए! क्योंकि वे झंझट ही खड़े करते हैं। अपने कुल से अधिक भला कौन जानता है?

सबका विशिष्ट पूजा विधान
शाक, अमिष जैसे आहार, भोग, नैवेद्य, उनके पूजन की सभी तिथियां भी बहुत कुछ कहती हैं, तीज तिथि का नाम ही गौरी तिथि हो गया। क्यों और कब? कुल देवियों की इस रूप में पहचान ब्राह्मणी, क्षत्रिय आदि रूप में होती है, क्योंकि उनको जो सामग्री चढ़ती है, वह कैसी है? ये सब बातें कुलदेवी के अपने परिवार की सदस्य होने जैसी लगती हैं। कुलदेवियों के बारे में पुराणों में नहीं, परिवार की वृद्धाओं में खोजना चाहिए, चाणक्य कहते हैं कि वे ज्ञानवृद्ध होती हैं।
महाभारत में कहा गया है :
माता जानाति यद्गोत्रं माता जानाति यस्य स:।
मातुर्भरणमात्रेण प्रीति: स्नेह: पितु: प्रजा:।। [शांतिपर्व 266, 35]

इसका भाव है कि रेख और लेख में मीन-मेख नहीं : महिला (मां) और शिला (शिलालेख) इसलिए मातृका कही जाती हैं कि वे अपनी स्मृतियों से सिद्ध करती हैं कि पुत्र का पिता कौन है? उसका गोत्र, वंश और चिह्न लक्षण आदि विशिष्टतायें क्या हैं? अपनी कोख में धारण करने के कारण सच में उनमें स्नेह होता है। अन्य सब अटकलें पिता के प्रभुत्व की तरह प्रजा को कब्जे में रखने के उपाय मात्र हैं।

देवियां वंश वल्लरी की मूल होती हैं, कभी माता से ही व्यक्ति को पहचाना जाता था, नामकरण मां के आधार पर ही होता था, देवताओं के नामकरण में भी इस मान्यता को मुहर लगाई गई है और उनके बारे में सबसे ज्यादा केवल कुल की वरिष्ठ महिलाएं ही जानती हैं। इसलिए वे सदैव आदरणीय और सम्माननीय होती हैं।

लोक में देवी अवधारणा

देवियों के रूप आदिम, लोक और शास्त्रीय तीनों प्रकार से मिलते हैं। यहां गृह देवी, ग्राम देवी, गढ़ देवी से लेकर नगर देवी तक की मान्यता है। राजस्थान में गवरी जैसा नृत्यानुष्ठान देवियों द्वारा प्रकृति को फलीभूत करके कुल परिवार को समृद्ध करने का पुरातन विचार लिए है। उदयपुर अंचल में भादौ और आधे आसोज माह तक गवरी नृत्यानुष्ठान का आनंद उठाया जा सकता है, उसे देवियों की लीला पीठिका के रूप में भी देखना चाहिए। यह पूरा नृत्‍यानुष्ठान कई मान्यताएं लिए हैं। इसी से मालूम होता है कि खेती और पेड़-पौधों के फलित होने के कलैंडर की पहली जानकारी महिलाओं को ही मिली थी। यायावरी जीवन में आदमी को शिक्षित करने का श्रेय महिला को ही है। इसलिए मिस्र में भी यह मान्यता चली आई है कि स्त्रियों ने दुनिया को खेती करना सिखाया।

गवरी की मूल कथा है
धरती पर कोई पेड़ नहीं। छाया कहां मिलै। नौ लाख देवियां परेशान। एक उड़ते हुए सवा माणी के भौरे को देखा। पूछा कि जो पेड़ नहीं तो तू कहां से आया। तू तो फूलों का रसिक है। देवियों को उसने बहुत परेशान होकर बताया कि पाताल में राजा वासुकी बाडी में पेड़ हैं।

देवियां पाताल पहुंचीं। एक एक देवी ने एक एक पेड़ उखाड़ा। वासुकी ने हजार फन तानकर रास्ता रोक लिया। देवी अंबा ने गुरज उठाया, लगी फन काटने। नागिन ने सुहाग की रक्षा मांगी। देवियों ने पेड़ चाहे। वासुकी ने कहा, धरती के लोग बहुत प्रपंची हैं। पेड़ों पर कुल्हाडा चलाएंगे। देवी ने कहा, राजा जैसल की बाड़ी में रोपेंगे। राजा जैसल ही रक्षा करेगा। सर चला जाए तो भी पेड़ नहीं कटने देगा।

एक एक देवी पेड़ लेकर जमीं पर आई। देवियों का नाम भी इसी कारण हआ-पीपल लाने वाली पीपलाज माता, नीम लाने वाली नीमज माता, आम वाली अंबा या आमज माता, खेर वाली खेमज माता, उमर वाली उमरा माता, बरगद वाली बडली माता। शाकंभरी, हिंगलाज, कूष्माण्डा … और भी नाम और पक्ष हैं।

खमनोर गांव के पास, उनवास में पहली बार देवियेां ने बाडी लगाई। सारे पेड़ों के साथ ही बरगद रोपा। राजा ने घी-दूध से सींचा मगर आबू के भानिया जोगी की सवा लाख की फौज चढ़ आई। देवी अंबा परीक्षा लेने पहुंची। रानी मेंदला के समझाने पर भी राजा ने सर दे दिया, इस अहद के साथ कि सवा लाख मानवी मरेंगे तो कहीं कुल्हाडा चलेगा पेड़ पर। भानिया ने कुल्हाडा चलाया।

पहले वार में दूध की धारा बही, दूसरे में पानी की धारा फूटी और तीसरे में… प्रलय ही आ गया, लहू की धारा ने सारी धरती को लाल कर दिया। देवी ने कहा: पेड़ बचे तो पृथ्‍वी और कुल वंश बचेगा, पेड़ कटा तो प्राण घटेगा।….. कितना सार्थक है गवरी का देखना। बडलिया हिंदवा। गवरी का मूल खेल, अद्भुत मेल, पेड़ ही प्राण हैं, पेड़ से ही जहान है…।