प्रो. डॉ ब्रह्मचारी व्यासनन्दन
प्राचार्य, सब्डिविजिनल गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, मधुबन, पकड़ीदयाल पूर्वी चम्पारण
यज्ञ का विज्ञान अत्यन्त व्यापक है, क्योंकि सृष्टि में जो कुछ घटित हो रहा है, वह यज्ञीय क्रियाकलाप ही है। कर्मप्रधान इस जगत् में समग्र सृष्टि इसी हेतु से है, इसीलिए ‘यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म’। यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म की परिधि में रखा गया है। और फिर, कुर्वन्नेवेह कर्माणि इस मन्त्र द्वारा ज्ञात होता है कि इस संसार में मनुष्य को 100 वर्ष तक कर्म करते हुए जीने की इच्छा करनी है। इस तरह मनुष्य को कर्म करने की स्वतंत्रता मिली है, परन्तु फल भोगने में परतन्त्रता।
यह ध्यातव्य है कि यज्ञ विचारपूर्वक किया जाने वाला कर्म है, जिसका फल विश्वकल्याण है। यज्ञ का विश्वकल्याणस्वरूप ही इसकी वैज्ञानिकता को परिपुष्ट करता है। इसके अन्तर्गत यजमान व याज्ञिक सुख-समृद्धि, धन-ऐश्वर्य, पुत्र-पौत्रादिकों की कामनायें सिद्ध करता है। इतना ही नहीं, परमात्मा भी सृष्टियज्ञ के माध्यम से चारों वेद एवं समस्त चराचर जगत् की रचना करते हैं-
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत: ऋच: सामानि जज्ञिरे।
छन्दाग्सि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत।।30
अर्थात् उस यज्ञ से परमात्मा ने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और छन्द अथर्ववेद की सृष्टि की। यजुर्वेद का 31वाँ अध्याय, जिसे ‘पुरुषसूक्त’ कहा जाता है, में 22 मन्त्र आते हैं, जिनमें सृष्टि-विषय वर्णित है। ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र में यह कहा गया है कि उस सृष्टियज्ञ का परमात्मा स्वयं पुरोहित, होता ऋत्विज् बनकर अतिशय रत्नों का भण्डाररूप जगत् की रचना करता है और उसकी अग्नि भी स्वयं है, इसलिए यज्ञ द्वारा हम उसी परमात्मा की स्तुति करते हैं। भौतिक दृष्टि से यह अग्नि ‘गार्हपत्य अग्नि’ है; कर्मकाण्ड की दृष्टि से ‘आहवनीय अग्नि’ है तथा आध्यात्मिक दृष्टि से ज्ञानस्वरूप परमेश्वर है। इस वैदिक अवधारणा से ही यज्ञ—विज्ञान को सरलता से समझा जा सकता है और तभी इसकी व्यापकता भी भलीभाँति सिद्ध होगी।
यज्ञ की व्यापकता के कारण ही हमारे ऋषियों ने यज्ञ को जीवन का पर्याय मानते हुए कहा है-पुरुषो वाव यज्ञ:। याज्ञिक प्रभाव भी अत्यन्त व्यापक होने से यज्ञ को ‘विष्णु’ की संज्ञा प्राप्त है- यज्ञो वै विष्णु:। सुख-विशेष स्वर्ग की कामना भी यज्ञ से सिद्ध होती है, एतदर्थ स्वर्गकामो यजेत कहकर इसे प्रतिष्ठापित किया जाता है। प्रत्येक गृहस्थ का घर सुख-समृद्धि और ऐश्वर्ययुक्त हो, इसके लिए यज्ञ ही प्रधान है-ईजाना: स्वर्गं यन्ति लोकम्। इसी हेतु यजुर्वेद का प्रथम मन्त्र ही इस यज्ञीय कर्म को श्रेष्ठतम मानकर प्रत्येक मनुष्य के लिए अनिवार्यता प्रदान करता है-श्रेष्ठतमाय कर्मणे। तथा, उपसंहार में ‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि’ कहकर निष्काम कर्म के प्रति प्रेरणा देता है। निष्काम कर्म और कोई नहीं, प्रत्युत् अग्निहोत्रादि शुभकर्म ही तो हैं जिनसे समग्र ब्रह्माण्ड परिपालित, परिपोषित और परिमार्जित होता है। वेद में इसी भावना से लक्षित कर यज्ञ को विश्व-ब्रह्माण्ड की नाभि कहा है-अयं यज्ञो विश्वस्य नाभि:।
यज्ञ की महत्ता व वैज्ञानिकता प्रतिपादन से पहले ‘यज्ञ’ की परिभाषा समझनी आवश्यक है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने ‘यज्ञ’ को परिभाषित करते हुए कहा है-‘यज्ञ’ उसको कहते हैं जिसमें विद्वानों का सत्कार यथायोग्य, शिल्प अर्थात् रसायन जो कि पदार्थविद्या उससे उपयोग और विद्यादि शुभगुणों का दान, अग्निहोत्रादि जिनसे वायु, वृष्टि, जल, औषधि की पवित्रता करके सब जीवों को सुख पहुँचाना है।
महर्षि दयानन्द ने उपर्युक्त परिभाषा में ‘यज्ञ’ शब्द के धात्वर्थ को ही व्याख्यायित किया है। ‘यज्ञ’ शब्द ‘यज्’ धातु से बना है- ‘यजौ देवपूजासंगतिकरणदानेषु’। इससे देवपूजादि अर्थों से ”यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षोनङ्” सूत्र से ‘नङ्’ प्रत्यय होकर ‘यज्ञ’ शब्द सिद्ध होता है। संक्षेपत: देवपूजा अर्थात् वेदवर्णित प्रकार के जड़-देवों व माता-पितादि चेतन देवों की पूजा-सत्कार यानी यथायोग्य व्यवहार; ‘संगतिकरण’-प्राकृतिक पदार्थों का यथोचित मात्रा में संयोगकरण जिससे प्राणियों का कल्याण हो। इसके साथ ही श्रेष्ठ धर्मात्माओं और विद्वानों का संग भी इसके अन्तर्गत है। यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली चार प्रकार की सामग्रियाँ-सुगन्धित, पुष्टिकारक, मिष्ट और रोगनाशक जिनके अन्तर्गत केशर, कस्तूरी, गुग्गुल, जावित्री, जायफल, अगर, तगर, चावल, घी, गेहूँ, उड़द, जौ, तिल, शक्कर, छोहाड़ा, मुनक्का, किशमिश, गरीगोला, मखाना, गिलोय, कमलगट्टा, चिरायता, गुलाबफूल सूखा, पलाशफूल सूखा, शंखपुष्पी, छरीला, तेजपत्रादि सैकड़ों ऋत्वनुकूल जड़ी-बूटियाँ आती हैं, जिनका यज्ञ में संगतिकरण करके ही प्रयुक्त होती हैं। यज्ञशाला में आबाल—वृद्ध सभी एक साथ बैठते हैं-यह भी संगतिकरण ही हैं।
दान-स्वयम् उपार्जित धन-सम्पत्ति-विद्यादि का प्राणिमात्र के कल्याणार्थ उत्सर्जन करना ही दान है। यज्ञ-प्रसंग में ‘द्रव्यं देवतात्याग:’ अर्थ भी ग्रहीत है। स्वाहारपूर्वक हव्यद्रव्यों को देवतानिमित्त त्याग ही दान कहलाता है। इसमें याज्ञिक की ‘इदन्न मम’ की भावना होती है, जो त्यागयुक्त है और श्रद्धायुक्त है। इस प्रकार यज्ञ का प्रयोग-क्षेत्र अति विस्तृत है।
यज्ञीय स्वरूप को लक्षित करते योगिराज श्रीकृष्ण ने द्रव्ययज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ, स्वाध्याययज्ञ, ज्ञानयज्ञरूप विविध भेद से निर्देशित किया है। इस दृष्टि से गीता के चतुर्थ अध्याय के 29 से 32 श्लोकपर्यन्त पाँच श्लोक विशेष द्रष्टव्य हैं। अतएव लोक में जो कुछ भी लोकोपकारक कर्म किये जाते हैं, उनके साथ यज्ञ शब्द का प्रयोग देखा जाता है।
यज्ञ विज्ञानों का विज्ञान
यज्ञ स्वयं एक वैज्ञानिक कर्म है। इसकी प्रत्येक विधि बुद्धिपूर्वक की जाती है। यज्ञ की तीन मेखला तीन लोक-पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यौलोक की प्रतीक है। इससे सिद्ध है कि यज्ञ से तीनों लोकों की शान्ति निश्चितरूपेण होती है। यज्ञ-कलश सृष्टि का प्रतीक है तो जलसिंचनविधि प्रलय का प्रतीक। कलश के नीचे यवादि का वपन-अन्न (प्राण) का प्रतीक है तथा दीप-प्रज्वलन प्रकाश व ज्ञान का। वहीं आम्रपल्लव औषधि का प्रतीक। यज्ञ के तीन आचमन-कफ, पित्त और वात के प्रतीक हैं। तीनों की समावस्था स्वास्थ्यविज्ञान को परिलक्षित करती है। क्योंकि यज्ञ में बराबर मात्रा में ही आचमन करने का विधान है। तीन समिधाओं का आधान-तीन आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ) की प्रतीक हैं। चूँकि तीनों आश्रमों को शास्त्रोक्त यज्ञाधिकार प्राप्त है। तीन बार शान्तिपाठ त्रितापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) की शान्ति के लिए है। इसी को आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दु:ख कहा जाता है, इसके निवारण निमित्त ही शान्तिकरण का पाठ होता है। अग्नि और सोम नाम से घृताहुति का अभिप्राय ऋणात्मक और धनात्मक दो शक्तियों से है जिनसे सृष्टि होती है- ”अग्निषोमात्मकं जगत्” भौतिक विज्ञान की दृष्टि से यही इलेक्ट्रॉन और प्रोट्रोन नामक दो तत्त्व हैं जिन्हें ऋत और सत्य भी कहा जाता है।
अग्नि स्वयं एक भेषज और भेदक तत्व है, जो पदार्थों का छेदन, भेदन और विभाजन करके चिकित्सकीय रूप प्रदान करता है। यथा-अग्नि में घृतादि सामग्रियाँ यज्ञ-माध्यम से स्वाहाकारपूर्वक प्रयुक्त होती हैं और अग्नि उन्हें सहस्र गुणी शक्तियों में विभाजित कर गुणों में वृद्धि करती है। इस तरह एक चम्मच घी हजार चम्मच के बराबर होकर वायुमण्डल में सुरभि फैलाता है, फलत: पर्यावरण की शुद्धि होती है। यज्ञ-सुरभि पर्यावरण में यथाशीघ्र व्याप्त होकर विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों को निवारित करती है। इस प्रकार यज्ञ ‘पर्यावरण-परिशोधनविज्ञान’ भी है। गुगुल, गिलोय, जटामासी इत्यादि जड़ी-बूटियाँ यज्ञ में प्रयुक्त होकर उत्तम स्वास्थ्य लाभ कराती हैं। गुग्गुल की गन्ध से राजयक्ष्मा (टी.बी.) रोग के कीटाणु यज्ञ से नष्ट होते हैं-
न तं यक्ष्मा अरुन्धते नैनं शपथो अश्नुते।
यं भेषजस्य गुल्गुलो सुरभिर्गन्धो अश्नुते।।
चावल, गुड़ तथा सूखे मेवे की आहुतियों से टाइफाईड आदि तीव्र ज्वर के कीटाणु शीघ्र नष्ट होते हैं। ये रोगाणु मनुष्यों को कष्ट पहुँचाते हैं इसीलिए ये ‘यातुधान’ कहलाते हैं। अथर्ववेद में वर्णित है कि ये धातुधान कीट अग्नि में प्रयुक्त आहुति द्रव्यों की गन्ध से नदीफेन की तरह बह जाते हैं-
”इदं हविर्यातुधानान् नदीफेनमिवावहत्।
य इदं स्त्राी पुमानकरिह स स्तुवतां जन:।।”
इस तरह यज्ञ से मौसमी ज्वर, जीर्ण ज्वर, क्षयरोग, गर्भदोष, मानसिक (भूतोन्माद) रोगादि नष्ट होकर उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है, फलत: ‘यज्ञ बनाम चिकित्साविज्ञान’ भी सिद्ध होता है।
इसके साथ ही यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली समिधाएँ अपेक्षाकृत कम कार्बन छोड़ती हैं। यह विज्ञानसिद्ध है कि जो चीजें जलती हैं, कार्बन डायक्साईड बनकर निकलती हैं, परन्तु यह ध्यातव्य है कि अग्नि स्वयं एक भिषक् (चिकित्सक) है। यदि उसे सुगन्धित द्रव्य मिले तो सुगन्ध ही फैलाती है और दुर्गन्धयुक्त मिले तो दुर्गन्ध फैलाती है। यज्ञ में सुरभियुक्तद्रव्यों की आहुतियाँ दी जाती हैं, इसलिए सुरभित वायु निकलती है। पुनश्च जल में यदि कुछ कार्बन घुलते हैं तो फॉरमेल्डिहाईड गैस (जीवनोपयोगी) बन जाती है जो प्राणिजगत् को जीवन देती है। इसके अतिरिक्त यज्ञ में ‘स्वाहा’ बोलने से कुछ कार्बन यदि मुख में प्रविष्ट कर अन्दर जाता है तो फेफड़ों को रोगरहित ही करता है चूँकि उसमें औषधीय गुण विद्यमान होता है। और, रक्त में मिलकर लाल रक्तकण को मजबूत करता है, फलत: हममें रोगों से लडऩे की क्षमता बढ़ाती है। इसके साथ ही यज्ञशाला में कदली-स्तम्भ लगाना और यवादि का वपन तथा आमपल्लवादि के प्रयोग होते हैं, जो कार्बनडाय ऑक्साईड को खा जाते हैं और हमें अधिक ऑक्सीजन बनाकर देते हैं। तभी तो वेदों में प्रात: सायं सूर्योदय और सूर्यास्त से पूर्व देवयज्ञ (अग्निहोत्र) करने के विधान आते हैं। प्रात:काल का हवन दिनभर की शुद्धि करता है और सायंकालीन हवन रातभर की शुद्धि करता है-
प्रात: प्रात: सौमनस्य दाता सायं सायं गृहपतिर्नोऽग्नि:।
यज्ञाद् भवति पर्जन्य:’ इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि यज्ञ से वर्षा होती है। यज्ञ की पवित्रता द्वारा वायुमण्डल के नियंत्रण से वर्षा इच्छानुसार होती है। निकामे निकामे न: पर्जन्यो अभिवर्षतु कहकर स्पष्ट किया गया है कि हम जब-जब चाहें, तब-तब वर्षा हो। सचमुच इसी अभिप्राय से यज्ञों का विधान किया गया है। वेदों में यज्ञ से वर्षा के संकेत मिलते हैं और इसी के आधार पर प्राचीन ऋषि-मुनियों ने समय-समय पर आवश्यकतानुसार वर्षा करायी थी। अर्वाचीन विद्वानों द्वारा भी इसके कतिपय सफल आयोजन हो चुके हैं। वेद में यह वर्णित है कि यज्ञ वर्षा को बढ़ाने वाला है। यज्ञ से मेरे लिए वृष्टि होवे। बरसते हुए बादल एवं वर्षा के लिए यज्ञ करो।
महाराज मनु ने भी डंके की चोट से उद्घोषणा की-
अग्नौ प्रास्ताहुति: सम्यगादित्यमुपतिष्ठते।
आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं तत: प्रजा:।।51
अर्थात् अग्नि में दी गई आहुति सूर्य तक पहुँचती है। सूर्य से वर्षा होती है; वर्षा से अन्न होता है और अन्न से प्रजा उत्पन्न होती है। यहाँ प्रजा से अभिप्राय सुसंतान और सृष्टि से है। इस प्रकार यज्ञ वृष्टिविज्ञान और सृष्टिविज्ञान दोनों है। और, जहाँ अधिक वर्षा हो रही है तो वृष्टिरोधक सामग्रियों व मन्त्रों से वृष्टि को रोका जा सकता है, फलत: यहाँ यज्ञ वृष्टिकारक और वृष्टिरोधक दोनों रूपों में चरितार्थ होता है। स्वयं लेखक ने इन दोनों रूपों में यज्ञ-सम्पादन कर सफलता पायी है और पुत्रोष्टि यज्ञ करके सृष्टिविज्ञान भी सफल हुए हैं। वृष्टियज्ञ के लिए करीर की समिधा विशेष महत्त्वपूर्ण है, इसकी प्रधानता के कारण वृष्टियज्ञ को कारीरेष्टि भी कहा गया है। इसके लिए अथर्ववेद के चतुर्थ काण्ड का 15वाँ सूक्त, जिसे ‘पजऱ्न्य सूक्त’ कहा जाता है, के मन्त्रों से वृष्टिकारक सामग्रियों द्वारा यज्ञ करने से शीघ्र सफलता मिलती है। इतना होने पर भी यज्ञकर्ता का सत्य-श्रद्धायुक्त संकल्प भी वृष्टि के दोनों रूपों के लिए आवश्यक है।
इसके साथ ही वेद के अनुसार मित्र और वरुण के मिलने से जल बनता है। और वृष्टि से हमारी रक्षा होती है, अत: दोनों को वृष्टि का स्वामी कहा गया है। मित्र और वरुण ही क्रमश: प्राण और उदान हैं। वर्तमान विज्ञानानुसार मित्र (प्राण) को आषेजन (ऑक्सीजन) और वरुण (उदान) को उद्रजन (हाइड्रोजन) कहा गया है। जल के निर्माण में वरुण तत्व की प्रधानता होती है। वरुण तत्व की अधिकता से ही जल निर्मित होता है।
इसके अतिरिक्त वेदों में वर्षा हेतु पवन के नाम प्राप्त होते हैं। ये सभी मरुद्गण वर्षा के भिन्न-भिन्न रूपों के परिचायक बनते हैं। इस प्रकार यज्ञ द्वारा वृष्टिजल की शुद्धता-पवित्रता द्वारा विश्वकल्याण होता है।
वृष्टिविज्ञान की सिद्धता से यज्ञ द्वारा कृषिविज्ञान भी फलित होता है। क्योंकि, कृषि के लिए वृष्टि की अनिवार्यता होती है। परन्तु दुर्भाग्य है कि आज अतिवृष्टि और अनावृष्टि के कारण हमारी कृषि बर्बाद हो रही है। यज्ञानुसार वृष्टि और वृष्टि-अनुसार कृषि होने से ही हमारी कृषिजन्य समस्या का समाधान होगा और देश की प्रजा अमनचैन से रहेगी।
कृषिविज्ञान की सिद्धि के लिए वेद में सीतायज्ञ का विधान आता है। सीतायज्ञ ही कृषियज्ञ है। हल की फाल को ‘सीताÓ संज्ञा है। इसे संबोधित करते हुए वेद कहता है-हे सौभाग्यवती फाल! तू हमारे लिए सौभाग्य देनेवाली और सुफल हो। हमें सुख देने वाली फाल हमारी जमीन को जोते, हमारा जोतने वाले बैलों से सुख प्राप्त करे, वर्षा (उत्तम जलों) से तृप्त कर दे और खेती हमलोगों में सुख धारण करे। मन्त्र द्रष्टव्य है-
शुनं न: फाला वि कृषन्तु भूमिं शुनं कीनाशा अभियन्तु वाहै:।
शुनं पर्जन्यो मधुना पयोभि: शुनासीरा शुनमस्मासु धत्तम्।।
कृषि तो विशेष यज्ञीय धूम से होती है, इसे ‘वायव्य खाद’ कहा जाता है, जो फसलों को विशेष लाभ पहुँचाती है। यज्ञ-भस्म भी कृषिजन्य भूमि को उर्वरा बनाती है, जबकि रासायनिक खाद से भूमि की उर्वरा शक्ति क्रमश: नष्ट होती जाती है। एक समय ऐसा आता है कि भूमि कृषि योग्य ही नहीं होती। ऐसी विषम घड़ी में सीतायज्ञ, उसकी धूम व भस्म अत्यन्त लाभकर सिद्ध होती है और भूमि हमेशा उर्वर बनी रहती है।
यज्ञीय भस्म से खट्टे नीबू मीठे होते हैं, नारियल में पर्याप्त फल आते हैं, चने की फसल सामान्य से चौगुनी बड़ी होती है, आदि-आदि अनेक सकारात्मक व विस्मयकारी परिणाम देखने को मिले हैं। आज अमेरिका ने भी इस सच्चाई को जानकर अपनी राजधानी वाशिंगटन में ”अग्निहोत्र यूनिवर्सिटी” की स्थापना की है। इसमें अहर्निश यज्ञविज्ञानों को अन्वेषित किया जा रहा है। हमारे वैदिक ऋषियों और आधुनिक वैज्ञानिक भाष्यकार महर्षि दयानन्दजी ने इसी सत्य विज्ञान को जानकर प्रत्येक गृहस्थ के लिए इसे अनिवार्य कर्म बताया और ‘अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकाम:’ कहकर इसकी पुष्टि की- ”प्रत्येक मनुष्य को सोलह-सोलह आहुति और छ:-छ: माशे घृतादि एक-एक आहुति का परिमाण न्यून से न्यून चाहिये और जो इससे अधिक करे तो बहुत अच्छा है। इसीलिए आर्यवर शिरोमणि महाशय ऋषि, महर्षि, राजे, महाराजे लोग बहुत-सा होम करते और कराते थे। जब तक इस होम करने का प्रचार रहा तब तक आर्यावत्र्त देश रोगों से रहित और सुखों से पूरित था, अब भी प्रचार हो तो वैसा ही हो जाय।”
ऋषि ने ”ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका” में प्रश्नोत्तर शैली में कहा है-यज्ञ नहीं करे तो क्या होगा? उत्तर-पाप होगा। आएँ! ऋषि-सन्देश के इस यज्ञ-प्रसाद को घर-घर पहुँचाएँ, तभी हमारा देश सर्वप्रकारेण सुखी होगा।
अत: यज्ञ और इसके विज्ञान पक्ष को गम्भीरतापूर्वक जीवन में अपनाना चाहिये। इससे न केवल अपना देश अपितु समग्र ब्रह्माण्ड में सुख-शान्ति, सौमनस्य और सौहार्द का वातावरण बनेगा। फलत: ”कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” उद्घोष सफल और सार्थक हो सकेगा।



