डॉ0 शैलनाथ चतुर्वेदी
मनुष्य ने जबसे सामूहिक जीवन और कृषि कार्य आरंभ किया उसी समय से जल का महत्व मानव जीवन में बढ़ गया है। और मनुष्य को जल प्रबंधन की आवश्यकता पडऩे लगी। मनुष्य ने इस समस्या के समाधान का उपाय खोज निकाला और उसने जल प्रवाह को बाँध बना कर रोका, जिससे झील के रूप में जल का भंडारण हो और हर मौसम में आवश्यकता अनुसार जल उपलब्ध हो सके। यह कहना कठिन है कि मनुष्य ने इस विधि का उपयोग कब से आरंभ किया किन्तु इस में संदेह नहीं कि बांध-निर्माण अत्यंत प्राचीन काल से चला आ रहा है। भारत में बाँध निर्माण का सबसे प्राचीन लिखित साक्ष्य ईसा पूर्व चौथी शताब्दी का मिलता है। इस बाँध-निर्माण के दो अभिलेख अभी भी सुरक्षित है जो हमें भारत की प्राचीन बाँध-निर्माण विधि से अवगत कराते है तथा हमें अपने प्राचीन बाँध-निर्माण कला को पुनर्जीवित करने के लिए प्रेरणा प्रदान करते है।
ऐतिहासिक अभिलेख
प्रथम अभिलेख शकों के कार्दमक वंश के प्रतापी राजा महाक्षत्रप रूद्रदामा का है। उसके काल (ईसा की दूसरी शताब्दी) में जूनागढ़ के निकट सुदर्शन झील का बाँध टूट गया, जिसका उसने पुननिर्माण कराया और कार्य सम्पन्न होने के अनन्तर उसके इतिहास के साथ निर्माण-वृत्त अभिलेख में प्रस्तुत किया। सौराष्ट्र (गुजरात) के जूनागढ़ नगर से प्राय: दो किलोमीटर दूर गिरनार पहाड़ी के एक दर्रे के समीप शिलाखण्ड पर उट्टंकित इस इस अभिलेख की गणना भारत के विशिष्ट लेखों में की जाती है। लगभग तीन शताब्दी बाद गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त के काल (ईसा की पाँचवी शताब्दी) में यह बाँध एक बार फिर टूट गया। उसका पुन: निर्माण हुआ और इसका विवरण भी उसी शिलाखण्ड पर अंकित किया गया। प्रसंगवश उल्लेख्य है कि इसी शिलाखण्ड पर सुप्रसिद्ध मौर्य सम्राट अशोक का लेख भी लिखवाया गया। प्राय: आठ सौ वर्ष के बीच तीन महत्वपूर्ण शासकों के लेखों का एक ही शिलाखण्ड पर अंकन इस स्थान की महत्ता का परिचायक है।
रूद्रदाता के जूनागढ़ लेख में उसके शासन काल अथवा अभिलेख अंकित किये जाने की तिथि का उल्लेख नहीं है, किन्तु यह बताया गया है कि सुदर्शन झील का बाँध रूद्रदामा के (शासनकाल के) 72वें वर्ष में टूटा था। यहाँ 7वें वर्ष से तात्पर्य उस संवत् के 72वें वर्ष में टूटा था। यहाँ 72वें वर्ष से तात्पर्य उस संवत् के 72वें वर्ष से है जिसका प्रयोग रूद्रदामा करता था। गुजरात-सौराष्ट्र के शक नरेश 78ईस्वी से आरम्भ में होने वाले शक संवत् का प्रयोग करते थे, अत: सुदर्शन झील का बाँध 150 ईस्वी (72 शक संवत्) में टूटा था। बाँध पूरी तरह ध्वस्त हो गया था जिसके पुनर्निर्माण में पर्याप्त समय लगा होगा। उसके बाद ही इस अभिलेख की रचना हुई। ब्यूलर के विचार से इसका रचनाकाल 160-170 ई के बीच होना चाहिए।
चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा निर्माण
अभिलेख में सुदर्शन झील के इतिहास का विशद और रोचक वर्णन किया गया है। इस झील का निर्माण मौर्यवंश के प्रथम शासक चन्द्रगुप्त के ‘राष्ट्रीय’ वैश्य पुष्यगुप्त ने कराया था। चन्द्रगुप्त मौर्य के पौत्र सम्राट अशोक के काल में गुजरात में नियुक्त प्रशासक यवनराज तुषास्प ने सुदर्शन झील को प्रणालियों से अलंकृत किया। इस उल्लेख से विदित होता है कि झील के जल का उपयोग सिंचाई के लिए भी किया जात था। सैकड़ों वर्ष से जूनागढ़-क्षेत्र के निवासियों की पानी की प्यास मिटाने वाली इस झील का बाँध शक संवत् 72 के मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा अर्थात् 18 अक्टूबर या 18 नवंबर के दिन भीषण वर्षा से अचानक टूट गया। उस दिन जूनागढ़ क्षेत्र में प्रलय का दृश्य उपस्थित हो गया।
भयानक जलवृष्टि और प्रचण्ड वायु की प्रलयलीला से जूनागढ़ नगर ध्वस्त हो गया और सुदर्शन झील के बाँध का एक विशाल अंश टूट गया। यह बाँध उस क्षेत्र की जनता का जीवनाधार था। अत: महाक्षत्रप रूद्रदामा ने उसके पुन:निर्माण का प्रस्ताव अपने सचिवों के सामने रखा। सचिवों ने इसे असंभव मानते हुए प्रस्ताव का विरोध किया। यह जानकर प्रजा हताश हो गयी और हाय हाय करने लगी। रूद्रदामा अपनी प्रजा की व्यथा और कष्ट भलीभांति समझता था। उसने सचिवों के मत को अस्वीकार कर दिया और बिना प्रजा पर अतिरिक्त कर लगाये बिना लोगों से बेगार लिये, अपने निजी कोष से विपुल धन लगाकर बाँध का पुन: निर्माण कराने का निश्चय किया।
उसने नये बाँध के निर्माण का उत्तरदायित्व उत्तरी काठियावाड़ और सौराष्ट्र के प्रशासक पहलव वंशीय सुविशाख को सौंपा। रूद्रदामा के अभिलेख में सुविशाख के अनेक गुणों का वर्णन किया गया है, जिससे यह ज्ञात होत कि महाक्षत्रप ने असंभव समझे जाने वाले सेतु-निर्माण का भार उसे ही क्यों दिया। सुविशाख ने अल्प समय में पहले से अधिक मजबूत तथा तीन गुणा बड़ा बाँध तैयार करवा दिया। रूद्रदाता की लोक- कल्याणकारी भावना के फलस्वरूप प्राय: साढ़े चार सौ वर्ष से जूनागढ़ क्षेत्रवासियों के जीवन को संपन्न बनाने वाला सुदर्शन तटाक पुन: लहलहा उठा।
रुद्रदामा ने सुदर्शन तटाक को दृढ़तर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मंत्रियों का मत पुननिर्माण के विपरीत होने के कारण राज्यकोष से धन नहीं लिया, जनहित का ध्यान रखकर निजी कोष से विपुल धनराशि व्यय करके एक ऐसे पुष्ट बाँध का निर्माण कराया जो तीन सौ वर्ष तक जूनागढ़-क्षेत्र के लोगों की आवश्यकता-पूर्ति करता रहा।
गुप्तवंश के प्रसिद्ध शासक चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर अपने राज्य का विस्तार पश्चिमी समुद्रतट तक कर लिया, तो जूनागढ़ क्षेत्र गुप्त साम्राज्य का अंग बन गया। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के बाद कई पीढिय़ों तक गुजरात गुप्त नरेशों के आधिपत्य में रहा। उसके पौत्र स्कन्दगुप्त के शासनकाल में रुद्रदामा द्वारा निर्मित सुदर्शन तटाक का बाँध ईसवी 855-56 में पुन: ध्वरत हो गया। इस बार भी घोर वर्षा ही उसका कारण बनी। स्कन्दगुप्त के समय तक संस्कृत काव्य का पर्याप्त विकास हो चुका था। अत: बाँध के पुन: निर्माण के बाद जिस शिलाखण्ड पर रुद्रदामा का अभिलेख लिखा गया था, उसी पर दूसरी ओर अत्यंत काव्यात्मक शैली में नया लेख अंकित किया गया।
बाँध के ध्वंस का वर्णन करते हुए बताया गया है कि गुप्त संवत 136( ईस्वी 855-56) के प्रौष्टपद मास (अगस्त-सितम्बर) की छठी रात्रि में मेघों से ग्रीष्म ऋतु का विदारण करते हुए बादलों का समय आया, तो दीर्घकाल तक अनवरत वर्षा हुई। इसके कारण सुदर्शन झील एकाएक फूट पड़ी। बाँध टूटने के कारण जो नदियां झील में गिर सकती थीं, वे सीधे समुद्र तक पहुंच गयी। इस प्रक्रिया का अत्यंत लालित्यमय दृश्य अभिलेख में प्रस्तुत किया गया है- ‘ऊर्जायत पर्वत से निकलने वाली बालुकापट्टियों से सुंदर दिखायी देने वाली पलाशिनी तथ अन्य नदियां, जो समुद्र की प्रियास्वरूपा हैं, चिरकाल तक बंधन में पड़ी रहने के अनन्तर, पुन: शस्त्रोचित रीति के अनुसार अपने पति के पास पहुंची:
बाँध के टूटते ही क्षेत्र के लोगों पर मानो वज्रपात हो गया। रात का समय चिन्ता में मग्न बीता और वे सोचने लगे सुदर्शन ने क्षणभर में मनुष्यों के प्रति दूदर्शन रूप धारण कर लिया है। जल से भरपूर समुद्र के समान दिखायी देने वाली यह झील क्या कभी पुन: सुदर्शन बन सकेगी। रुद्रदामा के काल में भी झील टूटने पर ऐसी ही निराशा व्याप्त हो गयी थी।
सुदर्शन झील की उपयोगिता को ध्यान में रखकर शासन ने उसके पुन: निर्माण का निर्णय लिया और टूटने के एक वर्ष में ही कार्य आरम्भ हो गया। सौराष्ट्र कुशल प्रशासक पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालि को यह उत्तरदायित्व सौंपा गया, जो नगर का प्रशासक था। उसने अगले ग्रीष्मकाल के आरंभ में पुननिर्माण आरंभ कर दिया। अपरिमित धन व्यय करके दो मास में यह कार्य संपन्न हो गया। सुदर्शन झील के पुनर्निर्माण का विवरण प्रस्तुत करने के बाद अभिलेख के अंत में कामना की गयी कि नगर समृद्ध हो, निवासियों से भरा हो, सैकड़ों ब्राह्मणों द्वारा उच्चरित प्रार्थनाओं से पापविहीन हो तथा सैकड़ों वर्ष तक वर्षा के अभाव एवं अकाल से मुक्त रहें। इस महत् कार्य को सम्पन्न कराने के बाद चक्रपालित ने अगले वर्ष वहाँ चक्रभृत् (भगवान विष्णु) के अत्यंत भव्य मंदिर का निर्माण कराया।
ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त के काल में निर्मित सुदर्शन झील का प्रयोजन निश्चय ही सौराष्ट्र के प्रमुख नगर जूनागढ़ की पहाड़ी नदियों से रक्षा करना रहा होगा। सम्राट अशोक के काल में झील के जल का सिंचाई के निमित्त उपयोग करने के लिए नहरों का निर्माण किया गया। शक नरेश रुद्रदामा के समय बाँध टूटने पर उसका पुन: निर्माण हुआ और तीन सौ वर्ष बाद गुप्त शासक स्कन्दगुप्त के काल में एक बार फिर ध्वंस होने पर उसे पुन: बनवाया गया। रुद्रदामा और स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ अभिलेखों में इस ऐतिहासिक झील के इतिहास का पूर्ण विवरण उपलब्ध है जिससे विदित होता है कि सात सौ वर्ष से अधिक समय तक यह तटाक जूनागढ़ और आसपास के क्षेत्र के लिए अत्यंत उपयोगी रहा। उसके बाद इस झील का क्या हुआ, ज्ञात नहीं है। तथापि अनुमान किया जा सकता है कि पाँचवी शताब्दी के बाद कम से कम दो-तीन सौ वर्ष तक सुदर्शन झील अस्तित्व में रही। इस प्रकार झील की उपयोगिता एक हजार वर्ष से अधिक समय तक बनी रही। संभवत: विश्व में किसी मानवनिर्मित झील को यह श्रेय प्राप्त नहीं है।



