सनातन धर्म की शिक्षा भारत में भी कुछ विश्वविद्यालयों में प्रारंभ हो गई है। इसके साथ ही अब भारत की संस्कृति उस अभिशाप से बाहर निकलने लगी है, जो अभिशाप उसे साम्राज्यवाद इस्लामी और यूरोपीय साम्राज्यवाद के कारण लगा था। यह हम सभी का दायित्व है कि सनातन धर्म की शिक्षाओं को न केवल आत्मसात करें, बल्कि उसे दूसरों को भी उपलब्ध कराएं। इसी दायित्व के अनुरूप भारतीय धरोहर महाभारत के शांति पर्व से अपना अभियान प्रारंभ कर चुका है। वास्तव में शांति पर्व विश्व का न केवल प्राचीनतम संविधान है, बल्कि वह किसी आधुनिक संविधान से भी कहीं व्यापक है। प्रस्तुत है तीसरा भाग – प्रवीण शर्मा
भीष्म जी कहते हैं-युधिष्ठिर! राजा को सदा ही उद्योगशील होना चाहिये। जो उद्योग छोड़कर स्त्री की भाँति बेकार बैठा रहता है, उस राजा की प्रशंसा नहीं होती है। प्रजानाथ! इस विषय में भगवान् शुक्राचार्य ने एक श्लोक कहा है, उसे मैं बता रहा हूँ। तुम यहाँ एकाग्रचित्त होकर मुझसे उस श्लोक को सुनो।
जैसे साँप बिल में रहने वाले चूहों को निगल जाता है, उसी प्रकार दूसरों से लड़ाई न करने वाले राजा तथा विद्याध्ययन आदि के लिये घर छोड़कर अन्यत्र न जाने वाले ब्राह्मण को पृथ्वी निगल जाती है (अर्थात् वे पुरुष अर्थसाधन किये बिना ही मर जाते हैं) अत: नरश्रेष्ठ! तुम इस बात को अपने हृदय में धारण कर लो,जो संधि करने के योग्य हों, उनसे संधि करो और जो विरोध के पात्र हों, उनका डटकर विरोध करो।
राज्य के सात अङ्ग हैं- राजा, मन्त्री, मित्र, खजाना, देश, दुर्ग और सेना। जो इन सात अङ्गों से युक्त राज्य के विपरीत आचरण करे, वह गुरु हो या मित्र, मार डालने के ही योग्य है। राजेन्द्र ! पूर्वकाल में राजा मरुत्त ने एक प्राचीन श्लोक का गान किया था, जो बृहस्पति के मतानुसार राजा के अधिकार के विषय में प्रकाश डालता है। ‘घमंड में भरकर कर्तव्य और अकर्तव्य का ज्ञान न रखने वाला तथा कुमार्ग पर चलने वाला मुनष्य यदि अपना गुरु हो तो उसे भी दण्ड देने का सनातन विधान है’ बाहु के पुत्र बुद्धिमान् राजा सगर ने तो पुरवासियों के हित की इच्छा से अपने ज्येष्ठ पुत्र असमंजा का भी त्याग कर दिया था। नरेश्वर! असमंजा पुरवासियों के बालकों को पकड़कर सरयू नदी में डुबा दिया करता था; अत: उसके पिता ने उसे दुत्कार कर घर से बाहर निकाल दिया। उद्दालक ऋषिने अपने प्रिय पुत्र महातपस्वी श्वेतकेतु को केवल इस अपराध से त्याग दिया कि वह ब्राह्मणों के साथ मिथ्या एवं कपटपूर्ण व्यवहार करता था।अत: इसमें लोक में प्रजा वर्ग को प्रसन्न रखना ही राजाओं का सनातन धर्म है सत्य की रक्षा और व्यवहार की सरलता ही राजोचित कर्तव्य है।
दूसरों के धन का नाश न करे। जिसको जो कुछ देना हो, उसे वह समय पर दिलाने की व्यवस्था करे। पराक्रमी, सत्यवादी और क्षमाशील बना रहे- ऐसा करने वाला राजा कभी पथभ्रष्ट नहीं होता। जिसने अपने मन को वश में कर लिया है, क्रोध को जीत लिया है तथा शास्त्रों के सिद्धान्त का निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त कर लिया है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के प्रयत्न में निरन्तर लगा रहता है, जिसे तीनों वेदों का ज्ञान है तथा जो अपने गुप्त विचारों को दूसरों पर प्रकट नहीं होने देता है, वही राजा होने योग्य है, प्रजा की रक्षा न करने से बढ़कर राजाओं के लिये दूसरा कोई पाप नहीं है।
राजा को चारों वर्णों के धर्मों की रक्षा करनी चाहिये, प्रजा को धर्म संकरता से बचाना राजाओं का सनातन धर्म है। राजा किसी पर भी विश्वास न करे। विश्वसनीय व्यक्ति का भी अत्यन्त विश्वास न करे। राजनीति के छ: गुण होते हैं- सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय’ । इन सबके गुण-दोषों का अपनी बुद्धि द्वारा सदा निरीक्षण करे। शत्रुओं के छिद्र देखने वाले राजा की सदा ही प्रशंसा की जाती है। जिसे धर्म, अर्थ और काम के तत्व का ज्ञान है तथा जिसने शत्रुओं की गुप्त बातों को जानने और उनके मन्त्री आदि को फोडऩे के लिये गुप्तचर लगा रखा है, वह भी प्रशंसा के ही योग्य है। राजा को उचित है कि वह सदा अपने कोषागार को भरा-पूरा रखने का प्रयत्न करता रहे, उसे न्याय करने में यमराज और धन संग्रह करने में कुबेर के समान होना चाहिये। वह स्थान, वृद्धि तथा क्षय के हेतुभूत दस वर्गों का सदा ज्ञान रखे।
जिनके भरण-पोषण का प्रबन्ध न हो उनका पोषण राजा स्वयं करे और उसके द्वारा जिनका भरण- पोषण चल रहा हो, उन सबकी देखभाल रखे। राजा को सदा प्रसन्नमुख रहना और मुसकराते हुए वार्तालाप करना चाहिये। राजा को वृद्ध पुरुषों की उपासना (सेवा या संग) करनी चाहिये, वह आलस्य को जीते और लोलुपता का परित्याग करे। सत्पुरुषों के व्यवहार में मन लगावे। संतुष्ट होने योग्य स्वभाव बनाये रखे । वेश-भूषा ऐसी रखे, जिससे वह देखने में अत्यन्त मनोहर जान पड़े। साधु पुरुषों के हाथ से कभी धन न छीने। असाधु पुरुषों से दण्ड के रूप में धन लेना चाहिये; साधु पुरुषों को तो धन देना चाहिये। स्वयं दुष्टों पर प्रहार करे, दानशील बने, मन को वश में रखे, सुरम्य साधन से युक्त रहे, समय-समय पर धन का दान और उपभोग भी करें तथा निरंतर शुद्ध एवं सदाचारी बना रहे। जो शूरवीर एवं भक्त हों, जिन्हें विपक्षी फोड़ न सकें, जो कुलीन, नीरोग एवं शिष्ट हों तथा शिष्ट पुरुषों से सम्बन्ध रखते हों, जो आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए दूसरों का कभी अपमान न करते हों, धर्मपरायण, विद्वान्, लोक व्यवहार के ज्ञाता और शत्रुओं की गतिविधि पर दृष्टि रखने वाले हों, जिनमें साधुता भरी हो तथा जो पर्वतों के समान अटल रहने वाले हों, ऐसे लोगों को ही राजा सदा अपना सहायक बनावे और उन्हें ऐश्वर्य का पुरस्कार दे। उन्हें अपने समान ही सुख भोग की सुविधा प्रदान करे, केवल राजोचित छत्र धारण करना और सबको आज्ञा प्रदान करना- इन दो बातों में ही वह उन सहायकों की अपेक्षा अधिक रहे।
प्रत्यक्ष और परोक्ष में भी उनके साथ राजा का एक-सा ही बर्ताव होना चाहिये। ऐसा करने वाला नरेश इस जगत में कभी कष्ट नहीं उठाता। जो राजा सब पर संदेह करता और सबका सर्वस्व हर लेता है, वह लोभी और कुटिल एक दिन अपने ही लोगों के हाथ से शीघ्र ही मारा जाता है। जो भूपाल बाहर से भीतर से शुद्ध रह कर प्रजा के हृदय को अपनाने का प्रयत्न करता है वह शत्रुओं का आक्रमण होने पर भी उनके वश में नहीं पड़ता, यदि उसका पतन हुआ भी तो वह सहायकों को पाकर शीघ्र ही उठ खड़ा होता है। जिसमें क्रोध का अभाव होता है, जो दुव्र्यसनों से दूर रहता है, जिसका दण्ड भी कठोर नहीं होता तथा । जो अपनी इन्द्रियों पर विजय पा लेता है, वह राजा हिमालय के समान सम्पूर्ण प्राणियों का विश्वासपात्र बन जाता है।
जो बुद्धिमान्, त्यागी, शत्रुओं की दुर्बलता जानने के प्रयत्न में तत्पर, देखने में सुन्दर, सभी वर्णों के न्याय और अन्याय को समझने वाला, शीघ्र कार्य करने में समर्थ, क्रोध पर विजय पाने वाला, आश्रितों पर कृपा करने वाला, महामनस्वी, कोमल स्वभाव से युक्त, उद्योगी, कर्मठ तथा आत्मप्रशंसा से दूर रहने वाला है, जिस राजा के आरम्भ किये हुए सभी कार्य सुन्दर रूप से समाप्त होते दिखायी देते हैं, वह समस्त राजाओं में श्रेष्ठ है ।
पुत्रा इव पितुर्गेहे विषये यस्य मानवा: ।
निर्भया विचरिष्यन्ति स राजा राजसत्तम:
जैसे पुत्र अपने पिता के घर में निर्भीक होकर रहते, है उसी प्रकार जिस राजा के राज्य में मनुष्य निर्भय होकर विचरते हैं, वह सब राजाओं में श्रेष्ठ है। जिसके राज्य अथवा नगर में निवास करने वाले लोग (चोरों से भय न होने के कारण) अपने धन को छिपाकर नहीं रखते हों तथा न्याय और अन्याय को समझते हों, वह राजा समस्त राजाओं में श्रेष्ठ है। जिसके राज्य में निवास करने वाले लोग विधिपूर्वक सुरक्षित एवं पालित होकर अपने-अपने कर्म में संलग्न, शरीर में आसक्ति न रखने वाले और जितेद्रिय हों, अपने वश में रहते हों, शिक्षा देने और ग्रहण करने योग्य हों, आज्ञा का पालन करते हों, कलह और विवाद से दूर रहते हों और दान देने की रूचि रखते हों,वह राजा श्रेष्ठ है। जिस भूपाल के राज्य में कूटनीति, कपट, माया तथा ईष्र्या का सर्वथा अभाव हो उसी के द्वारा सनातन धर्म का पालन होता है। जो ज्ञान एवं ज्ञानियों का सत्कार करता है, शास्त्र के ज्ञातव्य विषय को समझने तथा परहित-साधन करने में संलग्न रहता है, सत्पुरुषों के मार्ग पर चलने वाला और स्वार्थत्यागी है, वही राजा राज्य चलाने के योग्य समझा जाता है। जिसके गुप्तचर, गुप्त विचार, निश्चय किए हुए करने योग्य कर्म और किये हुए कर्म शत्रुओं द्वारा कभी जाने न जा सकें, वही राजा राज्य पाने का अधिकारी है।
भारत! महात्मा भार्गव ने पूर्व काल में किसी राजा के प्रति राजोचित कर्तव्य का वर्णन करते समय इस श्लोक का गान किया था।
राजानं प्रथमं विन्देत् ततो भार्यां ततो धनम् । राजन्यसति लोकस्य कुतो भार्या कुतो धनम्
‘मनुष्य पहले राजा को प्राप्त करे। उसके बाद पत्नी का परिग्रह और धन का संग्रह करे। लोक रक्षक राजा के न होने पर कैसे भार्या सुरक्षित रहेगी और किस तरह धन की रक्षा हो सकेगी ?
राज्य चाहने वाले राजाओं के लिये राज्य में प्रजाओं की भलीभाँति रक्षा को छोड़कर और कोई सनातन धर्म नहीं है, रक्षा ही जगत् को धारण करने वाली।राजेन्द्र! प्राचेतस मनु ने राजधर्म के विषय में ये दो श्लोक कहे हैं। तुम एकचित्त होकर उन दोनों श्लोकों को यहाँ सुनो।
‘जैसे समुद्र की यात्रा में टूटी हुई नौका का त्याग कर दिया जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह उपदेश ना देने वाले आचार्य वेद मंत्रों का उच्चारण न करने वाले ऋत्विज्, रक्षा न कर सकने वाले राजा, कटु वचन बोलने वाली स्त्री, गांव में रहने की इच्छा रखने वाले ग्वाले और जंगल में रहने की कामना करने वाले नाई इन छ: व्यक्तियों का त्याग कर दे।
इस प्रकार महाभारत शांति पर्व के अंतर्गत राजधर्मानुशान पर्व में सत्तावनवा अध्याय पूरा हुआ
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय:
भीष्म द्वारा राज्य रक्षा के साधनों का वर्णन तथा संध्या के समय युधिष्ठिर आदि का विदा होना और रास्ते में स्नान-संध्यादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर हस्तिनापुर में प्रवेश।
भीष्मजी कहते हैं- युधिष्ठिर! यह मैंने तुम से जो कुछ कहा है, राज धर्म रूपी दूध का माखन है। भगवान् बृहस्पति इस न्यायानुकूल धर्म की ही प्रशंसा करते हैं। इनके सिवा भगवान् विशालाक्ष, महातपस्वी शुक्राचार्य, सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र, प्राचेतस मनु, भगवान् भरद्वाज और मुनिवर गौरशिरा-ये सभी ब्राह्मण भक्त और ब्रह्मवादी लोग राजशास्त्र के प्रणेता हैं, ये सब राजा के लिये प्रजा पालन रूप धर्म की ही प्रशंसा करते हैं। धर्मात्माओं में श्रेष्ठ कमलनयन युधिष्ठिर ! इस रक्षात्मक धर्म के साधनों का वर्णन करता हूँ, सुनो।
युधिष्ठिर! गुप्तचर (जासूस) रखना, दूसरे राष्ट्रों में अपना प्रतिनिधि (राजदूत) नियुक्त करना, सेवकों को उनके प्रति ईष्र्या न रखते हुए समय पर वेतन और भत्ता देना, युक्ति से कर लेना, अन्याय से प्रजा के धन को न हड़पना, सत्पुरुषों का संग्रह करना, शूरता, कार्यदक्षता, सत्यभाषण, प्रजा का हित-चिन्तन, सरल या कुटिल उपायों से भी शत्रुपक्ष में फूट डालना, पुराने घरों की मरम्मत एवं मन्दिरों का जीर्णोद्धार कराना, दीन-दुखियों की देखभाल करना, समयानुसार शारीरिक और आर्थिक दोनों प्रकार के दण्ड का प्रयोग करना, साधु पुरुषों का त्याग न करना, कुलीन मनुष्यों को अपने पास रखना, संग्रहयोग्य वस्तुओं का संग्रह करना, बुद्धिमान् पुरुषों का सेवन करना, पुरस्कार आदि के द्वारा सेना का हर्ष और उत्साह बढ़ाना, नित्य-निरन्तर प्रजा की देख-भाल करना, कार्य करने में कष्ट का अनुभव न करना, कोष को बढ़ाना, नगर की रक्षा का पूरा प्रबन्ध करना, इस विषय में दूसरों के विश्वास पर न रहना,पुरवासियों ने अपने विरुद्ध कोई गुटबंदी की हो तो उसमें फूट डलवा देना, शत्रु, मित्र और मध्यस्थों पर यथोचित दृष्टि रखना, दूसरों के द्वारा अपने सेवकों में भी गुटबंदी न होने देना, स्वयं ही अपने नगर का निरीक्षण करना, स्वयं किसी पर भी पूरा विश्वास न करना, दूसरों को आश्वासन देना, नीतिधर्म का अनुसरण करना, सदा ही उद्योगशील बने रहना, शत्रुओं की ओर से सावधान रहना और नीच कर्मों तथा दुष्ट पुरुषों को सदा के लिये त्याग देना-ये सभी राज्य की रक्षा के साधन हैं।
बृहस्पति ने राजाओं के लिये उद्योग के महत्त्व का प्रतिपादन किया है। उद्योग ही राज धर्म का मूल है। इस विषय में जो श्लोक हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो। ‘देवराज इन्द्र ने उद्योग से ही अमृत प्राप्त किया, उद्योग से ही असुरों का संहार किया तथा उद्योग से ही देव लोक और इह लोक में श्रेष्ठता प्राप्त की। ‘जो उद्योग में वीर है, वह पुरुष केवल वाग्वीर पुरुषों पर अपना आधिपत्य जमा लेता है। वाग्वीर विद्वान् उद्योग वीर पुरुषों का मनोरञ्जन करते हुए उनकी उपासना करते हैं। ‘जो राजा उद्योगहीन होता है, वह बुद्धिमान् होने पर भी विषहीन सर्प के समान सदैव शत्रुओं के द्वारा परास्त होता रहता है। ‘बलवान् पुरुष कभी दुर्बल शत्रु की भी अवहेलना न करे अर्थात् उसे छोटा समझकर उसकी ओर से लापरवाही न दिखावे; क्योंकि आग थोड़ी-सी हो तो भी जला डालती है और विष कम मात्रा में हो तो भी मार देता है। चतुरङ्गिणी सेना के एक अङ्ग से भी सम्पन्न हुआ शत्रु दुर्ग का आश्रय लेकर समृद्धिशाली राजा के समूचे देश को भी संतप्त कर डालता है।
राजा के लिये गोपनीय रहस्य की बात हो, शत्रुओं पर विजय पाने के लिये वह जो लोगों का संग्रह करता हो, विजय के ही उद्देश्य से उसके ह्रदय में जो अथवा उसे जो न करने योग्य असत कार्य करना हो, वह सब कुछ उसे सरल भाव से ही छिपाये रखना चाहिये। वह लोगों में अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिये सदा धार्मिक कर्म का अनुष्ठान करे।
राज्य एक बहुत बड़ा तन्त्र है। जिन्होंने अपने मन को वश में नहीं किया है, ऐसे क्रूर- स्वभाववाले राजा उस विशाल तन्त्र को सँभाल नहीं सकते। इसी प्रकार जो बहुत कोमल प्रकृति के होते हैं, वे भी इसका भार वहन नहीं कर सकते। उनके लिये राज्य बड़ा भारी जंजाल हो जाता है। युधिष्ठिर ! राज्य सब के उपभोग की वस्तु है; अत: सदा सरल भाव से ही उसकी सँभाल की जा सकती है। इसलिये राजा में क्रूरता और कोमलता दोनों भावों का सम्मिश्रण होना चाहिये। प्रजा की रक्षा करते हुए राजा के प्राण चले जायँ तो भी वह उसके लिये महान् धर्म है। राजाओं के व्यवहार और बर्ताव ऐसे ही होने चाहिये। कुरुश्रेष्ठ ! यह मैंने तुम्हारे सामने राजधर्मों का लेश मात्र वर्णन किया है। अब तुम्हें जिस बात में संदेह हो, वह पूछो ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! भीष्मजी का यह वक्तव्य सुनकर भगवान् व्यास, देवस्थान, अश्म, वसुदेव नन्दन श्रीकृष्ण, कृपाचार्य, सात्यकि और संजय बड़े प्रसन्न हुए और हर्ष से खिले हुए मुखों द्वारा साधुवाद देते हुए धर्मात्माओं में श्रेष्ठ पुरुष सिंह भीष्मजी की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। तत्पश्चात् कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर ने मन-ही-मन दुखी हो दोनों नेत्रों में आँसू भरकर धीरे से भीष्मजी के चरण छूए और कहा-‘पितामह! इस समय भगवान् सूर्य अपनी किरणों द्वारा पृथ्वी के रस का शोषण करके अस्ताचल को जा रहे हैं; इसलिये अब मैं कल आपसे अपना संदेह पूछूंगा।
तदनन्तर ब्राह्मणों को प्रणाम करके भगवान् श्रीकृष्ण, कृपाचार्य तथा युधिष्ठिर आदि ने महानदी गङ्गा के भीष्मजी की परिक्रमा की। फिर वे प्रसन्नतापूर्वक अपने रथों पर आरूढ़ हो गये। फिर दृषद्वती नदी में स्नान करके उत्तम व्रत का पालन करने वाले वे शत्रुसंतापी वीर विधिपूर्वक संध्या, तर्पण और जप आदि मङ्गलकारी कर्मों का अनुष्ठान करके वहाँ से हस्तिनापुर में चले आये।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राज धर्मा नुशासनपर्वणि युधिष्ठिरादिस्वस्थानगमनेऽष्ट पञ्चाशत् मोऽध्याय:। इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व में युधिष्ठिर आदि का अपने निवासस्थानको प्रस्थानविषयक अट्ठावनवां अध्याय पूरा हुआ





