अरुणाचल और उत्तरपूर्वी राज्यों में महाभारत के साक्ष्य

राजीव रंजन
लेखक एनएचपीसी में इंजीनियर तथा प्रसिद्ध लेखक हैं


चीन की निगाह हमारे उगते सूरज के प्रदेश अरुणाचल पर हमेशा से रही है। चीन इस परिक्षेत्र पर अपना दावा, इतिहास और संस्कृति को आधार बनाकर करता है। वास्तविकता यह है कि यदि उत्तर-पूर्वी परिक्षेत्र विशेषरूप से अरुणाचल प्रदेश के इतिहास की पड़ताल करें तो यहाँ भारतवर्ष के गौरवशाली पुरातन अतीत की झलक मिल जाती है। इस अंचल का इतिहास समृद्ध तो है ही, आईये यह भी जानते हैं कि अरुणाचल प्रदेश का महाभारत काल से क्या संबंध है? क्या इससे संबंधित कोई पुरातात्विक साक्ष्य भी यहाँ से प्राप्त होते हैं?

अरुणाचल प्रदेश से प्राप्त महाभारत से संबंधित पुरातात्विक साक्ष्यों पर मैं प्रकाश डालूँ, उससे पूर्व हमें समग्र रूप से उत्तर-पूर्वी राज्यों की इसी दृष्टि से विवेचना करनी होगी क्योंकि आज के राज्यों की सीमाओं के अंतर्गत अतीत के राज्यों की सही व्याख्या नहीं हो सकती। वर्तमान के ये सभी राज्य अनेक मायनों में अपना अतीत और संस्कृति भी साझा करते हैं, इसमें महाभारत की भी महति भूमिका है। पहले बात त्रिपुरा की, महाभारत के अनुसार चन्द्रवंशी राजा नहुष के पुत्र थे ययाति। कतिपय कारणों से उन्होंने अपने छोटे बेटे पुरू को छोड़ कर शेष पुत्रों अर्थात यदु, तुर्वसु, द्रुह्य और अनु को राज्य से निष्कासित कर दिया था। इन राजकुमारों में से एक द्रुह्य ने उत्तर-पूर्व भारत की ओर बढ़ कर गंगासागर स्थित कपिलाश्रम क्षेत्र में आकर अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। उसके वंशज प्रतर्दन ने वहाँ से बढ़ते हुए ब्रह्मपुत्र और कपिली नदी क्षेत्र से आगे त्रिगर्त तक अपने राज्य का विस्तार किया था। वह इसी प्रतर्दन के कुल का राजा चित्रायुध था जोकि सम्राट युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में सम्मिलित होने इन्द्रप्रस्थ गया। वहाँ से लौटते हुए युधिष्ठिर ने चित्रायुध को भेंट स्वरूप एक श्वेत-छत्र प्रदान किया था। यह छत्र आज भी उपलब्ध है और इसकी पूजा अब भी त्रिपुरा के राजघराने द्वारा विशेष अवसरों पर की जाती है। इन्ही चित्रायुध के पौत्र त्रिपुर के नाम पर त्रिगर्त ही कालांतर में त्रिपुरा कहलाने लगा। प्राचीन त्रिपुरा राज्य की प्रजा भी एक समय किरातों के बाहुल्य वाली थी।

अब बात नागालैण्ड की करते हैं। हिडिंब तथा घटोत्कच को ले कर कुछ दावे एवं स्थान और भी हैं लेकिन नागालैण्ड से प्राप्त साक्ष्यों को सहजता से झुठलाया नहीं जा सकता। यहाँ मान्यता है कि पाण्डव लाक्षागृह अग्निकाण्ड से बचकर नगाभूमि तक आये, जहाँ के अत्याचारी राजा हिडिम्ब का भीम ने वध किया। भीम के पराक्रम पर हिडिम्ब की बहन हिडिम्बा को प्रेम हो आया था, अंतत: भीम और हिडिंबा का विवाह हुआ और उनसे घटोत्कच का जन्म हुआ था। ध्यान दीजिए कि माता हिडिंबा के नाम पर घटोत्कच का नाम हैडिम्ब और हैडिम्बि भी था। हैडिम्ब के वंश से चला राजवंश हैडम्बबर्मन कहलाया और उसकी राजधानी हिडिम्बापुर थी जो आज डिमापुर या दीमापुर कहलाती है। हैडम्बबर्मन राजवंश के राजा अपने नाम के अन्त में ‘नारायण’ उपाधि लगाते थे। उस वंश की लगभग एक सौ अस्सी पीढिय़ों की एक लम्बी वंशावली आज भी उपलब्ध है, जिसे ‘राजमाला’ कहा जाता है। हैडम्बबर्मन वंश के अन्तिम राजा का नाम गोविन्दचन्द्र नारायण था जिनसे वर्ष 1832 में अँग्रेजों ने राज्य छीन लिया। महाभारत से ही हमें जानकारी मिलती है कि अर्जुन ने नगाभूमि की उलूपी और इरावती, मणिपुर की राजकन्या चित्रांगदा और मेघालय की राजकुमारी प्रमीला से विवाह किया था। अर्जुन को इरावती से इरावत और चित्रांगदा से बभ्रुबाहन नामक पुत्र भी हुए। महाभारत में भीम का वर्णन किया गया है कि वह पूर्व की ओर बढ़े, उन्होंने इंद्र पर्वत के पास विदेह देश को पार करने के बाद पश्चात सात किरात राजाओं को हराया। अत: समग्ररूप से देश का उत्तरपूर्वी भाग महाभारत कालीन भारतवर्ष में सक्रिय भूमिका निभाता रहा था, यह किसी भी तौर पर चीन की नहीं बल्कि साहित्यिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से भी सर्वदा से भारत भूमि ही है।

समस्त उत्तरपूर्व किसी न किसी रूप मे असम परिक्षेत्र से जुड़ा हुआ था अत: ब्रम्हपुत्र नदी के प्रसार के साथ साथ विस्तारित इस क्षेत्र पर भी चर्चा इस विषय के अंतर्गत आवश्यक हो जाती है। असम का वृहद परिक्षेत्र जिसे हम प्राग्ज्योतिषपुर या कामरूप भी कहते हैं के संबंध में उल्लेख प्राचीन साहित्य विशेषरूप से रामायण, महाभारत सहित विविध पुराणों यहाँ तक कि महाकवि कालिदास कृत रघुवंश में रघु के दिग्विजय प्रसंग से भी प्राप्त होता है। एक पौराणिक संदर्भ जो असम के कामरूप नामकरण से सम्बद्ध है। मान्यता है कि महादेव की तपस्या को भंग करने के उद्देश्य से कामदेव ने उनपर कुसुम-धनुष से क्रमश: अरविन्द, अशोक, आम्र, नवमल्लिका और नीलोत्पल नामक पाँच वाण चलाये। इस धृष्टता से क्रुद्ध महादेव ने अपने तीसरे नेत्र से कामदेव को भस्म कर दिया। व्यथित होकर कामदेव की पत्नी रति ने भगवान शिव की कठोर साधना की। रति से प्रसन्न हो कर महादेव ने उसे कामदेव की भस्म को लेकर प्राग्ज्योतिषपुर आने का आदेश दिया, यही कामदेव को पुन: उनका प्राचीन स्वरूप शिवकृपा से प्राप्त हुआ था। कथनाशय यह है कि जहाँ शिवकृपा से काम को नयारूप मिला वह क्षेत्र कामरूप कहलाने लगा। कालिका पुराण में उल्लेख है – ”शम्भुनेत्राग्निनिर्दग्ध: काम शम्भोरनुग्राहत्”। इसी स्थान से जुड़ा अन्य उल्लेख है कि प्राग्ज्योतिष में शासन करनेवाले अत्याचारी नरकासुर का श्रीकृष्ण ने वध किया था। गुवाहाटी स्थित ‘नरकासुर पहाड़’ और ‘नीलांचल’ स्थित कामाख्या मन्दिर तक जानेवाला ‘नरकासुर मार्ग’ उस घटनाक्रम के स्मृतिशेष हैं। प्राग्ज्योतिष नरेश भगदत्त की पुत्री भानुमति से विवाह करने के लिए कौरव राजकुमार दुर्योधन अपनी बारात लेकर हस्तिनापुर से यहाँ आया था। उसकी बारात की अगवानी के लिए भगदत्त द्वारा खुदवाई गयी ‘दीघली पोखरी’ आज भी गुवाहाटी में है। दुर्योधन का एक और विवाह इसी नगर से थोड़ी दूर ब्रह्मपुत्र के उत्तरी तट पर बसे कुरुवा की लक्ष्मणा से भी हुआ था। युधिष्ठिर द्वारा इन्द्रप्रस्थ में आयोजित राजसूय यज्ञ में भी राजा भगदत्त सम्मिलित हुए थे और उन्होंने सम्राट को हाथी-दाँत, गैंडे के चर्म से बने ढाल-खड्ग तथा पर्वतीय उपज से निर्मित अन्यान्य उपहार भेंट किये थे। महाभारत के युद्ध में भगदत्त अपने जामाता दुर्योधन की किरात और चिन सैनिकों के साथ लड़े। वे न केवल किरातों की विशाल सेना अपितु दस हजार हाथियों के साथ कुरुक्षेत्र गये थे। भगदत्त वीर और कुशल योद्धा थे। महाभारत, विशेष रूप से अध्याय महापर्व में भगदत्त और उनके किरात और चिन सैनिकों के वीरतापूर्ण और साहसी कार्यों की प्रशंसा से भरा है। इस युद्ध में श्रीकृष्ण ने भगदत्त द्वारा छोड़ी गयी शक्ति को स्वयं झेलकर अर्जुन की प्राणरक्षा की थी। अंतत: अर्जुन के साथ युद्ध में भगदत्त ने वीरगति पायी। महाभारत महायुद्ध में कौरव राजकुमारों की सहायता की। महाभारत के अंतर्गत इस परिक्षेत्र में अवस्थित शिव के उपासक किरातों की अनेक बार चर्चा की गई है। असम में ही लिखे गए योगिनी तंत्र में भी किरातों की विस्तृत व्याख्या है। कौन थे किरात और महाभारत में उनकी क्या भूमिका थी इसे हम आगे देखेंगे।

हमारा विषय अरुणाचल प्रदेश में प्राप्त महाभारत के पुरातात्विक साक्ष्य हैं, अत: चलते हैं उगते सूरज के प्रदेश। विदर्भ क्षेत्र आमतौर पर महाराष्ट्र से सम्बद्ध माना जाता है। उत्तर पूर्व में जिस विदर्भ की बात होती है वह अरुणाचल प्रदेश और उसकी दिबांग घाटी के आसपास का परिक्षेत्र है। हमें भ्रमित नहीं होना चाहिए क्योंकि अरुणाचल के इस क्षेत्र के विदर्भ होने की संकल्पना के पीछे कतिपय साहित्यिक पुरातात्विक साक्ष्य हैं। यह भी कि एक नाम के भी अनेक परिक्षेत्र रहे हैं और क्षेत्रवार संकल्पनाएं भी भिन्न हो जाती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि श्रीकृष्ण का अनेक बार इस क्षेत्र में पदार्पण हुआ है। महाभारत में कुण्डिननरेश महाराज भीष्मक का उल्लेख मिलता है जिनकी राजधानी कुण्डिल नदी के तट पर अवस्थित थी। अरुणाचल प्रदेश के निचले दिबांग जिले में; रोईन्ग नगर से लगभग बीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है भीष्मक नगर। यहाँ कुण्डिल नदी के किनारे बिखरे पड़े ध्वंसावशेष राजा भीष्मक के प्रागैतिहासिक नगर कुण्डिल नगर की ऐतिहासिकता प्रमाणित करते हैं। अँग्रेज कर्नल एस.एफ. हैनॉय ने वर्ष 1844 में दिबांग घाटी के घने जंगलों में भीष्मक के किले का पता लगाया था। लगभग बीस हजार वर्ग फुट में फैला यह किला वास्तु नियमों के अनुसार निर्मित था। वर्ष 1967 में इस क्षेत्र में विस्तृत उत्खनन हुआ जिसमें प्राप्त अनेक अवशेषों ने महाभारत काल को इंगित किया था। राजा भीष्मक के राजप्रासाद के अनेक अवशेष वर्ष 1971 में उत्खनन के उपरांत निकाले गए। यहां ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित सप्त अश्वरथ आरूढ़ सूर्य का मंदिर, शिवलिंग, ऐरावत पर बैठे इंद्र, मयूरासन पर आसीन कार्तिकेय के अतिरिक्त भी शतादिक देवी- देवताओं की मूर्तियां, नृत्यरत यक्षिणी, मिथुन मूर्तियां समेत अन्य कई प्रकार की अन्य मूर्तियां भी मिली हैं। इस क्षेत्र में कालांतर में शासन करने वाले समृद्धशाली सुतिया राज्य के वंशज आज भी स्वयं को राजा भीष्मक की सन्तान ही मानते हैं। अति प्राचीन सुतिया जाति सदिया के आस-पास और उत्तर लखमीपुर जिले के अलावा ब्रह्पुत्र के दक्षिण पार शिवसागर तक फैली हुई थी। सुतिया जाति के लोग शाक्तधर्मी हैं और अपनी कुलदेवी ताम्रेश्वरी देवी को ‘केंचाई खाती गोसानी’ कहते हैं। कडिय़ां जोड़े तो भीष्मक के पश्चात इनकी राजसत्ता वनांचल में सिकुड़ी सिमटी रही तथापि यह जनजाति अपनी प्राचीन पहचान को थामें रही। कालांतर में तेरहवीं शताब्दी के निकट पुन: शक्तिशाली सुतिया जाति के राजा वीरपाल का नाम प्रकाश में आता है, जिसका राज्य सुवणशिरी नदी से लेकर सोनागिरी पर्वत तक विस्तारित था।

महाभारत के अनुसार महाराज भीष्मक विदर्भदेश के अधिपति थे। उनके पाँच पुत्र थे – रुक्मी, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेश और रुक्ममाली तथा एक कन्या थी जिनका नाम था रुक्मिणी। श्रीकृष्ण के कार्यों की सूचनाएं विदर्भ भी पहुँचती रही थी, जिससे प्रभावित राजकुमारी रुक्मिणी को द्वारिकाधीश से मन ही मन प्रेम हो गया था। राजकुमारी ने अपने हृदय की बात परिजनों के समक्ष भी रखी परंतु ज्येष्ठ राजकुमार रुक्मी को श्रीकृष्ण से द्वेष था, उसने चेदि राज शिशुपाल से राजकुमारी रुक्मिणी का विवाह सुनिश्चित कर दिया। राजकुमारी रुक्मिणी ने मन की बात एक पत्र में लिखी और द्वारिकाधीश के पास उसे एक ब्राह्मण के हाथों भिजवा दिया। स्वाभाविक था कि पत्र के भाव सीधे ही श्रीकृष्ण के हृदय में उतर गए। उन्होंने गोपनीय रूप से विदर्भ पहुँच कर राजकुमारी रुक्मिणी का पत्र में निर्दिष्ट युक्ति के अनुसार ही हरण कर लिया। स्वाभाविक था कि श्रीकृष्ण का राजकुमार रुक्मि, शिशुपाल, जरासंध आदि राजाओं व उनकी सेनाओं से संघर्ष हुआ। बलराम के नेतृत्व मे द्वारिका की सबल सेनाओं ने भी समानांतर लोहा लिया, अंतत: सभी बाधाओं को पार कर यह प्रेमी युगल एक हुआ तत्पश्चात सम्पूर्ण विधि-विधान से राजकुमारी रुक्मिणी का विवाह द्वारिकाधीश के साथ सम्पन्न हुआ।

यहाँ फिर कडिय़ा जुड़ती हैं। स्थानीय लोगों से बात करने के उपरांत ज्ञात हुआ कि भीष्मकनगर से दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित ताम्रेश्वरी देवी के प्राचीन मन्दिर में ही रुक्मिणी देवी-पूजा करने जाती रही होगी। केवल इतनी जानकारी से पूरा साक्ष्य नहीं बनाता अत: थोड़ी पड़ताल से ज्ञात हुआ कि ताम्रेश्वरी देवी को लोहित जिले के निशी और इदुमिशमी जनजातीय लोग केंचाइखाती गोंसानी कहते हैं। इसमें भी रोचक तथ्य यह है कि निशी जनजाति स्वयं को श्रीकृष्ण के सैनिकों के वंशज और इदुमिशमी अपना सम्बन्ध रुक्मिणी से मानते हैं। केवल संबंध जोडऩे से ही बात पूरी नहीं हुई, क्या परंपरा से भी कोई साक्ष्य मिल पाता है? महाभारत के अनुसार रुक्मिणी-हरण के समय उसका भाई रुक्मी श्रीकृष्ण से संघर्ष कर पराजित हुआ था। श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी के अनुरोध पर उनके भाई रुक्मि को जीवनदान दिया लेकिन सजा के रूप में उसके बाल काट दिये थे। मुझे यह बताया गया कि इदुमिशमी आज भी अपने बालों को पीछे से काटकर माथे के आगे बालों का जूड़ा बनाकर उसमें आड़ी लकड़ी खोंचते हैं। जनजातियों ने अपने प्राचीन इतिहास को बहुत अच्छी तरह से सहेज कर रखा है इसलिए मुझे इन संदर्भों की जांच करने के उपरांत ऐतिहासिकता में कोई संदेह नहीं लगता।

पश्चिम सियांग जिले की तलहटी में स्थित मालिनीथान में अनेक मंदिरों के खंडहर हैं जहाँ से बड़ी संख्या में हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां प्राप्त हुई है। यह स्थान भी भगवान कृष्ण के साथ सम्बद्ध है। कालिका पुराण के अनुसार भीष्मकनगर से वापस आते समय भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी रूक्मिणी के साथ इस स्थान पर विश्राम किया था तथा स्वयं भगवान शिव और उनकी पत्नी माता पार्वती ने पुष्प माला से उनका स्वागत किया था। भगवान कृष्ण ने देवी पार्वती को ‘मालिनी’ के नाम से संबोधित किया तबसे यह स्थान मालिनीथान या ‘मालिनी के निवास’ के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

महाभारत कालीन अरुणाचल प्रदेश के इतिहास का एक पन्ना और भी है। श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र का नाम था प्रद्युम्न। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में वर्णन है कि प्रद्युम्न का विवाह उसके मामा रुक्मी की पुत्री रुक्मवती से हुआ। प्रद्युम्न-रुक्मवती के पुत्र अनिरुद्ध का पाणिग्रहण भी अपने नाना रुक्मी की पौत्री रोचना से हुआ, फिर उसका शोणितपुर के राजा बाणासुर की पुत्री उषा से भी गन्धर्व विवाह हुआ। इसका पता बाण को लगा तो उसने अनिरुद्ध को कारागार में डालकर उषा को अग्निगढ़ में बन्दी बना दिया। अपने पौत्र को मुक्त कराने के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी सेना के साथ शोणितपुर आकर बाण से युद्ध किया। उल्लेख है कि बाण की प्रार्थना पर उसके आराध्यदेव शंकर को भी अपने भक्त के पक्ष में श्रीकृष्ण से युद्ध करना पड़ा। श्रीमद्भागवत में यह हरि-हर युद्ध के नाम से वर्णित है। आज भी तेजपुर में अग्निगढ़ के ध्वंसावशेष, उषा से सम्बन्धित अवशेष और बाण के इष्टदेव शंकर का मन्दिर विद्यमान है। यही नहीं अरुणाचल में ही वाण के पौत्र भालुक द्वारा तेजपुर के पास बालीपारा के उत्तर में, बसाई गयी राजधानी भालुकपुंग में उसके किले के भग्नावशेष अब भी देखे जा सकते हैं।

थोड़ा मानव को ले कर समझ और फिर उस माध्यम से भी महाभारत के इतिहास के साक्ष्यों का मिलान करने का यत्न करते हैं। मैंने अभी तक के अपने व्याख्यान में आपसे अनेक बार किरातों की चर्चा की है। इन किरातों को महाभारत के युग के आईने से जानते हैं। महाभारत्र में अनेक स्थानों पर वर्णन है कि ”किरात, नुकीले बालों वाले, देखने में सुखद, सोने की तरह चमकने वाले, पानी के भीतर चलने में सक्षम, भयानक, वास्तविक बाघ जैसे व्यक्ति होते हैं।” किरात ट्रांस-हिमालय अर्थात उत्तर पूर्व भारतके निवासियों के लिए प्रयुक्त सामान्य शब्द है, चिन किरातों के सहयोगी या रिश्तेदार हैं जो मंगोल वंश के थे। अब इन संदर्भों और जानकारियों को केवल आँख मूद लेने के बाद ही झुठलाया जा सकता है, हाँ!! महाभारत हमारे भारत देश का गौरवशाली इतिहास है।

अब फिर से प्रश्न यह उठता है कि महाभारत को झुठलाने वाले कौन लोग हैं? उनका उद्देश्य क्या है, एजेंडा क्या है और वे ऐसा क्यों करना चाहते हैं? मैने महाभारत श्रंखला के अपने विविध कार्यक्रमों में पहले भी कहा है कि इतिहास का तिरस्कार करने की हमारी प्रवृत्ति ही एजेंडावादियों को विखण्डन का गुणा-भाग करने में सहायता प्रदान करती है। इसलिए आप स्वयं महाभारत को मिथक कहने वाले इतिहासकारों की आंखों में आखें डाल कर कहें कि तुम ही हो जिन्होंने हमारा अतीत ही नहीं बिगाड़ा भविष्य का भी नाश कर रहे हो। अभी यह शृंखला जारी रहेगी, महाभारत के स्थान स्थान से एकत्रित कर मैंने साक्ष्य आपके समक्ष उपस्थित करता रहूँगा।