धनवंतरी देव का विरोध क्यों?

हाल ही में एक एनजीओ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के लोगों का विरोध किया है। इस लोगो में भारतीय प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के प्राकट्यकर्ता देवता धनवंतरी भगवान का रंगीन चित्र है। ज्ञात हो कि विगत दिनों में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के लोगो में दो परिवर्तन किए गए हैं।

पहला तो यह कि एनएमसी के आधिकारिक लोगो में पहले भगवान धनवंतरी का चित्र ब्लैक एंड व्हाइट था जो कि अब रंगीन कर दिया गया है। और दुसरा परिवर्तन यह है कि ‘इंडिया’ की जगह ‘भारत’ लिखा गया है। हालांकि लोगों पर हो रहे विवाद पर आयोग का कहना है कि भगवान धनवंतरी पिछले वर्ष से इसका हिस्सा रहे हैं। लेकिन अब उनकी फोटो को ब्लैक एंड व्हाइट की जगह रंगीन कर दिया गया है।

हमारा मानना है कि हमारे किसी भी चिकित्सा संस्थान के साथ भगवान धनवंतरी देव का जुड़ाव हम सबके लिए न केवल गौरव का विषय होना चाहिए बल्कि जो भी व्यक्ति समुदाय या आईएमए सरीखी संस्था इस का विरोध करें। उनके प्रति अत्यधिक सर्तक भी होना चाहिए।

ज्ञात हो कि इस संस्था के द्वारा आयुर्वेद को लेकर पहली बार इस तरह का विवाद खड़ा किया गया हो ऐसा नहीं है। इसके पहले भी जब 20 नवंबर 2020 को आयुर्वेदिक चिकित्सकों को 58 तरह की सर्जरी के अधिकार दिए गए दे तब भी इंडियन मेडीकल एसोसिएशन ने विरोध किया था, आयुर्वेद के खिलाफ, आयुर्वेदिक चिकित्सकों के खिलाफ अपमान जनक शब्दों का प्रयोग किया था। यहां तक कि आयुर्वेदिक औषधियों के लिए तो आपत्तिजनक रुप से ”चूरन चटनीÓÓ शब्द का भी प्रयोग किया था।

इस बार का विरोध धर्मनिरपेक्षता और विज्ञान की दुहाई देकर किया जा रहा है। निशाने पर हिंदू देवता हैं। कमाल की बात है कि जब ग्रीक और यूनानी देवाताओं की तस्वीर लोगो में होती है तब इन पाखंडियों की धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिकता खतरे में नही पड़ती है लेकिन जैसे ही आयुर्वेद और भगवान धनवंतरी की बात होती है तब इनको विज्ञान,धर्म सबकुछ याद आ जाता है।

असल में आईएमए के इस तरह के वक्तव्यों को भारतीय संस्कृति, भारतीय मान्यताओं और आयुर्वेदिक चिकित्सकों के विरोध के रुप में चिन्हित किया जाना चाहिए। समय आ गया है कि इस तरह के विरोधों को दरकिनार करते हुए उन वैद्यों का सम्मान किया जाए जो उन रोगों का भी उपचार सफलता पूर्वक कर रहे हैं जिन्हें एलोपैथिक चिकित्सक असाध्य मानते हैं। ऐसा तो तब है जबकि स्वतंत्रता के पहले और बाद में भी बहुत समय तक आयुर्वेद को समुचित या कहें तो बराबरी का राज्याश्रय नहीं मिला।

संतोष की बात है कि इस विवाद पर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री मनसुख मांडविया ने संसद में जोर देकर कहा कि भगवान धनवंतरी भारत के लिए चिकित्सा क्षेत्र में प्रतीक हैं और एनएमसी के लोगो में सिर्फ तस्वीर को रंगीन किया गया है। ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगले पच्चीस वर्षों में भारत को विकसित देश बनाने का न सिर्फ प्रण लिया है बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत में ”गौरव” और ”गुलामी” के अर्थ को परिभाषित किया है। इन्हीं बिन्दुओ को ध्यान में रखकर नये संसद भवन का निर्माण किया गया है। भारतीय नौसेना के ध्वज में छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रतीक चिह्न को लिया गया है। कर्तव्य पथ का निर्माण व सुभाषचन्द्र बोस की प्रतिमा का अनावरण जैसे कई औपनिवेशिकता के प्रतीकों से मुक्ति को दर्शाता है।

अब समय आ गया है कि वर्तमान सरकार आईएमए जैसी सनातन द्रोही संस्थाओं को अनदेखा कर आयुर्वेद के लिए अपने स्वास्थ्य बजट का समुचित भाग आवंटित करे। अभी तक की स्थिति तो यह है कि मात्र एम्स का बजट पूरे आयुष मंत्रालय के बजट से अधिक है। ऐसे समय में सरकार से यह अपेक्षा करना अनुचित नहीं होगा कि वह समस्त चिकित्सा पद्धतियों को समान राज्याश्रय प्रदान करे। यह भी ज्ञात हो यह है कि केन्द्र सरकार अपने स्वास्थ्य बजट का 97 प्रतिशत अकेले एलोपैथी को और शेष 3 प्रतिशत अन्य चिकित्सा पद्धतियों को देती है।