चंद्रपाल सिंह
लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं।
शचीन्द्रनाथ सान्याल की अमर कृति ‘बंदीजीवन’ के 1963 के संस्करण के प्रकाशकीय में लिखा गया है कि’भारत के उन महाप्राण वीर देश भक्तों के जीवन और कार्यों का इतिहास अभी तक लगभग अप्रकट ही है, जिन्होंने शस्त्र-बल के सहारे देश को विदेशी दासता से मुक्त कराने का प्रयास किया था’। स्वयं शचीन्द्र नाथ सान्याल को इस बात का अंदेशा था कि स्वतंत्रता पश्चात क्रांतिकारियों के इतिहास को ठीक से लिखा नहीं जाएगा। 1922 में अपनी पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा कि ”यह पुस्तक आज मैं इसलिए लिख रहा हूँ जिससे कि भारत के भविष्यत् इतिहास के कुछ अध्याय ठीक-ठीक लिखे जा सकें।” इस बात को सौ वर्ष से अधिक हो गये है। स्वतंत्रता के 77 वर्ष बाद आज भी क्रांतिकारियों का जौहर स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास लेखन के हाशिये पर ही सिमटा हुआ है। भगत सिंह सरीखे कुछ गिनेचुने बलिदानी तो फिर भी लोक मानस में अपना स्थान पा गये हैं लेकिन शचीन्द्र सान्याल जैसे कितने ही महावीर हैं जिन्होंने आज़ादी कि लड़ाई में संसार की सबसे बड़ी महाशक्ति को सशस्त्र टक्कर दी,आज भी विस्मृति की धूल फाँक रहे हैं।
शचीन्द्र सान्याल, एक सामान्य क्रांतिकारी नहीं थे बल्कि उत्तर भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के सबसे बड़े संगठनकर्ता थे। उन्हें 1915 के बाद बंगाल से क्रांतिकारी गतिविधियों के केंद्र को उत्तर भारत में लाने का श्रेय दिया जा सकता है। उन्होंने रास बिहारी बोस के साथ और विदेशों में स्थित भारतीयों से मिलकर 1915 में दूसरे 1857 यानि ग़दर की संकल्पना की और अंग्रेज़ी फ़ौज में भारतीय सैनिकों की सहायता से उसे रुप देने का महान प्रयास किया। उन्होंने भगत सिंह आदि अनेकानेक युवकों की योग्यता को पहचाना, प्रेरित किया और क्रांतिकारी दल का सदस्य बनाया। शचीन्द्र सान्याल ने हिंदुस्तान रिपब्लिक सोसिएशन की स्थापना की, बंगाल से लेकर पंजाब तक शहर-शहर जा कर दल की शाखाएँ बनायीं, दल की विचारधारा और कार्य प्रणाली का विकास किया, दल का संविधान बनाया, देश को झकझोर देने वाले पर्चे लिखे। गांधी जी समेत कांग्रेस के बड़े नेताओं से संवाद और विमर्श किया। नेता जी सुभाषचंद्र बोस ने भी भारत छोडऩे से पहले शचीनदा से लंबा सलाह मशविरा किया। शचीन्द्र सान्याल ने क्रांतिकारी संगठन के साथ भारत और विश्व की ज्ञान परंपराओं का विशद अध्ययन किया और माक्र्सवाद और समाजवाद की उत्कृष्ठ समालोचना प्रस्तुत की। सशस्त्र संघर्ष की सार्थकता, स्वतन्त्रता का स्वरूप कैसा हो, अन्य सामयिक सामाजिक, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर ‘बंदीजीवन’,’विचार विनिमय’, ‘साहित्य, समाज, और संस्कृति’, ‘धर्म, समाज और विज्ञान’ जैसी पुस्तकें लिखीं। ‘संघर्ष’, ‘प्रताप’, ‘अग्रगामी’, ‘नारायण’ जैसे अनेक पत्र-पत्रिकाओं में अनेकों लेख लिखे। इतना सब कुछ करते हुए उन्होंने अपने 50 वर्ष के कुल जीवन में से लगभग आधा जीवन वर्ष कारागार की यातनाओं को सहते हुए बिताया जिसमें दो बार का आजन्म कालापानी कारावास भी शामिल है। इस बेहद संक्षिप्त विवरण से यह अंदाज़ा हो जाता है कि शचीन्द्र सान्याल का स्वातंत्र्य समर में कोई छोटा स्थान नहीं है।
शचीन्द्र नाथ सान्याल का जन्म 3 जून, 1893 को कोलकाता में हुआ था। बाल अवस्था में ही उन्होंने संकल्प कर लिया था कि ‘भारत को स्वाधीन किया जाना है और उसके लिये मुझे सामरिक जीवन व्यतीत करना है’। लगभग 13-14 वर्ष की आयु में ही वे अविभाजित बंगाल के क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के माध्यम से क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ गये। 1908 में पिताजी के निधन के उपरांत शचींद्र परिवार सहित बनारस आ गए और बंगाली टोला हाईस्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की। बंगाली टोला विद्यालय में आज भी एक स्मारक पट लगा हुआ है जिसके अनुसार स्वातंत्र समर के दौरान इस विद्यालय के शिक्षक सुशील कुमार लाहिड़ी और छात्र राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को मृत्युदंड मिला, छात्र शचीन्द्र नाथ सान्याल को आजीवन निर्वासन और कई अन्य शिक्षकों और छात्रों को कारावास की सजा हुई। यहीं पढ़ते हुए युवा शचीन्द्र ने बनारस में अनुशीलन समिति की शाखा स्थापित करने में पहल की। शचीन्द्र ने यह भी लिखा है कि उन दिनों वे शिवाजी को अपना आदर्श मानने लगे थे। जब अनुशीलन को ग़ैर क़ानूनी घोषित कर दिया गया तो उन्होंने शाखा का नाम बदल कर ‘यंग मेंन्स सोसिएशन’ रख दिया। इस संगठन के एक सदस्य ने बाद में रहस्योद्घाटन किया इस संगठन की एक अंतरंग समिति थी। युवक महाकाली की मूर्ति के समक्ष अपने रक्त से हस्ताक्षर करके इसके सदस्य बनते थे। काली पूजा के समय एसोसिएशन के सदस्य एक सफ़ेद कद्दू काटते थे। यह सफ़ेद कद्दू क्रूर एवं गोरे शासकों का प्रतीक माना जाता था। ये युवक मदानपुरा में एक आदर्श विद्यालय भी चलाते थे। सप्लीमेट्री बनारस मामले में विशेष न्यायाधिकरण के निर्णय में लिखा है कि:
”यंग मेन्स एसोसिएशन, 1908 में शुरू हुआ और जिसमें विभिन्न स्थानीय स्कूलों के छात्र शामिल थे, लड़कों के बीच क्रांतिकारी विचारों के प्रसार की नींव प्रतीत होती है। इसमें एक आंतरिक गुट भी था जिसमें चुनिंदा सदस्य शामिल थे जिनके बीच नैतिक कक्षाएं आयोजित की जाती थीं, इन कक्षाओं में देशद्रोह के मामलों पर चर्चा की जाती थी और युवाओं के दिमाग में देशद्रोह की भावना पैदा करने के लिए व्याख्याताओं द्वारा गीता की नैतिक बातों को विकृत किया जाता था। यह… अकेले ही एसोसिएशन के संस्थापक-शचींद्र नाथ सान्याल के उद्देश्यों के अनुरूप नहीं था। …. शचींद्र का उद्देश्य इन प्रांतों में बंगाल के अराजकता वादियों के समान कार्य करना था। … इस नए संगठन का उद्देश्य भारत में विद्रोह भड़काना था। … नई पार्टी बंगाल के अराजकतावादियों में शामिल होना चाहती थी और उन की मदद से विस्फोटक और हथियार प्राप्त करना चाहती थी। विद्रोह को भड़काने के लिए अपनाए गए साधन हैं देशद्रोही साहित्य का वितरण, सैनिकों को लुभाना और हथियारों और गोला-बारूद का संग्रह। सरकारी गवाहों ने विस्तार से वर्णन किया है कि कैसे विभिन्न स्थानीय स्कूलों और संस्थानों में देशद्रोही पर्चे छोड़े गए और दीवारों पर चिपकाए गए, बनारस, रामनगर और दीनापुर में सैनिकों को लुभाने के लिए क्या प्रयास किए गए और धनुष बम, पिस्तौल और गोला-बारूद बंगाल और मध्य भारत से षड्यंत्रकारियों द्वारा लाए गए थे।”
जब रास बिहारी बोस ने उत्तर भारत में क्रांतिकारी आंदोलन का संगठन प्रारंभ किया तो शचीन्द्र उन के प्रमुख सहयोगी बन गये और रास बिहारी बोस के साथ पंजाब की छावनियों में घूम -घूमकर हिंदुस्तानी सैनिकों में क्रांति का प्रचार करने लगे। दरअसल इनकी चेष्टा ग़दर पार्टी के साथ मिलकर प्रथम विश्वयुद्ध का लाभ उठाते हुए भारत में अ_ारह सौ सत्तावन की तर्ज़ पर ऐसा महाविद्रोह करना था जिसमें सैनिक और क्रांतिकारी मिलकर विद्रोह करें। पंजाब के विद्रोही इस कार्य में रास बिहारी बोस का मार्गदर्शन चाहते थे लेकिन उनकी जगह स्थिति का जायज़ा लेने के लिए शचींद्र को पंजाब भेजा गया। 21 फऱवरी 1915 को विद्रोह प्रारंभ करने का दिन भी तय कर लिया गया लेकिन दुर्भाग्य से सरकार को पहले ही भनक लग गई और विद्रोह प्रारम्भ नहीं हो सका। परिणाम स्वरूप विद्रोह के नेताओं की धरपकड़ हुई, करतार सिंह सराभा समेत अनेक विद्रोही नेताओं को फाँसियाँ और आजीवन कारावास हुए। शचींद्र ने इस विद्रोह की तैयारी और इस दिशा में अपने प्रयासों का विस्तारपूर्ण वर्णन ‘बंदीजीवन’ में किया है।
ऐसे समय में जब पूरे देश की पुलिस रासबिहारी बोस को दिल्ली में वाय सराय पर बम फेंकने के मामले में पहले से ही ढूँढ रही थी और ग़दर के सिलसिले में उनके नेतृत्व को सभी विद्रोही मान रहे थे, तब शचींद्र का ही कौशल था कि उन्होंने रासबिहारी बोस को देश छोड कर जापान जाने के लिए मना लिया और 4 मई 1915 को जापान जाने वाले जहाज़ पर सकुशल रवाना कर दिया। कुछ दिनों के बाद, 26 जून 1915 को शचींद्र गिरफ़्तार हो गये। उन पर बनारस षड्यंत्र के अन्तर्गत मुक़दमा चलाया गया। न्यायाधीशों ने अपने निर्णय में रेखांकित किया की बनारस में शचीन्द्र के नेतृत्व में चल रही क्रांतिकारी गतिविधियां बंगाल और पंजाब में चल रहे बड़े षड्यंत्र या निका एक अंग था। शचीन्द्र को आजीवन कारावास की सजा मिली और उन्हें कालापानी अंडमान में भेजा गया।
प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात मोंटैगू-चेलमस्फोर्ड सुधारों के तहत रॉय लए मनेस्टी के अंतर्गत शचीन्द्र को कालापानी से रिहा कर दिया गया। 1921 में उन्होंने विवाह कर लिया और इलाहाबाद आकार बस गये। अगस्त 1922 में उन की प्रथम पुस्तक ‘बंदीजीवन’ हिन्दी में छपी। इससे पहले इस पुस्तक के अंश बांग्ला समाचार पत्रों में छपे थे। सशस्त्र संघर्ष के चाणक्य शचीन्द्र सान्याल जी के साहित्य सृजन के औचित्य को पुस्तक के प्रथम संस्करण की भूमिका में लिखे निम्नलिखित कथन से समझा जा सकता है कि ”किसी समाज को पहचानने के लिए उस समाज के साहित्य से परिचित होने की परम आवयशकता होती होती है। क्योंकि समाज के प्राणों की चेतना उस समाज के साहित्य में प्रतिफलित हुआ करती है। आज भारत घ्वंस और निर्माण के बीच क्रमश: अपनी सार्थकता को खोजता फिरता है, अत: भारत का समाज यदि सजीव हो गातो भारत के प्राणों की इस अशांति का चित्र उसके साहित्य में अवश्य ही अपने प्रतिबिंब को अंकित कर देगा”
काकोरी केस के मुक़दमे के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों ने उपरोक्त पुस्तक को राजद्रोह अपराध के संदर्भ में देखा।
”यह एक इतिहास से कहीं अधिक है क्योंकि यह एक उद्देश्य के साथ बहुत स्पष्ट रूप से लिखी गई है, अर्थात् अतीत में की गई गलतियों और भविष्य में उन से बचने का तरीका दिखाने के लिए यह दर्शाता है कि क्रांतिकारी दलों को कैसे संगठित किया जाना चाहिए, हथियार कैसे प्राप्त किये जा सकते हैं और बम कैसे बनाये जा सकते हैं, कैसे झूठे नामधारी और छद्मवेश अपनाये जाएँ और षडयंत्र कारियों को समूहों में बाँट दिया जाए ताकि देशद्रोही पूरी जानकारी न दे सकें, पुलिस निगरानी से कैसे बचा जा सकता है, डकैती क्यों आवश्यक है और अंतिम उद्देश्य जन विद्रोह की प्राप्ति के लिए सरकारी खजाने की लूट और जेलों में कैदियों की रिहाई कैसे संबंधित है।”
फऱवरी 1922 में गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन को अचानक वापस लिए जाने के बाद शचीन्द्र फिर से क्रांतिकारी संगठन में जुट गये और 1923 तक सम्पूर्ण संयुक्त प्रांत यानि आज के उत्तर प्रदेश में एक बड़ा संगठन बना लिया। 1924 में मेरठ के विष्णु शरण दूबलिश, शाहजहांपुर के रामप्रसाद बिस्मील और अशफ़ाक़ुल्लाह खाँ, कानपुर के सुरेश चंद्र भट्टाचार्य और उनका दल, बनारस के शचीन्द्र नाथ बख्शी, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी और उत्तर भारत के अनेक क्रांतिकारियों को इक_ा कर ‘हिंदुस्तान रिपब्लिक सोसिएशन’ के नाम से एक दल बनाया गया। हिंदुस्तान रिपब्लिक सोसिएशन उत्तर भारत की क्रांतिकारी गतिविशियों का केंद्र-बिंदु बन गया। चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव, भगवती चरण वोहरा, राजगुरु, शिव वर्मा, विजय कुमार सिन्हा, बटुकेश्वर दत्त आदि इसी संगठन में जुड़े। पुलिस की आँखों से बचकर, एक-एक व्यक्ति को को चुन कर-परख कर, आपस में तालमेल बनाकर, संपूर्ण उत्तर भारतीय क्रांतिकारी संगठनों को जोड़कर हिंदुस्तान रिपब्लिक सोसिएशन का संगठन करना शचीन्द्र सान्याल की साधना, योग्यता, और क्रांतिकारियों में उनकी साख बयान करता है। हिंदुस्तान रिपब्लिक सोसिएशन की स्थापना को शचींद्र नाथ सान्याल की अनेकानेक उपलब्धियों में शीर्ष पर रखा जा सकता है।
आयरिश रिपब्लिक सोसिएशन की तर्ज़ पर बने इस दल का बाक़ायदा संविधान शचीन्द्र ने बनाया जोकि उनकी दृष्टि और विश्व राजनीति की उनकी समझ को दर्शाता है। इस संविधान के अनुसार ”एसोसिएशन का उद्देश्य संगठित एवं सशस्त्र क्रांति के द्वारा भारत के संयुक्त प्रांतों का संघबद्ध गणतंत्र होगा। गणतंत्र का मूल सिद्धांत सभी के लिए मताधिकार और ऐसी समस्त व्यवस्थाओं का उन्मूलन होगा जोकि मनुष्य द्वारा मनुष्य के किसी भी प्रकार के शोषण को संभव बनाती है।” भारतीय संस्कृति की मूलभावना के प्रति शचीन्द्र और उन के साथी क्रांतिकारियों का समर्पण इस संविधान में वर्णित जिला संगठन कर्ता से अपेक्षित निम्नलिखित दो योग्यताओं से प्रदर्शित होता है:
”उसे भारत द्वारा विकसित की गई सभ्यता-विशेष के विशिष्ठ संदर्भ में सम-सामयिक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को समझने की क्षमता होनी चाहिए। स्वतंत्र भारत के जीवन लक्ष्य और मंज़िल को लेकर उसे अवश्य ही आस्थावान होना चाहिए, जोकि मनुष्य की आत्मिक एवं भौतिक दोनों प्रकार की गतिविधियों के विभिन्न क्षेत्रों में सामंजस्य क़ायम करती है।”
वामपंथी लेखकों ने भगतसिंह की अगुआई में सितंबर 1928 में हिंदुस्तान रिपब्लिक सोसिएशन के नाम में समाजवादी शब्द जोडऩे का तो खूब प्रचार किया है परंतु वे इस तथ्य को नजऱअंदाज़ कर देते हैं कि दल के संविधान में कोई संशोधन नहीं किया गया। इससे यह पुष्टि भी होती है की शचीन्द्र सान्याल की विश्व दृष्टि युगानुकूल थी और उसके दायरे में नये-पुराने क्रांतिकारियों के विचार समाजाते थे।
शचीन्द्र नाथ सान्याल अपने समय के उन गिने-चुने लोगों में से थे जिनके पास वह बौद्धिकता भरे दृढ़ विश्वास का साहस था कि गाँधी जी को ललकार सकें। शचीन्द्र जी ने गाँधीजी को चि_ी लिखकर खुली चुनौती दी और गाँधीजी का बड़प्पन इतना कि न केवल उसका जबाब दिया बल्कि शचीन्द्र के पत्र को 12 फऱवरी 1925 के ‘यंगइंडिया’ में ज्यों का त्यों छाप दिया। गाँधीजी को वर्तमान युग के महानतम व्यक्तित्वों में से एक मानते हुए शचीन्द्र सान्याल ने तर्कपूर्ण ढंग से सिद्ध करने की कोशिश की कि गांधीवाद का आदर्श भारतीय संस्कृति एवं प्रम्पराओं के अनुरूप नहीं है बल्कि हताशा से उपजा हुआ आटो लेस्टॉयवाद और बौद्ध-धर्म का अपूर्ण मिश्रण है। उन्होंने आरोप लगाया कि गांधी के समर्थक व्यक्ति-पूजा से ग्रसित हैं। अपने पत्र की समाप्ति उन्होंने इन शब्दों से की – ”क्रांतिकारियों ने मातृभूमि की सेवा के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया है, और यदि आप उनकी सहायता नहीं कर सकते, तो कम से कम उन के प्रति असहिष्णु तो न बनें”।
शचीन्द्र नाथ सान्याल के व्यक्तित्व और नेतृत्व में बौद्धिकता और सैन्य संगठनकर्ता के गुणों का अद्भुत तालमेल था। उनके द्वारा लिखित परचा ‘दरे वोल्यूशनरी’ भी चर्चा योग्य है। इसे क्रांतिकारी दल का घोषणा पत्र माना जा सकता है और इस परचे को 31 दिसंबर 1924 की रात और 1 जनवरी 1925 के बीच भारत के लगभग सही प्रमुख शहरों में वितरित किया गया। परचे के आरंभ में ही लिखा गया था। ”नये तारे के जन्म के लिए उथल-पुथल ज़रूरी है। जैसे प्रसव के समय दर्द और दु:ख का होने स्वाभाविक है, वैसे ही किसी देश के परिवर्तन काल में तथा नया युग लाने के किए क्रांति और उथल-पुथल होना स्वाभाविक है।” इस परचे में अहिंसा की नीति की आलोचना की गई थी और आने वाली सशस्त्र क्रांति के दर्शन और उसके औचित्य से परिचय कराया गया।
”हमारा आदर्श संगठित तरीक़े से मानवता की सेवा करना है। भारत अपने आदर्श को मूर्तरूप दे सके इसके लिए उसका पृथक और स्वतंत्र अस्तित्व बहुत ज़रूरी है। इस स्वतंत्रता को कभी भी शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक तरीक़ों से हासिल नहीं किया जा सकता। भारत के युवाओं, अपने भ्रमों को दूर भगाओ और मज़बूत हृदय से वास्तविकता का सामना करो और संघर्ष, कठिनायियों एवं क़ुर्बानियों से बचो नहीं। भारतीय क्रांतिकारी न तो आतंकवादी हैं और नहीं अराजकतावादी। वे यह नहीं मानते कि अकेला आतंकवाद ही आज़ादी दिला सकता है। हालाँकि यह संभव है कि वे समय-समय पर प्रतिकार के बहुत ही प्रभावी साधन के रूप में इस तरीक़े को काम में ले आयें। सरकारी आतंकवाद का जबाब प्रति आतंकवाद से दिया जाना तय है। हमारे समाज के प्रत्येक स्तर में पूरी तरह से बेचारगी की भावना व्याप्त है और समाज में समुचित जज्बे की बहाली के लिए सशस्त्र प्रति कार प्रभावी उपाय है। पार्टी कभी भी यह नहीं भूलेगी कि आतंकवाद लक्ष्य नहीं है और वे निरंतर ऐसे निस्वार्थ एवं समर्पित कार्यकर्ताओं के दल संगठित करने की कोशिश करते रहेंगे जो कि अपने देश की राजनीतिक और सामाजिक मुक्ति के लिए अपनी पूरी ऊर्जा झोंक देंगे। वे सदैव यह याद रखेंगे की राष्ट्र-निर्माण के लिए हज़ारों ऐसे गुम नाम स्त्री-पुरुषों के आत्बलिदान की आवश्यकता पड़ती है जो कि अपने ख़ुद के आराम या स्वार्थ, अपने स्वयं के जीवन या अपने प्रियजनों के जीवन के मुक़ाबले अपने देश के विचार की अधिक परवाह करते हैं।”
सशस्त्रक्रांति की आवश्यकता और क्रांतिकारियों के विरुद्ध दुष्प्रचार को बेअसर करने के उद्देश्य से शचीन्द्र सान्याल द्वारा लिखित बांग्ला में भी एक परचा ‘देशबाशिर प्रति निवेदन’ वितरित किया गया। ब्रिटिश सरकार ने इन परचों विशेष तया द रेवोल्यूशनरी को बहुत गंभीरता से लिया और इसके जारी होने के दो महीने के बाद शचीन्द्र को गिरफ़्तार कर लिया। परचे को लिखने और उसका वितरण करने के अपराध में उनके ऊपर राजद्रोह का मुक़दमा चलाया गया और 18 सितंबर 1925 को धारा 124 ए में उन्हें दो साल की सजा सुनाई गई।
शचीन्द्र के ऊपर मुक़दमे की करवाई चल ही रही थी कि हिंदुस्तान रिपब्लिक सोसिएशन के जाँबाज़ों ने हरदोई से लखनऊ जा रही 8 डाउन पैसेंजर ट्रेन को 9 अगस्त 1925 की शाम रोककर सरकारी खज़़ाना लूट लिया। इस सनसनी ख़ेज़ घटना के बाद सरकार ने काकोरी षड्यंत्र केस में ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारियों को फँसाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। डेढ़ साल मुक़दमा चलने के बाद स्पेशल से हेमिल्टन ने शचीन्द्र नाथ सान्याल को आजन्म कालापानी की सजा दी। उनके साथ राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, और रोशन सिंह को फाँसी की सजा सुनाई गई। मन्मथनाथ गुप्त को 14 वर्ष, राज कुमार सिंह, रामकृष्ण खत्री, मुकंदी लाल, गोविंद कार, तथा जोगेश चटर्जी को 10-10 वर्ष की सजा हुई। सुरेश चंद्र भट्टाचार्य तथा विष्णु शरण दुब लिश को 7- 7 वर्ष एव म्राम दुलारे त्रिवेदी, प्रेम कृष्ण खन्ना, भूपेन्द्र सान्याल (शचींद्र सान्याल के छोटे भाई), रामनाथ पाण्डे, प्राण वेश चटर्जी आदि को 5- 5 वर्ष की सजा दी गई। सप्लीमेंटरी कांस्पीरेसी में अश्फ़ाक उल्लाह खाँ को फाँसी की सजा दी गई और शचींद्र नाथ बख्शी को आजन्म कालापानी की सजा दी गई। हालाँकि शचीन्द्र नाथ सान्याल और शचीन्द्र नाथ नाथ बख्शी ने अपील नहीं की थी।
काकोरी मामले में आजीवन कारावास काटते हुए शचीन्द्र सान्याल 12 वर्षों तक लखनऊ, नैनी और आगरा जेलों में रहे। उनके पुत्र रंजीत कुमार सान्याल के अनुसार जब भी वे अपने पिताजी से मुलाक़ात करने जेल जाते तो उन्हें शचीन्द्र जी हमेशा प्रफुल्लित और मुस्कुराते हुए ही दिखते। साथी क्रांतिकारी रामकृष्ण खत्री के अनुसार शचीन्द्र जेल में अध्य्यनशील रहते थे और उनके पास पुस्तकों का एक बड़ा पुलिंदा था जिसमें भारतीय दर्शन, इतिहास, उपन्यास तथा अन्य विषयों की पुस्तकें थी।
भारत सरकार अधिनियम,1935 के अन्तर्ग तप्रांती यस्वायत्तता योजना के अंतर्गत यू.पी. में कांग्रेस मंत्रिमंडल गठित हो जाने के उपरांत सन् 1937 के अगस्त माह में शचीन्द्र सान्याल को आजीवन कारावास के दंड से मुक्ति मिली। किंतु इसके लिये उन्हें और समस्त राजनीतिक बंदियों को अनशन का सहारा लेना पड़ा था। जेल से छूटते ही उन्होंने ‘संघर्ष’, ‘अग्रगामी ‘और ‘प्रताप’ जैसे पत्र-पत्रिकाओं में राजनीतिक, दर्शन, संस्कृति, विज्ञान आदि विषयों पर लेख लिखने शुरू कर दिये। उनकी पत्नी ने उनके मित्रों से शिकायत की थी कि शचीन्द्र जी को मधुमेह है, डॉक्टर ने नियमित रूप से टहलने को कहा था लेकिन शचींद्र जी तो बस दिन रात लिखते ही रहते हैं। 1938 में उन्होंने ‘बंदीजीवन’ का पुन: प्रकाशन कराया। इसी वर्ष उन की पुस्तक’ विचार विनिमय’ छपी।
सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ होने के बाद राजनीतिक परिस्थियाँ बदल गयीं। ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को पूछे बग़ैर भारत को महायुद्ध में झोंक दिया जिसके विरोध स्वरूप अक्तूबर-नवम्बर 1939 में सात प्रांतों में कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने त्याग पत्र दे दिया। शचीन्द्र नाथ सान्याल को अंदेशा हो गया था कि उन्हें पुन: गिरफ़्तार किया जा सकता है क्योंकि उनकी राजनीतिक गतिविधियाँ सरकार की आंख का काँटा बनी हुई थी। सरकार को जानकारी थी कि वे पंजाब में ग़दर के पुराने नेताओं से मिलने गये थे, सुभाष चंद्र बोस से भी उनकी लंबी मंत्रणा हुई थी और जापान के राजदूत से भी मिले थे। आखऱि 13 नवंबर 1940 को उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और फऱवरी 1941 में अजमेर के निकट देवली कैम्प में भेज दिया गया। देवली कैम्प में हिंदुस्तान रिपब्लिक न सोशलिस्ट एसोसिएशन के क्रांतिकारी अजय घोष भी बंदी थे जो कि बाद में कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव भी रहे। अजय घोष फेफड़ों की तपेदिक से पीडि़त थे और शचीन्द्र उनकी सेवा करते हुए स्वयं भी इस बीमारी से ग्रस्त हो गये। मधुमेह और तपेदिक ने मिलकर गंभीर बीमारी का रूप ले लिया। देवली कैम्प में तपेदिक के इलाज की सुविधा नहीं थी। चूँकि शचीन्द्र पर ना कोई स्पष्ट आरोप थे, न कोई मुक़दमा चल रहा था अत: शचीन्द्र और उनके परिवार ने सरकार से लंबा पत्राचार किया किया तो उन्हें चिकित्सीय आधार पर रिहा कर दिया जाय या फिर बनारस में या ऐसी किसी जेल में स्थानांतरित कर दिया जाये जहाँ इलाज की सुविधा हो। जेल में इनकी हालत बिगडऩे लगी। अंतत: परिवार और गोविंदवल्लभ पंत के प्रयासों से उन्हें चिकित्सा कराने हेतु इस शर्त के साथ रिहा किया गया कि वे प्रतिदिन पुलिस के पास थाने में रिपोर्ट किया करेंगे। गोविंदवल्लभ पंत की सिफ़ारिश पर उन्हें भवाली सेनेटोरियम ले जाया गया पर उन की हालात में कोई सुधार नहीं हुआ तो उन के छोटे भाई के पास गोरखपुर लाया गया जहां 6 फऱवरी 1943 में 49 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया।
मात्र क्रांतिकारी दल के संगठन कर्ता के रूप में शचीन्द्र नाथ सान्याल का परिचय अधूरा है। क्रांतिकारी गतिविधियों में जान हथेली पर रखकर घूमते हुए या जेल की सीखचों के पीछे आजीवन कारावास भोगते हुए भी शचीन्द्र अपने समय में चल रहे बौद्धिक विमर्शों सेना केवल पूरी तरह वाकफ़ि़ रहे बल्कि उसमें भाग भी लिया।
अनेक क्रांतिकारी साथियों के साम्यवाद की ओर आकर्षित होने के संदर्भ में शचीन्द्र सान्याल की साम्यवाद पर टिप्पणी अत्यंत सटीक और समालोचक थी। 1920 के दशक में जब क्रांतिकारी ही नहीं बल्कि गांधी जी के अतिरिक्त अधिकांश कांग्रेसी नेता भी रूसी क्रांति और साम्यवाद से प्रभावित थे, शचीन्द्र ने साम्यवाद का वस्तु परक विश्लेषण किया। उन्होंने लेनिन और साम्यवाद के बारे में 1921-22 में अध्ययन और लेखन प्रारम्भ कर दिया। उसी समय उन का संपर्क क़ुतबुद्दीन जोकि एम.एन. राय के संदेश वाहक थे और कानपुर के सत्य भक्त से हुआ। सत्य भक्त ने 1925 में भारत में सबसे पहले कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना कि थी हालाँकि एक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 1920 में ताशकंद में की जा चुकी थी। 1923 से मृत्युपर्यंत कम्युनिज्म का विशद अध्ययन करते हुए शचीन्द्र इस विचार धारा के गुण-दोषों का वस्तु परक आकलन किया:
”सन् 1923 से लेकर आज तक अपनी सामथ्र्य के अनुसार कम्युनिज्म के बारे में अध्ययन किया, कम्युनिस्टों के संपर्क में आया, कम्युनिस्ट विचार के व्यक्तियों से प्रचुरवाद-विवाद किया, लेकिन आज भी मेरा दृढ़ विश्वास है की कम्युनिज्म में, उसके अंतर्निहित मानव कल्याण की महान प्रेरणा के साथ कुछ ऐसे अवांतर सिद्धांतों का समावेश हुआ है, जिनका सत्य के साथ कोई संबंध नहीं है।
मेरा यह पूर्ण विश्वास है की पाश्चात्य सभ्यता का श्रेष्ठदान है कम्युनिज्म का महान आदर्श। इस आदर्श के अनुसार समाज के कल्याण के सामने व्यक्तिगत लाभ एवं क्षति कि कोई पर वाहन करना, परम कर्तव्य समझा गया है।
इस सिद्धांत के साथ भारतीय प्राचीन आदर्श का कोई विरोध नहीं दिखाई पड़ता। लेकिन कम्युनिज्म के सिद्धांत को ग्रहण करते समय मेरे कितने ही साथियों ने भारत के अध्यात्मवाद को तिलांजलिदे दी है। मैं ऐसा कर नहीं पाया। इसलिए जेल में रहते ही मेरे साथियों से मेरा प्रचंड विरोध पैदा हो गया।”
शचीन्द्र ने कम्युनिज्म के आदर्शों को महान बताते हुए इसकी कमियों की भी व्याख्या की। वे साम्यवाद के मूल में स्थित इतिहास की आर्थिक व्याख्या, भौतिक द्वंदवाद और दार्शनिक अंश से सहमत नहीं हुए। उन्हें कम्युनिज्म में सबसे बड़ी बुराई यह दिखती थी कि वहाँ पर विचारों की स्वतंत्रता और अध्यात्म के लिए कोई स्थान नहीं था। उन्होंने रुस की बोल्शेविक पार्टी का हवाला देते हुए यह भी माना कि कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों की संख्या बहुत कम होते हुए भी यह पार्टी उपेक्षा के योग्य नहीं है क्योंकि भारत में आज (1938) दूसरी और कोई ऐसी संस्था नहीं है, जो की क्रांति के लिए काम कर रही है। हालाँकि वे इस बात से भली भाँति परिचित थे कि कम्युनिस्ट पार्टी का संचालन रुस से होता था। अपने लेखों में शचींद्र जी ने भारतीय दर्शन, योग व अन्य परंपराओं को श्रेष्ठमाना। उन्होंने कर्म वाद और उसके लिये जन्मांतर वाद में विश्वास व्यक्त किया। उनके अनुसार समाज व्यवस्था में गुण, कर्म एवं प्रतिभा के आधार पर श्रेणी कल्याण प्रद और आवश्यक है ना कि वित्त के आधार पर। साम्राज्यवाद और डिक्टेटर शिप का विरोध किया और उनके स्थान पर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था प्रजातांत्रिक स्थापित होनी चाहिए जोकि प्राच्य एवं पश्चात्य सभ्यता के श्रेष्ठ सिद्धांतों से युक्त हो और मानव मात्र की सेवा करना जिसका आदर्श हो।
”सर्वोपरि मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि संसार की भलाई के लिए भारतीय अध्यात्मवाद परम कल्याण प्रद है। इस बात का मुझे गौरव है की हमारे समाज में मनुष्यों को मर्यादा देते समय हम उसे देवता के स्थान पर बिठाते हैं। उसे हम ईश्वर का अवतार कहने में भी नहीं हिचकते, लेकिन व्यक्तिगत विचार स्वातंत्र्य का महत्व हम इतना अधिक समझते हैं कि जिसे हम आज ईश्वर का अवतार कहने में नहीं हिचकते, कल उसे भ्रांत कहने की भी हिम्मत रखते हैं, हमें इस बात का भी अभिमान है कि हमारे ही समाज में आचरण की भी इतनी आज़ादी है कि यदि पिता बौद्ध है तो पुत्र वेदा चारी हो सकता है, यदि पति शाक्त है तो पत्नी वैष्णवी हो सकती है।”
साम्यवाद और अन्तराष्ट्रीय राजनीति के अतिरिक्त स्वाधीनता संघर्ष की दिशा, समाज, दर्शन और जीवन के अनेक पहलुओं पर शचीन्द्र एक ऐसे विचारक के रूप में दिखाई देते हैं जो एक ओर भारतीय ज्ञान परंपरा से ओत प्रोत हैं और दूसरी ओर विश्व में चल रहे समसामयिक विमर्श से पूरी तरह परिचित हैं।
भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में क्रांतिकारी संगठन में शचीन्द्र नाथ सान्याल की भूमिका को अभी तक नजऱ अंदाज़ ही किया गया है। शचीन्द्र नाथ सान्याल में संगठन की अद्भुत क्षमता थी। 1913-14 में बनारस में बाढ़ की विभीषिका के दौरान युवा शचीन्द्र ने अपने साथियों के साथ मिलकर जो राहत और बचाव का कार्य किया उसके मुरीद ब्रिटिश जज भी हो गये। शचीन्द्र के भाई जितेंद्र नाथ सान्याल के अनुसार बनारस षड्यंत्र के मुक़दमे का फ़ैसला सुनाते हुए न्यायाधीश एस.आर. डैनियल्स ने लिखा ”यदि शचिन को राष्ट्रवाद की मूर्खता पूर्ण भावना में गुमराह नहीं किया गया होता, तो वह सामाजिक कार्यों के प्रति समर्पित एक विश्वसनीय नागरिक के रूप में विकसित हो सकता था।” उनके साथी क्रांतिकारी विजय कुमार सिन्हा ने उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि इन शब्दों में दी:
‘गोलियां फाँसी के एक झटके से शहीद होने वाले तो हमारे पूज्य ही हैं, परंतु क्रांति की आरी से तिल-तिल आजीवन चीरे जाने वाले शचीन दा जैसे मृत्युजयी वीरों के लिए किस किस शब्द का प्रयोग किया जाय? उन्हें मात्र शहीद कहने से मुझे लगता है कि उनके प्रति मैं अपने असीम श्रद्धा अभिव्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ।”





