प्रो. बलवंत सिंह राजपूत
वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं पूर्व कुलपति
महर्षि कणाद प्राचीन भारतीय दार्शनिक, वैज्ञानिक तथा संत थे, जिन्होंने वैदिक वैशेषिक दर्शन को स्थापित किया था। ये मूलत: पदार्थ की प्रकृति का दर्शन है, जिसमें परमाणु सिद्धांत समाहित है। महर्षि कणाद का जन्म छटी शताब्दी ईशा पूर्व लगभग तीन हजार वर्ष पूर्व हुआ था। बचपन में इन्हें कश्यप के नाम से जाना जाता था। वायु पुराण में उनका जन्म स्थान प्रभास पाटण बताया गया है। इनके अनासक्त जीवन के बारे मे ये रोचक मान्यता है कि जब ये किसी काम से बाहर जाते तो घर लौटते समय रास्ते में पड़े अन्न के दानों को बटोर कर अपना जीवन—यापन करने के कारण इनका नाम कणाद पड़ा। यह भी मान्यता है कि पदार्थ रचना के मूल कण परमाणु मूलत: अविभाजित पर इनकी मौलिक खोज के कारण इनका ये नाम कणाद पड़ा था।
इनके वैशेषिक दर्शन में प्रकृति के सभी लाक्षणिक गुणों का मौलिक स्तर पर विश्लेषण मिलता है। इसमें भौतिक जगत की संरचना को उच्चतम स्तर तक उल्लिखित किया गया है। महर्षि कणाद ने इस दर्शन में सभी भौतिक वस्तुओं को मूलत: दो श्रेणियों— अस्तित्व तथा अस्तित्वहीन में रखा था। इनमें से प्रथम श्रेणी की वस्तुओं को निम्नांकित छह वर्गों में बांटा गया था—द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष तथा सामाव्य। इनमें से द्रव्य, गुण तथा कर्म को क्रमश: नौ, चौबीस तथा पांच उपवर्गों में वर्गीकृत किया गया है। द्रव्य में कर्म और गुण को समाहित किया गया है। इसे अन्तहीन रूप में अविभाजित परमाणु की भांति नित्य तथा पदार्थ के रूप में प्रेक्षण योग्य भी माना गया है। द्रव्य का नित्य रूप भी दो प्रकार का माना गया है— परमाण्विक तथा सर्वव्यापी।
महर्षि कणाद के वैशेषिक सूत्रों में द्रव्य को निम्नांकित नौ उपवर्गों में विभक्त किया गया है—क्षिति, अस्प, तेज, वायु, आकाश, दिक्क, काल, मानस तथा आत्मा। इनमें से प्रथम पांच घटक भौतिक पदार्थवादी हैं तथा अन्य अभौतिक अपदार्थ हैं। आकाश, दिक्क तथा काल स्रजन प्रक्रिया को नित्य सतत पृष्ठभूमि प्रदान करते हैं। मानस पदार्थ की संरचना को समझ कर उससे संलग्न सुख और दुख की अनुभूति करने की क्षमता रखता है। वैशेषिक सूत्रों में वर्णित सभी भौतिक घटकों में संख्या, विमा, संयोजन तथा विघटन निहित होते हैं। वैशेषिक में वर्णित गुणों की संख्या चौबीस बतायी गयी है जिनसे मिलकर निम्नांकित पांच तन्मात्रा सतत से पदार्थ परमाणु की रचना करते हैं। स्पन्दन श्रवण, संवेग स्पर्श, ऊर्जा दृश्य, श्येन आकर्षण स्वाद तथा संसजक आकर्षण गंध।
वैशेषिक का परमाणु पदार्थ का मूल घटक है जो मर्मग्रही, अक्षुण, अविभाज्य तथा अदृश्य रहता है यह आधुनिक विज्ञान के अटॉम से भिन्न है। इसकी अदृश्यता का अर्थ इसकी अस्तित्वहीनता नहीं है, क्योंकि न्याय-वैशेषिक के अनुसार किसी वस्तु के दृश्य होने के लिए उसमें परिमाण का होना आवश्यक होता है तथा परमाणु में परिमाण नहीं होता। यद्यपि स्वयं में परमाणु कोई रचना नहीं कर सकते पर ये ब्रह्मांड की संरचना के मूल भौतिक घटक हैं। एक शक्तिशाली अदृष्ट बल उन्हें परस्पर संयोजित रखता है। वैशेषिक के ये परमाणु सांख्य दर्शन में पांच तन्मात्रा के गुणक माने जाते हैं।
वैशेषिक दर्शन में कारणता सिद्धांत
वैशेषिक दर्शन में कारण और प्रभाव के मध्य कारणता के सम्बंध को निम्नांकित नियमों के रूप में समझाया गया है—न द्रव्यम कार्य कारणम च बाधति। अर्थात् द्रव्य को स्वयं में अथवा कारण द्वारा नष्ट नहीं किया जा सकता है। क्रिया गुणवत समवाई कारणमिति द्रव्य लक्षणा अर्थात् द्रव्य के अभिलक्षणक कर्म तथा गुण होते हैं। कारण-अभावात कार्य-अभाव अर्थात् कारण के नष्ट होने पर प्रभाव भी नष्ट हो जाता है।
न तु कार्याभावात कारणभाव:। अर्थात् कारण की अस्तित्वहीनता प्रभाव की अस्तित्वहीनता का परिणाम नहीं है। कारण गुणपूर्वककार्यागुणों दृष्ट: अर्थात् प्रभाव कारण से पीछे रहता है। वैशेषिक के ये सूत्र दर्शाते हैं कि पदार्थ में कारणता निहित होती है जो इसे संरक्षित रखती है। पदार्थ-ऊर्जा संरक्षण।
वैशेषिक दर्शन में क्वांटम सिद्धांत
वैशेषिक में कारणता का सत्व तथा दिक्क-काल समन्वय परस्पर अपवर्जक परन्तु परिपूरक उल्लिखित हैं। इस परस्पर अपवर्जित परिपूरकता के कारण गति तथा स्थिति का एक साथ पूर्ण शुद्धता से मापन सम्भव नहीं हो सकता। वैशेषिक का ये ही विश्लेषण आधुनिक क्वांटम सिद्धांत का आधार है जिसे ईशावासउपनिषद में निम्नलिखित रूप में उल्लिखित किया गया है— तडेजति तनेजति तददूरे तदंतके। तदन्यस्त सर्वस्य तद सर्वस्यास्य बाह्यत:।। अर्थात् ये गतिशील है पर चलता नहीं, ये दूर है पर निकट भी है, ये इस सबसे भीतर है पर सभी के बाहर है। यही आधुनिक क्वांटम थ्योरी का अनिश्चितता सिद्धांत बना।
वैशेषिक का गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत
महर्षि कणाद के वैशेषिक सूत्र के पांचवें अध्याय में गुरुत्वाकर्षण को म्नांकित रूप में उल्लिखित किया गया था— ‘संयोग-अभावे गुरुत्वात पतनमÓ तथा ‘नदानविशेषा भावानिर्धारितह न तिर्यकगमनमÓ। अर्थात् किसी बाह्य बल के अभाव में कोई भी वस्तु गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से नीचे गिरती है। किसी बाह्य संवेग की अनुपस्थिति में कोई वस्तु ऊपर, पीछे अथवा तिरछे नहीं जाती, बल्कि सीधे नीचे गिरती है। इससे स्पष्ट है कि न्यूटन से हज़ारों वर्ष पहले महर्षि कणाद ने गुरुत्वाकर्षण को जान लिया था।
महर्षि कणाद के गति के नियम
इसी प्रकार न्यूटन से अनेक सहस्त्र वर्ष पूर्व महर्षि कणाद ने अपने वैशेषिक दर्शन में नियमों की निम्नांकित व्याख्या की थी— वेग निमित्त विशेषात कर्मनौ जायते अर्थात् किसी वस्तु की गति में परिवर्तन आरोपित बल द्वारा ही सम्भव है। तथा वेग: निमित्त-अपेक्षात कर्मनौ जायते,
नियतदिक् क्रिया प्रबंधहेतु। अर्थात् किसी वस्तु की गति में परिवर्तन त्वरण उस पर आरोपित बल के समानुपाती होता है। और वेग: संयोग विशेषविरोधी अर्थात् क्रिया और उसकी प्रतिक्रिया समान होती हैं। इन्हीं नियमों को न्यूटन ने आधुनिक विज्ञान में अपने नाम से प्रचारित किया है।





