संयुक्त परिवार की आधारशिला है स्त्री

प्रो. लल्लन प्रसाद
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री


संयुक्त परिवार व्यवस्था सनातन संस्कृति की आधारशिला है, हमारे वैदिक मनीषियों की महान देन है। परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र का निर्माण होता है। पीढिय़ों तक एक साथ रहना, एक रसोई में खाना, धार्मिक अनुष्ठानों, संस्कारों और परंपराओं को निभाना, आर्थिक गतिविधियों को सम्मिलित रूप से चलाना, अपने उत्तरदायित्व के प्रति सजग रहना, बड़े—बूढ़ों के प्रति श्रद्धा और उनकी देखरेख, महिलाओं का सम्मान और बच्चों का पालन—पोषण जिस तरह इस व्यवस्था में होता आ रहा है वह एकल परिवार या बिना शादी—शुदा एक साथ रहने (लिव इन रिलेशनशिप) जैसी व्यवस्थाओं, जो पश्चिम और अन्य संस्कृतियों की देन है, में संभव नहीं है। यह व्यवस्था कोई अनुबंध कांट्रैक्ट नहीं, है ना ही कोई कानूनी इकाई, कंपनी या साझेदारी है, यह खून के रिश्तों से जुड़े लोगों का संगठन है, श्रद्धा, विश्वास, स्नेह, प्रेम और सद्भाव इसके मूल में है। विवाह इस व्यवस्था में एक अटूट संबंध है जो जीवन—पर्यंत चलता है, जो विश्व की किसी और संस्कृति में नहीं है। ऋग्वेद में कहा गया है:
इहैव स्तंम मा वि यौष्टं विश्व माथुव्र्यश्ननुतम।
क्रीणन्तो पुत्रैर्नप्त्रिमिर्मोदमानौ स्वे ग्रिहे।।

हे वर और वधू! आप दोनों यहीं रहे, कभी भी परस्पर पृथक ना हों, संपूर्ण आयु शतायु का विशेष रूप से उपभोग करें। अपने गृहस्थ धर्म का निर्वाह करते हुए पुन: पौत्रादि संतानों के साथ आमोद—प्रमोद पूर्वक जीवन व्यतीत करें।
इहं प्रियं प्रजया ते सम्रिध्यतास्मिन ग्रिहे गार्हपत्याय जाग्रिही।
एनापत्या तन्वं संस्रिजस्वाधा जिव्री विदथमा वदाथ:।।

पति गृह में संतति युक्त होकर आपके स्नेह की वृद्धि हो और इस घर में आप गृहस्थ धर्म के कर्तव्यों के निर्वाह के लिए सदैव जागरूक रहें। स्वामी के साथ आप संयुक्त एक प्राण एक मन वाली होकर रहें। वृद्धावस्था में आप दोनों श्रेष्ठ उपदेश अपनी संतानों के लिए करें। ऋग्वेद संहिता 4, मं 10, सू.85 27।
घर में आने वाली बहू को साम्राज्ञी की संज्ञा दी गई है:
सम्राज्ञी श्वसुरे भव सम्राज्ञीश्सुवां भव।
ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधिदेवेषु।।

हे वधू! आप सास, श्वसुर, ननद और देवर की साम्राज्ञी महारानी के समान हो, आप सबके ऊपर स्वामिनी स्वरूपा हो। -ऋग्वेद संहिता 4, मं 10, सू 85 46।

संयुक्त परिवार व्यवस्था में परिवार के बड़े—बूढ़ों का विशेष स्थान होता है। परिवार का सबसे वरिष्ठ सदस्य कर्ता मुखिया होता है, उसका उत्तरदायित्व होता है कि सबके प्रति समान भाव रखे, सद्भावना पूर्ण वातावरण बनाए रखे, बिना पक्षपात सबको समान सुविधाएं प्रदान करे, आपसी विवादों को शांतिपूर्वक निपटाए। कन्या के लिए वर के चुनाव में अंतिम निर्णय उसका होता है। ऋग्वेद में सूर्य की पुत्री के लिए वर के निर्णय में यह कहा गया है कि सोम और अश्विनी कुमार दो प्रत्याशी थे, परिवार के मुखिया ने अश्विनी कुमार को चुना, उसके लिए अपनी स्वीकृति दी। मनुस्मृति मे कहा गया है कि मुखिया की जिम्मेदारी होती है कि वह प्रस्तावित वर के गुण दोष का अच्छी तरह से मूल्यांकन करके ही अपनी सहमति दें। वधू के लिए वेदों जहां यह कहा गया है कि उसे परिवार में साम्राज्ञी की तरह प्रतिष्ठा मिले, उसके साथ-साथ यह भी कहा गया है कि वह गृहस्थ धर्म के कर्तव्यों के निर्वाह के लिए सदैव जागरूक रहे। वह सद्विचारों से युक्त, तेजस्वी, वीर प्रसविनी, देवों की उपासिका, पशुओं के लिए हितकर, परिवार एवं परिजनों के लिए कल्याणकारी हो।

रामायण और महाभारत में संयुक्त परिवार का महत्व सर्वविदित है। माता कौशल्या का कैकई और सुमित्रा के पुत्रों के प्रति वैसा ही स्नेह जैसा राम के प्रति, चारों भाइयों में आपसी प्रेम, माता-पिता की आज्ञा सबके लिए सर्वोपरि, उनके आदेश पर राम द्वारा राज्य त्याग और 14 वर्ष के लिए वनवास सहर्ष स्वीकार करना, गुरुओं का सम्मान एवं प्रजा और सेवकों के कल्याण की प्रतिबद्धता आदर्श परिवार की ही देन थी। महाभारत में पांडवों का परिवार संयुक्त परिवार व्यवस्था का आदर्श प्रतीक है। स्वयंवर में मत्स्य चक्षु भेदन के बाद द्रौपदी को लेकर जब अर्जुन माता कुंती के पास आए और कहा कि मां देखो मैं क्या लाया हूं, तो मां ने कहा जो भी लाए हो सभी भाई आपस में बांट लो। द्रौपदी एक बड़े धर्म संकट में पड़ गई किंतु उसने कुंती के वचनों की लाज रखी, पांचों भाई अंत तक साथ रहे, धर्म मार्ग पर चलते रहे, महाभारत युद्ध में विजयी हुए।
चाणक्य ने सुखी परिवार को परिभाषित करते हुए कहा है—
सानन्दं सदनं सुताश्च सुधर्म: कांता प्रियालापिनी।
सुघनं सन्मित्रं स्वयोषितिरति: स्वाज्ञपरा: सेवक:।
आतिथ्यमं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्ठान पानं ग्रिहे।
साधो: संगमुपासते च सततं धन्यो गृहस्थाश्रम:।।

घर आनंद से युक्त हो, संतान बुद्धिमान हो, पत्नी मधुर वचन बोलने वाली हो, इच्छापूर्ति के लायक धन हो, अतिथि का सत्कार और शिव का पूजन प्रतिदिन हो, ऐसा गृहस्थाश्रम सभी आश्रमों से अधिक धन्य है, ऐसे घर का स्वामी अत्यंत सुखी और सौभाग्यशाली होता है।

संयुक्त परिवार में संपत्ति के स्वामित्व के बारे में चाणक्य ने कहा है कि माता-पिता के जीवित रहते लड़के संपत्ति के अधिकारी नहीं होते, उनके जाने के बाद रहने वाले सभी पुत्र, पौत्र चौथी पीढ़ी तक अविभाजित संपत्ति के बराबर के हकदार होते हैं। जिनका कोई पुत्र ना हो उसकी संपत्ति उसके सगे—भाइयों को जा सकती है और विवाह आदि के लिए जितने की अपेक्षा हो कन्याएं उतना धन अपने पैतृक संपत्ति से लेने की अधिकारी होती हैं। विवाहित बड़े भाइयों का कर्तव्य होता है कि वह अपने छोटे अविवाहित भाइयों और बहनों के विवाह में दहेज आदि के लिए यथोचित धन दें।

संयुक्त परिवार व्यवस्था यदि अब तक जीवित है तो उसके मूल में आपसी सहयोग, भावनात्मक समर्थन, सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण और आर्थिक संपन्नता है। मुगल काल में इस व्यवस्था पर चोट लगने शुरू हुए। महिलाओं को पर्दे में रखना, बाल विवाह आदि दुर्गुणों से परिवार में महिलाओं का स्थान, उनकी शिक्षा और समाज में योगदान में कमी आने लगी। पितृसत्तात्मकता बढ़ी। 20वीं सदी से औद्योगिकरण, शहरीकरण और पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से संयुक्त परिवार प्रणाली और कमजोर हुई। देहातों, कस्बों और छोटे शहरों से बड़े शहरों में पलायन शुरू हुआ, पत्नी, बाल—बच्चों को गांव में छोड़ पुरुष शहरों में नौकरी के लिए जाने लगे। परिवार के बड़े-बूढ़ों और महिलाओं की जिम्मेदारी बढ़ी। बदलते समय के साथ गांव से आए लोग शहरों में बसने लगे, परिवार में बिखराव शुरू हुआ, कुछ लोग शहर में कुछ गांव में। संयुक्त परिवार की मूल धारणा खतरे में आ गई। शहरों में रहने, खाने-पीने और जीवन निर्वाह की वह व्यवस्था नहीं थी, जहां एक आंगन, एक चूल्हा, साझी संपत्ति और व्यवसाय, शादी-ब्याह और पारिवारिक संस्कारों का साथ-साथ पालन हो सकें। एकल परिवार व्यवस्था बढऩे लगी जिसमें मां-बाप और बच्चे शहर में और बाकी परिवार गांव में उपेक्षित जीवन बिताने को मजबूर होने लगे। पाश्चात्य शिक्षा पद्धति ने युवकों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता और आत्मनिर्भरता, महिलाओं में भी शिक्षा प्रसार को बढ़ावा देना शुरू किया। अच्छाइयों के साथ बुराइयों ने भी जड़ जमाना शुरू किया। बिना शादी एक साथ रहने, कोर्ट में शादी करने, अंतर धर्मी और समलैंगिक विवाह, शादीशुदा जोड़ों में अलगाव डायवोर्स, अलगाव के बाद पत्नी और बच्चों के पालन—पोषण की समस्या, परिवार में आपसी विवाद और संपत्ति के बंटवारे को लेकर बड़े—बूढ़ों की राय ना लेकर सीधे कोर्ट का रास्ता चुनना, जैसी कुरीतियां भी परिवार व्यवस्था पर प्रहार कर रही हैं।

आजादी के बाद सुधार के नाम पर हिंदू कोड बिल से लेकर अब तक अधिकांश कानून संयुक्त परिवार व्यवस्था पर आघात करते आ रहे हैं। घोर विरोध के बावजूद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने हिंदू कोड बिल पारित कराया, जिसके अनुसार बहु—विवाह प्रथा पर रोक, हिंदू महिलाओं को तलाक का अधिकार, अंतर्जातीय विवाह को मान्यता जैसे प्रावधान किए गए। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि तलाक की प्रथा का स्वागत चंद उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाएं ही करेंगी, हमारे घर की बहू—बेटियां नहीं। 1956 में हिंदू उत्तराधिकार कानून पारित हुआ जिसमें हिंदू महिलाओं को पुरुषों के समान बराबर संपत्ति का अधिकार दिया गया। 1961 में दहेज प्रतिषेध अधिनियम लागू हुआ। 2005 में कानून में जो नए प्रावधान किए गए उसके अनुसार लड़कियों को जन्म से संपत्ति में सहभागी घोषित किया गया, मां को बच्चों का स्वाभाविक संरक्षक माना गया और विवाद की स्थिति में पहले 5 साल तक बच्चे मां के संरक्षण में ही रखे जाने का प्रावधान किया गया। विधवा और अविवाहित महिलाओं को बच्चा गोद लेने का अधिकार दिया गया। पति-पत्नी के बीच अलगाव होने की स्थिति में पत्नी को रहने की अलग से व्यवस्था और उसके खर्च के लिए पति को जिम्मेदार बनाया गया। 2006 में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम पारित हुआ। हिंदू कोड बिल का विरोध इतना प्रबल था कि बाबा साहब आंबेडकर ने मंत्रिमंडल से अपना इस्तीफा दे दिया था। ये सारे कानून हिंदुओं के लिए ही लागू किए गए, मुस्लिम पर्सनल लॉ को छूने की हिम्मत पंडित नेहरू और उनके बाद कांग्रेस शासित एवं कांग्रेस समर्थित शासन में दशकों तक नहीं हुई। देश के बहुसंख्यक समाज के लिए हिंदू कोड बिल और अन्य कानूनों में जो प्रावधान किए गए उसमें से अधिकांश सदियों से चली आ रही सनातन परंपरा की मूल सोच के विरुद्ध है, पश्चिम की अंधाधुंध नकल है, जिसके परिणाम समाज के सामने आ रहे हैं। एकल परिवार एवं बिना शादी—शुदा एक साथ रहने का रिवाज बढ़ता जा रहा है, विवाह संबंधी विवाद तलाक एवं अंतरजातीय विवाह के कारण तेजी से बढ़ रहे हैं। शिक्षित नौकरी करने वाली महिलाओं में शादी न करने और बच्चे ना पैदा करने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है, जो आबादी के संतुलन को प्रभावित करेगा। एनडीए की सरकार आने के बाद सबके लिए एक कानून की चर्चा शुरू हुई। उत्तराखंड राज्य ने इसके लिए कानून भी बनाया। एनडीए शासित और राज्यों में भी इस पर विचार हो रहा है। केंद्र सरकार द्वारा समान आचार संहिता बनाई जानी चाहिए, ताकि एक देश एक कानून का लक्ष्य पूरा हो सके। च