आस्था और सामाजिक समरसता की मिलन स्थली

हरि मंगल
वरिष्ठ पत्रकार


वनवास जाने के क्रम में प्रभु श्रीराम अपनी पत्नी माता सीता और लक्ष्मण के साथ श्रृंगवेरपुर पहुंचे थे। श्रृंगवेरपुर से आगे जाने के लिये उन्हें गंगा नदी को पार करना था, जो अपने रौद्र रूप में प्रवाहमान थी। आगे बढऩे से पहले श्रृंगवेरपुर और श्रीराम के जन्म से जुड़े इतिहास को जानना आवश्यक है। अनेक धार्मिक ग्रंथों और जनसामान्य में प्रचलित कथाओं के अनुसार राजा दशरथ को तीनों रानियों से कोई संतान नहीं थी। इस बात को लेकर राजा के साथ—साथ प्रजा भी बहुत निराश थी। कुलगुरु वशिष्ठ ने राजा दशरथ को परामर्श दिया कि प्रयागराज में श्रृंगवेरपुर स्थान पर स्थित श्रृंगी ऋषि से मिलने पर इस समस्या का निदान हो सकता है। राजा दशरथ गुरु की आज्ञा मानकर श्रृंगी ऋषि के आश्रम आकर मिले तो उन्होंने पुत्रेष्टि यज्ञ का आयोजन कराया। यज्ञ समाप्ति पर श्रृंगी ऋषि ने राजा दशरथ को प्रसाद के रूप में खीर दिया जिसे तीनों रानियों, कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा ने ग्रहण किया। इसके पश्चात ही राजा दशरथ को चार पुत्र प्रभु श्री राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न प्राप्त हुये थे। इस धार्मिक कथा के आधार पर प्रभु श्रीराम के जन्म का श्रेय श्रृंगी ऋषि को दिया जाता है जिनका आश्रम श्रृंगवेरपुर में था। आज भी श्रृंगवेरपुर स्थित श्रृंगी ऋषि का मन्दिर लोक मानस में विख्यात है जहां प्रतिदिन अनेक निसंतान दम्पति संतान की कामना लेकर आते हैं और पूजा पाठ करने के साथ मन्नत मानते हैं। परम्परा में यहां प्रसाद के रुप में श्रद्धालु रोट(पूड़ी) और खीर का भोग लगा कर प्रसाद ग्रहण करते हैं।
सिंसुपा के नीचे विश्राम
श्री रामचरितमानस में श्रीराम के वनवास की कथा में श्रृंगवेरपुर का खासा जिक्र है। अयोध्या से वनवास को निकले भगवान राम का पहला पड़ाव, रात्रि विश्राम, नाव से गंगा पार करना, राम केवट संवाद, माता सीता द्वारा अपनी मुदरी (अंगूठी) उतार कर केवट को उतराई देने की इच्छा, सीता जी द्वारा मां गंगा से सकुशल वापसी की मन्नत मांगना जैसे प्रंसगों के कारण श्रृंगवेरपुर सनातनियों की आस्था का बड़ा केन्द्र बना हुआ है। महाराज दशरथ ने जब रानी कैकेयी की इच्छा पर श्रीराम को वनवास जाने का आदेश दिया तो साथ में पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण भी चल दिये। अयोध्या से चलते हुये प्रभु श्रीराम श्रृंगवेरपुर पंहुचे, जो निषादराज गुह की राजधानी थी। प्रभु को यहां रात्रि विश्राम करना पड़ा, क्योंकि यहां से आगे जाने के लिये उनको गंगा नदी पार करना था। निषादराज गुह को जैसे ही प्रभु श्रीराम के आने का समाचार मिला तो वह तमाम प्रकार के फल, पुष्प आदि उपहार लेकर प्रभु से मिलने आये और प्रभु श्रीराम से महल में चल कर रुकने का आग्रह किया लेकिन राम द्वारा वनवास की बात बताने पर निषादराज सब को राम चैरा नामक स्थान पर लेकर आये और सिंसुपा वृक्ष के नीचे उनके रहने की व्यवस्था की। आज भी उस स्थल पर मौजूद 5 शीशम के वृक्षों की लोग पूजा और परिक्रमा करते हैं। रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन श्री राम, लक्ष्मण और सीता जी समीप के घाट से नाव द्वारा गंगा नदी पार कर प्रयागराज होते हुए चित्रकूट की ओर चले गये। गंगा नदी का वह स्थल आज रामघाट के नाम से विख्यात है।

राम केवट संवाद
भगवान राम नदी पार करने के लिये नाव वाले केवट को बुलाते हैं लेकिन वह आने से मना कर देता है। वह प्रभु से कहता है कि लोग कहते हैं कि आपके चरण कमलों के स्पर्श से पत्थर भी स्त्री बन जाती है मेरी नाव तो लकड़ी की है जो पत्थर से भी मुलायम है। यदि मेरी नाव स्त्री बन गई तो आप नदी पार नहीं हो पायेंगे और मेरी रोजी—रोटी मारी जायेगी परन्तु प्रभु के अनुरोध पर केवट इस शर्त पर तैयार होता है कि हम पहले आपके पैर पखारेंगे उसके बाद नाव पर बिठायेगें। प्रभु सहजता से तैयार हो जाते हैं और केवट प्रभु के चरणों को धोने के बाद गंगा नदी पार कराता है। श्रृंगवेरपुर के नाविक समाज के लोग अपने को उसी केवट का वंशज बताते हैं और बड़े आदर भाव के साथ तीर्थयात्रियों का सम्मान करते हैं।

सीता जी ने मुदरी उतारी
केवट प्रभु श्री राम सहित माता सीता और लक्ष्मण को गंगा नदी पार कराता है। नाव से उतारने के बाद वह प्रभु को प्रणाम कर वापस लौटने की मुद्रा में आता है। भगवान राम, जो सब कुछ त्याग कर संन्यासी वेष में वनवास जा रहे हैं, बहुत ही निराश होते हैं कि उनके पास नाव उतराई देने के लिये तो कुछ नहीं है, लेकिन तभी सीता जी को इसका आभास होता है और वह अपनी रत्न जडि़त मुदरी (अंगूठी) उतार कर राम के हाथों पर उतराई देने के लिये रख देती है, लेकिन केवट उतराई लेने से मना करके कहता है कि आप जब वापस आयेंगे तो जो कुछ भी देंगे उसे हम प्रसाद मानकर ले लेंगे।
मां गंगा से कुशलता की मनौती

श्रृंगवेरपुर से जुड़ी एक अन्य कथा में कहा गया है कि गंगा नदी पार करने के बाद सीता जी ने मां गंगा से हाथ जोड़ कर प्रार्थना की कि हे मां मेरा मनोरथ पूरा कीजिएगा, जिससे मैं पति और देवर के साथ लौट कर आपकी पूजा करूं। कथाओं में वर्णन है कि मां गंगा ने आशीर्वाद देते हुये कहा था कि तुम अपने प्राणनाथ और देवर के साथ कुशलतापूर्वक अयोध्या लौटोगी। तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी और तुम्हारा सुंदर यश पूरे विश्व में फैलेगा। मान्यता है कि श्रृंगवेरपुर ही एकमात्र स्थान है जहां सीता जी ने मां गंगा से सीधा संवाद किया था। 14 वर्ष के वनवास और लंका विजय के बाद पुष्पक विमान से अयोध्या वापस लौट रहे प्रभु श्री राम जब श्रृंगवेरपुर के पास आये तो माता सीता ने उन्हें याद दिलाया कि केवट की उतराई और मां गंगा का पूजन करना है। श्रीराम का पुष्पक विमान श्रृंगवेरपुर उतरा, जहां उन्होंने मां गंगा की पूजा अर्चना की और केवट समाज को विभिन्न प्रकार के उपहार बांटे। भगवान श्रीराम और माता सीता ने श्रृंगवेरपुर में लोक मर्यादा और सामाजिक समरसता का जो संदेश दिया वह आज भी प्रासंगिक और ग्राह्य है।

निषादराज पार्क
प्रयागराज में आयोजित होने वाले महाकुंभ और कुंभ के अवसरों पर श्रृंगवेरपुर का मान बढ़ जाता है जिसके कारण श्रृंगवेरपुर आज एक प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शामिल हो गया है। प्रयागराज महाकुंभ, 2025 से ठीक पहले श्रृंगवेरपुर में निषादराज पार्क बना है। लगभग 20 एकड़ भूमि पर 165 करोड़ की लागत से तैयार निषादराज पार्क प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ड्रीम प्रोजेक्ट था। पार्क की संरचना इतनी भव्य और दिव्य है कि वहां आने वाले श्रद्धालुओं को त्रेतायुग के उस भावपूर्ण दृश्य का आभास होता है जब प्रभु श्रीराम इस पावन स्थली पर पधारे और निषादराज उन्हें चित्रकूट जाने के लिये अपनी नाव से गंगा पार कराते हैं। पार्क की दीवारों पर पत्थरों को उकेर कर खूबसूरत नक्कशी से श्री राम के वनगमन की यात्रा का दृश्य और प्रयागराज स्थित महर्षि भारद्वाज के आश्रम का वह दृश्य भी दिखाया गया है जिसमें प्रभु श्रीराम महर्षि के समीप बैठे दिख रहे हैं। पार्क में सबसे आकर्षक 51 फीट की वह ताम्र प्रतिमा है जिसमें धनुर्धारी श्रीराम और निषादराज गले मिलते दिखायी पड़ते हैं। समीप में भाव विह्वल करने वाला वह दृश्य भी है जिसमें अयोध्या से वनवास को निकले श्रीराम नंगे पांव चल रहे हैं और उनके पीछे सीता जी और उनके पीछे लक्ष्मण जी चल रहे हैं। वहीं इन सबके पीछे विलाप करते चल रहे वह अयोध्यावासी भी हैं, जो बार—बार श्रीराम से अनुनय विनय कर लौटने का आग्रह कर रहे हैं। प्रवेश द्वार से अंदर जाते ही सामने वह दृश्य दिख जाता है जिसमें केवट अपनी नाव से प्रभु श्रीराम को गंगा पार करा रहे हैं। श्रीराम और सीता जी नाव पर बैठे हैं, तो लक्ष्मण और निषादराज खड़े हैं। पार्क के दूसरे छोर पर चित्रकूटधाम की उस कुटिया का मार्मिक दृश्य है जहां श्रीराम और माता सीता बैठी हैं और लक्ष्मण जी सुरक्षा प्रहरी के रूप में धनुष लिये खड़े हैं। तमाम मार्मिक दृश्यों का साक्षी यह पार्क आज तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बिन्दु है।

श्रृंगी ऋषि का मंदिर
प्राचीन स्थलों में श्रृंगी ऋषि मंदिर बहुत महत्वपूर्ण स्थल है। यहां बने मन्दिर में श्रृंगी ऋषि और माता शांता देवी की प्रतिमा है। तीर्थ—पुरोहितों का मानना है कि श्रृंगी ऋषि के निवास के कारण ही इस स्थल का नाम श्रृंगवेरपुर पड़ा। सरकार द्वारा करायी गयी खुदायी में यहां श्रृंगी ऋषि के मन्दिर के अवशेष मिले हैं। ऐसा माना जाता है कि श्रृंगी ऋषि ने यहां लम्बे समय तक रह कर साधना की थी और राजा दशरथ के अनुरोध पर पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था। इस मन्दिर में वैसे तो सैकड़ों की संख्या में प्रतिदिन श्रद्धालु आते हैं, लेकिन प्रमुख स्नान पर्वो एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या के अतिरिक्त आषाढ माह की सप्तमी और कार्तिक पूर्णिमा को विशाल मेला लगता है। यहां दूरदराज से लोग संतान की कामना लेकर आते हैं और पूजा अर्चना के साथ परम्परागत रोट (पूड़ी) और खीर का प्रसाद चढाते हैं और परिवार के सभी लोग उसे ग्रहण करते हैं। हाल के वर्षो में सरकार द्वारा मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया गया है तथा मन्दिर में माता शीतला की भी मूर्ति स्थापित है।

राम शयन स्थल धाम
राम शयन स्थल धाम, जो रामचैरा के नाम से प्रसिद्ध है, भी उन प्रमुख स्थलों में शामिल है,जहां श्रद्धालु और पर्यटक अवश्य पंहुचते हैं। यह स्थल विकसित हो रहे श्रृंगवेरपुर धाम से दो किमी दूर है। मान्यता है कि प्रभु श्रीराम ने माता सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ सिंसुपा (शीशम) के वृक्ष के नीचे ही रात्रि में विश्राम किया था। उस स्थल पर आज 5 शीशम के वृक्ष मौजूद हैं। लोग इन वृक्षों की पूजा और परिक्रमा करते हैं। रामचैरा के नाम से विख्यात शयन स्थल पर एक चबूतरा और एक मन्दिर है। चबूतरे को चैरा यानि ‘जहां संवाद होÓ कहा जाता है। अनुमान किया जाता है कि राम केवट संवाद यहीं हुआ होगा। इसी के पास गंगा का रामघाट है, जहां से प्रभु नाव द्वारा गंगा पार कर चित्रकूट के जंगल की ओर चले गये थे।

हनुमानगढी मंदिर
राम शयन स्थल के पास ही हनुमानगढी मन्दिर है। यहां हनुमान जी लेटे हुए हैं। यहां हनुमान जी की प्रतिमा 12 मुखी है। कहा जाता है कि यह देश की एकमात्र बारहमुखी हनुमान जी की प्रतिमा है। यहां तमाम शिवलिंग भी हैं, जो सिंदूर से लेपित हैं। मंदिर में हनुमान जी के अतिरिक्त कुछ अन्य देवी—देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित हैं। बताया जाता है कि यह मन्दिर भी प्राचीन मन्दिरों में से एक है।

इस प्रसिद्ध पौराणिक स्थल के संबंध में एक तथ्य यह भी है कि प्रदेश में जो भी सरकारें रही हैं वे इस पावन तीर्थस्थल के विकास के लिये कुछ न कुछ प्रयास अवश्य करती रही हैं। यही कारण है कि आज श्रृंगवेरपुर प्रमुख स्थलों में गिना जाने लगा है। प्रयागराज महाकुंभ से पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा श्रृंगवेरपुर कारिडोर और निषादराज पार्क की स्थापना करायी गई है। पार्क में श्रीराम और निषादराज की गले मिलते मूर्ति के सहारे देश को सामाजिक समरसता का संदेश देने का प्रयास किया गया है।