नशा धन, परिवार और कुल नष्ट करता है

प्रो. लल्लन प्रसाद
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री


मादक पदार्थों का सेवन मानव सभ्यता के साथ जुड़ा हुआ है, भारत इसका अपवाद नहीं है। प्राचीन ग्रंथो में इसका विवरण मिलता है, ऋग्वेद में सोम और सुरा का उल्लेख है, सोम को पवित्र औषधि माना गया है जो देवताओं को प्रिय है, सुरा वह पेय है जो सामान्य जन मादकता के लिए पीते हैं जो पाप और भ्रम का कारण बनता है। इसे क्रोध और जुए के समान प्रमाद का स्रोत कहा गया है। मनुस्मृति में सुरापन को पांच बड़े पापों में एक, ब्रह्म हत्या के समान गंभीर अपराध माना गया है। भगवत गीता में इसे तामसिक आहार की श्रेणी में रखा गया है। चरक संहिता में इसके गुण दोष का विवरण है, सही मात्रा और विधि से उपयोग करने पर यह लाभकारी हो सकता है अन्यथा जहर तुल्य। कौटिल्य अर्थशास्त्र में इसे पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया गया है, इसके राज्य द्वारा नियंत्रित उपयोग- जिसका स्वास्थ्य पर बुरा असर न पड़े और समाज के लिए अहितकर न हो, पर बल दिया गया है। मदिरापान की आदत को कामज (कमोत्तोजित करने वाला) व्यसन की संज्ञा दी गयी है। सार्वजनिक स्थानों में पीने पर रोक, राज्य द्वारा नियुक्त सुराध्यक्ष के प्रबंधन में मदिरालयों की स्थापना जहां पीने वालों के लिए सुगंधित वातावरण में बैठने, लेटने, सोने की व्यवस्था हो जो सभी मौसमों में सुखद हो।

विभिन्न प्रकार की मदिरा के निर्माण की विधि एवं सामग्री का भी विस्तृत विवरण अर्थशास्त्र में मिलता है जो प्राकृतिक वस्तुओं जैसे चावल, पि_ी, अंगूर, शहद ,केसर, पीपल, मिर्च, गुड, त्रिफला, इलायची, मुलेठी, वृक्षों की छाल और फूलों आदि से बनाए जाते थे। उत्सवों, विवाह-शादी आदि में पीने की व्यवस्था के पहले राज्य की अनुमति लेनी आवश्यक बताई गई है। मदिरा का निर्माण, व्यापार और वितरण राज्य के नियंत्रण में ही हो, जो लोग सरकारी नियमों का उलंघन करें उनके लिए कड़े दंड की व्यवस्था होनी चाहिए। बौद्ध ग्रंथों में मदिरापान को महादोष कहा गया है।

जातक माला में कुंभ जातक नाम की एक घटना का विवरण मिलता है जिसमें बोधिसत्व एक फूलों से आच्छादित सुंदर कलश में मदिरा लेकर राजा सर्व मित्र की सभा में पहुंचे जहां सुरापन का दौर चल रहा था और राजा स्वयं भी मद्यपान कर रहा था। राज्य का खजाना खाली हो रहा था और जनता त्रस्त थी। बोधिसत्व ने राजा से कहा मैं यह घड़ा बेचने आया हूं, राजा ने पूछा इसमें क्या है, उत्तर में उन्होंने कहा कि इसमें कोई तीर्थ जल नहीं है, ना कोई सुगंधित पेय है, इसमें वह वस्तु है जिसे पीकर आदमी अपना होश खो बैठता है, राजमार्ग पर वमन कर सकता है, माता-पिता और बड़ों का अनादर कर सकता है, धन संपत्ति और कुल का नाश कर देता है। नारी यदि इसका उपभोग करे तो अपने पति और परिवार का अनादर कर सकती है ऐसी वस्तु इस घड़े में भरी है। मैं यह घड़ा आपको बेचना चाहता हूं यदि आप परलोक में होने वाले दुख और इह लोग में आने वाली भारी विपत्तियों से भयभीत नहीं है। राजा उनके हृदयाकर्षक युक्ति- युक्त वचनों को सुनकर मद्यपान के दोष जान गए और वादा किया कभी भी सुरा पान न करने का।

आधुनिक युग में मादक पदार्थों की तो बाढ़ सी आ गई है। मदिरा (शराब), भांग, गांजा, अफीम का सेवन तो पहले से होता आ रहा है। गांवों में चारपाई पर बैठकर हुक्का पीने, शिव भक्तों द्वारा ठंडाई के साथ भांग की गोली लेने, काल भैरव को मदिरा चढाने और प्रसाद स्वरूप पीने की प्रथा पुरानी है, आमतौर से उतनी ही मात्रा में ली जाती हैं जो स्वास्थ्य और समाज के लिए समस्याएं ना पैदा करें। एल्कोहलिक ड्रिंक अंग्रेजी शराब- व्हिस्की, वोडका, रम, ब्रांडी, वाइन, बियर की खपत पूरी दुनिया में बढ़ती जा रही है। महुआ, गन्ना, ताड़ी आदि से बनी देसी शराब गरीबों का पेय है जो अंग्रेजी शराब से सस्ता होता है। चोरी छिपे अवैध रूप से बनाई गई शराब लाखों परिवार प्रतिवर्ष बर्बाद करती है। नशा चढ़ जाने पर पीने वाले द्वारा अपनी पत्नी और बच्चों को पीटने, पैसे की कमी होने पर चोरी, छिनारी और हत्या जैसे अपराध करने जैसी घटनाएं सुनने में आती हैं। सिगरेट, कोकीन, फेंटनिल, मेक्ष जैसे हानिकारक, तीव्र उत्तेजक नशीले पदार्थों- ङ्रग्स का सेवन तेजी से बढ़ रहा है। प्राकृतिक वस्तुओं की जगह सिंथेटिक ड्रग्स ले रहे हैं जो लैबोरेट्रीज में तैयार किए जाते हैं, धूम्रपान और इंजेक्शन के जरिए भी शरीर में डाले जाते हैं। क्लबों, उत्सवों, त्यौहारों और शादी ब्याह में इनका चलन बढ़ रहा है, सार्वजनिक पार्कों, छात्रावासों में नौजवान लड़के-लड़कियां इनका इस्तेमाल करती देखी जा रही है। रंग शालाओं, पार्टियों, होटलों, रेस्टोरेंट्स में खुलकर पीना, संपन्न परिवारों में सभी उम्र के लोगों का एक साथ बैठकर पीना भी फैशन बनता जा रहा है। पीने वाले इसे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में देखने लगे हैं।

दर्द से राहत पाने, गम भुलाने, अच्छी नींद सोने की आड़ में कंपनियों द्वारा बहुत से ड्रग परोसे जा रहे हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। ड्रग्स अपराधिक मानसिकता को जन्म देता है जो व्यक्ति, परिवार, समाज और देश के लिए घातक है। चोरी, डकैती, मारपीट, हत्या जैसे कितने ही मामले आए जिन सामने आते हैं जो ड्रग्स के आदी लोगों द्वारा किए जाते हैं। भारत जैसे देश जहां जीवन में धर्म की प्रधानता रही है नशीले पदार्थों का बढ़ता उपयोग पश्चिम की देन है।अमेरिका और यूरोप के संपन्न राष्ट्र इससे पीडि़त है अपराधिक घटनाएं वहां बड़े पैमाने पर होती हैं। वैश्विक स्तर पर ड्रग्स सिंडिकेट काम कर रहे हैं जो दुनिया भर में ड्रग्स की तस्करी कराते हैं, अपराधियों को बढ़ावा देते हैं उनकी सुरक्षा करते हैं, नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों से तालमेल बैठाकर ड्रग्स सेवन का प्रचार और प्रसार करते हैं। अवैध ड्रग्स मुख्य रूप से कोलंबिया, बोलोविया और दक्षिण पूर्व एशिया में प्रयोगशालाओं और गुप्त स्थानों में निर्मित किए जाते हैं। ड्रग्स की सबसे अधिक खपत संयुक्त राज्य अमेरिका में है। विश्व ड्रग्स बाजार लगभग विश्व की जीडीपी का एक प्रतिशत से अधिक है।
मादक पदार्थ मनुष्य को क्षणिक सुख देते हैं किंतु दूरगामी दुर्गति और दुख के कारण बनते हैं। इनको लेने के तीन चरण होते हैं: पहले चरण में व्यक्ति प्रसन्नता एवं ऊर्जा महसूस करता है, दूसरे चरण में विवेक और अज्ञान के बीच का अंतर घटने लगता है और तीसरे चरण में उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है और वह पशुवत व्यवहार करने लगता है, अपराधिक कार्यों की ओर अग्रसर होता है। आदमी पहले शराब पीता है फिर शराब उसे पीने लगती हैं और नशीले पदार्थों का बढता सेवन समाज को दीमक की तरह खा रहा है। व्यक्ति का तो यह जीवन तत्व नष्ट करती है, उसके शरीर को दुर्बल करती है, मन पर आघात करती है, कुत्सित संस्कारों को जन्म देती है, परिवार और समाज में उसे घृणा का पात्र बना देती है। सरकारों के लिए यह राजस्व का बड़ा साधन है जिससे इस पर अंकुश लगाने के उतने प्रयास नहीं किए जाते जो आवश्यक हैं। महात्मा गांधी शराब पीने को एक गंभीर अपराध मानते थे। उनका कहना था कि रोमन साम्राज्य और कितने ही और साम्राज्य दुनिया में शराबी शासको और प्रशासनिक अधिकारियों के कारण नष्ट हो गए। शराब पीने वाले अपनी तर्क शक्ति खो बैठते, हैं उनका नैतिक, बौद्धिक और आर्थिक पतन हो जाता है।

भारतीय संविधान के राज्य की नीति निर्धारक अनुच्छेद 47 में निर्देश दिया गया है कि राज्य सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधार के लिए कदम उठाएं और नशीले तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पदार्थों के सेवन पर रोक लगाएं। संविधान की सातवीं सूची में शराब को राज्य का विषय माना गया है, इसके उत्पाद खरीद-बिक्री पर राज्य का नियंत्रण होगा, राज्यों को इसके लिए कानून बनाने का अधिकार दिया गया। नशे की समस्या सभी राज्यों में है, कुछ कुछ में कम, कुछ मैं अधिक। एम्स के एक सर्वेक्षण के अनुसार केरल, मणिपुर, मिजोरम और तमिलनाडु में पूर्ण नशाबंदी के कानून बने थे किंतु बाद में उन्हें रद्द कर दिया गया या ढील दे दी गई। जिन राज्यों में पूर्ण नशाबंदी लागू है वहां भी पूरी तरह प्रभावी नहीं है।भौतिकवादी दृष्टिकोण, आत्म संयम का अभाव, एकल परिवारवाद, उपभोक्तावाद, नैतिक मूल्यों में गिरावट, रूढि़वादी परंपराएं, अशिक्षा और अज्ञानता नशाबंदी के रास्ते में रोडे हैं। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार ने 15 अगस्त 2020 को नशा मुक्त भारत अभियान शुरू किया। मादक पदार्थों के प्रति जागरूकता एवं इनका सेवन रोकने और इलाज के लिए नशा मुक्ति केंद्रों की स्थापना की, 272 जिले इसके लिए चुने गए। नशा मुक्ति उपचार की जो विधियां अपनाई जा जाती हैं उसमें संज्ञानात्मक व्यवहारिक चिकित्सा, व्यक्तिगत परामर्श, समूह चिकित्सा, पुनरावृति रोकथाम चिकित्सा, योग चिकित्सा आदि शामिल हैं। अभियान आंशिक रूप से ही सफल है, व्यक्ति, समाज और राज्य प्रशासन तीनों स्तरों पर दृढ़ संकल्प और ठोस प्रयास की आवश्यकता है।