पद्मनाभ स्वामी मंदिर को मिला उसका अधिकार कैसे मुक्त होंगे शेष मंदिर ?

सुरेश चिपलूनकर
लेखक प्रसिद्ध ब्लॉगर और लेखक हैं।


आठ-नौ वर्ष की लंबी कानूनी लड़ाई के पश्चात् हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय सुनाया है कि केरल स्थित स्वामी पद्मनाभ मंदिर के प्रबंधन एवं निर्णय में त्रावनकोर के महाराज मार्तंड वर्मन राजवंश की ही प्रमुख भूमिका रहेगी। इस निर्णय का सभी सनातनधर्मियों में ह्रदय से स्वागत किया है। जैसा कि सभी जानते हैं 2011 में वामपंथ-काँग्रेस और विधर्मियों ने मिलकर इस मंदिर की अकूत सम्पदा हड़पने के लिए एक कुटिल षड्यंत्र किया था, जिसके कारण केरल हाईकोर्ट ने मंदिर में स्थित धन-सम्पदा से लबालब भरे कई तहखानों को खोलकर वहाँ से निकलने वाली संपत्ति के लिए एक शासकीय अधिकारी, एक रिटायर्ड न्यायाधीश एवं एक महालेखाकार को नियुक्त किया गया था।

जिस समय केरल हाईकोर्ट का यह निर्णय आया था, उसी समय से सनातन धर्मियों के मन में इस बात को लेकर तीव्र आशंकाएं व्यक्त की जाने लगी थीं कि अब चूँकि जिस राजवंश ने सैकड़ों वर्षों से पद्मनाभ मंदिर के इस विपुल खजाने की प्राणपण, सत्यता एवं ईमानदारी से रक्षा की है, वह लूटा जाएगा अथवा कु-प्रबंधित किया जाएगा। राजवंश के उत्तराधिकारियों एवं भगवान विष्णु के परम भक्तों ने हाईकोर्ट के इस अप्रासंगिक निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। तमाम परम्पराओं का हवाला दिया। एवं सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि सरकारी संरक्षण में चल रहे देश के प्रमुख मंदिरों की संपत्ति की लूट, मंदिरों की भूमि में हेराफेरी एवं सनातन धर्मियों द्वारा मंदिरों को प्राप्त दान के बेहद घटिया प्रबंधन एवं सनातन का पैसा विधर्मियों पर लुटाने की घृणित प्रवृत्ति को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उजागर किया। अंतत: सुप्रीम कोर्ट को यह मानना पड़ा कि वास्तव में यदि स्वामी पद्मनाभ मंदिर का प्रबंधन सरकारी हाथों में चला गया, तो इसकी खरबों रूपए की संपत्ति को बर्बाद होने से कोई बचा नहीं सकेगा। खासकर यह बिंदु निर्णयात्मक सिद्ध हुआ कि सैकड़ों वर्षों से त्रावणकोर के मार्तंड राजवंश ने इस खजाने का उपयोग कभी भी एवं कहीं भी अपने निजी उपयोग हेतु नहीं किया और ना ही मंदिर के प्रबंधन में ऐसी कोई लूट मचाई, जिसके कारण इस व्यवस्था में नाहक ही सरकारी टांग अड़ाई जाए।

केरल के विश्वप्रसिद्ध स्वामी पद्मनाभ मन्दिर के तहखानों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत खोला गया, और जैसी कि खबरें छन-छनकर आ रही हैं (या जानबूझकर लीक करवाई जा रही हैं) उनके अनुसार यह खजाना लगभग एक लाख करोड़ से भी अधिक हो सकता है। मन्दिर के तहखानों से मिली वस्तुओं की सूची में भगवान विष्णु की एक भारी-भरकम सोने की मूर्ति, ठोस सोने के जवाहरात मढ़े हुए नारियल, कई फुट लम्बी सोने की मोटी रस्सियाँ, कई किलो सोने के बने हुए चावल के दाने, सिक्के, गिन्नियाँ, मुकुट एवं हीरे मिलने का सिलसिला लंबे समय तक जारी रहा था।

उल्लेखनीय है कि भगवान पद्मनाभ का यह मन्दिर बहुत प्राचीन काल से करोड़ों विष्णु भक्तों की आस्था का केन्द्र रहा है। त्रावणकोर के महाराजा मार्तण्ड वर्मन का राजवंश भगवान पद्मनाभ स्वामी का बहुत बड़ा भक्त रहा है, इस राजवंश ने अपनी सारी सम्पत्ति तथा भक्तों द्वारा भेंट की गई बहुमूल्य सामग्रियों को मन्दिर के नीचे 6 तहखानों में छिपा रखा था। त्रावणकोर राजवंश ने सन 1750 में ही पूरे घराने को पद्मनाभ दास घोषित कर दिया था, इस घराने की रानियाँ पद्मनाभ सेविनी कहलाती हैं। कांग्रेस-सेकुलरों तथा वामपंथी सरकारों द्वारा जिस तरह से लगातार हिन्दू आस्थाओं की खिल्ली उड़ाना, हिन्दू मन्दिरों की धन-सम्पत्ति हड़पने की कोशिशें करना, हिन्दू सन्तों एवं धर्माचार्यों को अपमानित एवं तिरस्कारित करने का जो अभियान चलाया जा रहा था, एवं वह किसके इशारे पर हो रहा था यह न तो बताने की जरुरत है और न ही हिन्दू इतने बेवकूफ हैं जो यह समझ न सकें। उदाहरण स्वरूप कांची के शंकराचार्य जी को ऐन दीपावली की रात को गिरफ़्तार किये जाने से लेकर, उड़ीसा में स्वामी लक्षमणानन्द सरस्वती की हत्या, नित्यानन्द को सैक्स स्कैण्डल में फाँसना, स्वामी असीमानन्द को बम विस्फोट के झूठे आरोप में घसीटना, साध्वी प्रज्ञा को हिन्दू आतंकवादी दर्शाना तथा विभिन्न साधु-संतों को मीडिया में ठग, लुटेरा इत्यादि प्रचारित करवाना जैसी फेहरिस्त लगातार जारी रहीं। इसी कड़ी में ताजा मामला था स्वामी पद्मनाभ मन्दिर का।

एक याचिकाकर्ता टीपी सुन्दरराजन (पता नहीं यह असली नाम है या कोई छिपा हुआ धर्म-परिवर्तित ईसाई है) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके स्वामी पद्मनाभ मन्दिर ट्रस्ट की समस्त गतिविधियों तथा आर्थिक लेनदेन को पारदर्शी बनाने हेतु मामला दायर किया था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार दो जज श्री एमएन कृष्णन तथा सीएस राजन, केरल के मुख्य सचिव के जयकुमार, मन्दिर के मुख्य प्रशासक हरिकुमार, पुरातत्त्व विभाग के एक अधिकारी तथा त्रावणकोर राजवंश के दो प्रमुख सदस्यों की उपस्थिति में तहखानों को खोलने तथा निकलने वाली वस्तुओं की सूची एवं मूल्यांकन का काम शुरु किया गया। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश था कि जब तक सूची पूरी करके न्यायालय में पेश न कर दी जाए, तब तक किसी अखबार या पत्रिका में इस खजाने का कोई विवरण प्रकाशित न किया जाए, परन्तु इसके बावजूद सबसे पहले एक कथित सेकुलर पत्रिका मलयाला मनोरमा ने इस आदेश की धज्जियाँ उड़ाईं और भगवान विष्णु की मूर्ति की तस्वीरें तथा सामान की सूची एवं उसके मूल्यांकन सम्बन्धी खबरें प्रकाशित कीं। हिंदुओं को बदनाम करने के लिए चटखारे ले-लेकर बताया गया कि मन्दिर के पास कितने करोड़ की सम्पत्ति है, इस धन का कैसे कथित सदुपयोग किया जाए इत्यादि। हालांकि न तो याचिकाकर्ता ने और न ही मलयाला मनोरमा ने आज तक कभी भी चर्च की सम्पत्ति, उसे मिलने वाले भारी-भरकम विदेशी अनुदानों, चर्च परिसरों में संचालित की जा रही व्यावसायिक गतिविधियों से होने वाली आय तथा विभिन्न मस्जिदों एवं मदरसों को मिलने वाले जकात एवं खैरात के हिसाब-किताब एवं ‘पारदर्शिताÓ पर कभी भी माँग नहीं की। जाहिर है कि ऐसी कथित पारदर्शिता सम्बन्धी सेकुलर मेहरबानियाँ सिर्फ हिन्दुओं के खाते में ही आती हैं।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि- 1) सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त इस समिति में उपस्थित किसी भेदिये के अलावा मन्दिर का कौन सा कर्मचारी इन हिन्दू विरोधी ताकतों से मिला हुआ है? 2) क्या सुप्रीम कोर्ट मलयाला मनोरमा के खिलाफ अदालत की अवमानना का मुकदमा दर्ज करेगा? 3) क्या इस विशाल खजाने की गिनती और सूचीबद्धता की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई थी? 4) मलयाला मनोरमा जैसी चर्च पोषित पत्रिकाएं मन्दिर और तहखानों के नक्शे बना-बनाकर प्रकाशित कर रहे थीं, ऐसे में सुरक्षा सम्बन्धी गम्भीर सवालों को क्यों नजरअन्दाज किया गया, क्योंकि खजाने की गिनती और मन्दिर में हजारों दर्शनार्थियों के नित्य दर्शन एक साथ ही चल रहे थे। इस विशाल धन-सम्पत्ति की मात्रा और मन्दिर में आने वाले चढ़ावे की राशि को देखते हुए, क्या किसी आतंकवादी अथवा माफिया संगठन के सदस्य दर्शनार्थी बनकर इस स्थान की रेकी नहीं कर सकते? तब इन सेकुलर-वामपंथी पत्रकारों एवं अखबारों को यह विस्तृत जानकारी प्रकाशित करने का क्या अधिकार था?

यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि त्रावणकोर राजवंश के सभी सदस्यों को इस खजाने के बारे में पीढिय़ों से जानकारी थी, परन्तु भारत के वर्तमान राजनैतिक राजवंशों की तरह, क्या मार्तण्ड वर्मा राजवंश ने इस सम्पत्ति को स्विस बैंक में जमा किया? नहीं किया। राजवंश के वारिस चाहते तो आराम से ऐसा कर सकते थे, लेकिन उन्होंने सारी सम्पत्ति भगवान पद्मनाभ मन्दिर को दान देकर, उसका कुछ हिस्सा भक्तों की सुविधा एवं सहूलियत तथा मन्दिर के विभिन्न धार्मिक संस्कारों एवं विकास के लिये उपयोग किया। इतने बड़े खजाने की जानकारी और कब्जा होने के बावजूद त्रावणकोर राजवंश द्वारा अपनी नीयत खराब न करना क्या साबित करता है? जाहिर है कि मार्तण्ड वर्मा राजवंश ने इस सम्पत्ति को पहले मुगलों की नीच दृष्टि से बचाकर रखा, फिर अंग्रेजों को भी इसकी भनक नहीं लगने दी, और अब सेकुलर-वामपंथी गठजोड़ की लूट से भी इस खजाने की रक्षा की हैा। पाठक स्वयं ही सोचें कि यदि आप अपनी श्रद्धानुसार कोई बहुमूल्य वस्तु अपने भगवान को अर्पित करते हैं, तो वह मन्दिर की सम्पत्ति होना चाहिए, परन्तु ऐसा है नहीं। मन्दिरों-मठों की विशाल सम्पत्ति पर सेकुलरिज़्म और वामपंथी-मिशनरी की काली नीयत का साया पड़ चुका है, ये लोग सत्य साँई ट्रस्ट पर भी नजरें गड़ाये हुए हैं और मौका पाते ही निश्चित रूप से उसे सरकारी ट्रस्ट बनाकर उसमें घुसपैठ करेंगे। यह काम पहले भी मुम्बई के सिद्धिविनायक ट्रस्ट में कांग्रेसियों एवं शरद पवार की टीम ने कर दिखाया है।

तात्पर्य यह कि आप जो भी पैसा मन्दिरों में यह सोचकर दान करते हैं कि इससे गरीबों का भला होगा या मन्दिर का विकास होगा तो आप बहुत ही भोले और मूर्ख हैं। जो पैसा या अमूल्य वस्तुएं आप मन्दिर को दान देंगे, वह किसी सेकुलर या वामपंथी की जेब में पहुँचेगी अथवा इस पैसों का उपयोग हज के लिए सब्सिडी देने, नई मस्जिदों के निर्माण में सरकारी सहयोग देने, ईसाईयों को बेथलेहम की यात्रा में सब्सिडी देने में ही खर्च होने वाला है। रही मन्दिरों में सुविधाओं की बात, तो सबरीमाला का हादसा अभी सबके दिमाग में ताजा है। केरल में हमेशा से सेकुलर-वामपंथी गठजोड़ ही सत्ता में रहा है, जो पिछले 60 साल में इन पहाडिय़ों पर पक्की सीढिय़ाँ और पीने के पानी की व्यवस्था तक नहीं कर पाया है, जबकि अय्यप्पा स्वामी के इस मन्दिर से देवस्वम बोर्ड को प्रतिवर्ष करोड़ों की आय होती है। लगभग यही स्थिति तिरुपति स्थित तिरुमाला के मन्दिर ट्रस्ट की है, जहाँ सुविधाएं तो हैं परन्तु ट्रस्ट में अधिकतर राजशेखर रेड्डी के ईसाई चमचे भरे पड़े हैं जो मंदिर में आने वाले धन का मनमाना दुरुपयोग करते हैं।

देश की आजादी के समय पूरे देश में चर्चों के संचालन-संधारण की जिम्मेदारी पूरी तरह से विदेशी आकाओं के हाथ मे थी, जबकि यहाँ उनके भारतीय नौकर चर्चों का सारा हिसाब-किताब देखते थे। 60 साल बाद भी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया है और सभी प्रमुख बिशपों का नामांकन सीधे वेटिकन से होता है तथा चर्च व मिशनरी की अधिकांश सम्पत्ति पर नियन्त्रण विदेश से एवं विदेशी बिशपों द्वारा ही होता है। जाहिर है कि चर्च की अकूत सम्पत्ति एवं कौडिय़ों के मोल मिली हुई खरबों रुपये की जमीन पर जो व्यावसायिक गतिविधियाँ संचालित होती हैं, उसकी जाँच अथवा बिशपों के घरों में बने तहखानों की तलाशी जैसा दुष्कृत्य, सेकुलरिज़्म के नाम पर कभी नहीं किया जाता।

भक्तों ने यह सुझाव भी दिया था कि यदि सुप्रीम कोर्ट मंदिर के इस अकूत धन को सरकार को सौंप देता है, तो यह निर्देश भी जारी करे कि इस संपत्ति की रक्षा हेतु इसका एक ट्रस्ट बनाया जाए, जिसकी अध्यक्षता केवल और केवल सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश करें एवं इसके ब्याज से प्राप्त आय के समस्त खर्चों पर एक समिति निगरानी रखे जिसमें केन्द्रीय सतर्कता आयोग भी शामिल हो। फिलहाल इस विशाल फण्ड के कुछ हिस्से से भारत की पूरी सीमा पर मजबूत इलेक्ट्रानिक बाड़ लगाई जाए, 200 ड्रोन विमान खरीदे जाएं, 400 स्पीड बोट्स खरीदी जाएं जो केरल के सभी प्रमु्ख समुद्र तटों और बन्दरगाहों पर तैनात हों, सीमा पर तैनात होने वाले प्रत्येक सैनिक को 50,000 रुपये का बोनस दिया जाए, पुलिस विभाग के सभी एनकाउंटर ्रञ्जस् दलों के सदस्यों को 25,000 रुपये दिए जाएं, देश के सभी शहरी पुलिस थानों को 4-4 और ग्रामीण थानों को 2-2 तेज और आधुनिक जीपें दी जाएं, तथा एके-47 के समकक्ष रायफल बनाने वाली भारतीय तकनीक विकसित कर बड़ा कारखाना लगाया जाए। इतना करने के बाद भी बहुत सा पैसा बचेगा जिसे सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कें बनाने, वॉच टावर लगाने, प्रमुख नदियों में नहरों का जाल बिछाने, नक्सल प्रभावित इलाकों में बिजली-सड़क पहुँचाने जैसे कामों में लगाया जाए।। इसमें शर्त सिर्फ एक ही है कि इन खर्चों पर नियन्त्रण किसी स्वतन्त्र समिति का हो, वरना सेकुलर-वामपंथी गठजोड़ इसका उपयोग कहीं और कर लेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने इस खजाने की रक्षा एवं इसके उपयोग के बारे में सुझाव माँगे हैं। सेकुलरों एवं वामपंथियों के दुर्भावनापूर्ण एवं उसे काला धन बताकर सरकारी खाते में जमा कर देने सम्बन्धी मूर्खतापूर्ण सुझाव तो आ ही चुके हैं, अब कुछ सनातनी सुझाव इस प्रकार भी हैं –

1) सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक हिन्दू मन्दिर धार्मिक सम्पत्ति काउंसिल का गठन किया जाए। इस काउंसिल में सुप्रीम कोर्ट के एक वर्तमान, दो निवृत्त न्यायाधीश, एवं सभी प्रमुख हिन्दू धर्मगुरु शामिल हों। इस काउंसिल में पद ग्रहण करने की शर्त यह होगी कि सम्बन्धित व्यक्ति न पहले कभी चुनाव लड़ा हो और न काउंसिल में शामिल होने के बाद लड़ेगा (यानी राजनीति से बाहर)। इस काउंसिल में अध्यक्ष एवं कोषाध्यक्ष का पद त्रावणकोर के राजपरिवार के पास रहे।
2) इस काउंसिल के पास सभी प्रमुख हिन्दू मन्दिरों, उनके शिल्प, उनके इतिहास, उनकी संस्कृति के रखरखाव, प्रचार एवं प्रबन्धन का अधिकार हो।
3) इस काउंसिल के पास जो अतुलनीय और अविश्वसनीय धन एकत्रित होगा वह वैसा ही रहेगा, परन्तु उसके ब्याज से सभी प्रमुख मन्दिरों की साज-सज्जा, साफ़-सफाई एवं प्रबन्धन किया जाएगा।
4) इस विशाल रकम से प्रतिवर्ष 2 लाख हिन्दुओं को (रजिस्ट्रेशन करवाने पर) अमरनाथ, वैष्णो देवी, गंगासागर, सबरीमाला, मानसरोवर (किसी एक स्थान) अथवा किसी अन्य स्थल की धार्मिक यात्रा मुफ्त करवाई जाएगी। एक परिवार को पाँच साल में एक बार ही इस प्रकार की सुविधा मिलेगी। देश के सभी प्रमुख धार्मिक स्थलों पर काउंसिल की ओर से सर्वसुविधायुक्त धर्मशालाएं बनवाई जाएं, जहाँ गरीब व्यक्ति भी अपनी धार्मिक यात्रा में तीन दिन तक मुफ्त रह-खा सके।
5) इसी प्रकार पुरातात्विक महत्व के किलों, प्राचीन स्मारकों के आसपास भी सिर्फ हिन्दुओं के लिए इसी प्रकार की धर्मशालाएं बनवाई जाएं जिनका प्रबन्धन काउंसिल करेगी।
6) नालन्दा एवं तक्षशिला जैसे 50 विश्वविद्यालय खोले जाएं, जिसमें भारतीय संस्कृति, भारतीय वेदों, भारत की महान हिन्दू सभ्यता इत्यादि के बारे में विस्तार से शोध, पठन, लेखन इत्यादि किया जाए। यहाँ पढऩे वाले सभी छात्रों की शिक्षा एवं आवास मुफ्त हो।

जाहिर है कि ऐसे कई और भी सुझाव माननीय सुप्रीम कोर्ट को दिये जा सकते हैं, जिससे हिन्दुओं द्वारा संचित धन का उपयोग हिन्दुओं और सनातन धर्म की उन्नति के लिए ही हो।