राजीव रंजन प्रसाद
एनएचपीसी में इंजीनियर तथा प्रसिद्ध लेखक
भारतीय गणित की गौरव गाथा से जुड़ा एक नाम अभिन्न है- लीलावती। कौन थी लीलावती, क्या है उनका योगदान, यह स्पष्ट करने से पूर्व दोहराना चाहता हूँ कि अपने पूर्वाग्रहों को जब तक परे हटा कर हम पुरा-ग्रंथों की पुनर्विवेचना के लिये प्रस्तुत नहीं होंगे, हमें अपने अतीत को लेकर वामपंथी-पूर्वाग्रहों और एजेंडा इतिहासकारों द्वारा गढ़े गये नैरेटिव से छुटकारा नहीं मिल सकता। लीलावती गणित पर चर्चा से पहले भास्कराचार्य को जानना आवश्यक है जिनका जन्म 1114 ई. में सह्याद्रि पर्वत प्रदेश अर्थात वर्तमान महाराष्ट्र के निकट विज्जडविड गाँव में हुआ था। केवल छत्तीस वर्ष की आयु में उन्होंने सिद्धांत शिरोमणि नाम के महान ग्रंथ की रचना की, यह कृति पद्य में थी। गणित जैसे जटिल विषय पर काव्यात्मक प्रस्तुति को समझने में विद्वानों को समस्या हो सकती थी अत: स्वयं भास्कराचार्य ने ही वासनाभाष्य नाम से अपने ग्रंथ की टीका प्रस्तुत की। सिद्धांतशिरोमणि विशालग्रंथ है जो कि चार पृथक खण्डों में विभाजित है जिन्हें स्वतंत्र कृतियाँ कहा जा सकता है, ये हैं – लीलावती, बीजगणित, गोलाध्याय और ग्रहगणित, कृतियाँ क्रमश: अंकगणित, बीजगणित, कालगणना और ज्योतिष से सम्बंधित हैं।
लीलवती ग्रंथ जो कि इस कड़ी में प्रथम है वह जिन अध्यायों में विभाजित है, वे हैं- परिभाषा, परिकर्म-अष्टक (इसके अंतर्गत जोड, घटाव, गुणा, भाग, वर्ग, वर्गमूल, घन, घनमूल आदि निकालने सम्बंधी विवरण हैं।), भिन्न-परिकर्म-अष्टक, शून्य-परिकर्म-अष्टक, प्रकीर्णक, मिश्रक-व्यवहार (ब्याज आदि निकालना), श्रेढी-व्यवहार, क्षेत्र-व्यवहार (त्रिकोणमिति अथवा ट्रिग्नोमैट्री), खात-व्यवहार, चिति-व्यवहार, क्रकच-व्यवहार, राशि-व्यवहार, छाया-व्यवहार, कुट्टक और अंक-पाश। जानिये कि बहुत रोचकता से लीलावती ग्रंथ प्रश्नोत्तर शैली में लिखा गया है जिसमें ग्रंथकार प्रश्न रखते हैं और उत्तर की अपेक्षा की जाती है, उदाहरण देखें कि ”अये बाले लीलावति मतिमति ब्रूहि सहितान्द्वि पञ्चद्वात्रिंशत्त्रिन वतिशताष्टादश दश। शतोपेतानेतान युतवियुतांश्चापि वद मे यदि व्यक्ते युक्तिव्यवकलन मार्गेअसि कुशला:” अर्थात ए लीलावती बाला, यदि तुम जोड़ और घटाने की क्रिया में दक्ष हो गयी हो तो योगफल बताओ कि यदि बत्तिस, एक सौ तिरानबे, अठारह और दस, प्रत्येक में सौ जोडते हुए एक हजार से इसे घटा दें तो क्या उत्तर होगा? एक अन्य उदाहरण देखें कि ”पंचाशोलिकुलात कदम्बमगमत त्र्यंज्ञं शिलींध्रम तयो विर्विश्लेषस्त्रिगुणो मृगाक्षिकुटजं दोलायमानोअपर:। कांते केतकमालती परिमलप्राप्तैक कालप्रिया दूताहूत इतस्तत: भ्रमति खे भृंगोलि संख्या वद” अर्थात भ्रमर कुल का एक बटा पाँच भाग कदम्ब पर एक बटा तीन शिलींद्र पुष्प पर दोनों के अंतर का तीन गुना कुटज पुष्प पर चले गये तो हे कांते बताओ कि एक भ्रमर जो अपनी केतकी और मालती नामक पुष्प प्रेयसियों द्वारा प्रसरित सुगंध से आकृष्ट आकाश में ही भ्रमण करता रहा, तब भ्रमरों की कुल संख्या क्या है?
गणित के ऐसे ही जटिल प्रश्नों के उत्तर देने वाली लीलावती रहस्यमयी जान पड़ती है। चूंकि कृति में वर्णित अनेक श्लोक ऐसे हैं जिनमें इस स्त्री की आँखों की तुलना हिरणी से की गयी है, अनेक स्थानों पर उसके लिये भास्कराचार्य ने सखि अथवा बाले शब्द का प्रयोग अपने पद्यों में किया है, कतिपय स्थानों पर प्रिये सम्बोधन भी प्रयोग में आया है। स्थान स्थान पर लीलावती के बुद्धि-विवेक की प्रशंसा भी की गयी है। इन सम्बोधनों ने विद्वानों के मध्य भ्रम उत्पन्न किया है कि लीलावती आखिरकार भास्कराचार्य की पत्नी थी अथवा पुत्री? भास्कराचार्य की कृति इसका कोई स्पष्ट उत्तर प्रदान नहीं करती। लीलावती को भास्कराचार्य की पत्नी मानने वाले विद्वान दो श्लोकों को विशेषरूप से उद्धरित करते हैं, पहला इस ग्रंथ की गणेश वंदना का हिस्सा है- ”लीला गललुलल्लोल कालव्याल विलासिने गणेशाय नमो नीलकमलामल कान्तये” अर्थात लीला के गले में लिपटे हुए चंचल सर्प से शोभित और नीलकमल के समान निर्मल कांति वाले भगवान गणेश को नमस्कार है। केवल इसलिये कि लीला शब्द से ग्रंथ का आरम्भ हुआ है, लीलावती को भास्कराचार्य की पत्नी मान लेने का औचित्य नहीं बनता। इसी तरह ग्रंथ के अंत का यह श्लोक देखें कि ”येषां सुजातिगुणवर्गविभूषिताङ्गी शुद्धाखिल व्यवहृति खलु कण्ठासक्ता। लीलावतीह सरसोक्तिमुदाहरन्ती तेषां सदैव सुखसम्पदुपैति” अर्थात जिस युवक की कुलपरम्परा में उत्पन्न, सुन्दर, सुशील, शुद्ध व्यवहार वाली, कोमल और मधुर भाषण करने वाली लीलावती सदृश्य पत्नी मिलती है उसकी इस जगत में सुख सम्पत्ति में निरंतर अभिवृद्धि होती रहती है। इस पद्य से यह स्पष्ट नहीं होता कि यहाँ पति द्वारा पत्नी की प्रसंशा है अथवा पिता द्वारा उस पुत्री को सांत्वना, जिसका विवाह टूट गया है। यद्यपि इसी श्लोक का एक अन्य अर्थ यह भी निकलता है कि जिन शिष्यों को लीलावती ग्रंथ के अंतर्गत बताये गये जोड़, घटाना, गुणन, भाग, वर्ग, घन आदि का अभ्यास है उनकी गणित ज्ञान सम्पदा हमेशा बढती रहती है। पुत्री के लिये भी प्रिय, बाले, सखि जैसे सम्बोधन हो सकते हैं अत: सुस्पष्टता नहीं है।
लीलावती ग्रंथ का फारसी अनुवाद अकबर कालीन मुगल दरबारी फैजी ने किया था, उसने लीलावती को भास्कराचार्य की पुत्री बताया है। इसके लिये निश्चय ही उस समय ज्ञात किसी संदर्भ का सहारा लिया गया होगा जो आज अज्ञात है। फैजी लिखता है कि ज्योतिष के अनुसार लीलावती के भाग्य में वैधव्य था, पिता भास्कराचार्य ने बहुत शोध कर एकमात्र उचित और शुभ मुहूर्त निकाला। सही मुहूर्त की गणना के लिये जल घड़ी में निश्चित मात्रा में पानी भर कर बूंद बूंद रिसते हुए सही क्षण पर उसके समाप्त होने की प्रतीक्षा की जाने लगी।
ध्यान दें कि जल घड़ी ऐसा यंत्र था जिसकी तली में निश्चित आकार का छिद्र होता था जिससे हो कर जल अन्य पात्र में गिरता रहता। दूसरे पात्र में बढते हुए जल की मात्रा से उस पल की सही जानकारी ले कर शुभ-अशुभ की गणना होती थी। कहते हैं भाग्य को कौन बदल सकता है, दुल्हन के वेश में सजी संवरी लीलावती इस जल घड़ी के निकट आयी, भूलवश उसकी मुद्रिका जलपात्र में गिर गयी, छिद्र बंद हो गया, मुहूर्त टल गया, विवाह न हो सका। भास्कराचार्य अत्यधिक दुखित हुए और उन्होंने प्रण किया कि जिन ग्रह-नक्षत्रों ने पुत्री का जीवन बिगाड़ा है, उसकी चाल-गति सहित गणित शास्त्र की बारीकियों से अवगत करा विदुषी बनाउंगा। संभव है उन्होंने यही किया भी। यह बहस व्यर्थ है कि भास्कराचार्य से लीलावती का क्या सम्बंध था, हर्ष की बात यह कि स्त्री शिक्षा के गढ़े हुए नैरेटिव को लीलावती तोड़ती है। हाँ, भारतीय समाज में मध्यकाल तक शिक्षा का अधिकार स्त्रियों को था, वह पत्नी हो अथवा पुत्री।




