आर्थिक संपन्नता प्राप्त करने का भारतीय मार्ग

ज्ञानेन्द्र नाथ बरतरिया
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान अथवा अर्थशास्त्र को समझना बहुत सरल कार्य नहीं है। इसके लिए सबसे पहले संस्कृत का ज्ञान होना आवश्यक है। और संस्कृत का ज्ञान प्राप्त करने के लिए या संभवत: किसी भी परिपूर्ण भाषा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि पहले कई अन्य भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया जाए। उदाहरण के लिए, संस्कृत को सिर्फ व्याकरण के आधार पर नहीं समझा जा सकता है। उसके लिए आधुनिक विज्ञान की समझ भी जरूरी है और शब्दोत्पत्ति के विज्ञान की भी समझ होना आवश्यक है। एक उदाहरण से इसे सरलता से देखा और समझा जा सकता है। अगस्त्य संहिता में प्राचीनकाल में भारत में वैसी बैटरी बनाने का उल्लेख है, जिसे आधुनिक रसायन शास्त्र में जिंक और कॉपर की बैटरी कहा जाता है। रोचक बात यह है कि अगस्त्य संहिता में इसका जो सूत्र दिया गया है, उसमें कॉपर के लिए ताम्र शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, बल्कि उसके लिए ”शिखिग्रीवा” शब्द का प्रयोग किया गया है। अब ”शिखिग्रीवा” का अर्थ संस्कृत के शब्दकोश में मोर की गर्दन बताया गया है। लेकिन आयुर्वेद में इसी ”शिखिग्रीवा” शब्द का अर्थ मोर की गर्दन के रंग जैसे पदार्थ अर्थात कॉपर सल्फेट, जिसे हिंदी में नीला थोथा कहते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर हम अगस्त्य संहिता के इस शब्द को सही रूप में समझना चाहते हैं, तो हमें न केवल आधुनिक रसायन शास्त्र का कॉपर सल्फेट पता होना चाहिए बल्कि साथ ही आयुर्वेद की भी समझ होनी चाहिए। यही स्थिति धातु कर्म से लेकर कम से कम 200 अलग-अलग विधाओं की है। यही कारण है कि कई बार संस्कृत शास्त्रों का अध्ययन और उन पर आधारित निष्कर्ष या तो अपूर्ण महसूस होते हैं, अथवा अधिकांश लोगों को अविश्वसनीय प्रतीत होते हैं।

फिर भी प्रत्येक अपूर्ण या अविश्वसनीय प्रयास एक काम अपूर्ण और अधिक विश्वसनीय सोपान की ओर ले जाता है। अन्वेषण जारी है, अनवरत है और महत्वपूर्ण रूप से वह बहुत बड़े अवकाश को पाटकर, बहुत सारी मान्यताओं से टकराकर और बहुत श्रमसाध्य ढंग से चल रहा है।

प्रोफेसर बजरंग लाल गुप्त की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक- ”एन्शीएंट इंडियन इकोनॉमिक्स थॉट्स एंड सिस्टम्स” इन सारी कठिन शर्तों को पूरा करके प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था को समझने के दृष्टिकोण से एक नया सोपान है। फिर भी, यह पुस्तक उन लोगों के लिए नहीं है, जो मात्र कौतुकवश इस विषय को देखना चाहते हैं।

प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था को समझने में एक अन्य बाधा का सामना करना पड़ता है। वह यह कि हम प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था को इतिहास की दृष्टि से देखें या आर्थिक विचारों की दृष्टि से! एक मिश्रित तरीका यह है कि इसे विचारों के इतिहास की दृष्टि से देखा जाए। निश्चित रूप से तीनों ही दृष्टिकोण परिपूर्ण नहीं हैं। इनमें तत्कालीन भारत और उसके समाज को समझने की अनिवार्यता भी निहित होती है। बहुत संभव है कि कई अन्य ऐसे पक्ष भी हों, जिनका हमें ठीक से अनुमान न हो। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वर्तमान परिस्थितियों में इसे समझने की चेष्टा करना अंतर्निहित ढंग से वर्तमान में प्रचलित परिभाषाओं और मानदंडों पर ऐतिहासिक संदर्भों को रखने के बराबर है।

यह पुस्तक निश्चित रूप से आधुनिक कसौटियों पर ही प्राचीन अर्थव्यवस्था को देखती है। लेकिन इसके साथ ही यह एक विस्तृत शोध प्रबंध भी है और बहुत गहराई से की गई शोध इसके हर बिंदु पर स्पष्ट दिखाई देती है। इस शोध का एक सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह है कि यह प्राचीन भारत के किसी एक ग्रंथ या एक कालखंड की चर्चा नहीं करती, बल्कि एक विषय को उठाकर उसे तमाम ग्रंथों और कालखंडों से ले जाती है। इस प्रकार हमें उसे विषय के उद्भव और विकास का मार्ग समझने का अवसर मिलता है, जो निश्चित रूप से एक लंबी कालावधि का है। इसके साथ ही पुस्तक में उन मान्यताओं की भी खुलकर चर्चा की गई है, जो मूलत: पश्चिम के शोधार्थियों ने प्रस्तुत की हैं। पश्चिम में या पश्चिम द्वारा की गई भारत संबंधी शोध की असंख्य सीमाएं अब धीरे-धीरे सामने आ चुकी हैं। यह पुस्तक उनमें से कई त्रुटियों को रेखांकित करके उनका निरसन भी करती है। इस दृष्टि से कई बार यह पुस्तक पश्चिम द्वारा स्थापित किए गए दुराग्रहों को उत्तर देती प्रतीत होती है। हालांकि निश्चित रूप से यह इस पुस्तक का मुख्य विषय नहीं है।

यह पुस्तक इस तरह की धारणाओं का खंडन करने में संकोच भी नहीं करती। प्रोफेसर बजरंग लाल गुप्त एक स्थान पर स्पष्ट लिखते हैं कि जिन यूरोपीय विद्वानों ने प्राचीन भारत की विनिमय व्यवस्था का विदेशी मूल रहे होने की बात रखी है, वे सभी पूरी तरह और निष्कर्षात्मक रूप से गलत साबित हो चुके हैं। इस संदर्भ में प्रोफेसर गुप्त अपना अभिमत नहीं देते, वह तर्क भी नहीं देते बल्कि साक्ष्यों की झड़ी लगा देते हैं और फिर अंत में एक ऐसा उद्धहरण रख देते हैं, जिसे नकार सकना संभव न हो। और ऐसे उद्धहरण सिर्फ भारतीय विद्वानों के नहीं होते। लेखक ने अनेक स्थानों पर उन पश्चिमी विद्वानों को भी उद्धृत किया है, जिनका निष्कर्ष ज्यादा तर्कसंगत हैं। उदाहरण के लिए प्राचीन भारत में धात्विक मुद्रा के प्रचलन के बिंदु को लेखक ने बहुत विश्वासपरक ढंग से स्थापित किया है।

एक बहुत रोचक पक्ष यह है कि यह पुस्तक ऐसी भाषा और वर्तनी में लिखी गई है, जो भारत के और पश्चिम के विद्वानों को एक साथ उपयुक्त प्रतीत होगी। उदाहरण के लिए जहां इसकी भाषा सरल और बोधगम्य है, वहीं इसमें प्रयुक्त संज्ञाओं में से कई शब्द इस ढंग से लिखे गए हैं, जिस ढंग से लिखना पश्चिम में पसंद किया जाता रहा है, लेकिन भारत में प्रचलित अंग्रेजी में भी उसे सरलता से समझ लिया जाता है। कहा जा सकता है कि पुस्तक का लक्षित पाठक वर्ग पूरे विश्व का भारत-विद्या (Indology) का अध्ययनशील वर्ग है। पुस्तक का मूल्य भी इसी की पुष्टि करता है। ढाई हजार रुपए मूल्य की पुस्तक न तो भारत में बहुत सस्ती मानी जा सकती है और न ही विदेश में बहुत महंगी। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि यह पुस्तक सिर्फ उत्साहित और उत्सुक शोधार्थियों के लिए है, बौद्धिक तौर पर सर्वहारा वर्ग के लिए नहीं।
जैसे-जैसे पुस्तक आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे नए से नए विषय इसके कलेवर में जुड़ते चले जाते हैं। पुस्तक सीधे तौर पर राजनीति शास्त्र को तो संबोधित नहीं करती लेकिन प्रशासन विज्ञान का बिंदु उठाने से परहेज भी नहीं करती। इससे उस भारतीय धारणा की भी पुष्टि होती है कि अर्थशास्त्र सिर्फ वित्त संबंधी पक्षों का विषय नहीं है वरन यह पूरे समाज की भौतिक उन्नति का, भौतिक आवश्यकताओं के प्रबंधन का विषय है।

प्राचीन भारत के अर्थशास्त्र को लेकर अतीत में भी कई पुस्तकें लिखी गई हैं और उनमें कई ऐसे बिंदु भी उठाए गए हैं जो इतिहास अथवा अर्थशास्त्र की अन्य पुस्तकों में उपलब्ध नहीं होते। लेकिन इस तरह की पुस्तकों को कई बार वैचारिक बंधन में बांधकर देखने की कोशिश होती रही है। वैचारिक बंधन का एक सबसे बड़ा सूत्र यह रहा है कि ऐसी पुस्तकों का मानक ही विदेशी अवधारणाएं हो जाती हैं और फिर यह पुस्तकें या तो उन धारणाओं की पुष्टि करती हैं, अथवा उनका खंडन करती हैं। अपनी ओर से या स्वतंत्र ढंग से कोई बिंदु प्रस्तुत करने में कई पुस्तकें सिर्फ अनुवाद जैसा प्रयास नजर आती रही हैं। यह पुस्तक उस दृष्टि से एक उल्लेखनीय अपवाद है। आय के वितरण की समानता का विषय इस पुस्तक में जिस ढंग से उठाया गया है, वह पुन: एक बार संपूर्ण भारतीय चिंतन को अभिव्यक्त करता है। वितरण की समानता को वाम अथवा दक्षिण पंथ से जोड़कर देखना उसके मानवीय पक्ष को अनदेखा कर देता है, जबकि भारतीय चिंतन दूसरी ही दिशा से शुरू होता है।

यह बात दोहराने में कोई संकोच नहीं कि यह पुस्तक सिर्फ गंभीर विद्वानों के लिए है और ऐसा संदर्भ ग्रंथ है, जो अनेक अन्य ग्रंथों को जन्म देने में सक्षम है। अर्थशास्त्र और इतिहास से लेकर लोक नीति के विषयों तक में गहराई से रुचि रखने वाले, भारत विद्या में रुचि रखने वाले लोग निश्चित रूप से इस पुस्तक को बहुत पसंद करेंगे।