आंवला सर्वश्रेष्ठ आहार, रसायन व औषधि

दीप नारायण पाण्डे
लेखक भारतीय वन सेवा से सेवानिवृत्त तथा वर्तमान में राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में विजिटिंग प्रोफेसर


बहुत लोग मुझसे एक प्रश्न पूछते हैं कि आप हमें एक ऐसा द्रव्य बताइए जो अमृत के सबसे नजदीक हो और जिसको लेने पर तमाम रोगों से दूरी बनी रहे। इसके उत्तर में प्राय: मैं यह कहता हूं कि आपके लिये इससे सरल कोई प्रश्न हो नहीं सकता और मेरे लिये इसका उत्तर देने से कठिन और कुछ नहीं हो सकता। इस प्रश्न का निर्विवाद, सटीक और वस्तुनिष्ठ उत्तर देने के लिये आयुर्वेद वांग्मय की समस्त संहिताओं की गहरी समझ और गहन अध्ययन तो जरूरी है ही, उसके साथ ही आयुर्वेद के समस्त द्रव्यों में आज तक हुई आधुनिक वैज्ञानिक शोध को भी समझना जरूरी है। अंततोगत्वा, आयुर्वेदाचार्यों का अनुभव भी उन समस्त द्रव्यों में देखना जरूरी है जो आयुर्वेद की संहिताओं में ज्ञात हैं। अब आप समझ गए होंगे कि यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर खोजने में पूरा जीवन खर्च किया जा सकता है। फिर भी, पिछले पांच दशकों में आयुर्वेद की संहिताओं, आधुनिक वैज्ञानिक शोध और अनुभव की त्रिवेणी में बार-बार डुबकी लगाते हुये प्राप्त व्यक्तिगत समझ के आधार पर आज मैं इस प्रश्न का उत्तर दे रहा हूँ। आज की चर्चा पुन: आमलकी पर केन्द्रित है जिसमें वर्ष 2023 में अब तक हुई शोध को समाहित किया गया है।

मेरे ज्ञान और विश्वास के आधार पर आँवला अकेला ऐसा द्रव्य है जो सर्वश्रेष्ठ आहार, रसायन व औषधि है। आंवला से बेहतर ऐसा कोई बहुआयामी द्रव्य नहीं है जिसे आप भोजन, रसायन और दवाई में एक साथ प्रयोग कर सकते हैं। आइये सबसे पहले आधुनिक वैज्ञानिक शोध से प्राप्त जानकारी के एक अंश को पहले देखते हैं।
उम्र-आधारित रोगजनन का एक प्रमुख कारण डी.एन.ए. रिपेयर मैकेनिज्म में गड़बड़ी होना माना जाता है। जीवित कोशिकाओं के गुणसूत्रों में पाये जाने वाले तंतुनुमा अणु को डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड या डी.एन.ए. कहा जाता है। इसी में अनुवांशिक कोड निहित रहता है। जैसे जैसे डी.एन.ए. डैमेज का बोझ बढ़ता जाता है, शरीर बुढ़ापे की ओर बढ़ता जाता है। इस कारण अनेक समस्यायें जैसे कैंसर, न्येरोडीजेनरेशन और बढ़ती उम्र के कारण होने वाली अनेक व्याधियां विकसित हो जाती हैं। शरीर की कोशिकाओं द्वारा डी.एन.ए. डैमेज के संकेत प्राप्त करना और टूट-फूट की मरम्मत करने की क्षमता उम्र के साथ घटती जाती है। इसीलिये बढ़ती उम्र में अनेक रोग लग जाते हैं। तो क्या रसायन के रूप में आमला बढ़ती उम्र के लोगों में डी.एन.ए. रिपेयर मैकेनिज्म की गति को बढ़ा सकता है? इस विषय में कई अध्ययनों से यह सिद्ध होता है कि रसायन औषधियाँ डी.एन.ए. रिपेयर की गति को बढ़ाकर बुढ़ापा आने की गति को धीमा कर देती हैं। हाल में हुये एक क्लीनिकल ट्रायल (जर्नल ऑफ़ एथनोफार्माकोलॉजी में पाया गया कि आमलकी रसायन के प्रयोग से डी.एन.ए. स्ट्रैंड में तोडफ़ोड़ की गति कम होती है तथा रिपेयर मैकेनिज्म तेज हो जाती है। यह रसायन सुरक्षित भी पाया गया है। एक अन्य अध्ययन में (जर्नल ऑफ़ आयुर्वेदा एंड इंटीग्रेटिव मेडिसिन) जो 45-60 वर्ष के लागों के मध्य किया गया, पाया गया है कि आमलकी रसायन का प्रयोग रक्त की पेरिफेरल ब्लड मोनोन्यूलियर सेल्स में टीलोमीयर की लम्बाई में बदलाव किये बिना टीलोमेरेज क्रियात्मकता को बढ़ा देता है। चूंकि इससे टीलोमियर के क्षरण में कमी आती है, अत: हितायु-सुखायु या हैल्थस्पान में बेहतरी होती है।

चयापचय समस्या या मेटाबोलिक सिंड्रोम वाले व्यक्तियों में प्राय: एंडोथेलियल डिसफंक्शन पाया जाता है जो एथेरोस्क्लेरोसिस की शुरुआत और वृद्धि का कारक बनता है। मेटाबोलिक सिंड्रोम के प्राथमिक प्रबंधन में दवाओं के साथ जीवन शैली में सुधार और निदान-परिवर्जन शामिल हैं। 59 लोगों के मध्य किये गए एक क्लिनिकल ट्रायल से ज्ञात हुआ है कि आमलकी के जलीय एक्सट्रैक्ट की 500 मिलीग्राम मात्रा दिन में दो बार लेने से एंडोथेलियल फंक्शन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, सिस्टमिक सूजन और लिपिड प्रोफाइल में महत्वपूर्ण सुधार हुआ (पी. ऊषारानी इत्यादि, बीएमसी कॉम्प्लिमेंटरी एंड अल्टरनेटिव मेडिसिन के क्लिनिकल ट्रायल में पाया गया है कि आँवला रक्तचाप घटाने की औषधि के साथ देने पर अनियंत्रित सिस्टोलिक और डायस्टोलिक रक्तचाप को नियंत्रित करता है।

कोलेस्ट्रोल व ट्राइग्लीसराइड साथ-साथ कम करने वाली दवा कम मिलती है। आमलकी उनमें एक है। आँवला कोशिकीय और माइटोकांड्रियल हेल्थ को दुरुस्त करता है। आँवला त्वचा को जवां रखता है क्योंकि यह किरैटिनोसाइट्स कोशिकाओं में वृद्धि करता है। असल में आमलकी की मदद से कैंसर, डायबिटीज, हृदयरोग समेत कम से कम 100 रोग ठीक हो सकते हैं, या बचाव हो सकता है (फार्माकोलॉजिकल रिसर्च, 2016, 111: 180-200)।

आमलकी रसायन के चमत्कारिक प्रभाव का विज्ञान तो अभी पकड़ में आना शुरू ही हुआ है। क्लिनिकल ट्रायल में आमलकी व गुडूची मुख-कैंसर के उपचार में लाभकारी पायी गयीं हैं। आमलकी रसायन, आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया में भी लाभकारी पाया गयी है। क्लिनिकल ट्रायल में पाया गया है कि मोटे लोगों में भी आँवला दिल की बीमारी का खतरा कम कर देता है (जर्नल ऑफ़ मेडिसिनल फ़ूड, 2015, 18:4)।

वर्तमान समय में न्यूरोलॉजिकल विकार जैसे मिर्गी, अवसाद, टार्डीव डिस्केनेसिया और तनाव, और न्यूरोडीजेनेरेटिव विकार जैसे अल्जाइमर रोग, पार्किंसंस रोग, मनोभ्रंश और हंटिंगटन-बीमारी एक भारी समस्या है। मौजूदा आधुनिक चिकित्सा इसमें प्राय: सफल नहीं है। आयुर्वेद चिकित्सा में प्रयुक्त आमलकी पर किये गये इन-वाइवो और इन-विट्रो अध्ययनों में आमलकी में एंटीऑक्सिडेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-हाइपरलिपिडेमिक और एंटी-हाइपरग्लाइसेमिक प्रभावों के पर्याप्त प्रमाण मिले हैं। इसके साथ ही अनेक न्यूरोलॉजिकल विकारों में आमला उपयोगी पाया गया है (मेटाबोलिक ब्रेन डिजीज, 2019, 34: 957-965)।

वर्ष 2023 में प्रकाशित क्लिनिकल ट्रायल्स की मेटा-एनालिसिस से यह सिद्ध हो जाता है कि आँवला मेटाबोलिक मार्कर्स में सुधार करता है। मेटा-विश्लेषण में पांच ट्रायल्स को शामिल किया गया था। परिणामों में सीआरपी, फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज, कम घनत्व वाले लिपोप्रोटीन कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल-सी), कुल कोलेस्ट्रॉल और सीरम ट्राइग्लिसराइड सांद्रता में उल्लेखनीय कमी देखी गई। साथ ही उच्च घनत्व वाले लिपोप्रोटीन कोलेस्ट्रॉल (एचडीएल-सी) में वृद्धि पाई गयी (एल. सेतायेश इत्यादि, डायबिटीज एंड मेटाबोलिक सिंड्रोम: क्लिनिकल रिसर्च एंड रिव्यूज, 17(3): 102729, 2023)।
आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से पुन: देखा जाये तो यह सिद्ध करने के लिये कि आमलकी आयु को स्थिर करने वाला द्रव्य है, प्रमाणों के दो अलग-अलग समूह देखना आवश्यक है। प्रथम समूह यह कि कोई भी द्रव्य जो जीवन को सुरक्षित रख सकता है, उसमें दो गुण होना अनिवार्य है: पहला, फ्री-रेडीकल स्केवेंजिंग के द्वारा ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करना एवं, दूसरा, एन्टीइन्फ्लेमेटरी गुण का होना। इन दोनों गुणों के कारण ही कोई द्रव्य बढ़ती हुई उम्र के कारण लगने वाले रोगों से लड़ सकता है। प्रमाणों के दूसरे समूह में सीधे इस बात को देखना है कि उम्र के कारण होने वाली बीमारियों को रोकने एवं हो जाने पर उपचार करने की शक्ति आमलकी में है या नहीं। फ्री-रेडीकल स्केवेंजिंग एवं एन्टीइन्फ्लेमेटरी गुण के सन्दर्भ में आमलकी उच्चकोटि का रसायन एवं एडॉप्टोजेन होने के कारण दोनों ही प्रभाव पर्याप्त आधुनिक शोध में सिद्ध हुये हैं। बढ़ती उम्र की गैरसंचारी बीमारियों जैसे कैंसर, डायबिटीज हृदय रोग, अपर श्वसन तंत्र के रोग, मानसिक रोग एवं इन रोगों के कारण होने वाली द्वितीयक-जटिलताओं को रोकने के प्रमाण भी हैं। इस दिशा में विश्व भर में आमलकी पर गंभीर अध्ययन हुये हैं। मुख्य रूप से प्रयोगशाला-उपकरणों के द्वारा इन-वाइट्रो तथा विभिन्न प्रजातियों के प्राणियों में इन-वाइवो अध्ययनों पर 400 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। इन सबसे सिद्ध हुआ है कि आमलकी में एंटीऑक्सीडेंट, इम्यूनोमोड्यूलेटर, हिपेटोप्रोटेक्टिव, कार्डियोप्रेटेक्टिव, रीनोप्रोटेक्टिव, एंटीडायरियल, एंटीएमेटिक, एन्टीकैंसर, एन्टीडायबेटिक, एन्टीइन्फ्लेमेटरी, एन्टीहाइपरटेंसिव, न्यूरोप्रोटेक्टिव, एंटीएथीरोस्क्लीरोटिक, एन्टीवायरल, ऐन्टीप्रोलीफेरेटिव, एन्टीपायरेटिक, एनलजेसिक, एन्टीमाइक्रोबियल, एन्टीएलर्जिक, एन्टीहापरलिपिडेमिक, एंटीहाइपरथायरॉयडिज्म, एल्डोज रिडक्टेज इनहिबिटर, प्रोटीन काइनेज इनहिबिटर, गेस्ट्रोप्रोटेक्टिव, स्मृतिवर्धक, एन्टीअल्जीमर, एन्टीकेटरेक्ट आदि गुण हैं। विश्व की सर्वाधिक महत्वपूर्ण शोध-पत्रिकाओं में आमलकी पर 2200 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। आँवला के गुणधर्मों पर शास्त्रीय सिद्धांतों एवं साइंटिफिक अध्ययनों के निष्कर्षों में पूर्ण समानता है। त्रिफला नामक उपयोगी रसायन में भी आमलकी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालाँकि अभी क्लिनिकल ट्रायल्स कि आवश्यकता है, परन्तु अभी तक के अध्ययनों में त्रिफला के रोगरोधी या प्रोफायलैक्टिक तथा रोगोपचारी या थेराप्यूटिक गुणधर्म का शास्त्रों और साइंस में निर्विवाद प्रमाणीकरण हुआ है।

आइये अब संहिताओं की ओर चलते हैं। आमलकं वय:स्थापनानाम् (च.सू. 25.40) चरकसंहिता का एक महावाक्य है। अनेक शताब्दियों बाद आचार्य वाग्भट ने इसी वाक्य को वयस: स्थापने धात्री (अ.हृ.उ. 40.56) दोहराया है। सन्दर्भ-विशेष में अर्थ यह है कि आमलकी या आँवला आयु को स्थिर करने वाले द्रव्यों में श्रेष्ठतम है। निहितार्थ यह भी है कि बढ़ती उम्र के बावज़ूद शरीर में आयु-आधारित-व्याधिजनन या तो रुक जाता है या गति धीमी हो जाती है। आयु-आधारित व्याधिजनन या एज-रिलेटेड-पैथोजेनेसिस समकालीन विश्व की सबसे गंभीर समस्या है जिससे बायो-मेडिकल साइंस अभी तक पार नहीं पा सका है।

कम से कम पांचवी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर वत्र्तमान काल तक लिखित या संकलित आयुर्वेद की संहिताओं और ग्रंथों के निचोड़ के आधार पर यह कहना उचित है कि आयुर्वेद का ऐसा कोई ग्रन्थ नहीं जिसने आमलकी को एक उच्चकोटि का भोजन, प्रभावी रसायन और महत्वपूर्ण औषधि के रूप में मान्यता नहीं प्रदत्त की हो। चरकसंहिता के अनुसार आँवला में लवण रस के अतिरिक्त सभी रस हैं। अम्लरस-प्रधान, रुक्ष, मधुर, कषाय है। परम कफ-पित्त नाशक, वृष्य या पुरुषत्व-वर्धक, रसायन, तथा गुल्म, उदर, ज्वर, पांडु, अतिसार, प्रमेह, कामला, कृमि आदि रोगों के विरुद्ध उपयोगी है। सुश्रुतसंहिता के अनुसार रक्त-पित्तशामक, नेत्र ज्योति बढ़ाने वाला, पुरुषत्व-वर्धक रसायन है। भावप्रकाश निघंटु के अनुसार यह पुरूषत्व बढ़ाने वाला, रसायन एवं रक्त-पित्त-हर, गुल्महर और प्रमेहहर है। धन्वन्तरि निघंटु के अनुसार पुरूषत्व-वर्धक, रसायन, ज्वरहर तथा स्त्रीरोगों में लाभकारी है। राजनिघंटु के अनुसार आमलकी रक्त-पित्त-हर है। इस सम्बन्ध में भावप्रकाश में वर्णित गुणधर्म देखना उपयोगी है (पूर्वखण्ड 6.2.39-40): हरीतकीसमं धात्रीफलं किन्तु विशेषत:। रक्तपित्तप्रमेहघ्नं परं वृष्यं रसायनम्।। हन्ति वातं तदम्लत्वात्पित्तं माधुर्यशैत्यत:। कफं रूक्षकषायत्वात्फलं धात्र्यास्त्रिदोषजित्।। आँवला हरीतकी की भांति है, विशेषकर रक्त-पित्त-प्रमेहहर, पुरुषत्ववर्धक व रसायन है। अपने अम्ल रस व शीत वीर्य द्वारा वात का शमन और शुष्कता और कषाय के द्वारा कफ शमन करता है। इस प्रकार तीनों दोषों के शमन में विजयी होता है। आचार्य वाग्भट ने आमलक रसायन का वर्णन करते हुये लिखा है (अ.हृ.उ. 39.149): धात्रीरसक्षौद्र सिताघृतानि हिताशनानां लिहतां नराणाम्। प्रणाशमायान्ति जराविकारा ग्रन्था विशाला इव दुर्गृहीता:।। आमले का रस, शहद, खण्ड, तथा घी मिलाकर प्रतिदिन चाटते रहने से जरा-जन्य-विकार ठीक उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे बेमन से पढ़े गये ग्रन्थ भूल जाते हैं। इसी प्रकार आँवले का वाजीकारक अर्थात वृष्य या पुरुषत्व-वर्धक योग भी निर्दिष्ट है (अ.हृ.उ. 40.2।): कृष्णाधात्रीफलरज: स्वरसेन सुभावितम्। शर्करामधुसर्पिर्भिर्लीढ्वा योऽनु पय: पिबेत्।। स नरोऽशीतिवर्षोऽपि युवेव परिहृष्यति। जैसा कि आचार्य सुश्रुत ने भी कहा है (सु.चि. 26.24-25): एवमामलकं चूर्णं स्वरसेनैव भावितम्। शर्करामधुसर्पिर्भिर्युक्तं लीढ्वा पय: पिबेत्््।। एतेनाशीतिवर्षोऽपि युवेव परिहृष्यति। तात्पर्य यह है कि आँवला स्वरस से अच्छी तरह भावित आँवला-चूर्ण में, खण्ड, मधु व घी मिलाकर जो व्यक्ति लेकर बाद में दूध पीता है, वह अस्सी साल की उम्र में भी युवा की तरह रहता है।

इन सब तथ्यों के कारण भूले-बिसरे आँवले को अपने भोजन का अंग बनाने के लिये हमारा उत्साहित होना स्वाभाविक है। चलते चलते आपको एक बढिय़ा चटनी बनाने की विधि भी बता देते हैं। यह स्वादिष्ट चटनी आपको स्वस्थ रखने में मददगार हो सकती है। चार लोगों के लिये 12 बादाम भीगे और छिलके उतारे हुये या यदि जवान लोगों के लिये है तो छिलका सहित, 2 इंच अदरक का टुकड़ा, 12 मुनक्के, 4 आमलकी के ताज़े फल, 1 मिर्च देसी, 4 दाना लहसुन, यदि आप लेते हों, 20 ग्राम अनार के ताज़े दाने, 1 ग्राम मिश्री, 12 ग्राम धनिया के पत्ते और सैन्धव लवण स्वादानुसार लेकर पीस डालिये। बस बन गयी चटनी। आनंद लीजिये और स्वस्थ रहिये।