ममता रानी
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।
टेलीविजन पर अक्सर हमने ऐसे विज्ञापन देखे होंगे। एक माँ अपनी किशोरी बेटी से पूछती है- अरे रेशमा, तुम आज डांस क्लास नहीं गयी। बेटी अपनी परेशानी बताती है कि उसकी माहवारी के दिन हैं। इस पर माँ उसे किसी कंपनी का सैनिटरी पैड का एक पैकेट देती है और कहती है कि इसका इस्तेमाल करो और डांस क्लास हो या योगा क्लास, कहीं दौड़ की प्रतियोगिता हो या पेड़ पर चढना हो, आराम से जाओ। कोई परेशानी नहीं। जो कष्ट हमने सहे, वह हम तुझे कभी नहीं होने देंगे। ऐसे विज्ञापन टीवी पर भरे पड़े हैं। इसका प्रचार इतना हुआ है कि इस पर एक फिल्म ही बना दी गई पैडमैन ।
सेनिटरी पैड के इन विज्ञापनों को देखकर मन बड़ा क्षुब्ध होता है। क्या वाकई माहवारी के उन दिनों में कपड़े की जगह पैड लगाने से लड़कियाँ कुछ भी करने योग्य हो जाती हैं? क्या केवल एक पैड लगाने से स्त्री के शरीर में होने वाले मानसिक और हारमोनल परिवर्तन एकदम से ठीक हो जाते हैं? इसके अलावा प्रश्न यह भी है कि क्या कपड़े का प्रयोग करने वाली स्त्रियां एकदम लाचार हुआ करती थीं? क्या माहवारी के प्रबंधन की पुरानी व्यवस्थाएं अवैज्ञानिक और पिछड़ी हुई थीं? इस पर बनी फिल्म पैडमैन में इन विज्ञापनों से एक कदम आगे बढ़कर दिखाया गया कि पैड के आविष्कार से पहले स्त्रियां माहवारी के कारण संक्रमण आदि स्वास्थ्य समस्याओं से भी जूझती थीं। क्या यह सच है कि कपड़े संक्रमण फैलाते हैं और पैड नहीं?
क्या वाकई पिछड़े थे हम?
देखा जाए तो ऐसे विज्ञापन बनाने वाली कंपनियों को न तो स्त्रियों के स्वास्थ्य से कोई मतलब होता है और न ही उन्हें इसकी कोई जानकारी होती है। अपनी चीजों को बाजार में अधिक से अधिक बेचने भर के लिए हमसे ही यह कहलवाया जा रहा है कि हम बहुत पुराने विचार के हैं, पिछड़े हैं। इन विज्ञापनों के अनुसार चूँकि हमारी दादी-नानी कपड़ा इस्तेमाल करती थी केवल इसीलिए वे लोग तीन दिन कोई काम नहीं करती थी। तुम तो नये जमाने की लड़कियाँ हो। यह लो पैड और जाओ बाहर, जो मर्जी आए, सो करो। इस प्रकार ये विज्ञापन न केवल स्त्रियों के स्वास्थ्य का मजाक उड़ाते हैं, बल्कि हमारे पूर्वजों और परंपराओं को भी पिछड़ा साबित करने का प्रयास करते हैं। इन्हें हम स्त्रियों की सेहत से कोई लेना देना नहीं है। इन्हें सिर्फ अपना सामान बेचना है और लाभ कमाना है। दुर्भाग्य यह भी है कि एक स्त्री ही सब कुछ जानते समझते हुए भी चन्द पैसो के लिए ऐसे विज्ञापन करती है। उसे पता होता है कि प्रकृति के नियमानुसार एक स्त्री के शरीर में किशोरावस्था यानी 13-14 वर्ष की आयु में एक बदलाव होता है, हारमोनल बदलाव होते हैं और लड़कियाँ बड़ी हो जाती है। हर महीने चार-पाँच दिन की माहवारी प्रारंभ हो जाती है। किसी-किसी को यह सात दिनों तक भी रहता है। शुरु के तीन दिनों तक परेशानी अधिक होती है। किसी को पेट दर्द, किसी को सर दर्द, बदन दर्द यहाँ तक कि उल्टी जैसा लगने की भी शिकायत होती है। वह यह भी जानती है कि यह केवल शारीरिक मामला नहीं होता, यह मानसिक मामला भी होता है। आलस्य, अन्यमनस्कता, अनुत्साह, उदासी आदि मानसिक समस्याओं से भी वह जूझ रही होती है। फिर भी केवल चंद पैसों के लोभ में ऐसे विज्ञापन बनाए जाते हैं और इनमें स्त्रियाँ ही काम भी करती हैं। वास्तविक जीवन के अनुभव इन विज्ञापनों के ठीक विपरीत होते हैं। मेरी एक परिचित 22 साल की सलोनी जो योग क्लास जाती है, बताती है कि वह हर महीने में सात दिनों की छुट्टी लेती है। उसके योग शिक्षक ने भी कहा है कि माहवारी के दिनों में मत आया करो। सलोनी की एक सहेली ने बताया कि उसकी डांस टीचर ने माहवारी के पाँच दिनों में डांस के लिए आने से मना किया है। ये आधुनिक युग की किशोरियाँ हैं, जिन्हें न केवल व्हिस्पर और सोफी के विंग वाले पैड भी उपलब्ध हैं, बल्कि जिनके मन में पूर्व की तरह की धार्मिक वर्जनाएं भी नहीं हैं। परंतु फिर भी वे डांस और योग जैसे शारीरिक कामों में माहवारी के दिनों में सहजता अनुभव नहीं करतीं। यह स्थिति केवल सलोनी और उसकी सहेली की ही नहीं, देश, बल्कि विश्व की सभी स्त्रियों की है। यही कारण है कि हमारे ऋषि-मुनियों ने माहवारी के दिनों में शारीरिक श्रम करने से साफ मना किया।
स्त्री-स्वास्थ्य के लिए घातक है बाजार का हस्तक्षेप
सैनिटरी पैडों का मामला केवल स्वास्थ्य का होता तो भी ठीक था, परंतु यह अब बाजार का मामला है। सैनिटरी पैड़ों के प्रचार में स्त्रियों के स्वास्थ्य से अधिक बाजार के लाभ की चिंता है। इसलिए इसकी बिक्री बढ़ाने के अधिकाधिक उपाय किये जा रहे हैं। इसके परिणाम भी आने लगे हैं। एक अध्ययन के अनुसार वर्ष 2022 में भारत सैनिटरी पैडों का बाजार लगभग 5734.37 अरब रुपयों का था। एक अन्य अध्ययन के अनुसार वर्ष 2016 में भारत में 5.12 अरब सैनिटरी पैड़ों की बिक्री हुई थी और वर्ष 2021 तक उसके दोगुने होने के अनुमान थे। इस अध्ययन के अनुसार प्रत्येक पाँच वर्षों में भारत में सैनिटरी पैडों की बिक्री दोगुनी हो रही है। यह स्थिति पैड के प्रचार का एक और बड़ा दुष्परिणाम किशोरियों के मन पर पड़ रहा है। इन विज्ञापनों और इनकी चर्चा से उनमें मानसिक चंचलता बढ़ रही है और इसके कारण रजस्वला होने की आयु घटने लगी है। आजकल विद्यालयों में भी जीवविज्ञान की कक्षाओं में इसकी चर्चा की जाने लगी है। जिसकी शिक्षा घर में माताओं से मिलनी चाहिए थी, उसकी शिक्षा सार्वजनिक स्थानों पर दी जा रही है। टैबु तोडऩे के नाम पर कुछ भी किया जा रहा है। ऐसे अनेक मामले मेरे व्यक्तिगत अनुभव में आए हैं, जिनमें 11-12 वर्ष की किशोरियों के बीच व्यक्तिगत अथवा विद्यालय में इसकी अत्यधिक चर्चा किए जाने पर उनकी माहवारी प्रारंभ हो गई। हालाँकि उसकी आयु अभी माहवारी आने की नहीं थी इसलिए फिर छह महीने-वर्ष भर तक उसकी माहवारी बंद रही और अपने समय से फिर प्रारंभ हुई। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अधिक नहीं 20-25 वर्ष पहले ही रजस्वला होने की आयु 14-16 वर्ष हुआ करती थी। एक अध्ययन के अनुसार लड़कियों की माहवारी आने की आयु निरंतर घट रही है। ”भारत में वर्ष 2005 में यह आवु अभी भी 13.76 वर्ष की थी, जो अब घट कर 12.5 वर्ष हो गई है।ÓÓ कम आयु में रजस्वला होने के ढेरों नुक्सान हैं। आगे चलकर इसका असर रजोनिवृत्ति पर भी पड़ता है। जब रजस्वला की आयु घटेगी तो रजोनिवृत्ति की आयु भी घट जाएगी। इससे भी स्त्री का स्वास्थ्य सीधा जुड़ा हुआ है। हालांकि आधुनिक विश्लेषक रजस्वला होने की घटती आयु पोषण से जोड़ रहे हैं, परंतु सच यह है कि इसका मूल कारण सामाजिक और धार्मिक वातावरण है। द्रष्टव्य है कि रजस्वला होने की जो आयु हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में 15 वर्ष की है, वह पूर्वोत्तर जैसे ईसाई बन चुके उन्मुक्त यौन वातावरण वाले राज्यों में अभी ही 12 वर्ष की है। ऐसे में स्पष्ट है कि सैनिटरी पैड को लेकर सरकार और बाजार द्वारा की जाने वाली चर्चाओं और विज्ञापनों से जो वातावरण बनता है, उसका भी दुष्परिणाम स्त्री स्वास्थ्य पर पड़ता है।
समझने की बात यह है कि पैडों का उपयोग करना गलत नहीं है। गलत है उनका अंधाधुंध प्रचार और उनके विज्ञापनों में पेड़ों पर चढऩे और नाचने जैसे अस्वाभाविक तथा स्त्री स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने वाली बातों को दिखलाना। ऐसे विज्ञापनों में अपने पूर्वजों की परंपराओं को अवैज्ञानिक बतलाना और भी अधिक नुकसानदेह काम है। माहवारी के दिनों में स्त्रियों को अनिवार्य रूप से अवकाश मिलना चाहिए, चाहे वे कपड़े का प्रयोग करें या फिर पैड का। इसलिए मातृत्व अवकाश की तरह ही माहवारी अवकाश भी होना चाहिए ताकि महिलाओं को माहवारी के दिनों में भाग-दौड़ न करनी पड़े। प्रकृति के नियमानुसार वे घर पर रहकर आराम कर सकें।
यह आराम का मामला है
भारतीय परंपरा तो यह रही है कि माहवारी की चार-पाँच दिनों तक स्त्री को सभी प्रकार के कामों से अवकाश दे दिया जाता था। उसे खाना नहीं बनाना होता था, कपड़े और बर्तन नहीं धोने होते थे, घर की सफाई नहीं करनी होती थी। ग्रामीण परिवेश में खेतों के काम नहीं करने होते थे। वह सभी कामों से दूर रह कर आराम करती थी। आज का विज्ञान भी अब मानता है कि माहवारी के उन दिनों में स्त्री को शारीरिक और मानसिक रूप से विश्राम करने की आवश्यकता होती है। इन दिनों में उसके शरीर को समय पर पौष्टिक भोजन की भी आवश्यकता होती है। किसी भी तरह का भाग दौड़ करने से उसकी कई समस्याएं बढ़ जाती हैं। परंतु इसके विपरीत ये कंपनियाँ अपना उत्पाद बेचने के चक्कर में न केवल स्त्रियों को उस आराम से वंचित कर रही हैं, बल्कि समानता के नाम पर स्त्रियों पर अतिरिक्त परिश्रम का बोझ भी डाल रही हैं। वास्तव में माहवारी प्रबंधन केवल दाग लगने का प्रबंधन मात्र नहीं है। माहवारी प्रबंधन स्त्री के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का प्रबंधन है। भारतीय परंपरा में स्त्री के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखा जाता था, जोकि इन पैडों के भ्रामक विज्ञापनों में गायब होता है। इसलिए माहवारी के उन दिनो में अत्यंत आवश्यक न हो तो बाहर कम ही जाना चाहिए। वैसे भी किसी लड़की से बैठकर पूछिये क्या वो माहवारी के दिनों में उसका कहीं घूमने का मन करता है, क्या कोई पार्टी में जाना पसन्द करती है? अब तो लगभग सभी लड़कियों के पास सैनिटरी पैड हैं। परंतु सैनिटरी पैड हों या कपड़ा हो, वह हमारी भावनाओं को कैसे बदल सकता है? माहवारी के दिनों में लगभग स्त्रियों का मन सुस्त-सा हो जाता है, एकाग्रता में कमी आ जाती है, चिड़चढ़ापन बढ़ जाता है, इसलिए किसी काम में मन नहीं लगता। ऐसे में डांस हो या खेल खेलना हो या फिर योगा करना हो, या फिर ऑफिस में काम ही क्यों न करना हो, कोई भी स्त्री पूरे मन से किसी काम को कर ही नहीं सकती। आज भी आप कितने भी आधुनिक हो गये हों, घर का काम महिलाओं के जिम्मे ही रहता है। हाँ, कुछ समझदार पुरुष होते हैं, जो घर के कामों में हाथ बंटाते हैं, लेकिन उसके बाद भी स्त्रियों के पास बहुत काम रहता है। इस प्रकार आज की आधुनिक स्त्रियाँ घर और बाहर दोनों के बीच में पिस रही हैं। भारतीय परम्परा में माहवारी के दौरान तीन दिनों तक रसोई मे जाना वर्जित था। तीन दिनो तक किसी पेड़ पौधो को पानी देना, अचार पापड़ समान बनाना, मन्दिर जाना या पूजा पाठ करना सब वर्जित था। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये सारे काम जो वर्जित थे, इससे स्त्रियों को ही फायदा था। इस वर्जना से उन्हें तीन-चार दिनों की पूरी छुट्टी मिल जाती थी, जोकि आज उन्हें अप्राप्य है। मैंने कितने ही घरों में देखा है कि बाकी दिन सास अपनी बहुओं से चाहे जितनी सेवाएं करवाएं, माहवारी के दिनों में वे स्वयं उसकी सेवा कर रही होती हैं। आज की व्यस्त जीवनचर्या में क्या कोई ऐसा घर है जहाँ पूरे सम्मान के साथ स्त्रियों को छुट्टी दे दी जाती है कि आज तुम आराम करो, आज कोई काम नहीं करना है तुम्हें।
इस आराम का महत्व हमें तब समझ में आएगा, जब हम पहले के परिवारों की कल्पना करेंगे। पहले संयुक्त परिवार होते थे और खाना भी उसी अनुपात में बनता था। आज की तरह रसोई नहीं हुआ करती थी कि नल भी रसोई में हों और राशन भी। उन दिनों में कुँए से पानी खींचकर बाल्टी में भरकर दूर से लाया जाता था। माहवारी के दौरान आज के डाक्टर भी भारी सामान उठाने से मना करते हैं। भारी वजन उठाने या भाग-दौड़ करने से माहवारी का रक्तस्राव बढ़ जाता है। डाक्टर की बात को छोड़ भी दें तो ये तो आजमाकर देखने वाली बात है। इसलिए तीन दिन काम नहीं करने देना, स्त्रियों पर कोई अत्याचार नहीं था और न ही अवैज्ञानिक छुआछूत थी। ये स्त्रियों के प्रति सम्मान था कि हम अपने माँ-बहनों-पत्नियों-बहुओं को वैसी अवस्था में थोड़ा आराम दे सके।
पूजा-पाठ मन का विषय है। माहवारी के दिनों में मन को एकाग्र करना कठिन होता है। पालथी मारकर बैठना सहज नहीं होता। क्या कोई शौच करके बिना शुद्ध हुए पूजा करने बैठता है? नहीं न, शौच के बाद वो पहले स्नान करेगा फिर मन्दिर जाएगा। पूजा करने के लिए मन और शरीर दोनों का शुद्ध होना जरूरी है। इसीलिए माहवारी के दिनों में पूजा-पाठ वर्जित थे। रह गई पेड़-पौधो में पानी देने की बात तो भारत में सिंचाई का मतलब पाइप से गमलों में पानी देना नहीं होता था। रहट चलती थी जिससे खेतों में सिंचाई की जाती थी। आज की लड़कियों को अगर रहट चलाने या खेतों में सिंचाई करने के लिए कहा जाय तो उनके प्राण निकल जाएंगे। ये जो भी काम वर्जित थे, सभी श्रमसाध्य कार्य थे।
आधुनिक माहवारी के प्रबंधन में पैड तो आ गया है और इसके फायदे भी हैं। यह कपड़े की अपेक्षा प्रयोग में सहज होता है। रक्तस्राव के बाहर होने या कपड़ो पर दाग लगने का डर नहीं रहता। यात्रा में इनके कारण काफी आराम हो जाता है। पर इनके कारण क्या समस्याएँ पैदा हो रही हैं, यह सोचना भी जरुरी है। सबसे बड़ी समस्या गरीब महिलाओं की है जिनके घर में ढंग से दो जून का खाना नहीं बनता, वे महीने का 50-100 रुपये पैड पर खर्च कर दे, यह उनके लिए आर्थिक रूप से वहनीय नहीं है। पुराने कपड़े से भी वह काम सदियों से और नि:शुल्क हो ही रहा है। रह गयी स्वास्थ्य और संक्रमण की बात तो आज से ज्यादा पहले की महिलाएँ स्वस्थ हुआ करती थीं। आधुनिक महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा मेहनत किया करती थी। कपड़ा इस्तेमाल करने भर से कोई महिला कभी बीमार नहीं पड़ती थी। गाँवों में कम से कम मैंने अपने संपर्क में सौ से अधिक स्त्रियों को कपड़ों का प्रयोग करते देखा है और उन्हें कभी किसी प्रकार की समस्या नहीं हुई। एक तो इसमें केवल मलमली-सूती कपड़ों का ही प्रयोग किया जाता है। अधिक रक्तस्राव होने की अवस्था में पहले कपड़ों की तह में गोबर के उपलों की राख की परत लगाया जाता था। गोबर के उपलों की राख में एंटीफंगल और एंटीबैक्टिरियल गुण होते हैं। इस कारण संक्रमण का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था।
पर्यावरण विरोधी भी हैं पैड
इसमें एक मामला प्रदूषण और पर्यावरण का भी है। कपड़ों का प्रयोग एक प्रकार की फटे-पुराने कपड़ों का रिसायकलिंग भी था। इसके अलावा कपड़े को धोकर दोबारा- तिबारा प्रयोग किया जाता था। अंत में कपड़े को इस्तेमाल करके जब फेंका जाता था तो यह सड़ कर मिट्टी में मिल जाता था, जिससे कहीं कोई प्रदूषण नहीं होता था। लगभग सैनिटरी पैड डिस्पोजेबल होते हैं यानी केवल एक बार प्रयोग किए जा सकते हैं। इस प्रकार एक माहवारी में एक स्त्री को न्यूनतम 4-5 पैड प्रयोग करने पड़ते हैं। आज के लगभग सभी सैनिटरी पैडों में प्लास्टिक प्रयोग होता ही है। प्लास्टिक के कारण ये पैड को आसानी से मिट्टी में नहीं गलते, लंबे समय तक ज्यों के त्यों पड़े रहते हैं। एक अध्ययन के अनुसार इन्हें गलने में 500-800 वर्ष लग जाते हैं। मेंस्ट्रुअल हाइजीन एलाइंस ऑफ इंडिया के अनुसार भारत में कुल 33.60 करोड़ स्त्रियां रजस्वला होती हैं, जिनमें से 36 प्रतिशत यानी 12.1 करोड़ स्त्रियां इन डिस्पोजेबल सैनिटरी पैड़ों का प्रयोग कर रही हैं। इस प्रकार प्रतिवर्ष लगभग 12.3 अरब सैनिटरी पैड कचड़े के रूप में एकत्र हो रहे हैं। यह सरलता से अनुमान लगाया जा सकता है कि इन पैड़ों के कारण हम पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं।





