प्रमोद कुमार दुबे
लेखक श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े रहे हैं
ऋषि प्रकृति के अनुकूल कार्य करते हैं और राक्षस प्रकृति के प्रतिकूल। राक्षस ऋषियों को समाप्त कर देना चाहते हैं। धर्माचरण में रहने वाले ऋषियों की रक्षा के लिए श्रीराम का वनगमन होता है। धर्म नहीं रहेगा तो राज नहीं, अराज होगा। इसी राज्यादर्श को श्रीराम स्थापित करते हैं। तदुपरांत श्रीराम का अयोध्या आगमन होता है।
रावण वध हो गया है, लंका विभीषण को सौंप दी गई है। विभीषण श्रीराम का लंका में सत्कार करना चाहते हैं, कहते हैं- मैं लक्ष्मण और देवी सीता सहित आप सबका मनोवांक्षित वस्तुओं से सत्कार करना चाहता हूँ। मेरी सेवा स्वीकार कर लीजिए, तब अयोध्या जाइएगा- अर्चित: सर्वकामैस्त्वं ततो राम गमिस्यसि। श्रीराम कहते हैं- ‘तुम्हारा आग्रह अस्वीकार नहीं कर सकता, लेकिन मेरा मन इस समय व्याकुल है कि मैं शीघ्र भाई भरत को देखूँ- तं तु मे भ्रातर द्रष्टुं भरतं त्वरते मन:। वह मुझे अयोध्या लौटा ले जाने के लिए चित्रकूट तक आए थे- मां निवर्तयितुं योस्सौ चित्रकूटमुपागत:। उन्होंने मेरे चरणों पर सिर झुकाकर याचना की थी, मैंने उनकी बात नहीं मानी थी- शिरसा याचतो यस्य वचनं न कृतं मया। अब मैं अपने पिता की राजधानी अयोध्या जाना चाहता हूँ। इसके लिए मैं आप सबकी अनुमति चाहता हूँ।’
रामजी की इच्छा में सबकी इच्छा समाहित हो गई, पुष्पक विमान पर सवार होकर श्रीराम, लक्ष्मण, सीता और विभीषण सहित सभी वानर वीर अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं। सबको श्रीराम का राज्याभिषेक देखने की लालसा है। पुष्पक विमान आकाश मार्ग से अयोध्या की ओर उड़ चला।
रावण वध के चौदह वर्ष पूर्व जब श्रीराम राज्याभिषेक होने वाला था, उसमें व्यवधान उत्पन्न हो गया। क्या वह व्यवधान माता कैकेयी के हठ से उत्पन्न हुआ? क्या कुब्जा के कुचक्र से? हम मान लेते हैं कि मंथरा ने कैकेयी की मति फेरी थी, तुलसी बाबा कहते हैं कि ‘गयी गिरा मति फेरि’ मंथरा की मति स्वयं सरस्वती ने फेरी थी, तब मंथरा ने कैकेयी की मति फेरी थी और कैकेयी हठ पर उतर आयी, किसी भी सूरत में श्रीराम का राज्याभिषेक नहीं होगा, उनके पुत्र भरत का राज्याभिषेक होगा और उन्हीं अभिषेक सामग्री से भरत का अभिषेक होगा, जो राम के लिए लायी गई है- भरतश्चाभिषिच्येत तदेतदभिषेचनम्। इतना ही नहीं, राम को चौदह वर्ष के लिए दंडकारण्य में प्रवेश करना होगा- त्वया रण्यं प्रवेष्टव्यं नव वर्षाणि पञ्च च। बड़ा विचित्र व्यवधान है।
कैकेयी जोर मार कर फुफकार रही है और राम कहते हैं- ‘तुम प्रसन्न रहो देवि, निश्चय ही मैं चीर और जटा धारण करके वन में चला जाऊँगा- यास्यामि भव सुप्रीता वनं चीरजटाधर:। यदपि महाराज ने भरत के राज्याभिषेक की बात मुझसे कभी बतायी नहीं है- स्वयं यन्नाह मां राजा भरतस्याभिषेचम्। फिर भी मैं पिता के कथन पर बिना विचार किए ही चौदह वर्ष के लिए दण्डकारण्य में चला ही जाता हूँ।’ कैकेयी देखती हैं कि राम ने कोई आपत्ति नहीं की, वे स्वयं ही दण्डकारण्य जाने के लिए उत्सुक हैं, वह कहती हैं- जितनी शीघ्रता से तुम यहाँ से वन जा सको, चले जाओ- राम तस्मादित: शीघ्रं वनं त्वं गन्तुमर्हसि।
भरत को बुलाने के लिए दूत भेजा गया, भरत अयोध्या आए। भरत भी अयोध्या के राजसुख को तिलाञ्जलि देकर श्रीराम को वन से लौटाने के लिए चित्रकूट निकल पड़े। जिस राजभोग अपने पुत्र को देने के लिए कैकेयी पति का आश्रय खोकर विधवा हो गई, सदा के लिए कलंकित हो गई, उसी राजभोग को राम ने पिता की सुनी-सुनाई आज्ञा मान कर त्याग दिया और भरत ने भी अपने अग्रज राम का अधिकार मानकर त्याग दिया।
भरत मानते हैं कि श्रीराम के राज्याभिषेक में उनकी माता कैकेयी व्यवधान बन गयी। उनके मन में माता के इस बात से ग्लानि होती है। भरद्वाज से भरत कहते हैं- मेरी माता कैकेयी आर्या के समान दिखती भले ही है लेकिन वह राज्य के लोभ में अनार्या है- ऐश्वर्यकामा कैकेयीमनार्यामार्य रूपिणीम्। माता कैकेयी को भरत ने अनार्या क्यों कहा? इसलिए कि आर्य राज्य के लिए अनाधिकार चेष्टा नहीं करता। इस मान बिन्दु पर वर्तमान विश्व की राज चरित्र को परखना चाहिए।
भरद्वाज भरत को समझाते हैं, तुम्हें कैकेयी के प्रति दोष-दृष्टि नहीं रखनी चाहिए- न दोषेणावन्तव्या कैकेयी भरत त्वया। श्रीराम के वनवास का परिणाम सुखद होगा- रामप्रव्राजनं ह्यतत् सुखोदकै भविष्यति।
श्रीराम को देखते ही भरत ‘हा! आर्य’ कहकर उनके चरणों में गिर पड़ते हैं। जिस अयोध्या के राजवैभव को उनकी माता कैकेयी ने उन्हें दिलाया था, उसे वे श्रीराम के चरणों अर्पित कर देते हैं। चित्रकूट के वन में अयोध्या के राज्य वैभव के उत्तराधिकार का निर्णय होने लगा – श्रीराम ने ‘तुम रखो, तुम्हारे लिए माता ने महाराज से प्राप्त किया है।’ भरत ने कहा- ‘नहीं, नहीं यह राजवैभव आपका है, अयोध्या से आपके निकलते ही दुख-संतप्त होकर पिता ने देह त्याग दिया। जब मैं परदेश में था, मेरी माता ने पाप कर डाला। भरत ने तर्क दिया कि ‘जो पुत्र पिता की भूल को सुधार लेता है, उसे ही लोक में उत्तम संतान माना जाता है।’ श्रीराम अपना अटल प्रण बता देते है- ‘चन्द्रमा से उसकी प्रभा अलग हो जाए, हिमालय हिम का त्याग कर दे, समुद्र अपनी सीमा पार कर जाए, तब भी मैं पिता की प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकता।’ राम और भरत के मध्य अयोध्या का राज्य वैभव क्रीड़ा कंदुक के समान हो गया।
भरत श्रीराम को अयोध्या लौटाने में सफल नहीं हुए, तब भरत ने श्रीराम के आगे चरण पादुका रखी, ‘आप इन पर चरण रखें। यही पादुका संपूर्ण जगत के योगक्षेम का निर्वाह करेंगी। चौदह वर्ष तक राज्य का सारा भार आपके चरणपादुकाओं पर रखकर मैं आपकी प्रतीक्षा करता रहूँगा। यदि चौदह वर्ष पूरा होने पर आपका दर्शन नहीं हुआ तो मैं जलती आग में समा जाऊँगा।’ श्रीराम की चरण पादुका की क्षत्र-छाया में भरत ने राज्य भार सम्हाला, उन्होंने यह कभी नहीं माना कि वे अयोध्या राज्य के स्वामी हैं। भरत अपने धर्म पर स्थिर हैं।
रावण वध के उपरांत श्रीराम को सबसे पहले भरत की याद आयी, वनवास की अवधि पूरी होने वाली है, भरत मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं, शीघ्र अयोध्या लौटना होगा।
श्रीराम के राज्याभिषेक में आए व्यवधान की अवधि पूरी हो गयी। विचारणीय है कि व्यवधान आया क्यों? भरत चाहते कहाँ थे कि अयोध्या के राजा बनें? वास्तविक व्यवधान कैकेयी का हठ नहीं था, तब क्या था?
राक्षसराज रावण ने ऋषियों की तपोभूमि को राक्षसों की मौज-मस्ती का स्थान बना रखा था। वाल्मीकि रामायण में बताया गया है कि रावण अधिकृत दण्डकारण्य के क्षेत्र को राक्षस जनस्थान कहते थे। एक तो राक्षस ऋषियों की तपोभूमि पर काबिज हो गए थे, दूसरे ऋषियों का नरसंहार कर रहे थे, ऋषि अपनी तपोभूमि से विस्थापित हो रहे थे। बिल्कुल आज के आतंकियों की तरह ही राक्षस काम कर रहे थे।
श्रीराम ने हड्डियों का अंबार देखकर ऋषियों से पूछा- यह क्या है? ऋषियों ने बताया- ‘राक्षसों ने ऋषि-मुनियों को खाकर उनकी हड्डियों का ढेर लगा दिया है।’ तुलसी बाबा ने लिखा है- निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए। और तब श्रीराम ने संकल्प लिया-
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह।।
चौदह वर्ष के वनवास काल में से श्रीराम ने दस वर्ष की अवधि ऋषियों के सान्निध्य और सुरक्षा में गुजारी थी- रमतश्चानुकूल्येन ययु: संवत्सरा दश। इसका उद्देश्य था यज्ञ संस्था की पुनस्र्थापना और बुझी हुई यज्ञाग्नि को पुन: प्रज्वलित कर वेद धर्म की पुनप्र्रतिष्ठा। रामायण यह संदेश देता है कि धर्म से ही कल्याणप्रद अर्थ उत्पन्न होता है, धर्म से ही सुख प्राप्त होता है, धर्म से सब कुछ मिलता है। धर्म ही जगत का सार है- धर्मादर्थ प्रभवति धर्मात्प्रभवते सुखम्। धर्मेण लभते सर्वं धर्म सारमिदं जगत।। वेदधर्म की तपोभूमि की पुनस्र्थापना के उपरांत अयोध्या में श्रीराम का आगमन हुआ।





