ताड़का वध के बाद भगवान राम ने यहां किया स्नान

अमिय भूषण, अध्येता, भारतीय संस्कृति परंपरा


बक्सर का रामरेखा घाट श्रीराम की स्मृतियों का चिर साक्षी है। मान्यताओं के अनुसार यह एक ऐसा नदी घाट है, जहाँ श्रीराम ने कभी एक रेखा खिंची थी। जिस नाते इसका नाम रामरेखा घाट पड़ा। वही यह एकलौता ऐसा स्थान भी है, जहाँ राम अपने जीवन मे दुबारा आए थे। श्रीराम सर्वप्रथम ऋषि विश्वामित्र संग इस नगर में आए थे। इसका प्रयोजन ऋषियों को सताने वाले असुर दल का दमन था। वे ऋषि विश्वामित्र के सान्निध्य में अनुज लक्ष्मण संग यहाँ पहुँचे थे। रामायण के अनुसार यहाँ पहुँचने से पूर्व रात्रि को ये लोग कामाश्रय वन में रुके। यह वर्तमान में बलिया जिले का क्षेत्र है। यहाँ से वे प्रात: ऋषि विश्वामित्र आश्रम के लिए निकले। आगे मार्ग में क्रोध से भरी ताड़का मिली, जो इन्हें देख कर मारने के लिए दौड़ी, वहीं स्त्री वध की बात सोचकर राम संशय में थे। किंतु ऋषि विश्वामित्र की प्रेरणा से उन्होंने इस दुर्दांत का अंत किया। इस राक्षसी के वध उपरांत वे गंगा के इस घाट पर स्नान हेतु प्रथम बार आए थे। स्त्री वध की ग्लानि से भरे राम को यहाँ स्नान से आत्मिक शांति मिली थी, वहीं इस कार्य ने उन्हें प्रशंसा भी दिलाई। यहाँ स्नान करने उपरांत उन्होंने विभिन्न ऋषि आश्रमों की यात्रा की। इनमें पाँच महर्षि गौतम, नारद, भार्गव, आरुणि उद्दालक और ऋषि विश्वामित्र आश्रम की चर्चा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे गुरु विश्वामित्र आश्रम में चल रहे यज्ञ का निमंत्रण लेकर इन मुनियों के आश्रम गए थे। इन सभी को निमंत्रण देने के उपरांत वे ऋषि विश्वामित्र आश्रम पहुँचे। ये सभी आश्रम एक खास परिक्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। इसे ही चरित्र वन कहा गया है। रामायण वर्णित यह स्थान रामरेखा घाट से प्रारंभ होकर बक्सर नगर के आस—पड़ोस तक जाता है। यह भूमि राम के वास्तविक चरित्र के प्राकट्य एवं व्यक्तित्व निर्माण की प्रथम पावन स्थली है। इस नाते ही इसे चरित्र वन से संबोधित किया गया है। यहाँ इन स्मृतियों में अब भी एक यात्रा निकलती है। अगहन कृष्ण पक्ष पंचमी तिथि को श्रद्धालु रामरेखा घाट पर स्नान करने के उपरांत परिक्रमा को निकलते हैं। इसके पाँच पड़ावों में पहला अहिरौली है, दूसरा नारदाश्रम नदाँव है। जबकि आगे के पड़ाव मे भभुहर का भार्गव आश्रम तथा बड़का नुआंव अर्थात उनुआव गाँव अवस्थित ऋषि आरुणि उद्दालक आश्रम है। इसके उपरांत यह पंच दिवसीय यात्रा ऋषि विश्वामित्र की स्मृतियों को संजोए बक्सर नगर के विश्वामित्र पीठ को जाती है। यह प्रसिद्ध संत मामाजी का आश्रम है। इन पाँच दिनों में इन सभी स्थानों पर श्रद्धालुओं का स्वागत पारम्पारिक भोजन से होता है, जिसमें दही चूड़ा,सत्तू खिचड़ी जैसे बिहारी व्यजंन होते हैं। हर दिन और हर जगह के लिए अलग व्यंजन निर्धारित है। मान्यता है कि रामजी का जहाँ जिस पकवान से स्वागत हुआ था, वहां इस यात्रा में श्रद्धालुओं को परोसा जाता है। इस परिक्रमा मेला के अवसर पर बड़ी संख्या में लोग रामरेखा घाट आते हैं। इन दिनों यहाँ घाट पर लिट्टी चोखा बनाने, खिलाने का चलन है। क्योंकि मान्यताओं के अनुसार श्रीराम ने यहाँ स्नान उपरांत यही खाया था। यह घाट कई दूसरी स्मृतियों को भी संजोये है। यहाँ एक मंदिर में उनके चरणपादुका का स्वरुप चिन्ह है, जिसे यहाँ के संतों के निवेदन पर वे मिथिला यात्रा क्रम में छोड़ गए थे। बात श्रीराम की दूसरी यात्रा की करें, तो यज्ञ प्रयोजनार्थ यहाँ वे पुन: एक बार आए थे। तब इसी गंगा घाट पर उन्होंने रेखा खिंच यज्ञ प्रयोजन पूर्ण किया था। उन्होंने रामेश्वर नाथ महादेव की स्थापना भी की थी। शिव उपासक श्रीराम ने अपनी यात्राओं में केवल दो स्थानों पर ही शिवलिंग स्थापित किए हैं। इनमें से एक ये रामरेखा घाट और दूसरा रामेश्वरम है।

चौरासी कोस में विस्तारित यह वह भूमि है, जहाँ कभी अठारह हजार ऋषि तपस्यारत थे। यह नगर भगवान विष्णु के वामन अवतार से भी संबंधित है। यह उनका प्राकट्य और तपोभूमि दोनों है। महामुनि विश्वामित्र यहाँ आने वाले एकलौते ऋषि नहीं थे। देवर्षि नारद,ऋषि भार्गव,गौतम और आरुणि उद्दालक भी यहाँ साधना के लिए खिंचे चले आए थे। ऐसे पाँच महर्षि एक ही समय यहाँ साधनारत थे।

श्रीराम की दूसरी यात्रा के एक अन्य कारण के तौर पर यहाँ का गौतम आश्रम है। अहिल्या उद्धार की कथा के अनुसार देवी अहिल्या का प्रभु श्रीराम के चरणों मे गिरना हुआ था। ऐसे मे मर्यादा पुरुषोत्तम राम भला इसे कैसे स्वीकार्य कर सकते थे। उनके लिए वे केवल ऋषि पत्नी नहीं अपितु पूजनीय देवी भी थीं। ऐसे में इन सभी के आशीर्वाद,पूजन और अनुष्ठान के निमित्त प्रभु राम का पुन: आना हुआ, ऐसी भी एक मान्यता है। वैसे वाल्मीकि रामायण से लेकर अधिकांश रामायणों के अनुसार अहिल्या उद्धार की घटना गंगा पार करने के उपरांत घटित हुई है। किंतु बांग्ला के कृतिवास और तुलसीदास कृत रामचरितमानस के अनुसार यह घटना इस क्षेत्र से संबंधित है। भूपरिक्रमणम् नामक ग्रंथ में तो रामरेखा घाट से ऋषि गौतम और विश्वामित्र मुनि आश्रमों की स्पष्ट दूरी लिखी गई है। वैसे देवी अहिल्या उद्धार प्रसंग स्थल का विचार मन्वंतर एवं कल्प भेद का विचार करते हुए होना चाहिए। इस नाते निश्चित ही बक्सर संग दरभंगा के विकास का मार्ग खुलेगा। वैसे साहित्य और शास्त्र प्रमाणों के आधार पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि बक्सर के गंगा किनारे का यह रामरेखा घाट अपने आप में है एक पूरा इतिहास।