प्रमोद कुमार दुबे
लेखक श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े रहे हैं
कवि केदारनाथ अग्रवाल की माक्र्स मिजाजी कविता ‘लाल सवेरा’ कह रही है-
‘रोटी तुमको राम न देगा ।
वेद तुम्हारा काम न देगा ।
जो रोटी का युद्ध करेगा,
वह रोटी को आप वरेगा।
यह बात केवल ‘लाल सवेरा’ वाले नहीं कहते, दूसरे-तीसरे कई लोग बहुधा कहते रहते हैं। क्या सचमुच राम रोटी नहीं देते और न वेद काम आता है, रोटी के लिए युद्ध करना पड़ता है ?
श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के समय विरोधी कह रहे थे, श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर बनाने से क्या मिलेगा, वहाँ अस्पताल बनाना चाहिए, वहाँ विश्वविद्यालय होना चाहिए। आज भी यह प्रश्न उठता है- मंदिर से क्या मिलेगा? इस प्रश्न का उत्तर भी लोग पर्यटन स्थलों के आर्थिक लाभ के समान दे देते हैं। जब तीर्थयात्रा को पर्यटन कहने में कठिनाई महसूस होती है, धार्मिक पर्यटन कह देते है। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर, अयोध्या के संदर्भ में इसप्रकार की सतही धारणा रखने से भारतीय अर्थ बोध से वंचित रहना पड़ेगा, पश्चिमी आर्थिक धारणा की मानसिक दासता से मुक्ति नहीं मिलेगी।
यह नहीं भूलना चाहिए कि श्रीराम राजा हैं अर्थात उस धर्म के मूर्तमान विग्रह जिसके अनुशासन में अर्थ और काम की प्रवृत्ति का विष निकल जाता है, अर्थ और काम मारक नहीं रहते, पालक बन जाते हैं। श्रीराम त्रिवर्ग के अधिष्ठाता हैं। आदिकवि वाल्मीकि ने श्रीराम को ‘धर्मकामार्थ विशारद:’ कहा है। श्रीराम से ही अर्थ की भारतीय अवधारणा फलित होगी।
अभी विश्व में अधर्म से अर्थार्जन का रोग फैला हुआ है। औद्योगिक क्रांति के बाद शोषक और शोषित उत्पन्न हुए, पूँजीवाद और साम्यवाद में टकराव शुरु हुआ। लाल सवेरा कहने लगा- जो रोटी का युद्ध करेगा, वह रोटी को आप वरेगा। उसे होश नहीं था कि खूनी क्रांति की खून सनी रोटी खाकर न मनुष्य बचेगा और न मनुष्यता रहेगी । स्वस्थकर रोटी केवल राम की रोटी है, वेद धर्म का अर्थ ही पोषक है।
श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के दौर में आधुनिक आर्थिक विकास के कायल लोगों ने इतना दबाव बनाया कि श्रीराम की आर्थिक अवधारणा को उजागर करना अनिवार्य हो गया है। इस बौद्धिक इतिहास को याद करना आवश्यक है क्योंकि राम की रोटी भारतीय आर्थिक अवधारणा और आर्थिक स्वतंत्रता का अभियान है। ‘राम और रोटी अर्थात राम की अर्थव्यवस्थाÓ शीर्षक से मेरा लेख साप्ताहिक पांचजन्य (12 मई 1991) में प्रकाशित हुआ। इसी क्रम में चुनौती अंक, पांचजन्य 18 अगस्त 1991 के लिए मैंने ‘भगवान श्रीराम का अर्थशास्त्र’ शीर्षक लेख लिखा, स्वदेशी पत्रिका के लिए राम, दाम और काम के त्रिवर्गीय विमर्श को आर्थिक संस्कृति के रूप में विस्तार दिया। आज वाल्मीकीय रामायण के आर्थिक पक्ष पर भी भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत शिक्षा क्षेत्र में भी प्रकल्प चल रहे हैं। इससे विश्व को श्रीराम की प्रकृति संगी और स्वसृजित आर्थिक दृष्टि का परिचय सुलभ होगा।
पं. दीनदयाल उपाध्याय ने स्वाधीन भारत में राम की रोटी अर्थात धर्म के अर्थ का बोध पुनस्र्थापित किया। उनका कथन है- ‘भौतिकता और आध्यात्मिकता का समन्वय धर्म से होता है, धर्म ही राम और रोटी के बीच की जीवमान कड़ी है। जो रोटी राम से विमुख करे, उसमें कोई राम नहीं और राम की उपासना रोटी के बिना हो ही नहीं सकती- भूखे भजन न हो ही गोपाला, ले लेउ अपनी कंठी माला। रोटी अवश्य चाहिए, पर जैसे कच्ची रोटी पेट में दर्द करती है, वैसे ही पाप की रोटी मन को बिगाड़ती है। रोटी वही, जो ठीक सिंकी हो, पुण्यमयी हो। अन्यथा आटे के टुकड़े को रोटी कहना ठीक नहीं होगाÓ (दी.वा. खं. 14, पृ. 9-10.)। पं. दीनदयाल के ऐतिहासिक साक्ष्य यह है कि धर्माधिष्ठित अर्थव्यवस्था से ही भारत विश्व का सबसे समृद्ध राष्ट्र बना था। जिस धन के लिए इस्लामी हमलावरों ने सन् 1001 ई. से लगातार भारत को लहुलुहान किया। भारत को पुन: सर्वसमृद्ध राष्ट्र बनाने के लिए श्रीराम के अनुशासन में भारत की त्रिवर्गीय शक्ति संरचना स्थापित करनी होगा, हमें पश्चिमी देशों के अर्थ बोध से मुक्त होना होगा।
माक्र्सवाद पश्चिमी देशों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में विकसित हुआ है। माक्र्स ने हेगेल के राष्ट्र और राज्य केन्द्रित विचार को नकार कर द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद को वैश्विक परिप्रक्ष्य दिया। उसने राष्ट्र और राज्य के उत्कर्ष को फासीवाद कहा और फासीवाद को व्यक्ति स्वतंत्रता के विरुद्ध माना। हेगेल के लिए द्वन्द्वात्मक शक्तियों का परिणाम राष्ट्र और राज्य था और माक्र्स के लिए सामाजिक वर्गसंघर्ष और वर्ग विहीन समाज का प्रतिफलन।
इसी वैचारिक प्रेरणा से भारत का माक्र्स मिजाजी भी समाज में वर्गभेद की रचना करता है और राष्ट्र का विरोध। यदि हम कहें कि वहाँ राष्ट्र नहीं होता, जहाँ राम राजा नहीं हों- न हि तद् भविता राष्ट्रं यत्र रामो न भूपति। राष्ट्र को नेशन मानकर माक्र्स मिजाजी टूट पड़ेगा। यह है दिमागी बुनावट अंतर।
वह त्रिर्वग नहीं जानता, द्वन्द्वात्मक तर्क पद्धति अर्थात पक्ष, प्रतिपक्ष और संपक्ष की पद्धति पर केन्द्रित है, जिसकी बुनियाद ग्रीक दर्शन में है। इसी विचार परंपरा से हेगेल और माक्र्स का संबन्ध है।
थेल्स (640 ई.पू.) को ग्रीस का पहला दार्शनिक है। फिर भी द्वन्द्वात्मक तर्क पद्धति का आरंभ सुकरात (469- 399 ई.पू.) से माना जाता है।
सुकरात एथेंस में प्रचलित बहुदेववाद, देवताओं के लिए बलि और धर्मभीरुता का खंडन करता था, वह धार्मिक भावुकता से नैतिकता को अलग रखने का परामर्श देता था। उसने पारंपरिक विश्वासों को चुनौती दी और कार्य कारण पर प्रश्न करने की प्रेरणा। इसे संशयवाद कहा जाता है। सुकरात की प्रसिद्ध उक्ति है- मैं एक ही बात जानता हूँ कि मैं नहीं जानता।
आधुनिक शिक्षा प्राप्त लोग सुकरात की उक्त पंक्ति बहुधा दुहराते हैं और संशयवाद के इल्म से बहुदेववाद, बलि प्रथा और धार्मिक आस्था को तर्कहीन भावुकता मसमझते हैं। यदि हम कहें कि संशय करनेवाला विनष्ट हो जाता है- ‘संशयात्मा विनश्यतिÓ तो सुकरात की बात कट जाएगी और आधुनिक बुद्धिजीवी उलझ जाएगा । सुकरात अपनी विचार परंपरा में ठीक है। भारत में भी ‘वादे-वादे जायते तत्त्व बोधा:’ की परंपरा है, धर्मभीरुता की नहीं, धार्मिकता की परंपरा।
सुकरात का मानना था कि ज्ञान और अज्ञान समीपवर्ती हैं, अज्ञान से ज्ञान की ओर जाना मनुष्य का स्वभाव है, जो सत्य को जान जाएगा, वह असत्य की ओर नहीं जाएगा- बिल्कुल ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय। असतो मा सदगमय’ के समान।
सुकरात नहीं भूल पाता था कि एथेंस पर स्पार्टा ने बहुत अत्याचार किया। वह मानता था कि एथेंस वासियों की हार उनके चारित्रिक पतन से हुयी। उसने एथेंस वासियों की चरित्र दुर्बलता के कारणों पर विचार किया। सुकरात के चिन्तन का सरोकार राज्य से था। सुकरात की विचार परंपरा के अन्य विचारक प्लुटो, अरस्तु, हिगेल और माक्र्स इत्यादि ने भी राज्य के पक्ष या विपक्ष में विचार किया ।
सुकरात की तर्क पद्धति में जो त्रिकोण था, वही द्वन्द्वात्मक तर्क पद्धति में विकासित हुआ और त्रिकोणीय विचार पद्धति आज भी पश्चिमी विचारकों में प्रचलित है। प्रश्न है कि क्या त्रिकोणीय तर्क पद्धति ग्रीस में भारत से गयी थी? ‘ग्रीक दर्शन में भारतीय प्रभाव’ शीर्षक लेख में विद्वान लेखक रासमोहन चक्रवर्ती ने अनेक अध्येताओं के कथन उधृत किया है, जिनसे यह सिद्ध होता है कि ग्रीक दर्शन पर भारतीय प्रभाव पड़ा। उक्त लेख से कुछ कथनों को मैं उधृत करता हूँ जिससे भारत के त्रिगुणात्मक भौतिक चिन्तन के प्रति जिज्ञासा बढ़े।
ए.बी. कीथ यह मानते हैं कि ग्रीक दर्शन का प्रभाव भारतीय दर्शन पर नहीं पड़ा, भारतीय दर्शन के बहुत बाद ग्रीस में दर्शन आरंभ हुआ। ऋग्वेद के सूक्तों से ही भारतीय दर्शनिक विचारों का सूत्रपात हुआ। गार्बे का मानना है कि ग्रीक दार्शनिक सिद्धान्त भारतीय सांख्य दर्शन से प्रभावित है। पैथागोरस भी सांख्य से प्रभावित था। विन्टरनीज ने भी माना है कि ग्रीक दर्शन पर भारतीय प्रभाव है।
प्लेटो ( 428- 348 ई.पू.) ने सुकरात के विचारों को ग्रंथीय कलेवर दिया। प्लेटो की सुप्रसिद्ध पुस्तक रिपब्लिक की समालोचना के लिए ई.जे. उर्विक ने पुस्तक लिखी- मैसेज ऑफ प्लेटो। इस पुस्तक में उर्विक ने लिखा है- प्लेटो ने अपने रिपब्लिक नामक ग्रंथ में जिस सिद्धान्त की स्थापना की है वह भारतीय सिद्धांत की प्रति ध्वनि मात्र है। प्लेटो की दार्शनिक भाषा में कहीं कहीं उपनिषदों की समानता देखकर मैक्स मूलर ने यह अनुमान किया था कि भारतीय दर्शन से प्लेटो का गहरा परिचय था। प्लेटो ने फिड्रस नामक अपने ग्रंथ में कठोपनिषद एक प्रसिद्ध रूपक रखा है, जिसमें आत्मा को रथी और इन्द्रियों को अश्व के रूप में वर्णित किया गया है-
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धि तु सारथिं विद्धि मन: प्रग्रहमेव च।। 1.3.3.
मेरा मानना है कि ग्रीक और पश्चिमी विचारकों में प्रचलित त्रिकोणीय तर्क पद्धति सांख्य दर्शन के त्रिगुणात्मक प्रकृति और उसकी साम्यावस्था की धारणा से प्रभावित हुई होगी और तैत्तिरीयोपनिषद की शिक्षावल्ली में पाँच प्रकार संहितोपासना के लिए पूर्व पक्ष, उत्तर पक्ष, संधि और संधान की प्रक्रिया दी हई है। इसमें तीन नहीं, चार आयाम हैं। द्वन्द्वात्मक तर्क पद्धति में पक्ष, प्रतिपक्ष और संपक्ष का त्रिकोण है, लेकिन त्रयी और त्रिवर्ग में तीन है। इन सभी का मूल उत्स त्रयी विद्या ही है।
इस शास्त्रीय विषय की चर्चा का प्रयोजन यह कि त्रिकोणीय तर्क पद्धति के बदले बौद्धिक विमर्शों में त्रिगुणात्मक भौतिक चिन्तन और श्रीराम का अर्थशास्त्र का धर्म, अर्थ और काम का त्रिवर्ग स्थापित हो सके। ह्व





