विक्रम संवत् और विक्रमादित्य

प्रो. वासुदेवशरण अग्रवाल
प्रसिद्ध इतिहासकार


नवीं शताब्दी के आसपास इसका नाम विक्रम संवत् पड़ा। उससे पहले इसकी संज्ञा मालव संवत् थी। सं. 898 के चंड महासेन के धौलपुर शिलालेख में विक्रम संवत् का सबसे पहला उल्लेख प्राप्त हुआ है; किन्तु इसके 38 वर्ष बाद के ग्यारसपुर (ग्वालियर) के लेख में इसे ‘मालवेशों का संवत्’ कहा गया है। इससे ज्ञात होता है कि नवीं और दसवीं शताब्दियों के लगभग लोक में यह विश्वास था कि यह विक्रम संवत् मालेवेशों का स्थापित किया हुआ था। सं. 1131 के चालुक्य कर्कराज के नवसारी ताम्रपट्ट ने इस संवत् को निश्चित रूप से विक्रमादित्य के द्वारा आरंभ किया हुआ संवत्सर कहा है। अतएव कम से कम एक सहस्र वर्ष पूर्व हमारी जनता का यह दृढ़ विश्वास था कि विक्रमादित्य के द्वारा इस संवत्सर की स्थापना हुई।

मालव संवत् नाम पडऩे से पहले विक्रम संवत् का नाम कृत संवत् था। मंदसौर से प्राप्त नरवर्मा के सं. 461 (404 ई.) के लेख में ऐतिहासिक स्थिति का ठीक—ठीक वर्णन किया गया है और सूत्र रूप में इस संवत् के प्राचीन नाम और उसके क्षेत्र का निर्देश कर दिया गया है—
श्रीमालवगणाम्नाते प्रशस्ते कृतसंज्ञिते।
एकषष्ट्यधिके प्राप्ते समाशतचतुष्टये॥

यह राजा नरवर्मा में चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समकालीन थे और संभवत: उनकी ओर से मालव के अधिपति शासक थे। गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने मालव को विजित किया था और वहाँ पर जो चाँदी के सिक्के जारी किए उन पर लिखा है—
परमभागवत महाराजाधिराज श्रीचंद्रगुप्तविक्रमादित्यस्य।
ई. सन् 400 के लगभग उत्तर भारत और मालवा में चंद्रगुप्त का राज्य था और ‘विक्रमादित्य’, ‘विक्रमांक’ या ‘विक्रम’ घर—घर में प्रचलित था। रीवा राज्य के सुपिया नामक गाँव से मिले एक गुप्तलेख में वंशावली देते हुए श्री समुद्रगुप्त के पुत्र को विक्रमादित्य और विक्रमादित्य के पुत्र को महेंद्रादित्य कहा गया है। चंद्रगुप्त और कुमारगुप्त नाम नहीं दिए गए। जब विक्रमादित्य नाम इस प्रकार सर्वत्र प्रसिद्ध था और मालवे से उसका विशेष संबंध था, तब भी 400 ई. के लगभग यही प्रसिद्ध था कि इस संवत् का नाम कृत संवत् है, और मालवा में इसकी प्रसिद्धि और इसकी स्थापना हुई। मालवा से बाहर और सब जगह गुप्त साम्राज्य में गुप्त संवत् का प्रयोग हो रहा था, कृत संवत् या विक्रम संवत् का नहीं।

अब तक कृत संवत् का पहली बार नाम और प्रयोग उदयपुर (मेवाड़) रियासत के नांदसा स्थान से प्राप्त संवत् 282 (225 ई.) के यूप-लेख में पाया गया है। यह संयोग की बात है कि जन्म के बाद करीब पौने तीन सौ वर्ष तक इस संवत् के प्रयोग का कोई उदाहरण हमारे लिये नहीं बचा। इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रारंभ के तीन सौ वर्ष में इसका प्रयोग और प्रचार था ही नहीं। ऐतिहासिक पद्धति से सही अनुमान यही निकलता है कि उन तीन सौ वर्ष में भी इस संवत् का नाम कृत संवत् था और मालवों में इसका प्रचार था। उनमें यही अनुभूति विख्यात होगी कि उनके गण की स्थापना से कृत संवत् का प्रारंभ हुआ।

विक्रम की तीसरी शताब्दी से छठी शताब्दी तक कृत संवत् के जो लेख अब तक मिले हैं उनसे एक बात अच्छी तरह मालूम होती है कि इन तीन सौ वर्ष तक कृत संवत् का प्रयोग अक्षांश और देशांश के एक परिमित क्षेत्र में ही हुआ। नांदसा (उदयपुर, सं.282), बर्नाला ( जयपुर, सं. 284), बड़वा (कोटा, सं. 295), विजयगढ़ (भरतपुर, सं.428), मंदसोर (मालवा, सं. 461, 493, 529, 589) और नगरी (चित्तौड़, सं. 481) इस क्षेत्र की सीमाओं को सूचित करते हैं। मोटे तौर पर दक्षिणी जयपुर से उज्जैन तक के प्रदेश में मालवगण का विस्तार था और वहीं पर कृत संवत् का प्रयोग हुआ। इस क्षेत्र के बाहर काल-गणना के दूसरे प्रकार प्रचलित थे। बाहर जब गुप्त संवत् जैसे प्रतापी संवत् का व्यापक प्रचार था उस समय भी मालवक्षेत्र में मालवगण के अपने कृत संवत् में ही कालगणना होती थी। यह इस बात का प्रमाण है कि मालवगण का इस संवत् के साथ कितना घनिष्ठ और अंतरंग संबंध था। शिलालेख भी इसका दृढ़ साक्ष्य देते हैं कि मालवगण की स्थापना से संवत् की काल-गणना का प्रारंभ हुआ-मालव-गणस्थिति-वशात् काल-ज्ञानाय लिखितेषु। (यशोधर्मन् का मंदसोर लेख, सं. 589, ई. 532)।

मालवगण-स्थिति मालवगण की स्थिति शब्द का ठीक अभिप्राय क्या है? हमारी सम्मति में स्थिति का सीधा अर्थ स्थापना है। मालवगण की स्थापना का यह अर्थ नहीं है कि उस गण की सत्ता पहले अविदित थी। मालव जाति का जो इतिहास अब तक ज्ञात है उसके अनुसार ई. पू. चौथी शताब्दी में मालव पंजाब में बसे थे। क्षुद्रकों के साथ मालवों का बड़ा मेल था और दोनों का संयुक्त सैनिक संगठन बड़ा प्रचंड था। पाणिनी के ‘खंडकादिभ्यश्च’ सूत्र के गणपाठ में क्षुद्रक और मालवों की समिलित सेना को क्षौद्रकमालवी सेना कहा गया है (क्षुद्रकमालवात्सेना सज्ञायाम् )। मालवों ने सिकंदर से रणभूमि में लोहा लिया था। सिकंदर के साथी यूनानी इतिहासकारों ने मालवयुद्ध का बड़ा ही रोमांचकारी वर्णन किया है। वीर मालवों के एक भीम बाण ने सिकंदर के पाव को भेदकर उसे लगभग मृत्यु के मुख तक पहुँचा दिया था। मालवों का यह कराल क्रोध उस यूनानी सेनापति के काल को निकट खींच लाया और कुछ ही महीनों बाद स्वदेश पहुँचने के पहले ही उसकी मृत्यु हो गई। छह फुट के धनुष पर नौ फुट का बाण छोडऩे वाले ये मालव अत्यंत पराक्रमी और स्वातंत्र्यप्रेमी थे। विदेशी सत्ता के प्रति उनका प्रतप्त क्रोध पंजाब में भली भाँति प्रकट हो चुका था।

दूसरी शताब्दी ई. पू. के लगभग हम मालवों को जयपुर रियासत में बसा हुआ पाते हैं। कर्कोट नगर इन मालवों का प्रधान केंद्र था जहाँ उनके अनेक सिक्के मिले हैं। इन सिक्कों पर ‘मालवानां जय:’ अंकित है। ये मालव पंजाब से यहाँ आकर बसे थे। यूनानी आक्रमण के बाद कई गणराज्य पंचनद से होकर राजपूताने की ओर चले आए। उनमें से चित्तौड़ के समीप नगरी स्थान में शिवि जनपद के लोग आकर बसे और जयपुर रियासत में मालवगण ने सन्निवेश किया। यह बात सिक्कों की सामग्री से प्रमाणित होती है।

लगभग सौ डेढ़ सौ बरस तक मालव सुख-शांति से निवास करते रह होंगे, जबकि ई. पू. प्रथम शताब्दी के लगभग एक नया भय उपस्थित हुआ। शक स्थान के शकों की क्षहरात नामक शाखा ने पश्चिमी भारत की ओर बढ़कर सुराष्ट्र पर आक्रमण किया और कुछ काल के लिये वहाँ अपना दखल जमा लिया। इस वंश के दो राजाओं के सिक्के और लेख मिले हैं। इनमें पहला भूमक और दूसरा नहपान था। क्षहरात शकों के इस आक्रमण की एक धारा तक्षशिला के मार्ग से घुसती हुई मथुरा तक पहुँची लेखों और सिक्कों से तक्षशिला और मथुरा के क्षहरात घरानों का भी परिचय मिलता है। मथुरा में क्षहरात महाक्षत्रप राजुबुल और शोडास ने दो पीढ़ी तक राज्य किया। तक्षशिला में इसी समय महाक्षत्रप लिक और पतिक का राज्य था जो मथुरा के शकों से संबधित भी थे। शकों का यह त्रिशूलो आक्रमण कुछ टिकाऊ नहीं हुआ, किंतु करारा अवश्य था। नहपान के जो लेख नासिक की गुफा में मिले हैं उनसे विदित होता है कि उत्तमभद्रों और मालवों में कुछ लाग-डॉट थी। इस आपसी वैर में उत्तमभद्रों ने विदेशी शहरातों से सहायता की पुकार की। शकों ने उत्तमभद्र का पक्ष लेकर मालवों को दबाया। अनुमान होता है कि उत्तमभद्र अजमेर-पुष्कर के इलाके में थे।

मालव, महेंद्र और विध्य के विस्तृत त्रिकोण में राज्य का विस्तार करने वाले एकछत्र शासक गौतमीपुत्र श्री शातकर्णि ने शक, पल्हव और यवनों का विवसन किया और अश्मक, आकर, अवाति को अपने विजित में मिलाया। इस घटना की ऐतिहासिक संगति पूर्वापर घटनाओं पर विचार करते हुए इस प्रकार समझ में आती है। उत्तमभद्रों ने मालवों के विरुद्ध अपने वैर का निर्यातन करने के लिये विदेशी शहरात शकों का आवाहन किया, परंतु मालवों ने शातकर्णि को अपनी सहायता के लिये बुलाया। इस अनुमान की ओर संकेत करने वाली एक ऐतिहासिक कड़ी भी प्राप्त है। एक ओर मालव और शहरातवंशी नहपान के संबंध की बात पुरातत्व-प्रमाणित है, दूसरी ओर गौतमीपुत्र शातकर्णि और शक-पल्हव युद्ध का भी शिलालेख में वर्णन है। यदि यह जाना जा सके कि जिन शकों से गौतमीपुत्र का संघर्ष हुआ था वे भो नहपानवशी थे तो यह चित्र पूरा हो सकता है। यह जान लेने पर कि मालवों के जो वैगे थे, वे ही शातकर्णि से परास्त हुए, हम मालव और शातकर्णि के बीच की राजनीतिक संधि की निश्चित कल्पना कर सकते हैं। इस शृंखला की पूर्ति सिक्कों से होती है। भारतीय मुद्राशास्त्र में यह भली भाँति विदित है कि शातकर्णि ने नहपान की विजय के उपलक्ष्य में उसके सिक्कों पर फिर से अपने नाम की छाप लगवाई।

मुद्राशास्त्र का यह प्रमाण बहुमूल्य है और इससे सिद्ध होता है कि शातकर्णि ने जिन शकों को परास्त किया था वह नहपान का वंश ही था। यह स्मरण रखना चाहिए कि शकों की दो धाराएँ भारतवर्ष में आईं। पहली बार के शक शहरातवंशी थे जिनका वर्णन ऊपर किया गया है। दूसरी बार के शकों में मथुरा के कुषाणवशी वेम कदफ, कनिष्क आदि थे तथा उज्जयिनी के चष्टन, रुद्रदामा आदि थे। इन्हें भारतीय इतिहास में शाहानुशाहि शक कहा गया है। देवपुत्र शाहानुशाहि शक और पहरात शकों में अवश्य ही समय का व्यवधान मानना पड़ेगा। हम इन दोनों को एक साथ नहीं रख सकते। स्मिथ ने मथुरा के रंजुवुल-सुदास को प्रथम शती ई. पू. में रखा है (वही, पृ. 241) और शहरात शकों को प्रथम शती ई. के आरंभ में माना है। यह स्थापना किसी प्रकार समीचीन नहीं मानी जा सकती। भूमक की मुद्राओं और पल्हवों की मुद्राओं में बहुत कुछ साम्य पाया जाता है।

प्रथम शती ईस्वी पूर्व में शकस्थान पल्हवों के अधिकार में था। वस्तुत: पल्हव और शहरात शक दोनों एक ही राजनीतिक चक्र के अंतर्गत थे। इस संयुक्त सैनिक शक्ति को पश्चिमी भारत से गौतमीपुत्र शातकर्णि ने निर्मूल किया। इसी लिये शिलालेख में गौतमीपुत्र को शंक और पल्हव दोनों का विध्वंस करनेवाला कहा गया है। मालूम होता है कि बाहीक के यूनानी शासक भी इसी विदेशी चक्र के पोषक थे, अतएव शातकर्णि के शक्तिशाली उत्कर्ष के आगे वे भी अवरुद्ध हुए। नासिक के लेख में भवति और आकर को गौतमीपुत्र के राज्य के अंतर्गत लिखा गया है। मालवों के साथ उसकी राजनीतिक संधि को ध्यान में रखते हुए इसमें कुछ आश्चर्य नहीं मालूम होता।

शकों की पराजय के बाद मालवगण ने स्वतंत्रता का अनुभव किया। हमारी सम्मति में स्वतंत्रता की यह स्थापना ही मालवगण को स्थिति थी जिसका मालव-कृत संवत् के लेखों में कई बार उल्लेख है। पहली बार मालवगण अवंती-पाकर में प्रतिष्ठित हुआ और तब से वह भूप्रदेश मालव कहा जाने लगा। गौतमीपुत्र शातकर्णि के लेख में कहा गया कि उसने अनेक विशाल आनंदोत्सवों का आयोजन किया।

दिग्विजय के उपलक्ष्य में ऐसा करना स्वाभाविक था। मालवों ने भी इस विजयोल्लास के आनंद में भाग लिया होगा। शकों के हुंकार से मालवगण भयभीत होकर तितर—बितर हो गया था: ‘ते च मालया प्रनादेनैव अपयाता। (नासिक लेख) वही मालव विदेशियों का पराजय और स्वराज्य की स्थापना के बाद स्वदेश में पुन: संघीभूत हुए एवं उनका गण सुप्रतिष्ठित हुआ। यही घटना ‘मालवगणस्थिति’ थी। ऐतरेय ब्राह्मण के चरैवेति गान में कृतादि परिभाषाओं की व्याख्या करते हुए लिखा है :
कलि: शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापर: ।
त्तिष्ठस्त्रेता भवति कृतं संपद्यते चरन् ।

सोने वाले का नाम कलि है, अंगड़ाई लेने वाला द्वापर है, उठकर खड़ा होने वाला त्रेता है और चलने वाला कृतयुगी होता है। अथर्ववेद के पृथिवीसूक्त में ‘उदोराणा सतासीनास्तिष्ठन्त: प्रक्रामन्त:’ मंत्र में इन्हीं चार अवस्थाओं का निरूपण है जिसमें कृत के लिये प्रक्रम या पराक्रम की अवस्था कहा गया है। विशेष पराक्रम या विक्रम के द्वारा आदर्श सतयुग की स्थापना कृत है। मालवों ने सत्य ही शक-विजय के बाद अपने गण की स्थिति को कृतयुग की स्थापना समझा और इसी कारण संवत् को गणना कर कृत नाम रखा गया। कृत संवत् का यही अर्थ घटनाओं से असमंजस जान पड़ता है। गौतमीपुत्र शातकर्णि के नासिकवाले शिलालेख में कृत युग के अनुकूल आदर्शों की पुन: स्थापना का उल्लेख आया है। ‘सब ओर प्रजाओं को अभय की जलांजलि देकर निर्भय बनाया गया। चातुर्वण्र्य की व्यवस्था को न माननेवाले शकपल्हव यवनों को हराकर चातुर्वण्र्य को संकर-रहित बनाया गया। धर्म से कर ग्रहण करके प्रजाहित में उसका विनियोग किया गया। द्विजों का विवर्धन और वेदादि आगम-शाखों की रक्षा की गई।’ वासिष्ठीपुत्र ने इसी लेख में अपने पिता के प्रादशी का वर्णन करते हुए उन्हें ‘धर्मसेतु’ कहा है।

हमारे साहित्य में कृतयुग की स्थापना के यही आदर्श माने जाते रहे हैं। इस तरह विक्रम संवत की स्थापना के मूल में यह विचार मालूम होता है कि उसके प्रारभ से लोक में कृतयुग की फिर स्थापना हुई। श्री जायसवाल जी ने पूर्वापर का विचार करने के बाद श्री गौतमीपुत्र शातकर्णि को ही विक्रमादित्य माना था। पुरातत्व की उपलब्ध सामग्री के आधार पर जो ऐतिहासिक चित्र निर्मित हो सकता है वह यही है। विक्रमादित्य के संबंध में जैन अनुश्रुति विशेष रूप से उपलब्ध है। इस अनुश्रुति के आधार पर शकों के पश्चिम भारत में प्राक्रमण और किसी प्रतापी नरेश द्वारा उनकी पराजय की जो सूचना मिलती है उसका भी उपर्युक्त ऐतिहासिक संगति से मेल बैठ जाता है। हाँ, जैन अनुश्रुति की यह विशेषता है कि उसमें इस सम्राट की संज्ञा विक्रमादित्य कही गई है।


सम्राट विक्रमादित्य पर पुरस्कार
गत दिनों मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घोषणा की है कि उज्जैन के शासक रहे और विक्रम संवत् का प्रारंभ करने वाले सम्राट विक्रमादित्य के नाम पर तीन स्तर के पुरस्कार दिए जाएंगे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्राट विक्रमादित्य की गौरवशाली स्मृति को बनाए रखने और उनके शौर्य, न्याय, प्रजा वत्सल आदर्शों को अमर बनाने के लिए उनकी स्मृति में एक करोड़, एक लाख रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा। सम्राट विक्रमादित्य को लेकर अखिल भारतीय स्तर पर काम करने वाले को पुरस्कार के रूप में 21 लाख रुपए की राशि भेंट की जाएगी। राज्य स्तर पर काम करने वालों को 5—5 लाख रुपए के तीन पुरस्कार दिए जाएंगे। विक्रम संवत् 2083 के प्रारंभ से ठीक पहले इन पुरस्कारों की घोषणा से लोगों में बहुत ही अच्छा संदेश गया।

57 ईसा पूर्व में प्रारंभ विक्रम संवत् एक कैलेंडर युग के समान है। विक्रमादित्य के साथ 57 ईसा पूर्व में शुरू हुए युग का संबंध नौवीं शताब्दी से पहले किसी भी स्रोत में नहीं पाया जाता है। विक्रम संवत् को नौवीं शताब्दी के बाद विक्रमादित्य के साथ जोड़ा गया। फारसी विद्वान अलबरूनी 973-1048 ने भारत के पांच युगों का उल्लेख किया है— विक्रमादित्य 57 ईसा पूर्व, शक 78 ईस्वी, वल्लभ और गुप्त 319 ईस्वी श्री हर्ष 606 ईस्वी। हिंदुओं के धार्मिक अनुष्ठानों में मुख्य स्थान पाने वाला संवत् विक्रम संवत् है। विक्रमादित्य युग का उपयोग दक्षिणी और पश्चिमी भारत में हिंदुओं द्वारा प्रमुखता से किया जाता था। अलबरूनी की शक युग के बारे में निम्नलिखित किंवदंती मिलती है— एक, शक शासक ने उत्तर-पश्चिमी भारत पर आक्रमण किया और हिंदुओं पर अत्याचार किया। एक सूत्र के अनुसार, वह एक गैर-हिंदू था, जो पश्चिम से आया था।

78 सीई में, हिंदू राजा विक्रमादित्य ने उसे हराया और मुल्तान और लोनी के महल के बीच स्थित करूर क्षेत्र में उसे मार डाला। खगोलविदों और अन्य लोगों ने इस तिथि का उपयोग नए युग की शुरुआत के रूप में किया। चूँकि उज्जयिनी के शासक विक्रमादित्य के 57 ईस्वी पूर्व के विक्रम संवत् युग और शक युग के बीच 130 वर्ष का अंतर था। अत: संभवत: अलबरूनी ने निष्कर्ष निकाला कि उनके संस्थापक एक ही नाम के दो राजा थे। पहले विक्रमादित्य संवत् युग का नामकरण किया गया और दूसरे विक्रमादित्य द्वारा शक शासक की पराजय के साथ 78 सीई में शक युग को जोड़ा गया।
क्षेमेन्द्र के बृहत्कथमामंजरी और सोमदेव की 11 वीं सदी के कथासरित्सागर में, बृहत्कथा के दोनों रूपांतरों में विक्रमादित्य के बारे में अनेक किंवदंतियाँ हैं। प्रत्येक किंवदंती उसकी शक्ति को दर्शाती है।