प्रो. विवेकानंद तिवारी
अध्यक्ष, आम्बेडकर पीठ, एचपीयू, शिमला
विश्व का सबसे प्रमाणिक और वैज्ञानिक संवत्सर का नाम है विक्रम संवत्। सम्राट विक्रमादित्य एक महान सम्राट थे। इनका शासनकाल भारतीय इतिहास में स्वर्णिम युग के रूप में माना जाता है। उन्होंने भारतीय भूमि पर शकों का प्रभाव समाप्त किया और अपने शासनकाल में ऐतिहासिक कार्य किए। विक्रमादित्य के द्वारा शकों को पराजित करने का उल्लेख मुख्य रूप से ‘विक्रम संहिता’ और अन्य ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है। विक्रमादित्य की विजय के संदर्भ में ‘कल्पलता’ और ‘नरसिंहपुराण’ जैसे ग्रंथों में भी विवरण मिलता है। जहां उनके द्वारा शकों को हराने और भारत में शांति स्थापित करने के काव्यात्मक और ऐतिहासिक वर्णन मिलते हैं।
विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर उनके प्रभाव को समाप्त किया और उनके द्वारा कब्जा की गई भूमि को पुन: भारतीय साम्राज्य में शामिल किया। इस विजय के बाद विक्रमादित्य को ‘विक्रम संवत्’ की शुरुआत करने का श्रेय भी दिया जाता है। विक्रमसंहिता में विक्रमादित्य के शासनकाल और उनके द्वारा शकों की पराजय के बारे में काव्यात्मक और ऐतिहासिक संदर्भ मिलते हैं। यह ग्रंथ विक्रमादित्य की महानता, न्यायप्रियता और उनके युद्धकौशल को वर्णित करता है, जिसमें शकों पर उनकी विजय का उल्लेख किया गया है। यह ग्रंथ खगोलशास्त्र और राजनीति के बारे में है, जिसे वराहमिहिर ने लिखा था।
चैत्र मास
चैत्र मास ही नव वर्ष मनाने के लिए सर्वोत्तम है, क्योंकि चैत्र मास में चारों ओर पुष्प खिलते हैं, वृक्षों पर नए पत्ते आ जाते हैं चारों ओर हरियाली मानो प्रकृति ही नव वर्ष मना रही हो, चैत्र मास में सर्दी जा रही होती है तथा गर्मी का आगमन होने जा रहा होता है मनुष्य के लिए यह समय प्रत्येक प्रकार के वस्त्र पहनने के लिए उपयुक्त है। चैत्र में नया पंचांग आता है जिससे प्रत्येक भारतीय पर्व, विवाह तथा अन्य मुहूर्त देखे जाते हैं। चैत्र मास में ही फसल कटती है तथा नया अनाज भी घर में आता है तो किसानों का नया वर्ष भी इसे ही माना जाता है।
वासंतिक नवरात्र
प्रत्येक वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन से वासंतिक नवरात्रि आरंभ हो जाते हैं। चैत्र नवरात्रि से ही हिंदू नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है। चैत्र माह हिंदू नववर्ष का पहला महीना माना जाता है। इस दिन से ही पूरे वर्ष भर के अनुष्ठानों, पर्वों आदि के शुभ मुहूर्त तय किए जाते हैं।
हेमाद्रि के ब्रह्म पुराण के अनुसार, परमपिता ब्रह्मा जी ने पृथ्वी का निर्माण चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा यानी कि नवरात्रि के पहले दिन किया था। हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल चैत्र माह के पहले दिन यानी कि नवरात्रि की प्रतिपदा तिथि से ही हिंदू नव वर्ष लग जाते हैं।
विक्रम संवत्
विक्रमादित्य ने 57 ई.पू. में शकों को हरा कर जीत के उपलक्ष्य में नए काल सत्र का निर्माण किया, इसे ही हिंदू पंचांग में विक्रम संवत् या हिंदू नव वर्ष कहा जाता है। सम्राट विक्रमादित्य अखंड भारत के चक्रवर्ती राजा थे। राजा गंधर्वसेन के सबसे छोटे पुत्र विक्रमादित्य थे।
विक्रम संवत् या विक्रमी भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचलित हिन्दू पंचांग है। नेपाल के सरकारी संवत् के रूप में विक्रम संवत् ही चला आ रहा है।
इस संवत् का आरम्भ गुजरात में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से और उत्तरी भारत में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है। बारह महीने का एक वर्ष और सात दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत् से ही शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चन्द्रमा की गति पर रखा जाता है। यह बारह राशियाँ बारह सौर मास हैं। पूर्णिमा के दिन, चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से 11 दिन 3 घटी 48 पल छोटा है, इसीलिए प्रत्येक 3 वर्ष में इसमें 1 महीना जोड़ दिया जाता है। जिस दिन नव संवत् का आरम्भ होता है, उस दिन के वार के अनुसार वर्ष के राजा का निर्धारण होता है।
आरम्भिक शिलालेखों में ये वर्ष ‘कृत’ के नाम से आये हैं। 8वीं एवं 9वीं शती से विक्रम संवत् का नाम विशिष्ट रूप से मिलता है। संस्कृत के ज्योतिष ग्रन्थों में शक संवत् से भिन्नता प्रदर्शित करने के लिए सामान्यत: केवल ‘संवत्’ नाम का प्रयोग किया गया है ‘विक्रमी संवत्’ नहीं।
नव संवत्सर का महत्व
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नव वर्ष प्रारंभ होता है। इसी दिन सूर्योदय के साथ सृष्टि का प्रारंभ परमात्मा ने किया था। अर्थात् इस दिन सृष्टि प्रारंभ हुई थी तब से यह गणना चली आ रही है। यह नववर्ष किसी जाति, वर्ग, देश, संप्रदाय का नहीं है, अपितु यह मानव मात्र का नववर्ष है। रवि की नई फसल घर में आने से कृषक के साथ संपूर्ण समाज प्रसन्नचित होता है। वैश्य व्यापारी वर्ग का भी आर्थिक दृष्टि से मार्च महीना इण्डिंग समापन माना जाता है। इससे यह पता चलता है कि जनवरी साल का पहला महीना नहीं है पहला महीना तो चैत्र है जो लगभग मार्च-अप्रैल में पड़ता है। 1 जनवरी में नया जैसा कुछ नहीं होता किंतु अभी चैत्र माह में देखिए नई ऋतु, नई फसल, नई पवन, नई खुशबू, नई चेतना, नया रक्त, नई उमंग, नया खाता, नया संवत्सर, नया माह, नया दिन हर जगह नवीनता है। यह नवीनता हमें नई ऊर्जा प्रदान करती है। नव वर्ष को शास्त्रीय भाषा में नव संवत्सर संवत्सरेष्टि कहते हैं। इस समय सूर्य मेष राशि से गुजरता है इसलिए इसे मेष संक्रांति भी कहते हैं।
प्राचीन एवं ऐतिहासिक महत्व
आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही परम पिता परमात्मा ने यौवनावस्था प्राप्त मानव की प्रथम पीढ़ी को इस पृथ्वी माता के गर्भ से जन्म दिया था। इस कारण यह मानव सृष्टि संवत् है। इसी दिन परमात्मा ने अग्नि वायु आदित्य अंगिरा चार ऋषियों को समस्त ज्ञान विज्ञान का मूल रूप में संदेश क्रमश: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के रूप में दिया था। इस कारण इस वर्ष को ही वेद संवत् भी कहते हैं। आज के दिन ही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंका पर विजय प्राप्त कर वैदिक धर्म की ध्वजा फहराई थी। आज ही से कली संवत् तथा भारतीय विक्रम संवत् युधिष्ठिर संवत् प्रारंभ होता है। आज ही के दिन महर्षि दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की थी। आज ही के शुभ दिन संसार के समस्त सनातन धर्म अनुयायियों का दैविक बल जगाने के लिए धर्मराज्यम् की स्थापना की गयी थी।
सिंधी नववर्ष
सिंधी समाज चैत्र शुक्ल द्वितीया को ‘चेटी चंड’ के रूप में सिंधी नववर्ष मनाता है। यह सिंधी समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला एक जीवंत और गहन आध्यात्मिक उत्सव है। यह त्योहार सिंधी नववर्ष का प्रतीक है और जल देवता वरुण देवता के अवतार माने जाने वाले भगवान झूलेलाल की जयंती के रूप में मनाया जाता है। चेटी चंड के दिन सिंधी समुदाय शोभायात्राएं निकालते हैं, झूलेलाल की महिमा के गीत गाते हैं और मीठे चावल (ताहिरी), छोले और शरबत का प्रसाद बांटते हैं।
गुड़ी पड़वा महाराष्ट्र का नव वर्ष
यह दिन मराठी लोगों के नव वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है। इस पर्व को युगादी चेती चंड और नव संवत्सर उगादी जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता है। इस शुभ अवसर पर महिलाएं अपने घरों को सुंदर गुड़ी से सजाती हैं जो शुभ शुरुआत को दर्शाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह चैत्र महीने के पहले दिन मनाया जाता है। यह मराठी लोगों के नव वर्ष की शुरुआत का भी प्रतीक है। इस दिन मराठी समुदाय के लोग अपने घरों के बाहर समृद्धि के प्रतीक गुड़ी को लगाते हैं और पूजा करके गुड़ी पड़वा मनाते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह परंपरा पूरे साल खुशियां, सफलता और समृद्धि लाती है। गुड़ी का मतलब है ध्वज यानी झंडा और प्रतिपदा तिथि को पड़वा कहा जाता है। यह रबी फसलों की कटाई का प्रतीक है। यह दिन महाराष्ट्र में बड़ी भव्यता और दिव्यता के साथ मनाया जाता है। गुड़ी पड़वा का पर्व मराठा शासक छत्रपति शिवाजी महाराज की जीत के रूप में मनाया जाता है। इसे लोग विजय ध्वज के समान अपने घरों के बाहर फहराते हैं। यह पर्व हिंदू विजय और समृद्धि का प्रतीक है। गुड़ी पड़वा पर लोग नीम के पत्ते खाते हैं। मान्यता है कि गुड़ी पड़वा पर नीम की पत्तियों का सेवन करने से खून साफ होता है और रोगों से मुक्ति मिलती है।





